चैप्टर 93 वैशाली की नगरवधु आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास | Chapter 93 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel
Chapter 93 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel
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मधुपर्व : वैशाली की नगरवधू
वीणा के तारों में औडव सम्पूर्ण के स्वर तैर रहे थे। सुनहरी धूप प्रासाद के मरकतमणि – जटित झरोखों और गवाक्षों से छन – छनकर नेत्रों को आह्लादित कर रही थी । अम्बपाली के आवास के बाहरी प्रांगण में रथ , हाथी , अश्व और विविध वाहनों का तांता लगा था । संभ्रान्त नागरिक और सामन्तपुत्र अपनी नई -निराली सज – धज से अपने – अपने वाहनों पर देवी अम्बपाली की प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रांगण के भीतरी मार्ग में अम्बपाली का स्वर्णकलशवाला श्वेत कौशेय का महाघोष रथ आचूड़ विविधपुष्पों से सजा खड़ा था , उसमें आठ सैन्धव अश्व जुते थे , जिनकी कनौतियां खड़ी , थूथनी लम्बी और नथुने विशाल थे। वे स्वर्ण और मणिमालाओं के आभरणों से लदे थे। रथ के चूड़ पर मीनध्वज फहरा रही थी , वातावरण में जनरव भरा था । दण्डधर शुभ्र परिधान पहने दौड़ – दौड़कर प्रबन्ध -व्यवस्था कर रहे थे ।
हठात् गवाक्ष के कपाट खुले और देवी अम्बपाली उसमें अपनी मोहक मुस्कान के साथ आ खड़ी हुईं । नख से शिख तक उन्होंने वासन्ती परिधान धारण किया था , उनके मस्तक पर एक अतिभव्य किरीट था , जिसमें सूर्य की – सी कान्ति का एक अलभ्य पुखराज धक् – धक् दिप रहा था । कानों में दिव्य नीलम के कुण्डल और कण्ठ में मरकतमणि का एक अलौकिक हार था । उनकी करधनी बड़ी – बड़ी इक्कीस मणियों की बनी थी , जिनमें प्रत्येक का भार ग्यारह टंक था । वे माणिक्य उनकी देह – यष्टि में लिपटे हुए उस मधुदिवस के प्रभात की स्वर्ण- धूप में इक्कीस बालारुणों की छटा विस्तार कर रहे थे। उनकी घन – सुचिक्कण अलकें प्रभात की मन्द समीर में क्रीड़ा कर रही थीं । स्वर्णखचित – कंचुकी – सुगठित युगल यौवन दर्शकों पर मादक प्रभाव डाल रहे थे।
करधनी के नीचे हल्के आसमानी रंग का दुकूल उनके पीन नितम्बों की शोभा विस्तार कर रहा था , जिसके नीचे के भाग से उनके संगमरमर के – से सुडौल चरण युगल खालिस नीलम की पैंजनियों से आवेष्टित बरबस दर्शकों की गति – मति को हरण कर रहे थे।
इस अलौकिक वेशभूषा में उस दिव्य सुन्दरी अम्बपाली को देखकर प्रांगण में से सैकड़ों कण्ठों से आनन्द- ध्वनि विस्तारित हो गई । लोगों की सम्पूर्ण जीवनी शक्ति उनकी दृष्टि में ही केन्द्रित हो गई । फिर , ज्योंही अम्बपाली ने अपने दोनों हाथों की अञ्जलि में फूलों को लेकर सामन्त नागरिकों की ओर मृद- मन्द मुस्कान के साथ फेंका, त्योंही देवी अम्बपाली की जय , मधुपर्व की रानी की जय , जनपद- कल्याणी नगरवधू की जय के घोषों से दिशाएं गूंज उठीं । ।
दुन्दुभी पर चोटें पड़ने लगीं । वीणा में अब सम्पूर्ण अवरोह-स्वर वातावरण में बिखरे जा रहे थे, जिनमें दोनों मध्यम और कोमल निषाद विचित्र माधुर्य उत्पन्न कर रहे थे ।
नायक दण्डधर लल्लभट ने अपनी विशाल काया के भार को स्वर्णदण्ड के सहारे
सीढ़ियों पर चढ़ाकर अर्ध-निमीलित नेत्रों से देवी अम्बपाली के सम्मुख अभिवादन करके निवेदन किया – “ देवी की जय हो ,रथ प्रस्तुत है एवं सभी नागरिक शोभा -यात्रा को उतावले हो रहे हैं , एक दण्ड दिन भी चढ़ गया है । ”
अम्बपाली ने कानों तक ओठों को मुस्कराकर एक बार प्रांगण में बिखरे वैशाली के महाप्राणों को देखा और फिर सप्तभूमि प्रासाद की गगनचुम्बी अट्टालिका की ओर । फिर उनकी आंखें सम्मुख विस्तृत नीलपद्म सरोवर की अमल जलराशि पर फैल गईं। उन्होंने गर्व से अपनी हंस की – सी गर्दन उठाकर कहा – “ लल्ल , मुझे रथ का मार्ग दिखा ! ”
“ इधर से देवी ! ”लल्ल ने अति विनयावनत होकर कहा और अम्बपाली लाल कुन्तक के जूतों से सुसज्जित अपने हिमतुषार धवल – मृदुल पादपद्मों से स्फटिक की उन स्वच्छ सीढ़ियों को शत -सहस्र – गुण प्रतिबिम्बित करती हुईं , स्वर्ग से उतरती हुई सजीव सूर्य रश्मि – सी प्रतीत हुईं ।
युवकों ने अनायास ही उन्हें घेर लिया । उनके हाथों में माधवी और यथिका की मंजरी और उरच्छद थे। वे उन्होंने देवी अम्बपाली पर फेंकना आरम्भ किया । उनमें से कुछ अम्बपाली के अलभ्य गात्र को छूकर उनके चरणों में गिर गईं, कुछ बीच ही में गिरकर अनगिनत भीड़ के पैरों के नीचे कुचल गईं।
ज्योंही अम्बपाली अपने पुष्प – सज्जित रथ पर सवार हुईं , वेग से मृदंग , मुरज और दुन्दुभी बज उठे । दो तरुणियां उनके चरणों में अंगराग लिए आ बैठीं । दो उनके पीछे मोरछल ले खड़ी हो गईं। कुछ काम्बोजी अश्वों पर सवार हो रथ के आगे-पीछे चलने लगीं । युवक सामन्तपुत्रों एवं सेट्टिपुत्रों ने रथ को घेर लिया । बहुतों ने अपने – अपने वाहन त्याग दिए और रथ का धुरा पकड़कर साथ- साथ चलने लगे । बहुतों ने घोड़ों की रश्मियां थाम लीं । बहुत अपने – अपने वाहनों पर चढ़, अपने भाले और शस्त्र चमकाते आगे-पीछे दौड़ – धूप करने लगे ।
सड़कें कोलाहल से परिपूर्ण थीं । मार्ग के दोनों ओर के गवाक्षों में कुलवधएं बैठी हईं जनपद- कल्याणी अम्बपाली की मधुयात्रा निरख रही थीं । पौरजनों ने मार्ग में अपने – अपने घर और पण्य सजाए थे। सेट्ठियों और निगम की ओर से स्थान – स्थान पर तोरण बनाए गए थे, जो बहुमूल्य कौशेय वस्त्रों एवं विविध रंगबिरंगे फूलों से सुसज्जित हो रहे थे। उन पर बन्दनवार , मधुघट और पताकाओं की अजब छटा थी । प्रत्येक की सजधज निराली थी ।
अम्बपाली पर चारों ओर से फूलों की वर्षा हो रही थी । वह फूलों में ढकी जा रही थी । अट्टालिकाओं और चित्रशालाओं से सेट्ठि लोग फूलों के गुच्छ उन पर फेंक रहे थे और वह हंस -हंसकर उन्हें हाथ में उठा हृदय से लगा नागरिकों के प्रति अपने प्रेम का परिचय दे रही थीं । लोग हर्ष से उन्मत्त होकर जनपदकल्याणी देवी अम्बपाली की जय -जयकार घोषित कर रहे थे।
सेनानायक सबसे आगे एक पंचकल्याणी अश्व पर सवार स्वर्ण- तार के वस्त्र पहने चांदी का तूर्य बजा – बजाकर बारम्बार पुकारता जाता था
“ नागरिको , एक ओर हो जाओ, मधुपर्व की रानी जनपद- कल्याणी देवी अम्बपाली की सवारी आ रही है। देवी मधुवन को जा रही हैं , उन्हें असुविधा न हो , सावधान ! ” घोषणा करके ज्यों ही वह आगे बढ़ता , मार्ग नरमुण्डों से भर जाता। कोलाहल के मारे कान नहीं दिया जाता था ।
सूर्य तपने लगा । मध्याह्न हो गया । तब सब कोई मधुवन में पहुंचे। एक विशाल सघन आम्रकुञ्ज में अम्बपाली का डेरा पड़ा । उनका मृदु गात्र इतनी देर की यात्रा से थक गया था । ललाट पर स्वेदबिन्दु हीरे की कनी के समान चमक रहे थे।
आम्रकुञ्ज के मध्य में एक सघन वृक्ष के नीचे दुग्ध -फेन- सम श्वेत कोमल गद्दी के ऊपर रत्न – जटित दण्डों पर स्वर्णिम वितान तना था । अम्बपाली वहां आसन्दि – सोपधान पर अलस -भाव से उठंग गईं । उन्होंने अर्धनिमीलित नेत्रों से मदलेखा की ओर देखते हुए कहा – “ हला , एक पात्र माध्वीक दे। ”
मदलेखा ने स्वर्ण के सुराभाण्ड से लाल – लाल सुवासित मदिरा पन्ने के हरे – हरे पात्र में उड़ेल कर दी । उसे एक सांस में पीकर अम्बपाली उस कोमल तल्प – शय्या पर पौढ़ गईं ।
अपनी – अपनी सुविधा के अनुसार सभी लोग अपने – अपने विश्राम की व्यवस्था कर रहे थे। वृक्षों की छाया में , कुओं की निगूढ़ ओट में , जहां जिसे रुचा, उसने अपना आसन जमाया । कोई सेट्ठिपुत्र कोमल उपाधान पर लेटकर अपने सुकुमार शरीर की थकान उतारने लगा , कोई बांसुरी ले तान छेड़ बैठा, किसी ने गौड़ीय, माध्वीक और दाक्खा रस का आस्वादन करना प्रारम्भ किया । किसी ने कोई एक मधुर तान ली । कोई वानर की भांति वृक्ष पर चढ़ बैठा । बहुत – से साहसी सामन्तपुत्र दर्प से अपने – अपने अश्वों पर सवार हो अपने – अपने भाले और धनुष ले मृगया को निकल पड़े और आखेट कर – करके मधुपर्व की रानी के सम्मुख ढेर करने लगे । देखते – देखते आखेट में मारे हुए पशुओं और पक्षियों का समूह पर्वत के समान अम्बपाली के सम्मुख आ लगा । सावर, हरिण , शश , शूकर , वराह, लाव , तित्तिर, ताम्रचूड़ , माहिष और न जाने क्या – क्या जलचर , नभचर , थलचर, जीव प्राण त्याग उस रात को मधुपर्व के रात्रिभोज में अग्नि पर पाक होने के लिए मधुपर्व की रानी अम्बपाली के सम्मुख ढेर- के – ढेर इकट्ठे होने लगे । कोमल उपधानों का सहारा लिए अम्बपाली अपनी दासियों के साथ हंस -हंसकर इन उत्साही युवकों के आखेट की प्रशंसा कर रही थीं और उससे वे अपने को कृतार्थ मानकर और भी द्विगुण उत्साह से आखेट पर अपने अश्व दौड़ा रहे थे ।
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