चैप्टर 4 : मेरे हमदम मेरे दोस्त उर्दू नॉवेल हिंदी में | Chapter 4 Mere Humdam Mere Dost Novel In Hindi

Chapter 4 Mere Humdam Mere Dost Novel In Hindi

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बहुत देर बाद वो बाथरूम से बाहर निकली, तो परवीन वहाँ से जा चुकी थी। दस मिनट बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। एक मर्तबा फिर वह उसके सामने खड़ी थी, अपनी मुस्कुराहट समेटे हुए।

“आपका खाने पर इंतज़ार हो रहा है।” यह उसका घर नहीं था, जहाँ वह अपनी मर्जी चलाती। ‘मुझे भूख नहीं। मेरा खाना खाने का मूड नहीं।’ किस्म का कोई बदतमीज जुमला बोल सकती।

वो यहाँ मेहमान थी। उसे यहाँ हर तरह की अख्लाकियात (नैतिकता, आचार-विचार) निभानी थी। उसे यहाँ मैनर्स का बहुत ज्यादा ख़याल रखना था। वह सिर पर दुपट्टा सलीके से फैलाती हुई परवीन के साथ ड्राइंग रूम में आ गई। उसका इसरार (ज़िद) के बावजूद कुछ खाने का दिल नहीं चाह रहा था। उसे मेज पर सजी अनवा-ओ-किस्म (भांति-भांति) की डिशेज को देखकर भी भूख का एहसास नहीं हो रहा था। उसे ऐसा लग रहा था कि अगर वह कुछ खायेगी, तो उसे उल्टी हो जायेगी।

“बीबी! लगता है आज खाना ख़ुद आपने बनाया है।” हैदर की बात से बीवी ने उस पर से तवक्को हटा ली।

“हाँ! यह सलाद और मछली मैंने ख़ुद बनाई है।” उसके जवाब पर वह ज़ोर से हँसा था।

पता था मुझे कि आज लंच में मेरे लिए आप कुछ ना कुछ अपने हाथ से ज़रूर बनाया बनायेंगी। कितने सारे दिनों बाद आज हम छुट्टी का दिन साथ गुज़ार रहे हैं। वहाँ वासिफ़ मुझे से वलीमा में शिरकत के लिए बहुत इसरार कर रहा था। मैंने उससे कहा इतने दिनों बाद आज छुट्टी का दिन मैं बीवी के साथ गुजारने वाला हूँ। वलीमा की वजह से रुक गया, तो यह संडे भी यूं ही गुज़र जायेगा।

वह दोनों अब आपस में मशरूफ़ हो गए थे। वो उससे पहले उस शादी के बारे में पूछने लगी थी, जिसमें शिरकत करने के लिए वह हैदराबाद गया था। फिर वह मुख्तलिफ़ (अलग-अलग) लोगों के नाम लेकर उनकी खैरियत दरयाफ्त कर रही थी। वह मंज़र (दृश्य) से हट जाने पर ख़ुद को बहुत परेशान महसूस कर रही थी। बीवी की सारी तवज्जो (ध्यान) हैदर के साथ गुफ्तगू में थी…इस दरमियान वो अख़लाक़न (morally) कोई ना कोई डिश उसके पास रख तो रही थी, मगर पहले की तरह ब-ज़िद (दृढ़) नहीं हो रही थी।

पता नहीं क्यों उसे यूं ही वहम सा हुआ कि उसने जानबूझकर बीवी की तवज्जो उस पर से हटाई है। खाना खत्म करने के करके जब हैदर अपनी कुर्सी से उठा, तो बीवी ने अपनी प्लेट पीछे सरकाते हुए उसकी तरफ देखा।

“तुमने बिल्कुल भी ठीक तरह खाना नहीं खाया।” वह उसके लिए तो फ़िक्रमंद हो रही थी, जैसे बरसों की जान-पहचान हो। उसे जवाब में कुछ बोला न गया, तो उनकी तरफ देखकर अखलाकन (morally) मुस्कुरायी।

हैदर ड्राइंग रूम से जा चुका था।

“तुम बहुत थकी हुई लग रही हो एमन! मेरे ख़याल में थोड़ी देर सो जाओ। उससे तुम्हारी तबीयत बेहतरीन हो जायेगी।” उनके लहजे में बुज़ुर्गगाना सा प्यार मौजूद था, वो जैसे समझ रही थीं कि माँ के मरने के तीसरे दिन में वह किसी तरह की अज़िय्यत (कष्ट) और दु:ख से गुज़र रही थी।

उनके कहने पर कमरे में आ तो गई थी, लेकिन बेड पर लेटने को भी दिल नहीं चाह रहा था। उसकी ज़ेहन में बहुत सी सोचे जगह बनाए हुए थी। कभी अपने बाप के बारे में, कभी अपने मुस्तकबिल (भविष्य) के बारे में, ज़िन्दगी में आगे क्या होने वाला था, वह नहीं जानती थी। उसके दिल को इतनी सारी फ़िक्र लाहिक थी कि वह सोने और आराम करने का तसव्वुर भी नहीं कर सकती थी। रात के आठ  बज चुके थे। इतनी देर में भी उसके बैठने के अंदाज़ में भी ज़रा-सी भी तब्दीली नहीं आई थी। एक ही जगह जमकर बैठने से उसका पूरा जिस्म अकड़ गया था। वह सोफे से उठ कर बैठ कर आ गई, मगर वह बिस्तर पर लेटकर इधर-उधर करवटें बदलने के सिवाय कुछ भी नहीं कर रही थी। नौ बजे उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने ख़ुद ही अंदाज़ा लगाया था कि उसे रात के खाने के लिए बुलाया जा रहा है।

फिर दस्तक देने के साथ उसे आवाज भी दी गई थी, “एमन!” वह पहचान गई कि वह बीवी की आवाज थी।

लेकिन वह उनकी आवाज सुनकर भी ढीठ बनी लेटी रही। उन्होंने दोबारा दस्तक देने के बजाय कमरे का दरवाजा खोल लिया। उसे बंद आँखों से भी पता चल रहा था कि वह कमरे के अंदर आ गई है। कदमों के चाप से अंदाज़ा हो रहा था कि साथ कोई और भी है।

“सो रही हो एमन?” बेड से कुछ फासले पर रुककर उसे बा-गौर देखते हुए उन्होंने जैसे ख़ु-कलामी की। उनकी आवाज बहुत धीमी थी।

“ज़ी बीबी! मैं उठा दू इन्हें?” यह आवाज परवीन की थी, वह उसी तरह आँखें बंदकर ख़ुद को सोता हुआ ज़ाहिर कर रही थी।

“नहीं उसे सोने दो। पता नहीं बेचारी कितनी रातों से जागी हुई होगी, मुझे बस यह फ़िक्र हो रही है कि यह बिल्कुल सो गई है।” उनकी आवाज पहले से भी ज्यादा हल्की थी।

फिर उसे सिर्फ वापस पलटते हुए कदमों की आवाज सुनाई दी। जब कमरे का दरवाजा वापस बंद होने की आवाज उसने सुनी, तो आँखें खोल कर कमरे में देखा। वह जाते हुए नाइट बल्ब जला गई थी। कमरे में अब इतना घुप्प अंधेरा नहीं था, जितना थोड़ी देर पहले था। वह ख़ामोशी से लेटी हुई एकटक छत पर लगी हुई लाइट को घूरी जा रही थी। लेटी-लेटी अचानक उसकी नज़र घड़ी पर पड़ी, तो वह घबरा कर बैठ गई।

साढ़े ग्यारह बज रहे थे। दस बजे अम्मी को दवा देनी है, मुझे याद ही नहीं रहा। वह ज़र-ए-लाव बदलते हुए फौरन बेड पर से उठ खड़ी हुई। बेड पर से उठते ही कुछ फासले पर दूसरे सिंगल बेड की तलाश में नज़दीक दौड़ आई।

ना वह बेड वहाँ पर था और ना अम्मी वहाँ थी। वो एकदम अचानक जैसे होश में आई थी। उसका चीख-चीख कर रोने का दिल चाह रहा था। उसका दिल चाह रहा था कि वह अपना सिर दीवार पर मार-मार कर रोये। उसके लिए दुनिया में कुछ भी नहीं बचा था। एक रिश्ता जो मिला था, वह भी उससे छिन गया था। उसके पास तो कोई भी नहीं था, जिसके कंधे पर सिर रखकर रो सके। ये गम उस अकेली का गम था। उस गम को उसके साथ बांटने के लिए कोई मौजूद नहीं था।

वह वहशतज़दा (डरकर) होकर कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर निकल आई। कमरे से बाहर निकलकर उसे हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आया था। वो अंधेरे में यू ही अंदाज़ से से चलते हुए पता नहीं कहाँ जा रही थी। उसका बस यह दिल चाह रहा था कि वह कुछ देर बिलकुल आसमां के नीचे खड़ी हो, जहाँ कोई दरवाजे और कोई छत ना हो।

यूं ही अंदाज़ से चलते-चलते उसने एक दरवाजा खोला, तो बाहर से आती हुई ठंडी हवा ने उसे उस बात का एहसास दिलाया कि दरवाजा खुला है। वो उस दरवाजे से बाहर निकल आई। वह उस घर का पता नहीं कौन सा हिस्सा था। लेकिन वह जगह वैसी ही थी, जैसे उस वक्त उसे दरकार थी। वो लॉन था या बाग था, न जाने क्या था, अंधेरे में वह अंदाज़ा नहीं कर पाई। वहाँ सिर्फ एक गार्डन लाइट जल रही थी।

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