स्वार्थी राक्षस की कहानी ऑस्कर वाइल्ड | The Selfish Giant Story In Hindi By Oscar Wild

प्रस्तुत है : स्वार्थी राक्षस कहानी ऑस्कर वाइल्ड (The Selfish Giant Story In Hindi By Oscar Wild). Swarthi Rakshas Oscar Wild Ki Kahani एक स्वार्थी विशाल राक्षस की है, जो अपने महल के खूबसूरत बाग़ में किसी को आने नहीं देता था. कैसे वह सबसे  मिलजुलकर और  प्रेमपूर्वक रहना सीखता है, इस कहानी में वर्णन किया गया है. यह कहानी मिलजुल कर और प्रेमपूर्वक  रहने की सीख देती है. पढ़िये :

The Selfish Giant Story In Hindi By Oscar Wild

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The Selfish Giant Story In Hindi By Oscar Wild

प्रत्येक दिन दोपहर को जब लड़के स्कूल से पढ़कर लौटते थे, तो वे राक्षस के बगीचे में खेलने के लिए जाया करते थे। यह बगीचा बड़ा और सुंदर था, जिसमें मुलायम हरे घास की मखमल बिछी हुई थी। इधर-उधर घास पर आसपास के सितारों की तरह जड़े हुए थे। बगीचे से बाहर मौलश्री के वृक्ष थे, जिसमें बसंत ऋतु में गुलाबी और मोती के समान श्वेत मृदुल कलिकायें प्रस्फुटित होती थीं।

शरद ऋतु में जिन वृक्षों में बढ़िया फल लगते थे, चिड़ियाँ इन वृक्षों पर बैठती थीं और मधुर राग में गाया करती थीं। बच्चे उन्हें सुनने के लिए अपना खेल स्थगित कर दिया करते ये।

“हम यहाँ कितने सुखी हैं? वे एक दूसरे से कहा करते।

एक दिन राक्षस वापस आया। वह अपने एक मित्र को देखने गया था और सात साल उसके यहाँ रहा था। जब सात साल व्यतीत हो चुके और जब राक्षस वह सब कह चुका, जो उसे अपने मित्र से कहना था ( क्योंकि उसका वार्तालाप सीमित था ) तब उसने अपने दुर्ग को वापिस जाने की सोची। जब वह वापिस आया, तो उसने छोटे छोटे बालकों को अपने बगीचे में खेलते पाया।

“तुम वहाँ क्या कर रहे हो?” राक्षस ने बड़ी ही रूखी आवाज में कहा और जिसे सुनकर सब लड़के भाग गए।

“मेरा बग़ीचा, मेरा बगीचा है। यह कोई बतलाने की बात नहीं है और मैं इसमें अपने के अलावा किसी दूसरे को नहीं खेलने दूंगा।” राक्षस ने कहा।

इसके बाद उसने बगीचे के चारों तरफ एक ऊँची दीवाल खड़ी की और एक नोटिस बोर्ड लगा दिया, जिसमें लिखा था “आम रास्ता नहीं और जो इस आज्ञा को नहीं मानेगा और प्रवेश करेगा, वह जुर्म का भागी होगा।”

वह सचमुच में बड़ा स्वार्थी राक्षस था। बेचारे बच्चों को खेलने के लिए अन्य कोई स्थान नहीं था। उन्होंने सड़क पर खेलने की चेष्टा की, लेकिन सड़क धूल से भरी हुई धी और जिस पर पत्थर भी पड़े हुए थे। इस कारण बच्चे उसे पसंद नहीं करते थे। वे बगीचे की ऊँची दीवार के चारों तरफ चक्कर लगाते थे और भीतर के सुंदर बगीचे की चर्चा किया करते थे। स्कूल से लौटते वक्त वे एक-दूसरे से कहा करते “हम बगीचे में कितने खुश रहते थे।”

तब बसंत ऋतु आई और सब कहीं छोटी-छोटी कलिकायें और नन्हीं-नन्हीं चिड़ियाँ देखने लगीं। केवल स्वार्थी राक्षस के बगीचे में अब भी शीत ऋतु थी। चिड़ियों ने बगीचे में गीत नहीं गाए, क्योंकि वहाँ कोई बच्चे खेलने नहीं आते थे और वृक्षों में भी नई कोंपलें नहीं फूटी थीं।

एक दिन घास में से एक सुंदर फूल उगा। लेकिन जब उसने राक्षस के बगीचे की वह सूचना देखी, तो उसे बच्चों पर इतना दुख हुआ कि वह फिर से जमीन पर गिर कर मुरझा गया। इस सूचना से जिन लोगों को प्रसन्नता हुई, वे थे बर्फ और कोहरा। उन्होंने कहा – “बसंत ऋतु इस बगीचे को अपना वरदान देना भूल गई है, इसलिए हम लोग साल भर यहीं रहेंगे।”

तत्पश्चात् बर्फ ने सारी घास को अपने सफेद लबादे से ढंक दिया और कोहरे ने सभी पेड़ों पर सफेदी पोत दी। तब उन्होंने उत्तरी हवा को बुलाया और वह आ गई। यह हवा दिन-रात बगीचे में बड़े जोर और आवाज के साथ बहा करती और इसने मकानों की चिमनी को गिरा दिया और कहा, “यह तो बहुत अच्छी जगह है और हमें यहाँ ओलों को बुलाना चाहिए।“

कुछ समय बाद ओले भी आए और वे राक्षस के महल की छत पर प्रतिदिन तीन घंटे तक तब तक बरसते रहे, जब तक कि उसकी लगभग सभी चीजें नहीं टूट गईं। तब वह बगीचे में चारो ओर खूब तेजी से दौड़-धूप कर नाचता रहा।

“मुझे यह समझ में नहीं आता कि मेरे बाग में बसंत का उदय क्योंनहीं हो रहा है। खिड़की पर बैठ कर बर्फ़ के समान सफेद दिखते हुए बगीचे की ओर निहारते हुए राक्षस ने कहा, “मैं आशा करता हूँ कि कुछ दिन में ऋतु परिवर्तन अवश्य होगा।“ लेकिन बगीचे में न तो बसंत ऋतु ही आई और न ग्रीष्म ऋतु ही आई। शरद ऋतु ने सभी बगीचों में सुनहले फल फूल दिए, परन्तु राक्षस के बगीचे के लिए अब भी कुछ न मिल सका।

शरद ने कहा “यह राक्षस बहुत स्वार्थो है। इसलिए इस बगीचे में सदा ही शिशिर का राज्य रहा और बर्फ कोहरा ओले और उत्तरी हवायें यहाँ अपनी क्रीडायें करती रहीं।”

एक दिन सुबह जब राक्षस अपने बिस्तर पर लेटा हुआ जाग रहा था, तो उसने एक मोहक गीत सुना। इसकी ध्वनि इतनी मधुर थी कि उसने सोचा कि शायद राजा के गायक गण इस मार्ग से जा रहे हैं। सचमुच ही उसकी खिड़की के बाहर एक कोयल गाना गा रही थी, लेकिन उसने यह गाना इतने अधिक दिनों बाद सुना था कि आज उसे यह पक्षी गायन संसार का सबसे सुंदर संगीत प्रतीत हुआ। इस संगीत के बाद ही ओलों ने उसके सिर पर बरसना बंद कर दिया और उत्तरी हवा ने भी अपना गर्जन बंद कर दिया। इसके बदले उसके खिड़की के खुले अंगों में से एक से एक सुंदर महक आने लगी। तब उसने कहा “मैं सोचता हूँ कि आखिर बसंत आ ही गई।”

यह कह कर वह बिस्तर से उछल पड़ा और चारों तरफ देखने लगा। पर उसने क्या देखा? उसने एक बहुत ही आश्चर्यजनक दृश्य देखा। उसके दुर्ग की चाहर दीवारी में एक छोटा सा छेद था, जिसमें से कुछ लड़के रेंग रेंग कर दुर्ग में घुस आए ये और वहाँ के बगीचे में लगे वृक्षों की डालियों पर बैठे हुए थे। वह जितने पेड़ देख सकता था उसने देखे और प्रत्येक पर एक न एक बालक बैठा पाया। बहुत दिनों के बाद बच्चों को अपने ऊपर बैठा हुआ देख पेड़ इतने प्रसन्न हुए कि उनमें फूल उग आए। बच्चों के सिरों पर पत्तों से भरी शाखायें लहराने लगी। पक्षीगण भी अब इधर उधर घूम रहे थे और प्रसन्नता से अपनी कूकें मार रहे थे। और हरी घास में से फूल भी धीरे धीरे हँसते हुए से उदित हो रहे थे।

यह बहुत ही सुंदर दृश्य था। इसके साथ ही बगीचे के एक कोने में अब भी शिशिर थी। यह कोना दुर्ग में बने हुए महल के सबसे अधिक दूर पर था। यहाँ एक छोटा लड़का खड़ा हुआ था। इतना छोटा था कि वह पेड़ों की डालियों तक नहीं पहुंच सकता था। और वह अपनी इस असफलता से झुंझला कर इधर उधर घूमता हुआ रो रहा था। बेचारे वृक्ष पर भी काफी कोहरा और बर्फ ढंका हुआ था। उत्तरी हवा भी इसके ऊपर तूफानी वेग से मंडरा रही थी

“बच्चे मेरे ऊपर चढ़ जाओ।” वृक्ष ने बालक से कहा और अपनी डालें इतनी नीचे झुका ली, जितना कि संभव था। परन्तु बच्चा फिर भी न चढ़ सका, क्योंकि वह बहुत ही छोटा था।

यह देख कर राक्षस का हृदय द्रवित हो उठा, “उफ मैं कितना स्वार्थी रहा हूँ। अब मैँ समझा कि बसंत मेरे यहाँ क्यों नहीं ठहरती। अब मैं इस बच्चे को वृक्ष के शिखर पर बैठाऊंगा और वहाँ से अपनी दीवार का दरवाजा खटखटाऊंगा और तब मेरा बगीचा हमेशा बच्चों के खेल का मैदान बन जाएगा।” वह वास्तव में अपनी करनी पर बहुत दुखी हो रहा था।

अब वह सीढ़ी से उतर कर नीचे आया और धीरे से अपने सामने वाला दरवाजा खोल कर बगीचे में चला गया। लेकिन लड़कों ने ज्यों ही उसे देखा, वे उससे इतना डर गए कि वे देखते ही भाग गए और बगीचे में पुनः शिशिर ऋतु का राज्य छा गया। केवल वही एक छोटा लड़का बचा जो दौड़ कर भाग नहीं सका क्योंकि उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं, इसलिए वह राक्षस को आते हुए न देख सका। राक्षस ने इसी बच्चे को चुपके से पीछे से जाकर पकड़ लिया और उसे प्यार भरे हाथों से लेकर वृक्ष के शिखर पर बैठा दिया।

उसके ऐसा करते ही पेड़ में फूल लग गये और पक्षी गण वहां आकर कूकने लगे। छोटे बच्चे ने भी अपने दोनों हाथ फैला कर राक्षस के गले में डाल दिए और उसे चूम लिया। जब दूसरे लड़कों ने यह सब देखा, तो समझ लिया कि राक्षस अब दुष्ट नहीं रहा है और वे दौड़ कर बगीचे में आए और उनके साथ बसंत ने भी अपने चरण वहाँ रखे और उनको देख कर राक्षस ने कहा, “प्यारे बच्चों अब यह तुम्हारा ही बगीचा है ? और उसकी कुदाली लेकर दुर्ग की दीवार को तोड़ डाला। बारह बजे दिन को जब सब लोग बाजार जा रहे थे। उन्होंने देखा कि राक्षस एक बड़े ही सुंदर बगीचे में बच्चों के साथ खेल रहा है।

सारे दिन वे खेलते रहे और शाम के वक्त वे राक्षस से विदा लेने के लिए आए।

“लेकिन तुम्हारा छोटा साथी कहाँ है? मेरा मतलब उस बच्चे से है जिसे मैंने पेड़ पर चढ़ा दिया था।” उसने कहा। राक्षस उसे सबसे अधिक प्यार करता था, क्योंकि उस बच्चे ने उसे चूमा था।

“हमें उसका पता नहीं है। बहुत संभव है कि वह चला गया हो।” बच्चों ने कहा।

“तुम लोग उससे यहाँ कल आने के लिए कह देना।” – राक्षस ने कहा।

लेकिन बच्चों ने जवाब दिया- “हम नहीं जानते हैं कि वह कहाँ रहता है और न हमने उसे इसके पहले कभी देखा ही है।” यह सुनकर राक्षस बहुत दुखी हुआ।

प्रति दिन दोपहर को जब स्कूल की छुट्टी हो जाती थी, तब बच्चे आते और राक्षस के साथ खेला करते थे। लेकिन जिस छोटे बच्चे को राक्षस प्यार करता था, वह कभी नहीं दिखाई दिया। राक्षस इन सब बच्चों के प्रति बहुत ही दयालु था। तथापि वह अपने छोटे मित्र को देखने के लिए तरसता रहता था और हमेशा उसके विषय में चर्चा किया करता था। वह कहा करता “मैं उसको देखने की कितनी तीव्र इच्छा रखता हूँ।”

वर्ष बीतते गये और राक्षस बहुत वृद्ध और शिथिल हो चला और अधिक खेलने की सामर्थ्य उसमें नहीं रह गई। इसलिए वह एक बड़ी आराम कुर्सी पर बैठा रहता और अपने बगीचे की प्रशंसा किया करता।

वह कहता “मेरे बगीचे में कई प्रकार के सुंदर पुष्प हैं लेकिन सब पुष्पों में बच्चे ही सबसे अधिक सुंदर पुष्प हैं।“ जाड़े में एक दिन सुबह कपड़े पहनते हुए राक्षस ने अपनी खिड़की के चारों ओर देखा। उसने शिशिर के प्रति घृणा प्रकट नहीं की, क्योंकि वह जानता था कि सोता हुआ बसंत ही शिशिर होता है। इसीलिए पहले भी इस ऋतु में मचकुन्द हो जाते हैं।

अब उसने अचानक ही अपनी आँखें मलीं और वह आश्चर्य चकित हो देखता रह गया। वास्तव में यह एक शानदार दृश्य था। उसके बगीचे के सबसे दूर वाले कोने में एक पेड़ था, जो सुंदर-सुंदर सफेद कलियों से लदा हुआ था। इसकी सभी डालियाँ सुनहली थीं और उनमें रुपहले फूल लदे हुए थे। उसके नीचे वही छोटा लड़का खड़ा था, जिससे उसने सबसे पहले प्यार किया था। आनंद विभोर होकर वह अपने महल से नीचे आया और बगीचे में गया। वह जल्दी-जल्दी घास पर चल कर उस लड़के के पास गया और जब उसके पास पहुँचा, तो उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। वह बोला “यहाँ तुम्हें किसने बांधा है।”

उस लड़के की हथेली पर और उसके पैर पर दो दो कीलों के चिह्न थे। उसे देखकर वह झल्ला कर फिर बोला, “किसने तुम्हें यहाँ बांध रखा है? मुझे जल्दी बताओ, जिससे मैं उसे अपनी तलवार के घाट उतार सकूं।“

“मेरे दादा। ऐसा मत कहो। यह तो प्यार के घाव हैं।” उस बालक ने उत्तर दिया।

“तुम कौन हो?” राक्षस ने पूछा और वह भय से थरथरा उठा और कुछेक क्षणों में वह उस छोटे बच्चे के सामने घुटने टेककर नत मस्तक हो गया। राक्षस की इस स्थिति पर बच्चे को बहुत हँसी आई ओर उसने कहा, “दादा तुम एक बार और मुझे अपने बगीचे में खेलने दो। फिर मैं आज ही तुम्हें अपने बगीचे में ले चलूंगा। क्या जानते हो कि मेरा बगीचा कौन है? मेरा बगीचा तो स्वर्ग है।”

उसी शाम को जब बाल मंडली उस बगीचे में खेलने गई तो उसने देखा कि उस पेड़ के नीचे सफेद पत्तियों से पूरी तरह ढंका हुआ राक्षस वहाँ मरा पड़ा है।

(अनुवाद: नन्दलाल जैन)

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