दि फर्निश्ड रूम (सुसज्जित कमरा) ओ. हेनरी की कहानी | The Furnished Room Story By O Henry In Hindi

प्रस्तुत है – दि फर्निश्ड रूम (सुसज्जित कमरा) ओ. हेनरी की कहानी (The Furnished Room Story By O Henry In Hindi). Susajjit KamraO Henry Ki Kahani एक Sad Love Story In Hindi है, जिसका अंत दिल को झकझोर देता है. पढ़िये :

दि फर्निश्ड रूम (सुसज्जित कमरा) ओ. हेनरी की कहानी (The Furnished Room Story By O Henry In Hindi

The Furnished Room Story By O Henry 

The Furnished Room Story By O Henry In Hindi

वक़्त की तरह ही लगातार चलते रहने, लगातार जगह बदलते रहने वाले कई ख़ानाबदोश न्यूयार्क शहर के वेस्टसाइड इलाक़े में लाल पत्थर वाले घरों के आस-पास मिल जाते हैं। ये लोग बेघर हैं, मगर इनके पास हज़ारों घर हैं। एक किराये के कमरे से दूसरे किराये के कमरे में अपनी ज़िन्दगी बसर करते लोगों के मुँह से ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर’ जैसे गाने बिल्कुल बेमतलब लगते हैं। इन्हीं कमरों में किसी तस्वीर के सहारे लटका हुआ मनी-प्लांट इनका बग़ीचा है, और गमले में लगा हुआ रबर-प्लान्ट इनका सायादार दरख़्त है।

शहर के इस हिस्से में इन्हीं ख़ानाबदोशों की एक बड़ी आबादी अपनी ज़िन्दगी बसर करती है। इस आबादी के पास कई क़िस्से हैं, ज्यादातर उदास कर देने वाले और डरावने क़िस्से। इन क़िस्सों में परेशानियाँ हैं, तकलीफ़ें हैं और अजीब रौंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव भी।

एक शाम की बात है। जब अंधेरा होने के बाद एक नौजवान आलीशान लाल मकानों के बीच रेंगता हुआ और तक़रीबन सभी दरवाज़ों को खटखटाता हुआ बारहवें मकान के ज़ीने पर सुस्ताने के लिये बैठ गया। उसने अपने माथे से धूल मिला पसीना पोंछा और कहीं दूर से आ रही घण्टे की आवाज़ में गुम हो गया। इस बारहवें घर में रहने वाली औरत जब बाहर आयी, तो उसने इस नौजवान को यूं देखा, जैसे वह किसी मेवे में लगा हुआ कीड़ा हो, जो मेवे को अंदर ही अंदर खोखला कर चुका हो और अब दूसरा मेवा ढूंढ रहा हो।

“क्या यहाँ कोई जगह ख़ाली है?” नौजवान ने दरयाफ़्त किया।

“अंदर आओ!” उस औरत ने सूखी मेंढक की सी टर्र अपने गले से बाहर निकाली। “ऊपर तीसरी मंज़िल पर एक कमरा हफ़्ते भर पहले ही ख़ाली हुआ है…देख लो, तुम्हें पसंद आयेगा।”

नौजवान चुपचाप उसके पीछे ज़ीने चढ़ने लगा। कहीं दूर से आती एक धुंधली रौशनी हाल की दीवार पर अस्पष्ट परछाइयाँ बना रही थी। नौजवान तेज़ी से बिना आवाज़ के उसके पीछे ज़ीने चढ़ता गया। उसके चढ़ने से आवाज़ यों भी नहीं हो रही थी कि ज़ीनों पर पड़े कारपेट के धागे बिना धूप के, नमी से चिपचिपे होकर अपना अस्तित्व ही भुला चुके थे। ज़ीने के हर मोड़ पर दीवार में ख़ाली ताक़ें थीं, शायद कभी उनमें मनी-प्लांट लगा रहा हो, जो धूप और हवा की कमी से मर गया हो या फिर शायद उनमें मशहूर लोगों की मूर्तियाँ रही हों, जिनको अंधेरों के राक्षसों ने खींचकर नीचे अधूरे बने बेसमेण्ट में फेंक दिया हो।

उस औरत ने ऊपर पहुँच कर अपनी सूखी आवाज़ में कहा, “बढ़िया कमरा है, बहुत ही कम ख़ाली रहता है…पिछले किरायेदार बहुत शालीन थे, मुझे उनसे कभी कोई तकलीफ़ नहीं हुई… किराया भी वह हमेशा एडवांस देते थे। सुनो नल उधर हॉल के आख़िर में है। तुम्हें पता है स्प्राल और मूनी को तो ये कमरा इतना पसंद आया था कि वो इसमें तीन महीने रहे।”

नौजवान के चेहरे पर हैरानी देखकर वो बोली, “तुम स्प्राल और मूनी को नहीं जानते? मशहूर आर्टिस्ट हैं, उन्होंने यहाँ कई शोज़ के स्केच भी बनाये थे। उधर ड्रेसिंग टेबल के ऊपर जो मैरिज सर्टिफ़िकेट…” कहते-कहते वो रुकी और नौजवान को दूसरी तरफ़ देखता हुआ देख कर बोली, “…गैसलाइट इधर है और ये देखो कपड़ों की अलमारी, काफ़ी बड़ी है न? ये कमरा तो सबको पसंद आ जाता है, बहुत कम ख़ाली रहता है, तुम्हारी क़िस्मत अच्छी है।”

“क्या यहाँ पर कलाकार भी रहते हैं?” नौजवान ने उसे बीच में ही टोक दिया।

“हाँ! आते हैं, रहते हैं और चले जाते हैं। मेरे कमरों में से ज्यादातर इन्हीं नाटक में काम करने वाले कलाकारों से भरे रहते हैं। दरअसल यह पूरा इलाक़ा ही थिएटर में काम करने वाले वाले लोगों से भरा हुआ है। कलाकार वैसे भी कहीं बहुत ज्यादा दिन नहीं टिकते, मगर मुझे पूरे पैसे देकर जाते हैं।”

नौजवान ने एक हफ़्ते का एडवांस देकर कमरे की बुकिंग कर ली। वो बहुत थका हुआ था, तो फ़ौरन ही कमरे में जम गया। पैसे गिनते हुए वो उस औरत की बातें सुन रहा था। “देखो मिस्टर, पूरा कमरा एकदम तैयार है यहाँ तक कि तौलिया और नहाने का पानी भी।”

जब वो औरत एडवांस लेकर जाने लगी तो लड़के की ज़ुबान पर फिर वही सवाल आ गया, जो कई दिनों से उसके दिमाग़ में डेरा जमाये हुए था।

“ज़रा सुनिए, आपने किसी मिस वैशनर का नाम सुना है? क्या वो यहाँ कभी किराये के लिये कमरा ढूंढने आयी है? एल्विस वैश्नर! वो स्टेज पर गाना गाती है, गोरी-सी लड़की है, सुनहरे बाल, और बायीं आँख के ऊपर गहरा काला मस्सा…”

“नहीं, मुझे नहीं मालूम। स्टेज वाले कलाकार अक्सर अपना नाम बदलते रहते हैं, और फिर वह यहाँ ठहरते भी कितनी देर हैं, मुझे ऐसा कोई नाम नहीं ध्यान आ रहा है।”

नहीं! हमेशा यही जवाब, हमें नहीं पता, हमने नहीं सुना। पाँच महीनों से वो लगातार अलग-अलग लोगों से यही सवाल पूछ रहा था और हर बार वही जवाब-‘नहीं’। दिन में होटल के मैनेजरों से, थियेटर के एजेण्टों से, गाने वालों की मण्डली में, संगीत के स्कूलों में हर जगह वो नौजवान बस इसी नाम के बारे में पूछता रहता था। रातों को म्यूजिकल शोज़ के, नाटकों के दर्शकों से भी यही सवाल किया करता था।

वो नौजवान उस लड़की, एल्विस वैश्नर से प्यार करता था, हर मुमकिन कोशिश करता था कि कहीं से उसका कोई सुराग़ मिल जाये। एक बात तो पक्की थी कि उसके ग़ायब हो जाने के बाद ज़रूर इसी टापूनुमा शहर ने उसको कहीं न कहीं पनाह दी होगी। मगर यह शहर एक शैतानी दलदल की तरह था। रेत के टीले रोज़ हवाओं के ज़ोर पर अपनी जगह बदलते रहते थे। आज जो रेत ऊपर दिखती थी, कल वो नीचे धंस चुकी होती थी।

इस कमरे ने अपने नये मेहमान का इस्तेक़बाल बड़ी ही खोखली मेहमान-नवाज़ी और ओढ़ी हुई मसरूफ़ियत के पूरे नाज़-ओ-अंदाज़ से किया। टूटे फ़र्नीचर की धुंधली चमक सोफ़े पे चढ़े ज़री के कवर, दोनों खिड़कियों के बीच लगा हुआ बड़ा सा आईना, दीवार पर टंगे दो सुनहरे फ़्रेम और पीतल के पायों वाला बेड, ये सब उसे कुछ देर का भुलावा देने के लिये बिल्कुल तैयार थे। ये भुलावा इस वक़्त नौजवान के लिये बहुत आरामदेह था।

ये नौजवान मेहमान बेदम सा होकर कुर्सी पर ही पसर गया, इस बात से बेख़बर कि इस कमरे में कितनी ही कहानियाँ, जो इसके पिछले किरायेदारों के बारे में थीं, सुनी जाने के लिये बेताब हो रही थीं। कमरे में एक रंगीन फूल बूटों वाला गलीचा, जिस पर एक फ़व्वारा भी बना था, मिट्टी से लिथड़ी हुई दरी के बीचोंबीच यूं लग रहा था, जैसे मटमैले समंदर के बीच कोई हरा भरा जज़ीरा उग आया हो, दीवार पर लगे सुंदर वॉलपेपर के ऊपर वही पुरानी आम सी तस्वीरें टंगी थीं, जो अमूमन किराये पर उठने वाले कमरों में लगी होती हैं। एल्गर हिक्स, सीनैक, जॉन एवरेट वग़ैरह की बनायी हुई तस्वीरें देख देख कर वो तंग आ चुका था। उसको ये तस्वीरें किरायेदारों का पीछा करती हुई मालूम होती थीं।

कमरे के एक तरफ़ टंगी ख़ूबसूरत चिलमनों के पीछे से, पुराने आतिशदान के संजीदा नुक़ूश अपने वजूद की उसी तरह चुगली कर रहे थे, जैसे ख़ूबसूरत रक़्क़ासाओं के बदन उनके दुप्पटों के पीछे से किया करते हैं। इस आतिशदान के ऊपर ही एक नाव का पुराना ढांचें नुमा शोपीस अपने हाल पर तरस खाते हुए पड़ा था। एक दो बेकार गुलदान कुछ अदाकाराओं की तस्वीरें, दवाओं का डिब्बा, और गड्डी से बिछड़े हुए ताश के पत्ते…. कुल मिलाकर कमरे का असासा यही था।

नौजवान की आँखों के सामने जैसे-जैसे इस पहेली नुमा कमरे के किरदार सामने आते गए, यहाँ रह चुके किरायेदारों की कहानी ने उसके लिये नये ही मानी अख़्तियार कर लिये। कालीन के बीच में ग़ायब हो चुके रेशे बता रहे थे कि भीड़ के बीच में ख़ूबसूरत लड़कियाँ कैसी लगती होंगी। दीवार पर छपे रह गये उंगलियों के निशान ऐसे थे जैसे किसी क़ैदी ने धूप और हवा को एक साथ छूने की कोशिश की हो। दीवार पर पड़े पानी की छीटों के धब्बे जो किसी धमाके की तस्वीर जैसे थे, ये बताते थे कि कोई शीशे का गिलास या बोतल यहाँ छनाक से टूटी है। आईने के पीछे की तरफ़ हीरे की क़नी से लिखा गया एक नाम- मैरी, इस पार भी बख़ूबी दिखाई देता था। ऐसा लगता था जैसे इस कमरे की चमकीली ख़ामोशी के ज़ेरे असर लोगों के कई तूफ़ान गुज़र चुके हैं।

फ़र्नीचर टूटा फूटा था, सोफ़े पे स्प्रिंग खिले हुए थे और वो ऐसा दिख रहा था जैसे कोई बड़ा भारी शैतान किसी वजह से अपने बदन को अजीब तरह से मरोड़ रहा हो और उसी हालत में मर गया हो। ज़रूर इन सबसे भी ज़ियादा बड़ी कोई उथल पुथल रही होगी, जिसकी वजह से आतिशदान के सामने का पूरा संगमरमर उखड़ गया था। कमरे की फ़र्श पर ऐसे नक़्श दर्ज थे जो उन सारे लोगों की नीयत और हालात बयान कर रहे थे, जिन्होंने इस कमरे को कभी अपना घर समझा था। यूं भी कहा जा सकता है कि ये इस कमरे की बचे रह जाने की चाहत ही थी, जिसने उन वक़्ती मालिकों के ग़ुस्से को और भड़का दिया, जिसकी वजह से ये आज इस हाल को पहुँचा।

नौजवान किरायेदार ने इन सब ख़यालों को सधे क़दमों के साथ अपने दिमाग़ में दाख़िल होने दिया, जबकि वहाँ पहले से ही इस कमरे की महक और आवाज़ें अपना डेरा जमा चुकी थीं। थोड़ा और ग़ौर करने पर उसको आस पास के कमरों का अहसास होना भी शुरू हुआ। एक कमरे से उसको सुस्त हँसी की आवाज़ आयी, दूसरे से किसी के डांटने वाली रौबदार मर्दाना आवाज़, कहीं पासों के फेंके जाने की आवाज़ तो कहीं लोरी और रोने की आवाज़ें। उसके सिर के ठीक ऊपर से बैंजो की आवाज़ आ रही थी, जिसे कोई पूरे जोश के साथ दीवानावार बजा रहा था। कहीं दूर से दरवाज़े खटखटाने की आवाज़, कुछ और दूर से जाती हुई ट्रेन की आवाज़ और घर के पीछे की ओर जैसे कोई बिल्ली चारदीवारी पर बैठी रो रही हो। उसने एक गहरी साँस ली और इस कमरे को अपने सीने में भर लिया। सीलन, गले हुए फ़र्नीचर और धूल की मिली जुली गंध उसकी रगों में पैवस्त हो गयी।

और तभी जब उसने अपने बदन को आराम के इरादे से ढीला छोड़ा, तो वहाँ जंगली फूलों की एक मीठी सुगन्ध भर गयी। इस सुगंध को हवा का एक झोंका कमरे के अंदर लेके आया था और ये झोंका इतना ज्यादा जानदार था, जैसे सचमुच ही उसमें जान हो और वो इस नौजवान से मिलने आया हो, जैसे इस हवा के झोंके ने नौजवान से कुछ कहा और नौजवान एकदम से चिहुँक पड़ा, “हाँ… क्या हुआ ?” ख़ुशबू का ये झोंका नौजवान को अपने आग़ोश में ले रहा था और उसका सारा जिस्म ठंडा पड़ता जा रहा था।

कोई ख़ुशबू भला किसी को कैसे आवाज़ दे सकती है। ये बात उसकी समझ से बाहर थी। मगर फिर भी ये आवाज़ जो भी थी, उसे ऐसा लगा जैसे उसको छू रही हो।

“वो यहीं थी।” ये लफ़्ज़ उसके अंदर बजने लगे। वो नौजवान हर एक उस चीज़ को, उस छोटी से छोटी चीज़ को पहचान सकता था जिसे ‘उसने’ छुआ हो, वरना ये जंगली फूलों की सुगंध, वो सुगंध जो ‘उसे’ बहुत पसंद थी, यहाँ कहाँ से आयी।

एक बार फिर उसने कमरे का जायज़ा लिया। इस बार उसको कमरे की तरतीब बहुत ही अजीब ओ ग़रीब लगी। ड्रेसिंग टेबल पर एक सस्ता स्कार्फ़ पड़ा था जिस पर ढेर सारी हेयरपिन्स बिखरी पड़ी थीं, हेयरपिन्स लड़कियों की बहुत अभिन्न मित्र होती हैं, मगर उसने उन्हें नज़र अंदाज किया और वो ड्रेसिंग टेबल पर झुककर एक एक दराज़ देखने लगा। पहली दराज़ में उसको एक पुराना गंदा सा रुमाल दिखा, रुमाल को अपने चहरे के पास ले जाते ही उसे अजनबीयत का अहसास हुआ, फ़ौरन ही उसने रुमाल ज़मीन पर फेंक दिया। दूसरे दराज़ में उसे कुछ बटन, एक नाटक की पर्ची, किसी साहूकार का काग़ज़ कुछ टॉफ़ियाँ और सपनों का मतलब बताने वाली एक किताब मिली। आख़िरी दराज़ में एक काला रेशमी हेयरबेंड था, वो रुका और उसने बहुत ग़ौर से उस हेयरबेंड को देखा । हेयरबेंड के पास कोई कहानी नहीं थी।

इसके बाद तो वो कमरे की तलाशी में यूं जुट गया, जैसे खोजी कुत्ते किसी की गंध पहचान कर जुट जाते हैं। दीवारों के वालपेपर को, कालीन के उभरे हुए हिस्सों को, कमरे के हर एक कोने को कभी घुटनों के बल तो कभी पंजों पर उचककर उसने अच्छी तरह खंगाला, आतिशदान के दायें-बायें, पर्दों के पीछे, और कमरे के कोने में रक्खे बॉक्स तक उसने हर एक चीज़ को किसी सुराग़ मिल जाने की उम्मीद में ठीक से टटोला। कोई एक सुराग़, जिससे ये पता चलता कि उसके आगे पीछे, दायें-बायें, ऊपर नीचे कहीं भी वो लड़की जिसे वो ढूंढ रहा है, अपने वजूद के साथ शामिल रही हो, नहीं मिला।

मगर वो अहसास अभी तक उसको अपने आग़ोश में लिये हुए था। ”हाँ… क्या हुआ ?” उसने एक बार फिर से ऊँची आवाज़ में पुकारा और चौकन्ना होकर आँखें फाड़े हुए जवाब का इंतज़ार करने लगा। वो अभी तक यक़ीन ही नहीं कर पा रहा था कि गर्मजोशी को वो इस ख़ुशबू की बाहों में महसूस कर सकता है, वो उस लड़की के वजूद के बिना ही है। उसने दरवाज़ों और खिड़कियों की झिर्रियों में झांकने की कोशिश की। उसे वहाँ केवल सिगरेटों के टुकड़े और बोतलों के ढक्कन फँसे मिले।उसे कालीन के नीचे से एक अधजला सिगार मिला और इसके इलावा भी ज़िक्र, न किये जाने लायक़ कई बेकार चीज़ें,जो यहाँ पर उससे पहले रह चुके ख़ानाबदोश लोगों की ज़िन्दगी से किसी न किसी रूप में जुड़ी रही होंगी, मिलीं मगर वो सुराग़ न मिला जिसकी उसे तलाश थी।

और तब उसे उस सूखी टर्र की सी आवाज़ वाली औरत का ध्यान आया।

वो भाग कर नीचे पहुँचा और दरवाज़े पर दस्तक दी। जब वो औरत बाहर आई, तो उसने फिर से, मगर इस बार बहुत गर्मजोशी के साथ पूछा,”कि आप बता सकती हैं कि मुझसे पहले यहाँ पर कौन रहता था?”

मैंने बताया न “….. स्प्राल और मूनी.. मिस बरेटा स्प्राल तो वो थिएटर में थीं। मगर वैसे वो मिसेज़ मूनी थीं। देखो मैं कोई ऐसे वैसे लोगों को कमरा थोड़ी देती हूँ, उनका मैरिज सर्टिफ़िकेट…”

“ये मिस स्प्राल कैसी थीं… मेरा मतलब दिखने में कैसी थीं।”

”ओह! उसके बाल काले थे, वो छोटे क़द की थी और थोड़ी मोटी थी। उसका चेहरा बड़ा मज़ेदार था। देखते ही हँसी आ जाती थी। अभी हफ़्ते भर पहले ही तो वो लोग यहाँ से गये हैं।”

“और उसके पहले यहाँ कौन रहता था?”

“ओहहो, तुम्हारे पास कितने सवाल हैं। उससे पहले यहाँ का किरायेदार एक बूढ़ा ढुलाई वाला था। वो एक हफ़्ते का किराया दिए बिना ही चला गया। उसके पहले मिसेज़ क्राउडर और उनके दो बच्चे, वो लोग यहाँ चार महीने रहे; उसके पहले वो बूढ़ा डॉयल, उसका तो किराया उसके बच्चों ने अदा किया। बाद में वो यहाँ छह महीने रहा था। देखो, अब मैं तुम्हें क़रीब साल भर के किरायेदारों के बारे में बता चुकी हूँ। इससे ज्यादा मुझे याद नहीं।”

“जी, शुक्रिया।”

वो वापस अपने कमरे में चला गया। कमरा अब पूरी तरह ख़ामोश पड़ा था। वो वजह, जिससे उस कमरे में थोड़ी देर पहले तक रौनक़ थी, अब नहीं थी। जंगली फूलों की सुगंध अब वहाँ नहीं थी। उसकी जगह अब फंफूद लगे फ़र्नीचर की बास ने ले ली थी । उम्मीद के खो जाने से जैसे उस नौजवान की सोचने समझने की ताक़त ही चली गयी। वो वहीं पर बैठ कर गैसलाइट से आती पीली मटमैली रौशनी को घूरने लगा। इसके बाद वो बिस्तर पर गया, उसने बेडशीट को चीर कर उसके छोटे छोटे टुकड़े बनाये और अपने चाक़ू की मदद से उसने इन चीथड़ों को खिड़कियों और दरवाज़ों की हर झिर्री में कस कर ठूंस दिया। जब बाहर से किसी भी गंध या आवाज़ के आने का कोई भी रास्ता न रहा। उसने गैसलाइट बुझाई और फिर न जाने क्या सोचकर गैस को पूरा खोल दिया और बिस्तर पर आराम से लेट गया।

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इस रात मिसेज़ मैक्कूल की बारी थी बियर लेकर आने की। सो वो बियर लायीं और मिसेज़ पर्डी के साथ नीचे अधूरे बने बेसमेंट में बैठ कर बातें करने लगीं, ” पता है मैंने तीसरी मंज़िल वाले कमरे को आज किराये पर दे दिया।”

”अरे! कमाल है, कमरे किराये पर उठाना तो कोई आप से सीखे।”

”हाँ भई, कमरे किराये पर न उठायेंगे, तो अपना काम कैसे चलेगा।”

” क्या आपने उसे बताया…ख़ुदकुशी के बारे में”

“मिसेज़ मैक्कूल, हम कमरे इसलिये तैयार कराते हैं कि हम उसे किराये पर उठा सकें…. इसलिये नहीं कि हमारा नुक़सान हो…. मैंने उसे कुछ नहीं बताया।”

”ठीक किया…अगर लोगों को ख़ुद-कुशी के बारे में पता चलेगा, तो क्या वो उस कमरे में रहेंगे…और हमें अपना काम भी तो देखना है….वैसे भी पिछले हफ़्ते वो लड़की जो कमरे में गैस भरने की वजह से मर गयी थी… बाद में हमें कितनी परेशानी हुई थी।”

“ओह! मुझे वो याद मत दिलाओ…वैसे वो लड़की थी बहुत ख़ूबसूरत, अगर उसकी बायीं भौंह के पास के गहरे तिल को छोड़ दें तो।”

(अनुवाद : सलमान ख़याल)

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