पत्नी का पत्र रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी (Patni Ka Patar Rabindranath Tagore Ki Kahani)
यह कहानी रवींद्रनाथ टैगोर की “पत्नी का पत्र” है, जिसमें एक महिला का आत्म-चिंतन और उसकी भावनाओं का गहन चित्रण है। इसमें वह महिला अपने घर-परिवार, रूप और बुद्धि को लेकर एक आत्मसंघर्ष से गुज़र रही है। अपने सुंदर रूप के बावजूद, उसे लगता है कि उसका वास्तविक मूल्य उसकी सुंदरता में नहीं बल्कि उसकी बुद्धि में है, जिसे परिवार ने हमेशा नजरअंदाज किया है। वह इस बात को स्वीकारती है कि एक महिला के लिए बुद्धि का वरदान कभी-कभी श्राप की तरह महसूस होता है, खासकर पारंपरिक भूमिकाओं में बंधे समाज में।
उसका दर्द और आकांक्षाएं उसके कविता लिखने के शौक में झलकती हैं, जो उसने अपने परिवार से छुपाकर रखा, क्योंकि उसे अपने परिवार के साथ बौद्धिक रूप से जुड़ने का मौका नहीं मिला। इसके साथ ही, वह अपने जीवन की एक और बड़ी पीड़ा का उल्लेख करती है – अपनी नवजात बेटी को खोना। इस घटना ने उसे माँ होने का दर्द तो दिया, लेकिन मातृत्व की पूर्णता से वंचित रखा।
Patni Ka Patar Rabindranath Tagore Ki Kahani
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श्रीचरणकमलेषु,
आज हमारे शादी को पंद्रह साल हो गए हैं, लेकिन मैंने कभी तुम्हें चिट्ठी नहीं लिखी। हमेशा तुम्हारे पास रही, न जाने कितनी बातें हम दोनों ने एक-दूसरे से कीं, लेकिन कभी इतनी दूरी ही नहीं हुई कि चिट्ठी लिखने की जरूरत पड़े। आज मैं श्रीक्षेत्र में तीर्थ करने आई हूँ, और तुम अपने ऑफिस के काम में बिजी हो। कलकत्ता से तुम्हारा वही रिश्ता है, जो घोंघे का शंख से होता है—वो तुम्हारे तन-मन से चिपका है। इसलिए तुमने ऑफिस से छुट्टी नहीं ली, लेकिन ऊपर वाले की मर्जी थी कि मेरी छुट्टी मंजूर हो गई। मैं तुम्हारे घर की मझली बहू हूँ, लेकिन आज पंद्रह साल बाद इस समंदर के किनारे खड़े होकर समझ पाई हूँ कि दुनिया और खुदा से मेरा एक रिश्ता और भी है। इसीलिए आज हिम्मत करके ये चिट्ठी लिख रही हूँ। इसे मझली बहू की चिट्ठी समझकर मत पढ़ना!
तुम लोगों से मेरा रिश्ता क्या है, ये तो ऊपर वाले ने ही तय किया था, लेकिन जब इसकी खबर किसी को भी नहीं थी, तब मैं और मेरा भाई दोनों एक साथ बुखार में पड़े थे। भाई इस बुखार से गुजर गया, लेकिन मैं बच गई। मोहल्ले की औरतें कहने लगीं, “मृणाल लड़की है, इसीलिए बच गई। लड़का होती तो क्या बच पाती!” यमराज चोरी में माहिर हैं, उनकी नज़र हमेशा कीमती चीज़ पर ही होती है। मैं बच गई, मेरे हिस्से में मौत नहीं थी। यही बात समझाने के लिए मैंने ये चिट्ठी लिखना शुरू की है।
एक दिन जब दूर के रिश्ते में तुम्हारे मामा तुम्हारे दोस्त नीरद को साथ लेकर मुझे देखने आए थे, तब मेरी उम्र बस बारह साल की थी। हमारा घर एक सुनसान गाँव में था, जहाँ दिन में भी सियार बोलते थे। स्टेशन से सात कोस तक छकड़े में सफर करने के बाद बाकी तीन मील का कच्चा रास्ता पालकी में तय करके हमारे गाँव पहुँचना पड़ता था। उस दिन तुम लोगों को बहुत हैरानी हुई थी। हमारे पूर्वी बंगाल के खाने पर तुम्हारे मामा आज तक हंसते हैं।
तुम्हारी माँ का यही इरादा था कि बड़ी बहू के रूप की कमी मझली बहू के जरिए पूरी हो जाए। वरना तुम लोग इतने दूर गाँव में क्यों आते? यहाँ पीलिया, यकृत के रोग और बिमारियाँ खुद आ जाती हैं, उनसे पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता। मेरे पिता का दिल धक-धक करने लगा, माँ ने दुर्गा माँ का नाम जपना शुरू कर दिया। शहर के लोगों को खुश करना गाँव के लोग कैसे समझें? बेटी के रूप का भरोसा था, लेकिन खुद बेटी के लिए उसका कोई मोल नहीं होता। उसके रूप की कीमत वो होती है, जो देखने वाले लोग उसे दें। शायद इसलिए, कितनी भी खूबसूरती क्यों न हो, लड़कियों का संकोच दूर नहीं होता।
सारे घर, बल्कि पूरे मोहल्ले में फैली ये दहशत मेरे दिल पर पत्थर बनकर बैठ गई। आसमान की सारी रोशनी और दुनिया की सारी ताकत उस दिन जैसे इस बारह साल की गाँव की लड़की को दो जोड़ी आँखों के सामने कसे रखने पर आमादा थीं—मुझे कहीं छुपने की जगह नहीं मिली।
शहनाई अपने करुण स्वरों में जैसे पूरा आसमान हिला रही थी, और मैं तुम्हारे घर आ पहुँची। मेरी खूबियों और कमियों का जायज़ा लेकर, सब गृहिणियों को आखिरकार यह मानना पड़ा कि मैं सच में खूबसूरत हूँ। यह सुनते ही मेरी बड़ी जेठानी का चेहरा बुझ गया। लेकिन सोचती हूँ, मुझे इस खूबसूरती की क्या जरूरत थी। अगर किसी पंडित ने इसे अपने हिसाब से किसी गंगा-मिट्टी से तराशा होता, तो इसे मान मिलता, लेकिन इसे तो ऊपर वाले ने अपने शौक से ही बना दिया है। इसलिए तुम्हारे धर्म की दुनिया में इसका कोई मोल नहीं। मैं सुंदर हूँ, यह बात भूलने में तुम्हें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मगर मुझमें अकल भी है, यह बात तुम्हें बार-बार याद आती रही।
मेरी समझ इतनी सच्ची है कि तुम्हारे घर-गृहस्थी में इतने वक्त बिताने के बाद भी वो अब तक मेरी अपनी है। मेरी इसी समझ से मेरी माँ हमेशा परेशान रहती थीं। उनके हिसाब से, औरत के लिए ये समझ एक मुसीबत है। जो औरत हर मुसीबत को सहने का काम करे, अगर वो खुद सोचकर रास्ता बनाने लगे, तो उसे ठोकरें मिलेंगी ही। मगर तुम ही बताओ, मैं क्या करूँ? तुम्हारे घर की बहू को जितनी समझ की ज़रूरत थी, उससे कहीं ज्यादा अक्ल ऊपर वाले ने मुझे दे दी। अब मैं उसे वापिस करूँ तो किसको? तुम लोग मुझे हमेशा पुरखिन कहकर ताना मारते रहे। शायद इससे तुम्हें कुछ सुकून मिलता होगा, तो मैंने इसे भी माफ कर दिया।
मेरी एक चीज़ ऐसी थी, जो तुम्हारे घर-गृहस्थी से बिल्कुल अलग थी, जिसे तुम में से कोई भी नहीं जानता था। मैं छिपकर कविताएं लिखा करती थी। भले ही वो कविताएं अच्छी ना हों, लेकिन तुम्हारे घर के अंदर की दीवारें उनकी राह में खड़ी नहीं हो सकीं। उन्हीं कविताओं में मुझे सुकून और दर्द मिला। मेरे अंदर मझली बहू के अलावा भी जो कुछ था, उसे तुम लोगों ने कभी पसंद नहीं किया। शायद इसलिए क्योंकि तुम लोगों ने उसे कभी समझा ही नहीं। मैं कवि हूँ, यह बात पंद्रह साल बाद भी तुम सबकी समझ में नहीं आई।
तुम लोगों के घर की पहली यादों में सबसे ज्यादा जो बात मेरे दिल में बसी रही, वह है तुम लोगों की गोशाला। आँगन के पास बने छोटे से कोठे में तुम लोगों की गायें रहती थीं। उनके लिए वहाँ सिर्फ आँगन का कोना था। आँगन के एक किनारे पर लकड़ी की नाँद रखी थी, जिसमें उनको चारा दिया जाता। नौकरों के पास वक्त कम होता, इसलिए भूखी गायें नाँद को चाट-चाटकर छील देतीं। मेरा दिल रोने लगता। गाँव की बेटी होने के नाते, जिस दिन मैंने पहली बार तुम्हारे घर में कदम रखा, उस दिन उस बड़े शहर के बीच में मुझे वो दो गायें और तीन बछड़े बिल्कुल अपने जैसे लगे। जितने दिन मैं वहाँ रही, बहू बनी रही, खुद न खाकर उन्हें छिप-छिपाकर खिलाती रही। जब बड़ी हुई और गायों के लिए मेरा ये लगाव लोगों ने देखा, तो उन्होंने मज़ाक में मेरे गोत्र पर ही शक करना शुरू कर दिया।
मेरी बेटी पैदा होते ही चली गई। जाते वक्त उसने मुझे भी साथ चलने को बुलाया था। अगर वो जिंदा रहती, तो मेरे जीवन में जो कुछ भी अच्छा और सच्चा था, उसे मेरे पास ले आती। तब मैं सिर्फ मझली बहू ना रहती, माँ भी बन जाती। घर-गृहस्थी में रहते हुए भी एक माँ सारी दुनिया की माँ बन जाती है। लेकिन मुझे तो माँ बनने की तड़प ही मिली, मातृत्व का सच्चा सुख नहीं मिला।
हमारे घर के अंदर का हाल देखकर एक बार अंग्रेज डॉक्टर चौंक गया था। खासकर जच्चा घर की हालत देखकर तो उसने इतना गुस्सा किया कि हमें डांट भी लगाई। बाहर का हिस्सा ठीक-ठाक था—छोटा सा बाग, सजावट से भरे कमरे। लेकिन अंदर का हिस्सा ऐसा था, जैसे महंगे कपड़े का उल्टा हिस्सा—बिल्कुल बेजान और बिन सजे-संवरे। वहां न कोई सुंदरता थी, न रौशनी, न हवा। बस गंदगी और कालिख भरे दीवारें। लेकिन डॉक्टर ने एक बात गलत समझी—उसे लगा कि इस वजह से हमें बहुत दुख होता होगा। सच्चाई यह थी कि हमें इसकी आदत हो गई थी। अपमान तो राख की तरह होता है, जो अंदर की आग को बचाए रखता है, लेकिन बाहर से ठंडा दिखता है। आत्म-सम्मान जब खत्म हो जाता है, तब अपमान भी सहने लायक लगता है। और औरतें अपने दुख तक महसूस करने में शर्मिंदा हो जाती हैं।
तुम्हें लगता है औरतों को तकलीफ में ही रहना चाहिए। तो फिर उन्हें अनादर में ही रहने दो, क्योंकि इज्जत मिलने से उनका दर्द और बढ़ जाता है।
तुमने मुझे जैसे रखा, मुझे कोई दुख नहीं हुआ। जच्चा घर में मेरी जान पर बन आई थी, लेकिन मुझे मौत का डर नहीं था। हमारा जीवन ऐसा भी क्या है कि उससे मोह हो। लेकिन ऐसे लोग जिनकी जिंदगी इज्जत और परवाह के जाल में बंधी हो, उन्हें मौत से डर लगता है। उस दिन अगर यमराज मुझे ले जाते, तो मैं वैसे ही चली जाती जैसे कमजोर जमीन से घास उखड़ जाती है। बंगाल की बेटियां तो छोटी-छोटी बातों पर मरने को तैयार हो जाती हैं। लेकिन ऐसी मौत में कोई बहादुरी नहीं।
मेरी बेटी संध्या-तारा की तरह कुछ समय के लिए चमकी और फिर बुझ गई। मैं अपने रोज़मर्रा के कामों में लग गई। गाय-बछड़ों की देखभाल करते-करते मेरा जीवन कट जाता। लेकिन कभी-कभी जीवन की व्यवस्था में एक मामूली-सा बदलाव आ जाता है। जैसे आंगन में पीपल का बीज गिर जाए और धीरे-धीरे पत्थर को चीर दे। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ, जब मेरी मेरी विधवा सास के देहांत के बाद मेरी बड़ी जेठानी की बहन बिंदु हमारे घर आ गई।
बिंदु के चचेरे भाइयों ने उसे इतना सताया कि उसके पास और कोई चारा भी तो नहीं था। तुम सबने सोचा कि यह बड़ी मुसीबत आ गई है। मुझे भी गुस्सा आया, लेकिन उसकी मजबूरी देखकर मैंने उसे संभाला। मैं जानती थी, किसी पराए घर में पनाह लेना कितना बड़ा अपमान होता है। लेकिन मजबूरी में उसे सहन करना पड़ा। मेरी बड़ी जेठानी ने उसे बुलाया जरूर, लेकिन जब उनके पति ने नापसंदगी जाहिर की, तो उन्होंने अपनी बहन से दूरी बना ली। उन्होंने उसे ऐसे रखा, जैसे वह बोझ हो।
जब मैंने बड़ी जेठानी का यह हाल देखा तो मेरा दिल और ज्यादा दुखी हो गया। मैंने देखा कि उन्होंने जानबूझकर सबके सामने बिंदु के खाने-पीने और पहनने की बेहद खराब व्यवस्था की। इतना ही नहीं, उसे घर में नौकरानी जैसे काम भी सौंप दिए। यह देखकर मुझे सिर्फ दुख नहीं हुआ, बल्कि शर्म भी आई। मैं हमेशा सबके सामने यह साबित करने में लगी रहती थी कि बिंदु हमारी गृहस्थी के लिए बहुत सस्ती सौदेबाजी है—वह ढेर सारा काम करती है, लेकिन उसका खर्च ना के बराबर है।
मेरी बड़ी जेठानी के मायके में कुल (वंश) के अलावा कोई खास बात नहीं थी—न रूप, न पैसा। तुम लोग अच्छी तरह जानते हो कि मेरे ससुर के पैरों पड़ने के बाद उनका तुम्हारे परिवार में ब्याह हुआ था। वह हमेशा यह सोचती रहीं कि उनका तुम्हारे वंश में आना एक बड़ी गलती थी। इसीलिए उन्होंने हर बात में खुद को बहुत छोटा बनाकर रखा। वे घर में एक कोने में सिमटी-सिमटी सी रहती थीं, किसी से ज्यादा न बोलतीं।
उनका यह आदर्श व्यवहार, जो देखने में सराहनीय लगता था, हमारे लिए बहुत मुश्किलें खड़ी करता था। मैं खुद को हर चीज में इतना छोटा नहीं बना सकती थी। मैं जो सही समझती थी, उसे किसी और की खुशी के लिए गलत मानने को तैयार नहीं थी। तुम्हें यह बात कई बार दिख भी चुकी है।
बिंदु को मैंने अपने कमरे में बुला लिया। तब बड़ी जेठानी ने कहा, “मझली बहू गरीब घर की लड़की का दिमाग खराब कर देगी।” उन्होंने हर जगह मेरी इस बात की शिकायत की जैसे मैंने कोई बड़ी आफत खड़ी कर दी हो। लेकिन मैं जानती थी कि उनके मन में राहत थी कि उनकी जिम्मेदारी खत्म हो गई। अब बिंदु की चिंता का बोझ मेरे सिर पर था।
वे अपनी बहन के लिए जो प्यार नहीं दिखा सकीं, वही प्यार मेरे ज़रिये दिखाकर उनका मन हल्का हो जाता था। मेरी बड़ी जेठानी हमेशा बिंदु की उम्र कम बताने की कोशिश करती थीं। लेकिन अगर कोई अकेले में कह देता कि बिंदु की उम्र चौदह साल से कम नहीं है, तो यह गलत नहीं होता।
तुम लोग जानते हो कि बिंदु देखने में इतनी बदसूरत थी कि अगर वह फर्श पर गिरकर अपना सिर भी फोड़ लेती, तो लोग उसके बजाय फर्श की ज्यादा चिंता करते। यही वजह थी कि उसके माता-पिता के गुजर जाने के बाद कोई ऐसा नहीं था जो उसके विवाह के बारे में सोचता। वैसे भी ऐसे लोग कितने होंगे जो इतनी हिम्मत दिखाकर उससे शादी करने को तैयार हो सकते थे?
बिंदु जब पहली बार मेरे पास आई, तो बहुत डरी हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसे डर हो कि अगर वह मुझसे छू जाएगी तो मैं नाराज हो जाऊंगी। वह इस तरह पेश आ रही थी, जैसे इस दुनिया में उसे जीने का कोई अधिकार ही न हो। वह हमेशा सबकी नजरों से बचकर अलग-थलग चलती थी। उसके अपने घर में भी उसके चचेरे भाइयों ने उसके लिए ऐसा कोई कोना नहीं छोड़ा था, जहां वह चुपचाप रह सके।
यह सच है कि अनावश्यक सामान जैसे फालतू कूड़े को तो लोग भूल जाते हैं और वह किसी कोने में पड़ा रह सकता है। लेकिन अगर कोई लड़की अनावश्यक समझी जाए, तो उसे भूलना भी मुश्किल होता है। इसलिए बिंदु को तो घर के कूड़े के ढेर पर भी जगह मिलना नामुमकिन था। फिर भी यह कहना गलत होगा कि उसके चचेरे भाई ही इस दुनिया में सबसे जरूरी लोग थे। जो भी हो, वे लोग ताकतवर थे।
जब मैंने बिंदु को अपने कमरे में बुलाया, तो उसका डर और बढ़ गया। उसकी सांसें तेज चलने लगीं। उसकी हालत देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने उसे प्यार से समझाया कि मेरे कमरे में उसके लिए थोड़ी सी जगह जरूर है।
लेकिन यह कमरा सिर्फ मेरा नहीं था, इसलिए मेरी मुश्किलें आसान नहीं थीं। कुछ ही दिनों में बिंदु के शरीर पर लाल-लाल दाने निकल आए। शायद अम्हौरी हो गई थी, या शायद शीतला। तुमने तो इसे शीतला कह दिया। आखिर वह बिंदु थी, न।
तुम्हारे मोहल्ले के एक अज्ञानी डॉक्टर ने आकर कहा कि सही बीमारी बताने के लिए दो-चार दिन और लगेंगे। लेकिन तुम लोगों में किसे धैर्य था? बिंदु खुद अपनी बीमारी की वजह से शर्म से मरी जा रही थी। मैंने कह दिया, “अगर शीतला है, तो मैं खुद उसकी देखभाल करूंगी। इसे जच्चा घर ले जाती हूं, किसी और को परेशान होने की जरूरत नहीं।”
इस पर तुम सब मुझ पर भड़क गए। यहां तक कि बिंदु की बड़ी बहन भी उसे अस्पताल भेजने की सलाह देने लगी। लेकिन तभी बिंदु के शरीर के सारे दाने अचानक गायब हो गए।
यह देखकर तुम सब और परेशान हो गए। तुमने कहा, “अब तो सच में शीतला बैठ गई है। आखिर वह बिंदु ही तो है।”
अनादर में पलने-बढ़ने का एक अजीब गुण होता है। यह इंसान को जैसे अजर-अमर बना देता है। बीमारियां पास भी नहीं आतीं, और मौत के रास्ते जैसे पूरी तरह बंद हो जाते हैं। इसीलिए बीमारी ने बिंदु के साथ मजाक किया और फिर चली गई। उसका कुछ नहीं बिगड़ा।
लेकिन इस घटना ने मुझे यह समझा दिया कि सबसे कमजोर इंसान को सहारा देना दुनिया का सबसे कठिन काम है। जिसे सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उसके लिए सहारे की बाधाएं भी सबसे कठिन होती हैं।
जब बिंदु का मुझसे डर खत्म हुआ, तो उसकी जगह एक और अजीब आदत ने ले ली। वह मुझे इतना प्यार करने लगी कि मैं डरने लगी। उसका प्यार एकदम जुनून जैसा था। ऐसा स्नेह मैंने पहले कभी नहीं देखा था। किताबों में जरूर पढ़ा था, लेकिन वह भी स्त्री-पुरुष के बीच का।
बहुत समय से मैंने अपने रूप के बारे में सोचा भी नहीं था। लेकिन बिंदु को देखकर मैं अपने रूप के बारे में सोचने लगी। वह कुरूप लड़की मेरे रूप की दीवानी हो गई।
वह दिन-रात मेरा चेहरा देखती रहती, फिर भी उसकी प्यास नहीं बुझती थी। वह कहती, “जीजी, तुम्हारा चेहरा बस मैं ही देख पाती हूं, और कोई नहीं।” जिस दिन मैं खुद अपने बाल बांध लेती, वह नाराज हो जाती। उसे मेरे बालों को अपने हाथों से सजाने में बहुत खुशी मिलती।
दावतों के अलावा मुझे शायद ही कभी सजने-संवरने की जरूरत पड़ती थी। लेकिन बिंदु मुझे जिद करके थोड़ा-बहुत सजाती रहती। वह मुझ पर जैसे पागल हो गई थी।
तुम्हारे घर के अंदर कहीं पर भी मिट्टी का नामोनिशान नहीं था। उत्तर की ओर की दीवार के पास नाली के किनारे न जाने कैसे एक गाब का पौधा उग आया था। जब मैं देखती कि उस पौधे में नई-नई लाल कोंपलें निकल आई हैं, तो लगता कि धरती पर फिर से वसंत आ गया है। उसी तरह, जब मैंने बिंदु के मन में खुशी और उमंग को रंग भरते देखा, तो समझा कि दिल की दुनिया में भी वसंत की हवा बहती है। यह हवा किसी स्वर्ग से आती है, गली-कूचों से नहीं।
बिंदु के स्नेह का तीव्र बहाव कई बार मुझे बेचैन कर देता था। मैं मानती हूं कि कभी-कभी मुझे उस पर गुस्सा भी आ जाता था। लेकिन उसके प्यार में मैंने अपने एक नए रूप को देखा, जिसे मैं पहले कभी नहीं जानती थी। यही मेरा असली रूप था।
मैंने बिंदु को इतना प्यार और दुलार दिया, यह बात तुम सबको बहुत खलती थी। इसी को लेकर हमारे बीच अक्सर झगड़े होने लगे। जिस दिन मेरे कमरे से बाजूबंद चोरी हुआ, उस दिन बिना किसी सबूत के तुम सबने मान लिया कि इसमें बिंदु का हाथ है। जब स्वदेशी आंदोलनों की वजह से लोगों के घरों की तलाशी होने लगी, तो तुम लोगों ने यह तक सोच लिया कि बिंदु शायद पुलिस की गुप्तचर है। इस बात का कोई आधार नहीं था, बस यह था कि वह बिंदु थी।
घर की नौकरानियां भी उसका काम करने से मना कर देती थीं। बिंदु इतनी संकोची थी कि वह खुद उनसे कोई मदद मांगने की हिम्मत नहीं कर पाती थी। इस वजह से उसका ध्यान रखने के लिए मुझे अलग से एक नौकरानी रखनी पड़ी। यह बात भी तुम लोगों को पसंद नहीं आई।
मैं बिंदु के लिए जो कपड़े खरीदती, उन्हें देखकर तुम लोग नाराज हो जाते। गुस्से में तुमने मेरा खर्चा बंद कर दिया। इसके बाद मैंने सस्ते कपड़े पहनने शुरू कर दिए—सिर्फ सवा रुपये में खरीदी मोटी धोती।
जब मोती की मां मेरी जूठी थाली उठाने आई, तो मैंने उसे मना कर दिया। मैंने खुद ही अपना जूठा खाना बछड़े को खिलाया और आंगन के नल पर जाकर बर्तन मांजे। एक दिन तुमने मुझे ऐसा करते देख लिया और तुम्हारी नाराजगी और बढ़ गई।
मैं आज तक यह नहीं समझ पाई कि मेरी खुशी के बिना तो सब कुछ चल सकता है, लेकिन तुम्हारी खुशी के बिना कुछ भी नहीं।
जैसे-जैसे बिंदु बड़ी हो रही थी, तुम लोगों की परेशानी भी बढ़ती जा रही थी। यह तो एक स्वाभाविक बात थी, लेकिन तुम लोग इसे लेकर अस्वाभाविक रूप से चिंतित थे।
मैं हमेशा हैरान होती हूं कि तुम लोगों ने उसे जबरदस्ती घर से क्यों नहीं निकाला। मुझे लगता है कि तुम लोग मन ही मन मुझसे डरते थे। भगवान ने मुझे जो बुद्धि दी है, उससे तुम लोग भीतर ही भीतर असहज रहते थे। आखिरकार, जब तुम लोग अपनी कोशिशों से उसे घर से विदा नहीं कर सके, तो तुमने उसका विवाह तय कर दिया।
तुम्हें लगा कि अब मुसीबत टल जाएगी। बड़ी जेठानी ने राहत की सांस ली और कहा, “जान बची।” तुम लोगों ने कहा कि वर बहुत अच्छा है।
बिंदु मुझसे लिपटकर रोने लगी। उसने कहा, “दीदी, मेरा ब्याह क्यों कर रही हो?” मैंने उसे समझाते हुए कहा, “डर मत, बिंदु। मैंने सुना है कि तुम्हारा वर अच्छा है।”
बिंदु ने उदासी से कहा, “अगर वह अच्छा है, तो मुझमें ऐसा क्या है जो उसे पसंद आ सके?”
लेकिन वर-पक्ष ने बिंदु को देखने तक की जहमत नहीं उठाई। इस बात से बड़ी जीजी और भी निश्चिंत हो गईं। मगर बिंदु का रोना जारी रहा। वह दिन-रात रोती रहती।
मैं समझती थी कि उसे किस बात का दुख है। मैंने उसके लिए घर में कई बार झगड़ा किया, लेकिन यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि उसकी शादी रुक जानी चाहिए। मैं ऐसा कहती भी तो किस आधार पर? अगर मैं मर जाती, तो बिंदु की क्या हालत होती?
जिस लड़की पर पहले ही काली छाई हो, उसके भविष्य की चिंता करना बेकार है। अगर सोचती, तो प्राण डर से कांप उठते।
बिंदु ने मुझसे कहा, “दीदी, ब्याह में अभी पांच दिन बाकी हैं। क्या इस बीच मुझे मौत नहीं आ सकती?”
मैंने उसे डांटकर चुप कर दिया। लेकिन मन में सच कहूं, तो अगर किसी स्वाभाविक कारण से बिंदु की मौत हो जाती, तो शायद मुझे भी सुकून मिलता।
शादी के एक दिन पहले बिंदु अपनी बड़ी बहन के पास गई और उनसे गिड़गिड़ाकर कहा, “जीजी, मुझे कहीं मत भेजो। मैं तुम्हारी गोशाला में पड़ी रहूंगी। जो कहोगी, करूंगी। बस मुझे इस तरह मत धकेलो।”
जीजी की आंखों से चुपचाप आंसू बह रहे थे। उन्होंने कहा, “बिंदु, पति ही औरत की सारी गति और मुक्ति है। अगर भाग्य में दुख लिखा है, तो उसे कोई मिटा नहीं सकता।”
सच्चाई यह थी कि कोई रास्ता बचा ही नहीं था। बिंदु को शादी करनी ही थी। जो होना है, सो होना है।
मैं चाहती थी कि शादी हमारे घर से हो। लेकिन तुम लोगों ने कहा कि शादी लड़के वालों के घर से होगी, क्योंकि उनके कुल की यही परंपरा है। मैं समझ गई कि तुम लोग शादी पर खर्च नहीं करना चाहते। इसलिए मैंने भी कुछ नहीं कहा।
लेकिन एक बात तुम लोग नहीं जानते। मैंने अपने गहने निकालकर चुपचाप बिंदु का श्रृंगार कर दिया। मुझे लगा, जीजी इसे देख लेंगी। लेकिन उन्होंने देखा भी तो अनदेखा कर दिया। धर्म के नाम पर तुम उन्हें माफ कर सकते हो।
शादी के दिन बिंदु मुझसे लिपटकर रो पड़ी। उसने कहा, “दीदी, क्या तुम लोगों ने मुझे पूरी तरह त्याग दिया है?”
मैंने उसे समझाया, “नहीं बिंदु, चाहे जो भी हो, जब तक मैं जिंदा हूं, तुझे कभी नहीं छोड़ूंगी।”
शादी के तीन दिन बाद, जब मैं नीचे कोयले की कोठरी में गई, तो देखा कि बिंदु वहां एक कोने में दुबकी बैठी थी। मुझे देखते ही उसने मेरे पैरों को पकड़ लिया और चुपचाप रोने लगी।
बिंदु ने बताया कि उसका पति पागल है। मैंने पूछा, “सच कह रही है, बिंदु?”
उसने कहा, “क्या मैं तुम्हारे सामने इतना बड़ा झूठ बोल सकती हूं, दीदी? वह सच में पागल है। शादी के पहले ही मेरे ससुर को यह पता था, इसलिए वे घर छोड़कर काशी चले गए। लेकिन मेरी सास ने जिद करके यह शादी करवाई।”
यह सुनकर मैं वहीं कोयले के ढेर पर बैठ गई। सोचने लगी कि औरत को औरत पर दया क्यों नहीं आती। उसकी सास ने कहा, “लड़का पागल है तो क्या? वह पुरुष है।”
बिंदु का पति दिखने में पागल नहीं लगता था, लेकिन कभी-कभी उसका दिमाग इतना खराब हो जाता कि उसे कमरे में बंद करना पड़ता। शादी की रात वह ठीक था, लेकिन जागने और परेशानी की वजह से अगले दिन से उसका दिमाग बिगड़ गया।
एक दिन बिंदु खाने बैठी। उसने पीतल की थाली में भात लिया। अचानक उसके पति ने भात समेत थाली उठाकर आंगन में फेंक दी। उसे लगने लगा कि बिंदु रानी रासमणि है और चोरी का खाना खा रही है।
बिंदु डर के मारे कांप रही थी। तीसरी रात उसकी सास ने उसे पति के कमरे में सोने को कहा। बिंदु ने डरते-डरते कमरे में कदम रखा। उसके पति का मूड उस दिन ठीक था, लेकिन बिंदु का शरीर डर के मारे पत्थर बन गया। आधी रात बाद, जैसे-तैसे, वह वहां से भाग निकली।
जब उसने मुझे यह सब बताया, तो मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था। मैंने कहा, “बिंदु, यह शादी नहीं, धोखा है। तुझे वहीं रहना चाहिए, जहां तुझे इज्जत मिले। मेरे पास आ जा।”
तुम सबने कहा, “बिंदु झूठ बोल रही है।”
मैंने कहा, “वह कभी झूठ नहीं बोलती।”
तुमने पूछा, “तुम्हें कैसे पता?”
मैंने जवाब दिया, “मैं उसे जानती हूं।”
तुम लोगों ने डराया कि अगर उसके ससुराल वालों ने पुलिस में शिकायत कर दी, तो बड़ी आफत आ जाएगी। मैंने कहा, “अदालत में बताऊंगी कि उसकी शादी पागल से करवाई गई है।”
तुमने कहा, “क्या तुम अदालत के चक्कर लगाओगी?”
मैंने कहा, “जो हो सकेगा, अपने गहने बेचकर करूंगी।”
तुमने फिर पूछा, “क्या वकील के घर तक जाओगी?”
इसका कोई जवाब मेरे पास नहीं था। मैंने सिर पीट लिया।
मैंने देखा कि बिंदु का जेठ बाहर आकर धमकियां दे रहा है। मैं सोच रही थी कि बिंदु को अपने कमरे में ले जाकर ताला लगा लूं। लेकिन तभी बिंदु खुद बाहर चली गई और अपने जेठ के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उसने सोचा कि अगर वह यहां रही, तो मुझे और भी मुश्किलों में डाल देगी।
बिंदु ने अपना दुख और बढ़ा लिया था। उसकी सास कहती, “लड़का बुरा है तो क्या? पति ही सब कुछ है।” मेरी जेठानी कहतीं, “जिसका भाग्य खराब हो, उसे रोने से क्या फायदा।”
मुझे बिंदु की हालत देखकर दुख तो हुआ ही, लेकिन तुम लोगों का व्यवहार देखकर और भी शर्म आई।
बिंदु के ससुराल से उसका जेठ आया और बाहर खूब हंगामा करने लगा। उसने धमकी दी, “मैं थाने में रिपोर्ट कर दूंगा।”
मैं नहीं जानती, मुझमें उस वक्त कहां से इतनी हिम्मत आ गई। लेकिन मुझे यह मंजूर नहीं था कि जिस बेजुबान लड़की ने डर के मारे मेरे पास पनाह ली हो, उसे मैं फिर से उन दरिंदों के हवाले कर दूं। मैंने दृढ़ता से कहा, “जा, थाने में रिपोर्ट कर दे।”
इतना कहने के बाद मैंने सोचा कि बिंदु को अपने कमरे में ले जाकर ताला लगा लूं। लेकिन जब उसे ढूंढा, तो वह कहीं नहीं मिली। उसी समय, जब मैं तुम लोगों से बहस कर रही थी, बिंदु खुद बाहर चली गई और अपने जेठ को आत्मसमर्पण कर दिया।
उसे लग गया था कि अगर वह मेरे घर में रही, तो मैं और बड़ी मुसीबत में फंस जाऊंगी।
लेकिन बिंदु का यह कदम उसके लिए और भी दुखद साबित हुआ। उसकी सास ने कहा, “हमारा लड़का उसे खा तो नहीं जाएगा। वैसे भी दुनिया में बुरे पतियों की कमी थोड़ी है? उनके मुकाबले तो हमारा लड़का सोने का चांद है।”
मेरी बड़ी जेठानी ने तसल्ली देते हुए कहा, “जिसका भाग्य ही खराब हो, उसके लिए रोने का क्या फायदा। पागल हो या कुछ और, है तो उसका पति ही।”
तुम लोगों के मन में उस कथित सती-साध्वी का उदाहरण घूम रहा था, जिसने अपने कोढ़ी पति को कंधे पर बैठाकर वेश्या के घर ले जाकर खुशी-खुशी सेवा की थी।
इस तरह की कहानियां सुनाकर तुम लोगों का पुरुष अहंकार और मजबूत हो रहा था। तुम्हें इस पर जरा भी शर्म महसूस नहीं हुई।
लेकिन मुझे तुम्हारी यह सोच और बिंदु के प्रति तुम्हारा व्यवहार देखकर गहरी लज्जा हुई। मेरा दिल बिंदु के लिए फट रहा था, लेकिन तुम्हारी क्रूरता से मुझे और ज्यादा चोट पहुंची।
मैं तो एक साधारण गांव की लड़की थी, जो तुम्हारे घर आ गई। फिर भी न जाने भगवान ने मुझे यह समझ और हिम्मत कैसे दे दी। तुम्हारे धर्म और परंपरा की यह बातें मेरे लिए असहनीय हो गईं।
मुझे पक्का यकीन था कि बिंदु अब कभी वापस हमारे घर नहीं आएगी। लेकिन मैं उसे शादी के दिन वादा कर चुकी थी कि मैं उसे कभी नहीं छोड़ूंगी।
मेरा छोटा भाई शरद कलकत्ता में पढ़ाई करता था। वह बहुत जोशीला था। प्लेग के मरीजों की मदद करना, बाढ़ आने पर राहत कार्यों में दौड़ पड़ना—ऐसे कामों में उसका मन लगता था। भले ही उसने एफ.ए. की परीक्षा में दो बार फेल किया हो, लेकिन उसका उत्साह कभी कम नहीं हुआ।
मैंने उसे बुलाकर कहा, “शरद, जैसे भी हो, बिंदु की खबर लाने का इंतजाम तुझे करना होगा। उसे खुद मुझे पत्र लिखने की हिम्मत नहीं होगी। और अगर वह लिखेगी भी, तो मुझे वह चिट्ठी कभी नहीं मिलेगी।”
अगर मैं उससे कहती कि बिंदु को वापस लाने के लिए डाका डालना है या उसके पागल पति को मारना है, तो शायद उसे और खुशी होती।
मैं शरद से बातें कर रही थी, तभी तुम कमरे में आए। तुमने गुस्से में पूछा, “अब तुम कौन सा तमाशा कर रही हो?”
मैंने जवाब दिया, “वही जो हमेशा करती आई हूं। जब से इस घर में आई हूं… लेकिन नहीं, यह तो तुम्हारी ही कीर्ति है।”
तुमने मुझसे सीधा सवाल किया, “क्या तुमने बिंदु को फिर से कहीं छिपाकर रखा है?”
मैंने कहा, “अगर बिंदु मेरे पास आती, तो जरूर उसे छिपा लेती। लेकिन वह अब यहां नहीं है। तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है।”
तुमने शरद को मेरे पास देखा, तो तुम्हारा शक और बढ़ गया। मैं जानती थी कि तुम उसके घर आने-जाने से खुश नहीं थे। तुम्हें डर था कि कहीं वह पुलिस की नजर में न आ जाए। और अगर वह किसी राजनीतिक झमेले में फंसा, तो तुम्हें भी फंसा देगा।
इसीलिए भैया-दूज पर भी मैं शरद को घर नहीं बुलाती थी। तिलक उसके पास किसी आदमी के हाथ भेज देती थी।
तुम्हारे डर और बिंदु के प्रति तुम्हारे व्यवहार ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इस घर की मान्यताओं और परंपराओं को बदलना कितना मुश्किल है।
एक दिन तुमने बताया कि बिंदु फिर से भाग गई है। उसका जेठ उसे खोजने के लिए हमारे घर आया है। यह सुनकर मेरे दिल में जैसे कांटे चुभ गए। मैं उसकी तकलीफ समझ सकती थी, लेकिन फिर भी उसकी मदद का कोई रास्ता नजर नहीं आया।
शरद उसकी खबर लेने गया। शाम को जब वह लौटा, तो उसने बताया कि बिंदु अपने चचेरे भाइयों के पास गई थी। लेकिन उन्होंने गुस्से में उसी वक्त उसे वापस ससुराल भेज दिया। इतना ही नहीं, उन्हें हर्जाना और गाड़ी का किराया भी भरना पड़ा, जिसका गुस्सा अब भी उनके दिल में था।
कुछ दिन बाद तुम्हारी काकी तीर्थ यात्रा के लिए हमारे घर ठहरीं। मैंने तुमसे कहा, “मैं भी तीर्थ यात्रा पर जाऊंगी।”
मेरा अचानक धर्म के प्रति यह झुकाव देखकर तुम इतने खुश हुए कि तुमने कोई आपत्ति नहीं की। शायद तुम्हें यह भी लगा कि अगर मैं घर में रही, तो बिंदु को लेकर कोई नया झगड़ा खड़ा कर दूंगी।
मुझे बुधवार को निकलना था। रविवार तक मेरी यात्रा की सारी तैयारियां पूरी हो गईं। मैंने शरद को बुलाया और कहा, “बुधवार को जो ट्रेन पुरी जा रही है, उसमें बिंदु को जरूर चढ़ा देना।”
शरद का चेहरा खुशी से चमक उठा। उसने कहा, “डरने की कोई बात नहीं, दीदी। मैं बिंदु को गाड़ी में बैठाकर पुरी तक साथ चलूंगा। इस बहाने जगन्नाथ जी के दर्शन भी हो जाएंगे।”
शाम को शरद फिर आया। उसका चेहरा देखते ही मेरा दिल बैठ गया। मैंने पूछा, “क्या हुआ, शरद? क्या कोई रास्ता नहीं निकला?”
उसने कहा, “नहीं।”
मैंने पूछा, “क्या वह राजी नहीं हुई?”
शरद ने जवाब दिया, “अब उसकी जरूरत नहीं है। कल रात बिंदु ने अपने कपड़ों में आग लगाकर आत्महत्या कर ली। उसके घर के एक भतीजे ने, जिससे मेरी थोड़ी जान-पहचान हो गई थी, यह खबर दी। बिंदु तुम्हारे नाम एक चिट्ठी छोड़ गई थी, लेकिन उन लोगों ने वह चिट्ठी जला दी।”
यह सुनकर मैंने कहा, “चलो, छुट्टी मिली।”
गांव के लोग इस घटना पर शोर मचाने लगे। कहने लगे, “लड़कियों का कपड़ों में आग लगाकर मरना अब जैसे फैशन बन गया है।”
तुमने कहा, “यह सब नाटक है।”
हां, यह नाटक ही सही। लेकिन यह नाटक केवल बंगाली लड़कियों की साड़ियों पर ही क्यों होता है? बंगाली पुरुषों की धोती पर ऐसा तमाशा क्यों नहीं होता? यह सोचने की बात है।
बिंदु का दुर्भाग्य ऐसा ही था। जब तक वह जीवित रही, उसे न तो रूप का मान मिला, न गुण का। मरते वक्त भी उसने कोई ऐसा काम नहीं किया कि लोग उसकी तारीफ करें। उसकी मौत पर भी लोगों को गुस्सा ही आया।
बड़ी जीजी अपने कमरे में जाकर चुपचाप रोने लगीं। लेकिन उनके रोने में जैसे राहत छिपी थी। उन्हें लगा कि चलो, जान बच गई। अब वह नहीं रही, यही क्या कम है। अगर वह जिंदा रहती, तो न जाने और क्या-क्या होता।
मैं तीर्थ यात्रा पर आ गई हूं। बिंदु को यहां लाने की जरूरत नहीं रही, लेकिन मुझे खुद यहां आने की जरूरत थी।
तुम्हारे घर में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। तुम्हारे बड़े भाई का चरित्र चाहे जैसा हो, तुम्हारे चरित्र में ऐसी कोई बात नहीं जिसके लिए भगवान को दोष दिया जाए।
अगर तुम्हारा स्वभाव तुम्हारे बड़े भाई जैसा भी होता, तो भी मेरा जीवन ऐसे ही चलता। शायद मैं भी अपनी बड़ी जेठानी की तरह तुम्हें दोष देने के बजाय भगवान को ही कोसती।
लेकिन अब मैं तुम्हारे माखन बड़ाल गली के सत्ताईस नंबर वाले घर में वापस नहीं आऊंगी।
बिंदु ने मुझे इस दुनिया में औरत के सच्चे रूप का परिचय दिया। अब मुझे तुम्हारी कोई जरूरत नहीं।
मैंने यह भी देखा कि भगवान ने किसी लड़की का त्याग नहीं किया। चाहे तुम लोगों ने कितना भी दबाने की कोशिश की हो, वह तुम्हारे हाथ से छूट गई।
मृत्यु ने उसे तुम लोगों से भी बड़ा बना दिया। अपनी मौत में वह महान है।
बिंदु अब केवल बंगाली परिवार की एक लड़की नहीं है। वह सिर्फ चचेरे भाइयों की बहन नहीं है। न ही वह किसी पागल पति की पत्नी है। वह अब अनंत है।
जब उसकी मृत्यु की खबर ने मेरे दिल को छुआ, तो ऐसा लगा जैसे मेरे सीने में कोई बाण घुस गया हो। मैंने भगवान से पूछा, “जो सबसे कमजोर और तुच्छ है, वही सबसे ज्यादा कठिन क्यों है?”
तुम्हारे इस समाज ने मुझे हमेशा बंधनों में बांधे रखा। लेकिन अब मृत्यु की वंशी बजने लगी है। अब वह सब कुछ मिट गया है।
मैं अब इस बंद दुनिया से बाहर निकल आई हूं। मेरे सामने नीला समुद्र है। मेरे सिर पर आसमान के बादल छाए हुए हैं।
बिंदु ने अपनी मौत से मेरी दुनिया बदल दी है। अब मैं आजाद हूं।
तुम सोच रहे होगे कि मैं मरने जा रही हूं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। मैं मीरा की तरह जीना चाहती हूं, जिसने बंधनों से मुक्त होकर भगवान से लगन लगाई।
अब मैं बच गई हूं। मैं आजाद हूं।
तुम्हारी,
मृणाल
**समाप्त”**
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