वर्ष गाँठ डॉ. शोभा घोष की कहानी | Varsh Gaanth Shobha Ghosh Ki Kahani

वर्ष गाँठ डॉ. शोभा घोष की कहानी, Varsh Gaanth Shobha Ghosh Ki Kahani, Varsh Gaanth Shobha Ghosh Story In Hindi 

Varsh Gaanth Shobha Ghosh Ki Kahani

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“अगर मैं सिगरेट पी लूं, तो आप कोई आपत्ति तो नहीं है?” अत्यंत मीठे स्वर में सुरेश ने पूछा ।

सुधा ने जैसे सुनकर भी नहीं सुना। वह खिड़की से बाहर देख रही थी। गाड़ी की रफ़्तार बहुत तेज़ थी। रात का समय था। सेकंड क्लास के कम्पार्टमेंट में ये दो ही व्यक्ति बैठे हुए थे।

‘सुनिए ।’

अब सुधा ने इधर मुँह घुमाया – ‘आपने मुहसे कुछ कहा?’

‘जी, मैं जरा सिगरेट ….।’

‘जरूर, जरूर।’ – वह फिर खिड़की के बाहर देखने लगी।

सुरेश सोच रहा था, कैसे बात का सिलसिला शुरू करें?

थोड़ी देर बाद जब सुधा ने इधर मुंह घुमाया, तो मौका पाकर सुरेश ने पूछा – ‘आप को कहाँ जाना है?’

‘मैं बनारस उतरूंगी।’

‘मैं भी बनारस ही जा रहा हूँ ।’ – सुरेश ने वार्ता की कड़ी जोड़ी।

बस भूमिका के लिए इतना ही पर्याप्त था। अब आगे धारा प्रवाहित करने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

‘घर आप का वहीं है?’

‘जी हाँ। छुटपन से मैं बनारस में ही रहती हूँ ।’

‘कलकत्ते कैसे?’

‘वहां छुट्टियों में घूमने गयी थी, आप भी बनारस में ही रहते है?’

‘जी हाँ, वहीं मेरा परिवार भी … मतलब मैं वहीं रहता हूँ ।’

‘कलकते में किसी काम से?’

‘जी….जी…. वहां मैं अपनी बहन के पास गया था। मतलब सभी लोग कलकत्ते में ही रहते हैं, मैं अकेला ही बनारस में रहता हूँ ।’

‘बड़ा आश्चर्य है। इतने दिनों से आप बनारस में रहते थे, पर कभी आपसे परिचय नहीं हुआ।‘

‘आज तो हो गया?’

दोनों हंस पड़े। स्टेशन पर उतरने के बाद सुरेश सुधा के मना करने पर भी उसे घर तक पहुँचाने गया।

‘कष्ट न हो, तो कभी घूमते-घामते दर्शन दे दीजियेगा ।‘

‘जरूर, जरूर। अच्छा नमस्ते।‘

आज कलकत्ते से लीला की चिट्ठी आई है, उसने लिखा है – ‘अब मेरी तबीयत ठीक है। जल्दी ही आकर तुम मुझे ले जाओ। यहाँ से मेरा जी ऊब गया है। बच्चे भी तुम्हारे लिए बहुत रोते है। फिर तुम्हें भी तो कितनी तकलीफ हो रही होगी।‘

सुरेश चिट्ठी पढ़ ही रहा था, नौकर ने आ कर कहा – ‘बाबूजी, कोई आपसे मिलना चाहती हैं।‘

‘बुला लाओ।‘

‘नमस्ते ।’

‘नमस्ते, अरे आप! आईये, आईये कई दिनों से मैं आप की ही बात सोच रहा था।‘

‘तो फिर आपने मुझे पहचान लिया है?’

‘वाह, आपने भी खूब कहा।‘

‘ट्रैन में तो कितने लोगों से परिचय होता है? पर याद कितनों की रह जाती है?’

‘केवल आप जैसे लोगों की।‘

‘आप शायद कोई चिट्ठी पढ़ रहे थे.. क्या पत्नी ने……’

‘पत्नी? देख ही रही है अपने को? ऐसे लड़के कोई अपनी लड़की देगा? पति बनने का तो सौभाग्य ही नहीं हुआ, फिर पत्नी कहा से आएगी?’

‘अच्छा, इसका मतलब आप अविवाहित है? मैंने तो कुछ और ही सोच रखा था।‘

जोर से हंस पड़ा सुरेश, ‘अब आप का भ्रम दूर हो गया?’

‘जी हाँ।‘

चाय पीने के बाद सुधा ने कहा, ‘अच्छा अब आज आज्ञा दें।‘

‘अच्छा, फिर कभी दर्शन देंगी?’

‘दर्शन देने नहीं, करने आ सकती हूँ।‘

‘चाहे जिस बहाने से हो, अच्छा गुड नाईट।‘

‘गुड नाईट।‘

लीला को सुरेश ने लिख दिया – कुछ दिन तुम और वहां रह कर विश्राम कर लो। आने की इतनी जल्दी क्या है? यहाँ आते ही तुम्हारे लिए आराम हराम हो जायेगा, एक मिनट चैन नहीं मिलेगा तुम्हें। इसलिए डर लगता है, स्वस्थ्य कहीं फिर खराब न हो जाये। मेरे लिए चिंता न करो, मैं अच्छी तरह हूँ। समय से मैं तुम्हें लेने के लिए आ जाऊंगा।‘

दफ्तर से लौटते सुरेश नहा-धोकर बहार जाने की तैयारी कर रहा था। कालिंग बेल की आवाज़ सुनकर स्वयं ही दरवाजा खोलने गया। एक अपरिचित युवती को देख कर कुछ आश्चर्यचकित होते हुए भी सहज भाव से बोला – ‘आइये’।

अंदर जाते हुए जया ने कहा – ‘आपने तो शायद मुझे पहचाना नहीं। पर मैं आप को अच्छी तरह जानती हूँ। मेरा नाम है जया शुक्ला। जब से आपकी पुस्तक ‘जीवन यात्री’ पढ़ी है, आप से मिलने की बड़ी उत्कंठा थी, पर संकोचवश इतने दिनों तक आयी नहीं। आखिर आज….’

‘यह तो मेरा सौभाग्य ही है, जो मेरी पुस्तक आप को पसंद आयी। लीजिये, चाय पीजिये।‘

चाय की एक घूंट सिप करते हुए जया ने कहा – ‘आप को देखने से पहले, आप के रंग-रूप , आकार – प्रकार की जो मैंने कल्पना कर ली थी, आप ठीक उसके विपरीत ही निकले। मैंने सोचा था आप ६० साल के वृद्ध होंगे, सफ़ेद बाल और सफ़ेद लम्बी दाढ़ी होगी। सामने के दो दांत नहीं होंगे, और चश्मे के अंदर से देखते होंगे, फिर लाठी आपकी दासी होगी।‘

सुरेश जोर से हंस पड़ा- ‘वाह! कितनी अच्छी कल्पना थी आपकी?’

‘और मुझे आपसे भी अधिक’ – प्रति उत्तर में सुरेश ने कहा।

‘अब जाती हूं।‘

‘फिर कभी …।’

दूसरे दिन शाम सुरेश लॉन में बैठकर अखबार पढ़ रहा था, सुधा को देखते ही – ‘आइए, आइए सुधा जी। मैंने तो सोचा था भूल ही गई हैं।‘

‘सुधा की डिक्शनरी में एक ही शब्द नहीं है ।‘

‘कौन सा?’

‘ओह! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा, कहीं नए एडिशन में न जुड़ जाए।‘

‘चाहे नया हो चाहे पुराना, भूल तो हो ही नहीं सकती। आज मैं अपनी एक-दो कवितायेँ आप को सुनाने के लिए लाई हूँ।‘

सुरेश (उत्सुकता से) – देखूं, आखिर चोरी-चोरी अपने में क्या- क्या छिपाये हुई हैं?

सुधा- मुझे आता ही क्या है?

सुरेश- यह कहो क्या नहीं आता है?

जाते समय सुरेश ने कहा -‘कल का प्रोग्राम याद है न?’

‘जी हाँ, भूलते आप हैं, मैं नहीं।’

धीरे-धीरे सुरेश और सुधा का सम्बन्ध घनिष्ठ होता गया, यद्यपि वह डूब-डूब कर पानी पीता था, इधर सुधा के साथ और उधर जया के साथ समान रूप से प्रेम का अभिनय करता था, पर यह बात दोनों में से किसी को मालूम नहीं थी।

‘हेलो जया? सुनो, आज सात बजे के शो में न जाकर अगर १० से १ बजे के शो में जाएँ, तो तुम्हें कोई दिक्कत होगी?’

‘क्यों, क्या बात हो गयी?’

‘जरा कुछ काम है ।‘

‘अच्छा ठीक है ।’

‘अच्छा, ओके ।‘

निश्चित समय पर जया सुरेश के घर पहुँच गयी। कार में बैठती हुई जया बोली- ‘ड्राइव मैं ही करूंगी।‘

‘और अगर किसी से टकराई तो?’

‘तो क्या हुआ? सीधे इस लोक से उस लोक पहुँच जाऊंगी । ‘

‘और बिचारे इस लोक में रहने वालों की गाडी कौन चलाएगा?’

‘बहुत मिल जायेंगे।’ कहकर उसने गाडी स्टार्ट कर दी।

पिक्चर से लौट कर सुरेश जया को लेकर सीधा घर पहुंचा। जया को खाना खिला कर घर पहुँचाने का प्रोग्राम था। घंटी की आवाज़ सुनकर दरवाजा स्वयं लीला ने खोला। सुरेश ने पत्नी को देखा, तो चौंक पड़ा।

‘तुम नहीं आये तो मैंने सोचा, खुद ही चली चलूँ। ‘

भारी मन से सुरेश ने जया को बाहर ही बिदा दी और कपडे बदलने चला गया।

‘रामु, यह लड़की कौन है?’ लीला ने नौकर से पूछा।

‘पता नहीं बहूजी, यह तो रोज़ ही आती है। कभी-कभी खाना भी खाती है, और बाबूजी के साथ अक्सर घूमने जाती है।’

‘हूँ ।’

अब बिचारे लेटर पैड की शामत आयी। सुरेश के हृदय पटपर काल्पनिक अभिनय की रंगीन भवतुलिका से प्रेम का इतिहास लिखा जाने लगा । जया तथा सुधा दोनों को ही सुरेश प्रेमपत्र लिखने लगा । हूबहू वही बात सुधा को लिखता था, जो जया को लिखता था । एकदम कार्बन कॉपी । दोनों से ही उसने शादी करने का भी वचन दे रखा था ।

इधर दो दिनों से सुरेश बहुत ही परेशान है। आज तो वह सबेरे से ही बहुत बेचैन है। आज ही जया ने अपनी वर्ष गाँठ पर उसे बुलाया है। कहाँ जाऊं, क्या करूँ? अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वह कही नहीं जायेगा। बाद में पूछने पर तबीयत ख़राब होने का बहाना कर दूंगा। ५ बजे तक सुधा सुरेश कि प्रतीक्षा करती रही। अंत में जब सुरेश नहीं आया, तब वह उसके घर पहुंची। सीधे उसके कमरे में पहुंच कर बोलीं- ‘अच्छा, आप अभी तक तैयार नहीं हुए है?’

‘सुनो सुधा, आज तबियत ठीक नहीं है ।’

‘क्या हो गया आप को?’ कहते हुए जया ने भी उसी समय कमरे में प्रवेश किया ।

‘खूब परेशान किया आपने। अब देर मत कीजिये । सब लोग आप के ही इंतजार में हैं।’ जया ने आदेशपूर्ण स्वर में कहा ।

‘पर सुनिए, इन्हें तो मेरे यहां जाना है, आज मेरी वर्ष गाँठ है। मैं इन्हें लेने आयी हूँ।’

‘पर इस समय तो इन्हें मेरे यहाँ जाना होगा, क्यों कि आज के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि हैं ये ।’ सुधा ने प्रतिउत्तर में कहा ।

सुरेश – ‘इस समय मेरी तबियत ठीक नहीं है। मैं कहीं नहीं जा सकता हूँ।’

सुधा- ‘आप को जाना ही पड़ेगा। आपने जाने के लिए वादा किया था। अपने अधिकार से मैं आपको बुलाने आयी हूँ। मैं आपकी वाग्दत्ता हूँ, मेरी बात आपको ले ही चलूंगी।’

जया – ‘शादी का वचन तो पहले इन्होंने मुझे दिया। परसों तिलक भी है। सारी तैयारियां हो चुकी हैं।’

लीला -‘मेरे घर में यह सब क्या नाटक हो रहा है?’

सुरेश – ‘सच कहता हूँ लीला, यह सब मैंने कुछ नहीं कहा है।’

सुधा – ‘आपने नहीं कहा है? मेरे पास इसका सबूत है।’

जया – ‘और मेरे पास भी इसका प्रमाण है ।’

‘आप भूल रही हैं, किसी और ने आप लोगों से कहा होगा, मैं तो आप लोगों को पहचानता तक नहीं हूँ।’

लीला ने कहा – सुनिए बहनजी, इनकी शादी हो चुकी है, मैं ही इनकी पत्नी हूँ। आप लोग …..’

**समाप्त**

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