आठवां बयान कुसुम कुमारी देवकीनन्दन खत्री का उपन्यास | Aathvan Bayan Kusum Kumari Devaki Nandan Khatri Ka Upanyas

आठवां बयान कुसुम कुमारी देवकीनन्दन खत्री का उपन्यास | Aathvan Bayan Kusum Kumari Devaki Nandan Khatri Ka Upanyas Novel In Hindi 

Aathvan Bayan Kusum Kumari Devaki Nandan KhatriAathvan Bayan Kusum Kumari Devaki Nandan Khatri

शैतान के बच्चे जसवंतसिंह ने बेचारे रनबीरसिंह के साथ बदी करने पर कमर बांध ली। उस पहली मुहब्बत की बू उसके दिल से बिलकुल जाती रही। अब तो यह फिक्र हुई कि जहां तक जल्द हो सके रनबीरसिंह की जान लेनी चाहिए, बल्कि इस खयाल ने उसके दिमाग में इतना जोर पैदा किया कि नेक और बद का कुछ भी खयाल न रहा और वह बेधड़क बालेसिंह की तरफ रवाना हुआ। हां, चलते समय उसने इतना जरूर सोचा कि महारानी ने पहले तो मेरी खूब ही खातिरदारी की थी मगर पीछे से इतनी बेरुखी क्यों करने लगी, यहां तक कि सवारी के लिए एक घोड़ा तक भी न दिया और मुझे पैदल बालेसिंह के पास जाना पड़ा! साथ ही इसके यह खयाल भी उसके दिल में पैदा हुआ कि पहले मुझे रनबीर का दोस्त समझे हुए थी इसलिए खातिरदारी के साथ पेश आई, मगर जब से मेरा सामना हुआ तब से वह मुझको मुहब्बत की निगाह से देखने लगी, इसी से इस नई मुहब्बत को छिपाने के लिए उसने मेरी खातिरदारी छोड़ दी।

इन्हीं सब बेतुकी बातों को सोचता विचारता बेधड़क बालेसिंह की तरफ पैदल रवाना हुआ। दो दिन रास्ते में लगाकर तीसरे दिन पूछता हुआ उस गांव में पहुंचा, जिसमें बालेसिंह थोड़े से शैतानों को लेकर हुकूमत करता था।

यह बालेसिंह का गांव देखने में एक छोटा-सा शहर ही मालूम होता था, जिसके चारों तरफ मजबूत दीवार बनी हुई थी और अंदर जाने के लिए पूरब और पश्चिम की तरफ दो बड़े-बड़े फाटक लगे हुए थे। दीवारें इस अंदाज की बनी हुई थीं कि अगर कोई गनीम चढ़ आवे, तो फाटक बंद करके अंदरवाले बखूबी अपनी हिफाजत कर सकते थे और दीवार के छोटे-छोटे सूराखों में से बाहर अपने दुश्मनों पर गोली और तीर इत्यादि बरसा सकते थे।

जसवंतसिंह जब पूरब के दरवाजे से उस छोटे से किलेनुमा शहर के अंदर घुसा, तो दरवाजे ही पर कई पहरेवालों से मुलाकात हुई। पहले तो यह फाटक के दोनों तरफ पहरेवालों को देखकर अटका मगर फिर सोच विचार कर आगे बढ़ा। पहरेवालों ने भी उसकी तरफ गौर से देखा और आपस में कुछ इशारा करके हंसने लगे। जब जसंवत कुछ आगे बढ़ा तब उन पहरेवालों में से दो आदमी उसके पीछे-पीछे रवाना हुए।

जसवंत भी चौंका हुआ था और इसीलिए इधर-उधर आगे-पीछे देखता-भालता जा रहा था। अपने पीछे तो दिलावर जंगी सिपाहियों को आते देख वह कुछ अटका मगर फिर आगे बढ़ा, इसी तरह घड़ी-घड़ी पीछे देखता अटकता आगे बढ़ता चला जा रहा था। पीछे-पीछे जानेवाले दोनों सिपाही भी उसी की चाल चलते थे अर्थात् जब वह अटकता तो वह भी रुक जाते और उसके चलने के साथ ही पीछे-पीछे चलने लगते। यह कैफियत देख जसवंतसिंह के जी में खटका पैदा हुआ बल्कि उसे खौफ मालूम होने लगा और एक चौमुहानी पर पहुंच वह एक किनारे हटकर खड़ा हो गया। वे दोनों सिपाही भी कुछ दूर पीछे ही खड़े हो गए।

जसवंत आधी घड़ी तक खड़ा रहा, जब तक दोनों सिपाहियों को भी रुके हुए देखा तो पीछे की तरह लौटा, मगर जब वहां पहुंचा, जहां वे दोनों सिपाही खड़े थे तब रोक लिया गया। दोनों सिपाहियों ने पूछा, ‘‘लौटे कहां जाते हो?’’

जसवंत ने कहा, ‘‘जहां से आए थे वहां जाते हैं।’’

दोनों सिपाहियों ने कहा, ‘‘तुम अब लौटकर नहीं जा सकते, इस चारदीवारी के अंदर जहां जी चाहे जाओ, घूमो फिरो, हम दोनों तुम्हारे साथ रहेंगे, मगर लौटकर नहीं जाने देंगे।’’

जसवंत–क्यों?

एक सिपाही–मालिक का हुक्म ही ऐसा है।

जसंवत–यह हुक्म किसके लिए है?

दूसरा सिपाही–खास तुम्हारे लिए।

जसवंत–क्या तुम लोग मुझे जानते हो?

दोनों–खूब जानते हैं कि तुम जसंवतसिंह हो।

जसवंत–यह तुमने कैसे जाना?

दोनों–इसका जवाब देने की जरूरत नहीं। तुम यहां क्यों आए हो?

जसवंत–तुम्हारे मालिक बालेसिंह से मुलाकात करने आया था।

एक-तो लौटे क्यों जाते हो? चलो हम तुम्हें अपने मालिक के पास ले चलते हैं।

जसवंत–(कुछ सोचकर) खैर चलो, इसीलिए तो मैं आया ही हूं।

दोनों सिपाही जसवंत को साथ लिए अपने सरदार बालेसिंह के पास पहुंचे। उस वक्त बालेसिंह एक सुंदर मकान के बड़े कमरे में अपने साथी दस-बारह आदमियों के साथ बैठा गप्पें उड़ा रहा था।

अपने दो सिपाहियों के साथ जसवंत को आते देख खिलखिलाकर हंस पड़ा और जसवंत के हाथ-पैर खुले देख बोला, ‘‘क्या यह खुद आया है?’’

जिसके जवाब में दोनों सिपाहियों ने कहा, ‘‘जी सरकार!’’

बालेसिंह–क्यों जसवंतसिंह साहब बहादुर, क्या इरादा है? कैसी नीयत है जो बेधड़क चले आए हो?

जसवंत–बहुत अच्छी नीयत है, मैं आपसे मित्रभाव रखकर आपके मतलब की कुछ कहने आया हूं।

बालेसिंह–मैं तो तुम्हारा दुश्मन हूं–मेरी भलाई की बात तुम क्यों कहने लगे?

जसवंत–आप मेरे दुश्मन क्यों होंगे! मैंने आपका क्या बिगाड़ा है? या आप ही ने मेरा क्या नुकसान किया है?

बालेसिंह–(जोश में आकर) तुम्हारे दोस्त रनबीरसिंह को मैंने गिरफ्तार कर लिया है और कल उनका सिर अपने हाथ से काटूंगा!

जसवंत–(जी में खुश होकर) क्या हुआ जो रनबीरसिंह को आपने गिरफ्तार कर लिया? शौक से उसका सर काटिए, इसके बाद एक तरकीब ऐसी बताऊंगा कि महारानी बड़ी खुशी से आपके साथ शादी करने पर राजी हो जाएंगी।

बालेसिंह–(जोर से हंस कर) वाह बे शैतान के बच्चे, क्या उल्लू बनाने आया है! अबे तेरे ऐसे पचासों को मैं चुटकियों पर नचाऊं, तू क्या मुझे भुलावा देने आया है! बेईमान हरामजादा कहीं का! मुझे पढ़ाने आया है! जन्मभर जिसका नमक खाया, जिसके घर में पला, जिसके साथ पढ़-लिखकर होशियार हुआ और जिसके साथ दिली दोस्ती रखने का दावा करता है आज उसी के लिए कहता है कि शौक से उसका सर काट डालो! जरूर तेरे नुत्फे (वीर्य) में फर्क है, इसमें कोई शक नहीं! तेरा मुंह देखने से पाप है। रनबीर ने तेरे साथ क्या बुराई की थी, जो तू उसके बारे में ऐसा कहता है? उल्लू के पट्ठे, जब तू उसके साथ यह सलूक कर रहा है तो मेरे संग क्या दोस्ती अदा करेगा! (इधर-उधर देखकर) कोई है? पकड़ो इस बेईमान को अपने हाथ में कल इसका भी सर काटकर कलेजा ठंडा करूंगा!

हुक्म पाते ही चारों तरफ से जसवंत के ऊपर आदमी टूट पड़े और देखते-देखते उसे पकड़ रस्सियों से कस के बांध लिया।

बालेसिंह ने अपने हाथ से वे बिलकुल बातें कागज पर लिखीं जो उस वक्त जसवंतसिंह से और उससे हुई थीं और इसे एक आदमी के हाथ में देकर कहा, ‘‘यह पुर्जा रनबीरसिंह को दो और इस नालायक को ले जाकर जिस मकान में रनबीरसिंह है उसी में लोहे के जंगलेवाली कोठरी में बंद कर दो।’’

बालेसिंह ने पहाड़ी के ऊपर से रनबीरसिंह को गिरफ्तार तो जरूर किया था मगर अपने घर लाकर उनको बड़े आराम से रखा था। एक छोटा-सा खूबसूरत मकान उनके रहने के लिए मुकर्रर करके कई नौकर भी काम करने के लिए रख दिए थे और मकान के चारों तरफ एहरा बैठा दिया था।

मिजाज उनका अभी तक वैसा ही था। उस पत्थर की मूरत का इश्क सिर पर सवार था, घड़ी-घड़ी ठंडी सांस लेना रोना और बकना उनका बंद न हुआ था, खाने-पीने की सुध अभी तक न थी बल्कि उस पत्थर की तसवीर से अलहदे होकर उनको और भी सदमा हुआ था। बालेसिंह से हरदम लड़ने को मुस्तैद रहते थे मगर उनके सामने जब बालेसिंह आता था और उनको गुस्से में देखता था, तो हाथ जोड़ के यही कहता था, ‘‘मैं तो तुम्हारा ताबेदार हूं!’’

इतना सुनने ही से रनबीरसिंह का गुस्सा ठंडा हो जाता था और अपना क्षत्रिय धर्म याद कर उसे कुछ नहीं कहते थे, बल्कि किसी-न-किसी तरकीब से कह सुनकर बालेसिंह उनको कुछ खिला-पिला भी आता था। जब ये खाने से इनकार करते तो बालेसिंह कहता कि आप अगर कुछ न खाएंगे तो मैं उस पहाड़ी पर जाकर उस मनमोहिनी मूरत के टुकड़े-टुकड़े कर डालूंगा, और अगर आप इस वक्त कुछ खा लेंगे तो मैं वह मूरत आपके पास ले आऊंगा। यह सुन रनबीरसिंह लाचार हो जाते और कुछ-न-कुछ खाकर पानी पी ही लेते।

कभी-कभी जब तबीयत ठिकाने होती तो वे ये बातें भी सोचने लगते कि पहाड़ी पर मुझे अकेला छोड़कर मेरा दोस्त जसवंत कहां चला गया? इस बालेसिंह ने धोखा देकर मुझे क्यों गिरफ्तार किया? मैंने इसका क्या बिगाड़ा था? तिस पर न तो यह मेरा दोस्त मालूम होता है न दुश्मन, क्योंकि कैद भी किए और खुशामद और खातिरदारी भी करता है। जो हो इस बात का तो अफसोस रह ही गया कि मैं किसी तरह की लड़ाई न कर सका और एकाएक धोखे में गिरफ्तार हो गया।

आज भी इन्हीं सब बातों को बैठे-बैठे रनबीरसिंह सोच रहे थे कि आठ-दस आदमियों के साथ हथकड़ी बेड़ी से जकड़े हुए जसवंतसिंह आते दिखाई पड़े और उन सभी में से एक आदमी ने बढ़कर वह पुर्जा रनबीरसिंह के हाथ में दिया, जो बालेसिंह ने अपनी ओर जसवंत की बातचीत होने के बारे में लिखा था।

रनबीरसिंह जसवंत को देखकर बहुत खुश हुए, वह पुर्जा हाथ से जमीन पर रख दिया और जल्दी से उठकर जसवंत के साथ लिपट गए, बाद इसके उन सिपाहियों से जो इसे कैदी की तरह से लाए थे, पूछा, ‘‘इसे हथकड़ी बेड़ी क्यों डाल रखी है? जब तुम्हारा सरदार मेरे साथ इतनी नेकी करता है तो उसने मेरे इस दोस्त को इतनी तकलीफ क्यों दे रखी है!’’

जिस सिपाही ने रनवीरसिंह के हाथ में पुर्जा दिया था उसने जवाब में कहा, ‘‘उस पुर्जे को पढ़ने से इसका संबंध आपको मालूम हो जाएगा जिसे हमारे राजा साहब ने लिखकर आपके पास भेजा है।’’

रनबीरसिंह ने उस पुर्जे को उठाकर पढ़ा और ताज्जुब में आकर सोचने लगे, हैऽ! यह क्या मामला है? जसवंत मेरा दुश्मन क्यों हो गया और यह सब क्या लिखा है! जसवंत ने कहा है, ‘‘क्या हुआ जो रनबीरसिंह को आपने गिरफ्तार कर लिया! शौक से उसका सिर काटिए! इसके बाद एक तरकीब ऐसी बताऊंगा कि महारानी बड़ी खुशी के साथ आपसे शादी करने पर राजी हो जाएगी, यह सब क्या बात है? कौन महारानी बालेसिंह के साथ शादी करने पर राजी हो जाएगी, जो मेरे मरने की राह देख रही है? मालूम होता है कि वह पत्थर की मूरत जरूर किसी ऐसी औरत की है, जो महारानी बोली जाती है और मुझसे मुहब्बत रखती है। बालेसिंह भी उस पर आशिक है और शायद इसी सबब से उसने मुझे गिरफ्तार भी कर लिया हो तो ताज्जुब नहीं। मगर यह तो कभी हो नहीं सकता कि जसवंत मेरे साथ दुश्मनी करने पर कमर बांधे…हां, इस पुर्जे के नीचे यह भी तो लिखा है कि ‘मैं खुद आकर आपको समझा दूंगा कि जसवंत की नीयत खराब हो गई और अब वह आपका पूरा दुश्मन हो रहा है। खैर, बालेसिंह भी आता ही होगा, देखें क्योंकि साबित करता है कि मेरी तरफ से जसवंत की नीयत खराब हो गई।’ ’’

उन सिपाहियों ने अपने सरदार बालेसिंह के हुक्म के मुताबिक जसवंत को उसी मकान की एक लोहे के जंगलेवाली कोठरी में कैद करके ताला लगा दिया और वहां से चले गए। रनबीरसिंह ने किसी को न टोका कि जसवंत को क्यों कैद करते हो, मगर जब वे लोग उसे कैद करके चले गए तब उठकर जसवंत की कोठरी के पास जंगले के बाहर जा बैठे और बातचीत करने लगे–

रनबीर–क्यों जसवंत, तुमने क्यों खुदबखुद आकर इस बालेसिंह के हाथ में अपने को फंसाया?

जसंवत–मैं तो आपको छुड़ाने की नीयत से आया था, मगर कुछ कर न सका और इसने मुझे गिरफ्तार कर लिया।

रनबीर–तो छिपकर क्यों न आए?

जसंवत–(कुछ सोचकर) भूल हो गई, मैंने सोचा था कि जाहिर होकर चलूंगा और तुम्हारा दुश्मन और उसका दोस्त बनके काम निकाल लूंगा मगर उस शैतान के बच्चे से कारीगरी न चली। पर आपको तो उसने इस तौर पर रक्खा है कि कैदी मालूम ही नहीं पड़ते!

रनबीर–भला यह तो बताओ कि तुम्हें कुछ मालूम हुआ कि वह पत्थर की मूरत किसकी है?

जसवंत–हां, घूम फिर कर दरियाफ्त करने से मुझे मालूम हो गया कि उसी पहाड़ी से थोड़ी दूर पर एक रानी रहती है और उसी ने अपनी और आपकी मूरतें उस पहाड़ी पर बनवाई हैं। यह सुनकर मुझे यकीन हो गया कि वह जरूर आपसे मुहब्बत रखती है, तभी तो फंसाने के लिए वे दोनों मूरतें बनवाईं है।

यह सोचकर मैं उसके पास गया। मुझे उम्मीद थी कि जब आपके गिरफ्तार होने का हाल उससे कहूंगा तो वह आपके छुड़ाने की जरूर कोशिश करेगी और मुझे भी मदद देगी, मगर कुछ नहीं, वह तो निरी बेमुरौवत निकली! सब बातें सुन साफ जवाब दे दिया और बोली कि मैं क्या कर सकती हूं, मुझसे रनबीरसिंह से क्या वास्ता जो उसको छुड़ाऊं, ऐसे-ऐसे सैकड़ों रनबीरसिंह मारे-मारे फिरते हैं!!

रनबीर–(ऊंची सांस लेकर) ठीक ही है, भला इतना तो पता लगा कि वह पत्थर की मूरत झूठी न थी! खैर जो भी हो, मैं तो उसके दरवाजे की खाक ही बटोरा, करूंगा, इसी में मेरी इज्जत है।

रनबीरसिंह और जसवंतसिंह में बातें हो रही थीं कि कई आदमियों को साथ लिए बालेसिंह उसी जगह आ पहुंचा और रनबीरसिंह को जसवंत से बातें करते देख बोला–‘‘महाराजकुमार, आप इस नमकहराम से क्या बातें कर रहे हैं! यह पूरा बेईमान और पाजी है, इसका तो मुंह न देखना चाहिए!

रनबीर–यह मेरा पुराना दोस्त है, मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं कि यह मेरे साथ बुराई करेगा।

बालेसिंह–आप भूलते हैं जो ऐसा सोचते हैं, आज ही इसने मेरे सामने आकर कैसी-कैसी बातें कही आपको तो मैंने लिख ही दिया था। क्या पढ़ा नहीं!

रनबीर–मैंने पढ़ा, मगर यह कहता है कि मैं अकेला था इसलिए आपके छुड़ाने की सिवाय इसके और कोई तरकीब न देखी कि जाहिर में तुम्हारा दुश्मन और बालेसिंह का दोस्त बनूं!

बालेसिंह–कभी नहीं, यह झूठा है! मैं खूब समझ गया कि जिस पर आप आशिक है यह खुद भी उस पर आशिक हो गया है और चाहता है कि आपकी जान ले।

रनबीर–होगा, मगर मुझे विश्वास नहीं होता!

बालेसिंह–अच्छा एक काम कीजिए, आप अपने हाथ से एक चिट्ठी महारानी को लिखकर पूछिए कि जसवंत तुम्हारे पास गया था या नहीं और तुमने इसकी नीयत कैसी पाई? उस खत को मैं अपने आदमी के हाथ भेजकर उसका जवाब मंगा देता हूं।

रनबीर–अहा, अगर ऐसा करो तो मैं जन्मभर तुम्हारा ताबेदार बना रहूं! भला मेरी ऐसी किस्मत कहां कि मैं उनके पास चिट्ठी भेजूं और जवाब आ जाए! हाय! जिसकी सूरत देखने की उम्मीद नहीं, उसके पास मेरी चिट्ठी जाए और जवाब आवे तो मेरे लिए इससे बढ़के और क्या खुशी की बात होगी!!

बालेसिंह-जरूर जबाब आवेगा, मगर एक बात है–आप उस चिट्ठी में यह भी लिख दीजिएगा कि बालेसिंह ने मुझे किसी तरह की तकलीफ नहीं दी है, बड़े आराम के साथ रखा है, और भाई की तरह मुझको मानता है।

रनबीर-हां-हां, जरूर मैं ऐसा लिख दूंगा! जब तुम मेरे साथ इतनी नेकी करोगे कि मेरी चिट्ठी का जवाब मंगा दोगे तो क्या मंं तुमको अपने भाई के बराबर न समझूंगा?

जसवंत–(चिल्लाकर) मगर यह कैसे मालूम होगा कि महारानी ही ने इस पत्र का जवाब दिया है? क्या जाने तुम जाल बनाकर किसी गैर से चिट्ठी का जवाब लिखवा के ला दो, तब?

बालेसिंह–(गुस्से में आकर) बेइमानों को ऐसी ही सूझती है! हम लोग क्षत्रिय वंश में पैदा होकर जाल करने का नाम भी नहीं जानते। जरूर इस पत्र का उत्तर महारानी अपने हाथ से लिखेंगी और अपनी खास लौंडी के हाथ भेंजेगी, क्योंकि इनके लिए वह अपनी जान भी देने को तैयार है। क्या तुमने महारानी की सूरत देखी है?

जसवंत–हां, मैं उन्हें देख चुका हूं, वह इतनी मुरौवतवाली नहीं…!

बालेसिंह–(हंसकर) बस-बस, अब मुझे पूरा विश्वास हो गया। ऐसा तो कोई दुनिया में है ही नहीं जो उसे देखे और अपनी नीयत साफ बनाए रहे!

रनबीर–(बालेसिंह से) इन सब बातों में देर करने की क्या जरूरत है, आप मेरे ऊपर कृपा कीजिए और चिट्ठी लिखने का सामान मंगाइए, मैं अभी लिखे देता हूं!

बालेसिंह ने अपने एक आदमी को भेजकर कलम-दावात तथा कागज मंगवाया और रनबीरसिंह के सामने रखकर कहा, ‘‘लीजिए लिखिए।’’ रनबीरसिंह खत लिखने बैठे।

अह…, जिसके इश्क में रनबीरसिंह की यह दशा हुई, इतनी आफतें उठाईं आज उसी को पत्र लिखने बैठे हैं मगर क्या लिखें? क्या कहकर लिखे? कौन-सी शिकायत करें? इन्हीं बातों को घड़ी-घड़ी सोच-सोच रनबीरसिंह को कंप हो रहा था, आंखें डबडबा आती थीं, लिखनेवाला कागज आंसुओं से भीग जाता था, बड़ी मुश्किल से कई दफे कागज बदलने के बाद यह लिखा–‘‘मेरे लिए तुमने जो कुछ सोचा मुनासिब ही था, जिसका पहला हिस्सा ठीक भी कर चुके। मगर अफसोस उसका आखिरी हिस्सा अभी तक तय न हुआ। जसवंत की मदद तक न की! बालेसिंह की खातिरदारी अभी तक जान बचाए जा रही है। तुम्हारा रनबीर।’’

वालेसिंह ने यह पत्र उसी समय अपने एक विश्वासी और चालाक आदमी के हाथ महारानी की तरफ रवाना किया। उस आदमी के जाने के बाद रनबीरसिंह ने बालेसिंह से पूछा–‘‘क्यों बालेसिंह, यह महारानी कौन है? और मुझे तुमने क्यों गिरफ्तार कर रक्खा है? देखो सच कहना, झूठ मत बोलना!’’

बालेसिंह ने कहा, ‘‘ऐसा ही है तो लीजिए सुन ही लीजिए, आखिर मैं कहां तक और किस-किससे डरा करूंगा। महारानी चाहे जो भी हों आज मेरे और जसवंत के तरह के सैकड़ों ही उनके लिए जान दे रहे हैं, लेकिन उन्होंने सिवाय तुम्हारे किसी से भी शादी करना मंजूर न किया–जिसने जिद्द की उसी की दुर्गति कर डाली। अभी तक मेरे पास उनका लिखा पत्र मौजूद है जिसमें उन्होंने साफ लिखा है कि सिवाय रनबीरसिंह के मैं किसी को कुछ भी नहीं समझती। अपने पत्र का ऐसा जवाब पाकर मुझे भी बड़ा ही गुस्सा आया और दिल में ठान लिया कि अगर ऐसा ही है तो फिर चाहे जो हो मैं भी रनबीरसिंह से और उससे मुलाकात न होने दूंगा! सिवाय इसके!’’

बालेसिंह की बातें सुनते-सुनते एकाएक रनबीरसिंह को बड़ा ही क्रोध चढ़ आया। वह आगे कुछ और कहना चाहता था मगर उसकी यह आखिरी बात कि, ‘‘मैं भी रनबीरसिंह से और उससे मुलाकात न होने दूंगा।’’ सुनकर उठ खड़े हुए, अपने गुस्से को जरा भी न रोक सके, और उसके गले में हाथ डाल ही तो दिया। दोनों में खूब कुश्ती और मुक्कों की मार होने लगी, यहां तक कि दोनों के सिर और बदन से खून बहने लगा। आखिर रनबीरसिंह ने बालेसिंह को उठाकर जमीन पर पटक दिया और उसकी छाती पर चढ़ बैठे।

अभी तक बालेसिंह के आदमी जो वहां मौजूद थे चुपचाप खड़े तमाशा देख रहे थे। जब अपने मालिक की पीठ जमीन पर देखी और उम्मीद हो गई कि अब रनबीरसिंह उसके गले को दबा कर मार ही डालेंगे, तब एकदम रनबीरसिंह के ऊपर टूट पड़े, यहां तक कि बालेसिंह मौका पाकर हाथ से निकल गया और उसने साथियों की मदद से उसने रनबीरसिंह को बांध लिया।

अब रनबीरसिंह की आजादी बिल्कुल जाती रही, वे कैदी हो गए। हथकड़ी बेड़ी डालकर एक कोठरी में बन्द कर दिए गए। अभी तक बालेसिंह को उनकी खूबसूरती और हाथ-पैरों की मुलायमियत देखकर उनके इतने ताकतवर, बहादुर और जवांमर्द होने की उम्मीद बिलकुल न थी, अपने सामने वह किसी को भी कुछ नहीं समझता था, मगर आज रनबीरसिंह ने उसकी शेखी भुला दी, बल्कि अपना रोग उसके दिल पर जमा दिया।

Prev | Next | All Chapters 

चंद्रकांता देवकीनंदन खत्री का उपन्यास

रूठी रानी मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास

देवांगना आचार्य चतुर सेन शास्त्री का उपन्यास

Leave a Comment