सच, मैं सुंदर हूँ? ~ विष्णु प्रभाकर की कहानी | Sach Main Sundar Hoon Story By Vishnu Prabhakar

पढ़िये “सच, मैं सुंदर हूँ?” विष्णु प्रभाकर की कहानी  (Sach Main Sundar Hoon Story By Vishnu Prabhakar) – देवर और भाभी के रिश्ते की दिल को झकझोरती कहानी  :

Sach Main Sundar Hoon Story By Vishnu Prabhakar

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Sach Main Sundar Hoon Story By Vishnu Prabhakar

मुकुल ने निश्चय किया कि इस बार होली की छुट्टियों में वह घर नहीं जायेगा। लेकिन छुट्टियाँ आये, इसके पूर्व ही मंजरी का पत्र आ पहुँचा –

‘मनी भाभी का आग्रह है कि सदा की भांति इस बार भी वे आपकी राह देखेंगी।’

उसकी प्रतिज्ञा और भाभी का आग्रह – इन दोनों में कौन शक्तिशाली है? यह वह जानता था। इसीलिए मन में अवसाद लेकर भी उसे जाना पड़ रहा है।

ट्रेन में अपार भीड़ है, शोर है, बदतमीजी है। लेकिन सब ओर से आँखें मूंदे वह ऊपर की बर्थ पर लेटा हुआ सिगरेट के लंबे-लंबे कश खींचता और उठते हुए सर्पाकार धुएं में राह भटक-भटक जाता।

स्वभाव से वह अल्हड़ था। जहाँ वह है, वहाँ विषाद नहीं है। मृत्यु के मुख पर भी एक बार मुस्कान बिखर जाती। लेकिन आज उसके स्मृति पटल पर ऐसा कंपन है, जैसा संभवत: रडार में होता है। किसी संकट की सूचना…लेकिन वह संकट की बात सोचना नहीं चाहता। पर ज्यों-ज्यों वह उसे स्मृति पटल से मिटाने की चेष्टा करता है, त्यों-त्यों उसकी रेखायें और स्पष्ट होती है और उभरती है। विस्मृति की चेष्टा में ही स्मृति का जन्म होता है।

गत वर्ष उल्लास से भरा-भरा वह घर पहुँचा था, तो मंजरी ने मनी भाभी से मुस्करा कर कहा था, “जानती हो भाभी, मुकुल भैया क्यों आए हैं?”

मनी भाभी बोली, “अपने घर कोई क्यों आता हैं? यह जानने की भी क्या कोई ज़रूरत होती है?”

मंजरी हँस पड़ी, “होती है भाभी! होती है!”

अब भाभी मुस्करायी, “तो तुमसे मिलने आए होंगे।”

“ऊंहूं! मुझसे नहीं, तुमसे।”

“तो फिर क्या बात है! भाभी से मिलने आना क्या अनाधिकृत है?”

“जी अनाधिकृत तो नहीं, अद्‌भुत अवश्य है। विशेषकर इन दिनों।”

“ओफ्!” भाभी खुल कर हँसी, “तो यह बात है।”

मंजरी ने भैया की ओर देखा। कहा, “कहती थी ना, भाभी जानती हैं।”

मुकुल की उत्फुल्लता पूर्णता की ओर थी। बोला, “जानती क्यों नहीं।”

सहसा धुएं में एक तीव्र कंपन हुआ। कल्पना का महल तिरोहित हो गया और मस्तिष्क में एक विचार जाग आया – ‘न जाने किस शास्त्र ने भाभी के साथ होली खेलने का अधिकार दिया है। शायद यह परंपरा है और परंपरा की शक्ति विधि विधान, धर्म और शास्त्र सबसे ऊपर होती है। न जाने कब किस देवर ने किस भाभी के साथ पहली बार होली खेली होगी…’

उसने एकाएक करवट बदली। फिर हँस आया – ‘हूँ न मूर्ख। इसमें खोज की क्या बात है? इस परंपरा के पीछे शाश्वत यौन आकर्षण है।’

सिगरेट का धुआं फिर नए मेघों का निर्माण कर रहा था और उनके पटल पर मंजरी कुछ गंभीर होकर कह रही थी, “मुकुल भैया! हमारी भाभी इन बातों को पसंद नहीं करती।”

“क्यों?”

“क्यों क्या! देखा नहीं तुमने! कितनी सादी रहती हैं। कभी-कभी तो डर लगता है। उस दिन हमारे घर आई थीं। मैंने भोजन के लिए कहा, तो आ बैठी। दाल में नमक ज्यादा था, लेकिन वह बोली नहीं। मैं जानती थी। मैंने उनसे कहा, तो हँस दीं। बोली – यदि कभी कभी ज्यादा नमक न पड़े, तो ठीक का पता कैसे लगे?”

मुकुल ने बड़ी तीव्रता से सिगरेट के कश खींचे। फिर बुदबुदा उठा – “हां…सचमुच कभी-कभी ओवरडोज की जरूरत होती है। वही जीवन का आनंद है। समता तो थका देने वाली होती है।”

धुएं के बादल घहरा उठे। उनके पीछे मनी भाभी की सलोनी आँखें उभर आई। उस दिन उन्होंने पूछा था, “आखिर होली क्यों खेली जाती है?”

और तब मुकुल ने अपना संचित ज्ञान कोश जैसे भाभी के चरणों में उडेल दिया था। सारे इतिहास का रत्ती-रत्ती वर्णन उसने रस विभोर होकर किया था और उस तमाम समय भाभी अचरज से मुस्कराती उसकी ओर देखती रही।

मुकुल बोला, “सच तो यह है भाभी। यह प्रकृति का त्यौहार है। प्रकृति हँसती है, मधु ऋतु मुस्काती है, किसान उन्मत हो उठता है, हम हँसते हैं। हँसना ही तो जीवन है। वर्ष भर जीवन की विषमताओं में हम डूबे रहते हैं। एक दिन मुक्त होकर खूब हँसे, ऐसा सोच कर ही किसी दूरदर्शी पुरातन पुरुष ने इस त्यौहार का आविष्कार किया था।”

“हाँ लाला! वर्ष भर रोकर एक दिन हँसना या एक दिन हँस कर वर्ष भर रोना, सौदा काफी मंहगा है। है ना देवरजी!”

“भाभी!”

“झूठ कहती हूँ मैं। हँसना रोना क्या कभी एक साथ होता है। जब एक रोता है, तभी दूसरे को हँसी आ जाती है।”

“नहीं भाभी! आज के दिन कोई नहीं रोता। सभी हँसते हैं।”

सहसा वह उठ बैठा। दृष्टि नीचे की ओर गई। पाया, अधिकांश यात्री ऊंघ रहे हैं। कुछ पढ़ भी रहे हैं। कुछ दीवार से सटे खड़े हैं और गाड़ी है कि अपनी रफ्तार से चली जा रही है। निर्मुक्त निर्द्वन्द्व।

सोचा – ‘सभी हँसते हैं। सचमुच क्या सभी हँसते हैं। आज भी चारों ओर रोना ही कुछ अधिक है। भूख, अभाव, आत्महत्यायें, पुलिस, जेल, सभी कुछ पूर्ववत है। लेकिन फिर भी हँसने वाले हँसते हैं। लेकिन जिनके प्रिय बिछुड़ गए हैं, वे भी क्या हँस सकते हैं? उनके लिए रोना ही सत्य है। वे रोयेंगे, तभी तो हँसने वाले हँसेंगे! कैसी विडम्बना है? कैसा चक्रव्यूह है? हँसना रोना, रोना हँसना! सहसा भाभी की एक और बात याद आ जाती है –  ‘देवर जी! हँसना और रोना क्या यही जीवन के मूल तत्व हैँ?”

“तो!”

“आत्म समर्पण।”

“भाभी!!”

पल के उस सहस्र्वें भाग में यह कह कर भाभी लजा आई और मुकुल हो उठा आत्म विभोर। प्रेम की सिहरन जैसे उसकी शिराओं में उमड़ आई। भाभी मुस्कराई। बोली, “किसी के होना चाहते हो?”

“किसका?”

“किसी के भी!”

अनायास ही, मानो जैसे अपने से ही कहता हो, मुकुल बोल उठा, “तुम्हारा!”

भाभी तनिक भी चकित नहीं हुई, जैसे वह यही सुनना चाहती हो। सहज स्वाभाविक स्वर में बोली, “मेरे भी हो सकते हो। लेकिन अब मुझ में आत्म समर्पण कहाँ है। तुम नहीं चाहोगे…”

आत्म विस्मृत-सा मुकुल एकाएक बोल उठा,  मेरी बात नहीं मानी भाभी।”

“कौन-सी बात?”

“तुमने होली खेलने से इंकार किया।”

भाभी की मुस्कान में जैसे इन्द्रधनुष चमक उठा, “होली खेलना चाहते हो, तो खेलो।”

“सच!”

“हाँ, सच!”

मुकुल तुरन्त दौड़ कर रंग ले आया – लाल, पीला, नीला, हरा। भाभी वहीं उसी तरह बैठी रही। मंद-मंद मुस्काती, उसी की राह देखती। मुकुल ने पिचकारी भरी। बोला, “हो जाओ तैयार!”

भाभी ने कहा, “बैठी तो हूँ।”

मुकुल एकाएक ठिठक गया, “नहीं नहीं! मंजरी ठीक कहती थी। तुम होली खेलना पसंद नहीं करतीं। तुम होली खेलना नहीं चाहतीं। चुपचाप बैठकर भी होली खेली जाती है?”

भाभी ने उठने का ज़रा भी प्रयत्न नहीं क्रिया। बोली, “देवरजी! मैं न चाहूं, पर तुम तो चाहते हो। तुम्हारी चाह का मैं सम्मान क्यों न करूं?”

“नहीं भाभी! जो तुम नहीं चाहती, उसमें रस कहाँ से उड़ेलोगी।

“क्या कहते हो देवरजी? संसार में ऐसा ही तो होता है। सदा एक की चाह दूसरे पर लाद दी जाती है।”

मुकुल तीव्र गति से कांप गया। बोला, “नहीं भाभी नहीं! मैं अपनी चाह तुम पर न लादूंगा।”

भाभी हर्ष और विषाद के झूले में जैसे झूलती हो। चेहरे पर एक रंग आया एक गया। बोली, ‘देवर जी! तुम तो पागल हो। जितना चाहे रंग डालो, मैं बुरा न मानूंगी।”

कहते-कहते वह विद्युत की गति से उठी, एक बाल्टी उठाई और मुकुल को सराबोर कर दिया और उसके बाद…

यही सब सोचते-सोचते मुकुल कुछ पिघला, कुछ हर्षित हुआ, कुछ खिन्न भी हुआ। लेकिन स्मृति का राजरथ तीव्र गति से आगे बढ़ता चला गया।

वह रंग खेल ही रहे थे कि मंजरी आ गई। बोली, “अरे भैया! यह क्या हुआ? मैं तो समझती थी कि भाभी केवल ज्ञान की बातें बघारती हैं। देखती हूँ कि वह तो रंगीली भी हैं। पुरुष को हरा सकतीं हैं। बाप रे बाप! नारी को क्या यह शोभा देता है?”

और वह खिलखिला कर हँस पड़ी। भाभी भी हँसी। बोली, “इसमें अशोभनीय क्या है मंजरी? पुरुष ने सदा नारी के संग होली ही खेली है। और किसी योग्य तो वह उसे मानता नहीं।”

दोनों भाई-बहन जैसे सिहर-सिहर उठे कि उसी क्षण बड़े भैया वहाँ आ गये। गीले बालों पर आँचल सरका कर भाभी चुपचाप किवाड़ के पीछे हो गई। एक क्षण कोई कुछ नहीं बोला। फिर मंजरी जैसे बरबस हँसी। बोली, “भैया! आज भाभी ने मुकुल भैया की खूब परीक्षा ली। पहले तो उपदेश दिया, फिर यह दुर्गति कर दी।”

भैया हँस आये। बोले, “मंजरी! जीत मुकुल की ही हुई है। उसने अपनी भाभी को होली खेलने के लिए विवश कर दिया। मैं नहीं कर सका।”

मुकुल ने सहसा अपने ममेरे भैया की ओर देखा। वह अत्यंत कुरूप थे और हँसी उस कुरूपता को और भी उजागर कर देती थी। वह कुछ नहीं बोल सका। केवल संध्या को जब भाभी को प्रणाम करने आया, तो कहा, “परीक्षा समीप है। अब जा रहा हूँ।”

भाभी सकपकाई, “अभी, इतनी जल्दी!”

“हाँ भाभी!”

भाभी ने एक दीर्घ निःश्वास खींचकर केवल इतना ही कहा, “देवरजी! जीवन में सफल होओ। यही मैं चाहती हूँ।”

उसने सिगरेट का आखिरी कश खींचा और बचे हुए टुकड़े को आराम से डिब्बे में एक हुक में रख दिया। फिर गाल हथेली पर टिका, सामने निगाह जमा दी। सोचने लगा उस पत्र की बात, जो अगले ही दिन भाभी ने लिखा था…

‘क्षण कितना प्रबल है, यह मैंने उस दिन जाना। सोचती हूँ कि इसमें जो शक्ति है, जो उद्दाम उद्वेग है, वह वर्षों की घुटन का परिणाम है। जिस बात की हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते, वह अनायास ही हो जाती है। कल का उन्माद भी क्षणजीवी नहीं था। न जाने कब से मेरे अंतर में रमता जा रहा था। मानूंगी कि मैं प्यासी हूँ। चेतन रहते कभी इस पर नहीं सोची। सोचना वर्जित जो था।

तुम्हारे भैया जैसे हैं, मेरे पति हैं, देवता हैं। लेकिन देवरजी, नारी को क्या पति और देवता की ही आवश्यकता होती है? वे पूजा के पात्र हो सकते हैं, लेकिन प्यार के नहीं और नारी चाहती है — प्यार, रस, उन्माद। किसी का होने या किसी को अपना बनाने की साथ। यही साथ नारी को सधवा बनाती है अन्यथा वह चिर विधवा हैं…’

मुकुल फुसफुसा उठा – “न जाने ऐसी कितनी चिरविधवायें इस देश में भरी पड़ी हैं। क्या इन्हीं के अंतर से अभिशापों से ही दासता की श्रृंखला का निर्माण नहीं हुआ?”

सोचते-सोचते अंतर में भाभी के लिए अगाध सहानुभूति उमड़ आई।

लेकिन वह फिर घर नहीं जा सका। छुटिटयों में मसूरी चला गया, लेकिन वहाँ पहुँचने पर भी भाभी क्या उसे मुक्ति दे सकी। वह अन्तर्मुखी हो चला। चिंतन ने उसकी वाणी को अवरुद्ध कर दिया। मित्रों ने कहा – ‘यह प्रेम का रूप है।’ प्रोफेसर बोले – ‘यह सनक है।’

लेकिन भाभी ने भी स्वयं फिर उसे कोई पत्र नहीं लिखा। मंजरी के पत्रों में भी उनकी बहुत कम चर्चा रहती थी। उसके चारों ओर जैसे एक घुटन घिरती जा रही हो और उसे कोई राह नहीं दिखाई दे रही हो। तभी सहसा देश एक भयंकर भूकंप से हिल आया। हिमालय के उस पार के पड़ोसी, चिरकाल के मित्र ने उसकी पीठ में छुरा भोंक दिया। युगों से दबी हुई उसकी रक्त की प्यास मानो जाग उठी और चिरशाश्वत श्वेत-हिम लज्जा से रक्तिम हो आया। इतना बड़ा मित्रघात निकट विगत में हिटलर की ही याद आती है। मुकुल ने सोचा, शायद यह भी होली है। रंग इसमें भी है और अमिट है। होली खेलना मानव का स्वभाव है। पुरुष नारी के संग होली खेलता है, धनी निर्धन के साथ। ज्ञानी मूर्ख का उपहास उड़ाता है। बली निर्बल का रक्त पीता है। यह सहज है, शाश्वत है…।

तभी अचानक मंजरी का पत्र आ पहुँचा। लिखा था –

तुमने सुना, भैया सेना में भर्ती होकर नेफा चले गये हैं।

मुकुल को सहसा विश्वास नहीं आया। कालेज के दिनों में वह कभी एन० सी० सी० में थे। शक्ति उनमें थी, पर उसको उन्होंने कभी पहचाना नहीं था। जीवन को कभी एक लकीर से अधिक नहीं समझा। जैसे अपने में सिमटे लीक पर चलते रहे हों। कोई उद्वेग नहीं, उल्लास नहीं। भीतर जैसे घुटन हो, सीलन हो। वे भैया एकाएक मोर्चे पर कैसे चले गये?

वह तुरंत पत्र लिखने बैठ गया। चाहा, भाभी को पत्र लिखे, पर लिख नहीं पाया। मंजरी को ही लिखा-

‘भाभी से कहना कि आज वे गर्विता हैं। भैया देश के लिए मोर्चे पर गए हैं। जो देश की रक्षा के लिए प्राणों की चिंता नहीं करता, वही सचमुच जीता है। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ…।’

पत्र पढ़कर भाभी मुस्करा आई। बोली, “मुकुल को लिख देना कि मैं सचमुच गर्विता हूँ। बहुत प्रसन्न हूँ, कभी-कभी याद आती है। लेकिन उस याद का हर क्षण प्रेम को पवित्र करता रहता है।”

मुकुल जैसे सिहर उठा। जैसे आत्म-विस्मृत, किसी भय से आक्रान्त, किसी अनचिन्हे दर्द से पीड़ित वह अलोड़ित हो आया। तभी नीचे कहीं कुछ कोलाहल उठा। क्षणिक व्यवधान के कारण कल्पना-पट हिल गया। सुस्थिर हुआ, तो मंजूरी का एक महीने बाद का दूसरा पत्र सामने था –

‘भारत सरकार ने सूचित किया है कि भैया लापता हैं और भाभी के लिये जैसे इसका कोई अर्थ ही नहीं है। न रोती हैं, न सुनती हैं। पत्थर की प्रतिमा जैसी यंत्रवत काम में लगी रहती हैं।

उसे खूब याद है कि वह फुसफुसाया थी – “भाभी रोई नहीं! क्यों? क्यों नहीं रोई? क्योंकि…क्योंकि…”

जैसे तूफान गरज उठा। उनचास पवन एक साथ उमड़-घुमड़ आये। कई क्षण वह आलोड़ित रहा, फिर स्तब्ध हो गया। बहुत चाहा कि तुरन्त भाभी को लिखे, परन्तु तीन दिन के प्रयत्न के बाद दो ही पंक्ति लिख सका –

‘भैया अवश्य लौटेंगे। जगदीश्वर इतने निर्दयी नहीं होंगे।

उत्तर में इतना ही पाया – ‘मैं जानती हूँ।’

सोचा, भाभी के पास चलूं। पर जब चला तो देखा पथ दक्षिण की ओर मुड़ गया है। निमित्त उसका था, पर निमित्त क्या स्व-निर्मित होता है। वह तो किसी भी क्षण निर्मित कर लिया जाता है। दो माह तक इसी निरुद्देश्य निमित्त के सहारे घूमता रहा। एक दिन अचानक मंजरी का पत्र फिर मिला –

‘सुनो भैया! एक खुशखबरी है। बड़े भैया का पता चल गया। नेफा में वे वीरतापूर्वक लड़े। खूब लड़े, पर इतने घायल हो गए कि साथी मृत समझ कर छोड़ आये। दुश्मन ने तो मिट्‌टी का तेल डाल कर आग भी लगा दी। लेकिन उसी आग से जैसे उनके प्राण लौट आये। होश में आने पर सबसे पहले उन्होंने जलती हुई जाकेट उतार फेंकी और फिर धीरे-धीरे रेंगते हुए रात के अंधकार में अपनी चौकी पर लौट आये। ओफ, उस छोटी-सी यात्रा की कहानी मैं लिख नहीं सकूंगी। रोमांच हो उठता है। वह सैनिक अस्पताल में हैं। हम सब वहां गए थे। भाभी वहीं पर है। भैया की अवस्था बहुत अच्छी नहीं है। शत्रु की गोली ने नाक का कुछ भाग काट दिया है। प्लास्टिक सर्जरी हुई है। सुनते हैं एक हाथ और एक पैर भी काट देने की बात है।

वे लौट आये यही क्या कम बात है। परन्तु जानते हो, भाभी ने जब भैया के जीवित होने का समाचार सुना तो बहुत संज्ञाहीन हो गई थीं। कई घंटे बाद आँख खोल सकीं। नहीं जानती थी कि हर्ष भी इतना घातक होता है। बात बात में रो उठती हैँ। लेकिन भैया के सामने बराबर हँसती रही। आँसुओं के धार के पीछे उनकी हँसी नहीं रुकती।

सैनिकों के लिये और उनके परिवारों के लिये उन्होंने जितना कुछ किया है, उसका लेखा-जोखा मेरे बस का नहीं है। अभी-अभी लौटी हूँ, क्योंकि होली फिर आने वाली है। उनका आग्रह है कि सदा की भांति इस बार भी वह आपकी राह देखेंगी?’

न जाने कितनी बार मुकुल ने उस पत्र को पढ़ा। स्तब्ध हुआ, रोया। एक बार तो चीख उठा – “मैं नहीं जाऊंगा, नहीं जाऊंगा।”

लेकिन जाना न जाना क्या उसके वश में था. ..।

उसने तेजी से फिर करवट बदली, पर तभी पाया कि गाड़ी की गति धीमी पड़ रही है। पटरी बदलने के कारण शड़ाक्छूं-सडाक्छूं की आवाज में खरखराहट भर आई। केबिन पास से गुजर गया। नीचे के यात्री बोल उठे – “स्टेशन आ गया।”

मुकुल को यहीं उतरना था। सामान उसके पास बहुत ही सीमित था। बाहर जाने पर पाया कि मंजरी पागलों की तरह उसी को ढूंढ़ रही है। देखते ही बावली-सी चीख उठी, “भैया!”

मुकुल ने प्यार से उसे थपथपाकर पूछा, “तू अच्छी है?”

“हाँ!”

“भाभी कैसी है?”

“प्रसन्न हैं। खूब प्रसन्न हैं। इस बार होली खेलने की उन्होंने बहुत तैयारी की है। नाना प्रकार के रंग, केसर का लेप, स्वादिष्ट मिठाइयाँ।”

मुकुल बोल उठा, “क्या कह रही है तू?”

मंजरी ठीक ही कह रही थी। जब वह भाभी के पास पहुँचा, तो सहसा पहचान न पाया। शरीर पर धवल उज्जवल साड़ी, मुख पर रहस्यमयी मुस्कान, आँखों में तरल चंचलता। मुकुल को देखा, तो मानो कमल खिल आया। बोली, “जानती थी इस बार अवश्य आओगे ।”

मुकुल ने मुस्कराना चाहा, पर मुस्करा नहीं सका। गंभीर स्वर में बोला, “भैया ने तो…”

भाभी तुरंत बोली, “वही किया, जो प्रत्येक पुरुष को करना चाहिये।” और कहते-कहते वह फुर्ती से मुड़ी, रंग की एक बाल्टी उठाई और मुकुल के ऊपर उलट दी। वह संभले-संभले, तब तक दूसरी, तीसरी और चौथी बाल्टी खाली हो चुकी थी। उसने संभलने का प्रयत्न किया, लेकिन भाभी उसका हर प्रयत्न विफल कर देती थीं।

उसने पाया कि जैसे उसका विषाद दूर हो गया है। हृदय में एक रहस्यमयी हिलोर उठकर उन्माद पैदा करने लगी है। देखता है कि बाल्टी उसके हाथ में भी आ गई है। अब तो भाभी आगे है और वह पीछे। गन, दालान, बैठक, रसोई सभी से होते हुए दोनों अंदर के कमरे में जा पहुंचे। आगे दीवार थी। उसी से सट कर भाभी खड़ी हो गई। बोली, “अच्छा लो, डाल लो।”

दूसरे ही क्षण सिर से पैर तक रंग में सराबोर हो आई। साड़ी बदन से चिपक गई। कुन्दक-सी मांसल देह चमक आई। वह हँस रही थी। इसलिये शिराओं में थिरकन थी। रंगों ने उन्हें और भी मोहक बना दिया था। अस्त-व्यस्त वस्त्रों के कारण आकर्षण और भी गहरा हो उठा था। मुकुल सस्मित पुकार उठा, ‘भाभी!”

“बस लाला जी और रंग नहीं डालोगे।”

“भाभी!” विद्युत् की गति से आगे बढ़कर उनके दोनों कंधों पर अपनें हाथ रख दिये। फुसफुसाया, “भाभी!”‘

भाभी तनिक भी नहीं झिझकी, मुक्त मन बोली, “कहो देवर जी!”

“तुम… तुम… इतनी सुंदर हो।”

“सच!”

“मेरी आँखों में झाँको।”

“ओह! तुम कवि हो।”

भाभी मुस्कराई। सहज-सरल भाव से उसके दोनों हाथ हटा दिये। बोली, “सच कहते हो। मैं सुंदर हूँ। मैं तो समझी थी कि मैंने अपने आपको उनकी याद में मिटा दिया है। लेकिन देवरजी, तुमने मेरा भ्रम दूर कर दिया। धन्यवाद…”

कहते-कहते भाभी का वक्ष उभरा, नेत्र दीप्त हुए। हर्ष ने जैसे नववधू को जकड़ लिया हो और मुकुल थरथर कंपित अपलक पृथ्वी पर दृष्टि गड़ाये वहीं का वहीं स्थिर हो गया कि पृथ्वी फटे और वह उसमें समा जाये। लेकिन यह क्या? यह कैसा स्वर? भाभी को क्या हो गया?

भाभी सिसक रही हैं। सिसके जा रही हैं।

और मुकुल स्तब्ध है। समूचा विश्व स्तब्ध है।

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