चैप्टर 7 नीलकंठ गुलशन नंदा का उपन्यास | Chapter 7 Neelkanth Gulshan Nanda Novel In Hindi Read Online

चैप्टर 7 नीलकंठ गुलशन नंदा का उपन्यास | Chapter 7 Neelkanth Gulshan Nanda Novel In Hindi Read Online, Chapter 7 Neelkanth Gulshan Nanda Ka Upanyas 

Chapter 7 Neelkanth Gulshan Nanda Novel

Chapter 7 Neelkanth Gulshan Nanda Novel In Hindi

आनंद बेला को खींचता हुआ थोड़ा आगे ले गया और एक स्थान पर रुककर उसने बेला को धरती पर उल्टे लेट जाने को कहा। आनंद स्वयं भी बेला के पास उल्टा लेट गया और हाथ से संकेत करके बोला-

‘वह देखो-क्या है?’

धुंध के बादल छंट जाने से दृश्य स्पष्ट हो गया था। आनंद ने नीचे नदी के किनारे हाथ का संकेत किया। भूरे रंग का एक पशु वहाँ पानी पी रहा था। आनंद बोला-

‘वह देखो शेर विचित्र दृश्य है न, हम नीचे जा सकते हैं और न वह इस खाड़ी से बाहर आ सकता है… इसलिए इस स्थान को टाइगर प्वाइंट का नाम दिया गया है। शिकारी यहाँ से उसका बेधड़क शिकार करते हैं, परंतु अपने शिकार को बाहर नहीं ला सकते।’

वहां से दोनों सीमा के साथ-साथ झरने की ओर बढ़ने लगे। पानी का शोर और घाटी में उसकी गूंज दृश्य को बड़ा भयानक बना रहे थे। बेला को आनंद का संग इस भयानकता का अनुभव न होने दे रहा था।

झरने के पास आनंद ने कैमरे को अपनी और बेला की ओर फिराकर दोनों की इकट्ठी तस्वीर उतारी। आज जीवन में पहली बार इन घाटियों में आनंद ने विशेष आनंद अनुभव किया। वह पहले भी मित्रों के संग वह दृश्य देख चुका था, किंतु आज की यह सैर सबसे अनोखी थी।

यहां से वह उस नदी के किनारे हो लिए, जो पर्वतों से होकर इस झरने में परिवर्तित हो रही थी। थोड़ी दूर जाकर पानी छोटी-छोटी नालियों में बह जाता और स्वच्छ और निर्मल जल दर्पण की भांति चमक रहा था। बेला ने आनंद को खींचकर नदी में ले जाना चाहा, पर वह गिरते-गिरते संभल गया और बोला-‘डूबने का निश्चय किया है क्या?’

‘जी-किंतु अकेले नहीं।’

‘तो एक बात मानो।’

‘क्या?’

‘डूबने से पहले अपने जूते उतार लें।’ आनंद ने दबेे स्वर में कहा।

‘आप ठीक कहते हैं, ये बेचारे भीग गए तो जीना कठिन हो जाएगा।’

दोनों इस व्यर्थ की बातचीत पर हँस पड़े और अपने-अपने जूते उतार पास की एक झाड़ी में छिपा दिए। अपनी पैंटों को घुटनों तक ऊँचा कर वे पानी में उतर पड़े और उछलते-कूदते बच्चों के समान भागने लगे। दोनों संसार को बिलकुल भूल चुके थे और एक-दूसरे की हृदय की धड़कन को जान गए थे। उनके मन में कामना का उठता हुआ तूफान उस हवा और बरखा के तूफान से किसी प्रकार कम न था।

वे पागलों की भांति उस ठंडे, स्वच्छ और निर्मल जल की धारा को लांघते हुए बढ़ गए। उनके चलने से पानी के छींटे उछलकर उनके मुख को चूमने लगी तथा ओस-कणों की भांति उनके कपोलों पर आ ठहरती। उनके टूटने पर लगता मानो मन की भावनाएँ और अभिलाषाएँ बुलबुले से बनकर आपस में टकरातीं और मिलते ही ओझल हो जातीं।

थोड़ी दूर पत्थर की सुंदर सीढ़ियाँ देख दोनों रुक गए, जिससे झर-झर करता हुआ जल बड़ा सुहावना लगता था। बेला के प्रश्न करने पर आनंद ने बताया कि यह पानी एक बड़े जलाशय में एकत्रित होता है और वर्षा ऋतु में भरकर सीढ़ियों पर से झलकता है।

एक गर्जन हुई और बेला आनंद से लिपट गई। सफेद और घने बादलों के झुंड ने उन्हें घेर लिया। भरपूर प्याले छलक पड़े। आनंद ने अपने जलते हुए होंठ बेला के होंठों पर रख दिए। वह मछली के समान तड़पी और गुत्थमगुत्था होकर उसकी बांहों में मचलकर रह गई।

बादल छंट गए, दोनों ने एक-दूसरे को देखा। उनकी आँखों में लाल रेखाएँ झलक रही थीं। बेला के होंठों पर दबी मुस्कान स्पष्ट हुई और वह आनंद की बांहों से निकलकर सीढ़ियों की ओर भागी। आनंद लपकते हुए चिल्लाया-

‘बेला! बेला! रुक जाओ, गिर पड़ोगी।’

बेला ने सुनी-अनसुनी कर दी और भावना के प्रवाह में उन सीढ़ियों पर भागकर चढ़ने लगी, जिनसे तेज गति से पानी झर-झर कर बह रहा था। काई के कारण उन पर फिसलन के कारण पाँव का ठहरना कठिन था। दो बार सीढ़ियाँ ऊपर चढ़ने पर बेला फिसलकर धड़ाम से आ गिरी।

आनंद ने लपककर उसे थाम लिया और वे फिसलते-फिसलते बचे।

‘कहा था न कि फिसल जाओगी।’ बेला को बांहों में लेते आनंद बोला।

बेला ने अपने आपको उसकी बांहों में ढीला छोड़ दिया और बोली-‘आनंद! यह तुमने क्या किया-मुझे नदी पर आकर प्यासा क्यों छोड़ दिया?’

‘बेला क्यों सुध खोती जा रही हो? मेरी अच्छी बेला, देखो पानी का प्रवाह बहुत तेज है, शीघ्र उतर चलो-वह देखो बादल घने हुए जाते हैं-ये अब अवश्य बरसेंगे-हम तूफान में घिर जाएँगे।’

‘मेरी आशाओं से खेलकर मुझे मझधार में छोड़ते हो और तूफान की सूचना देते हो।’

बेला की यह दशा देख आनंद ने उसे बांहों में खींच लिया और व्याकुलता से उसे चूमने लगा-घटाएँ घनी होती चली गईं और धुंध की मोटी चादर ने उन्हें लपेट लिया। चारों ओर एक अंधेरा-सा छा गया, कुछ सुनाई न देता था।

इसी दशा में वह गिरते-पड़ते अनजाने मार्ग पर बढ़ने लगे। आशाएँ तीव्र हो उठीं और घाटी में गर्जन तथा तूफान के मध्य वे एक-दूसरे से ऐसे लगे हुए थे मानो किसी आकर्षण-शक्ति ने उन्हें एक कर दिया हो।

फिर गर्जन हुई, बिजली चमकी और वातावरण क्षण-भर के लिए जगमगा उठा। घटाएँ टकराकर बरस पड़ीं, थोड़े ही समय में जल-थल एक हो गया। झरनों का शोर आकाश में घिरे बादलों से उलझ रहा था। लगता था कि मेघ स्वयं धरती पर उतरकर क्रोध बरसा रहा हो।

धीरे-धीरे बरखा की बौछार कम होने लगी। घटाएँ कहीं दूर चली गईं और आकाश फिर से निखरने लगा। कुछ समय पश्चात् आकाश बिलकुल खुल गया और वही दृश्य चमकने लगा जैसे कुछ हुआ ही न था।

खंडहर के अंदर बेला लेटी हुई थी और आनंद उसकी पीठ धीरे-धीरे थपककर उसे उठाने का प्रयत्न कर रहा था। जब कुछ देर तक वह न उठी तो आनंद अपने स्थान से उठकर खंडहर से बाहर आ गया।

थोड़े समय पश्चात् बेला अपने भीगे हुए उलझे कपड़ों को ठीक करके उसके पीछे आ गई। उसने आनंद की ओर देखा और फिर दोनों आँखें नीची करके धीरे-धीरे अपने मार्ग पर चल पड़े।

दोनों चुपचाप थे। अब उनके हाव-भाव में वह चंचलता और शोर न था। मानो बरखा के पश्चात् वातावरण में शांति सी छा गई थी। बेला ने एक-दो बार प्रश्न पूछने का प्रयत्न भी किया, किंतु आनंद ने किसी-न-किसी बहाने टाल दिया।

जब दोनों घर पहुँचे तो माँ ने टिफिन खोलकर देखा। खाना वैसे-का-वैसा रखा था। पूछने पर कोई कारण न पाकर बेचारी चुप ही रही और चाय का प्रबंध करने लगी-न जाने दोनों किस विचारधारा में खोए हुए थे।

उसी रात दोनों को अलग होना पड़ा। आनंद ने उसे पूना की गाड़ी पर चढ़ा दिया और गाड़ी छूटने से पूर्व उनमें केवल यह बातचीत हुई-

‘बेला’-नीची दृष्टि किए हुए धीरे से उसने पूछा।

‘हूँ!’ उसने असावधानी से उत्तर दिया।

‘तुम खंडाला में आई हो और जो कुछ यहां बीता, उसका किसी से वर्णन तो न करोगी?’

‘किसलिए?’ उसके होंठों पर एक चपल मुस्कान थी।

‘इसी में सबकी भलाई है तुम्हारी-मेरी और…’

‘और किसकी? रुक क्यों गए?’ बात पूरी करते हुए बेला ने कहा।

‘तुम्हारी दीदी की, तुम तो जानती हो हम दोनों का विवाह होने वाला है।’

आनंद के मुँह से संध्या की बात सुनते ही बेला के तन-बदन में आग-सी लग गई। परंतु अधिकार से काम लेते हुए वह खिलखिलाकर हँसने लगी। आनंद उसकी इस हँसी पर डर-सा गया और बोला-

‘वचन दो कि यह रहस्य ही रहेगा।’

‘परंतु एक बात पर।’

‘क्या?’

‘कि तुम मेरी आशाओं को कभी ठेस नहीं पहुँचाओगे।’

‘पूरा प्रयत्न करूँगा।’

‘और हाँ…’

‘क्या?’

‘यदि मुझ पर विश्वास हो तो कुछ दिन के लिए कैमरा दे दो।’

‘परंतु फिल्म…’

‘मैं धुलवा लूँगी। शीघ्रता में अपना न ला सकी, वहां आवश्यकता पड़ेगी।’

आनंद ने जैसे ही कैमरा उतारकर बेला के हाथ में दिया, गाड़ी ने सीटी दी और वह अपना बेजान-सा हाथ उसे विदा करने को हिलाता रहा, किंतु उसका मन और मस्तिष्क कहीं और थे।

सामने प्लेटफॉर्म की घड़ी शाम के छह बजा रही थी। पूना से बंबई जाने वाली गाड़ी में केवल आधा घंटा शेष था और वह अपनी चिंता मिटाने के लिए प्लेटफॉर्म की दूसरी ओर बढ़ा, जहाँ उसके पिता सामान लिए उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

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