चैप्टर 9 तितली जयशंकर प्रसाद का उपन्यास | Chapter 9 Titli Jaishankar Prasad Novel In Hindi
Chapter 9 Titli Jaishankar Prasad Novel In Hindi
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तहसीलदार ने कागजों पर बड़ी सरकार से हस्ताक्षर करा ही लिया, क्योंकि शैला की योजना के अनुसार किसानों का एक बैंक और एक होमियोपैथी का नि:शुल्क औषधालय सबसे पहले खुलना चाहिए। गांव का जो स्कूल है, उसे ही अधिक उन्नत बनाया जा सकता है। तीसरे दिन जहाँ बाजार लगता है, वहीं एक अच्छा-सा देहाती बाजार बसाना होगा, जिसमें करघे के कपड़े, अन्न, बिसाती-खाना और आवश्यक चीजें बिक सकें। गृहशिल्प को प्रोत्साहन देने के लिए वहीं से प्रयत्न किया जा सकता है। किसानों में खेतों के छोटे-छोटे टुकड़े बदलकर उनका एक जगह चक बनाना होगा, जिसमें खेती की सुविधा हो। इसके लिए जमींदार को अनेक तरह की सुविधाएं देनी होंगी।
यह सबसे पीछे होगा। बैंक पहले खुलना चाहिए। कलेक्टर ने इसके लिए विशेष आग्रह किया है।
तहसीलदार के सुझाने पर शैला ने शेरकोट को ही बैंक के लिए अधिक उपयुक्त लिख दिया था, किंतु मधुबन के पिता की जमींदारी नीलाम खरीद हुई थी श्यामदुलारी के नाम। वह हिस्सा अभी तक उन्हीं के नाम से खेवट में था। इसलिए श्यामदुलारी ने थोड़ी-सी गर्व की हंसी हंसते हुए हस्ताक्षर करने पर कहा, तहसीलदार ! अब तो मुझे इससे छुट्टी दो। इन्द्र से ही जो कुछ हो, लिखाया-पढ़ाया करो।
तहसीलदार ने चश्मे में से माधुरी की ओर देखकर कहा-सरकार, यह मैं कैसे कह सकता हूँ कि आप अपना अधिकार छोड़ दें। न मालूम क्या समझकर आपके नाम से बड़े सरकार ने यह हिस्सा खरीदा था। आप इसे जो चाहे कर सकती हैं। यदि आप किसी के नाम इसकी स्पष्ट लिखा-पढ़ी न करें, तो यह कानून के अनुसार बीबीरानी का हो सकता है। छोटे सरकार से तो इसका कोई संबंध…
श्यामदुलारी ने कड़ी निगाह से तहसीलदार को देखा। उसमें संकेत था उसे चुप करने के लिए, किंतु कूटनीति-चतुर व्यक्ति ने थोड़ी-सी संधि पाते ही, जो कुछ कहना था, कह डाला !
माधुरी इस आकस्मिक उद्घाटन से घबराकर दूसरी ओर देखने लगी थी ? वह मन में सोच रही थी, मुझे क्या करना चाहिए ?
माधुरी के जीवन में प्रेम नहीं, सरलता नहीं, स्निग्धता भी उतनी न थी। स्त्री के लिए जिस कोमल स्पर्श की अत्यंत आवश्यकता होती है, वह श्यामलाल से कभी मिला नहीं। तो भी मन को किसी तरह संतोष चाहिए। पिता के घर का अधिकार ही उसके लिए मन बहलाने का खिलौना था। वह भी जानती थी कि यह वास्तविक नहीं, तो भी जब कुछ नहीं मिलता तो मानव-हृदय कृत्रिम को ही वास्तविक बनाने की चेष्टा करता है। माधुरी भी अब तक यहीं कर रही थी।
चौबेजी कब चूकने वाले थे ! उन्होंने खांसकर कहना आंरभ किया – बडे़ सरकार सब समझते थे। विलायत भेजकर जो कुछ होने वाला था, वह सब अपनी दूर-दृष्टि से देख रहे थे। इसी से उन्होंने यह प्रबंध कर दिया था, तहसीलदार साहब ने इस समय उसको प्रकट कर दिया। यह अच्छा ही किया। आगे आपकी इच्छा।
श्यामदुलारी ऊब रही थी, क्योंकि सब कुछ जानते हुए भी वह नहीं चाहती थीं कि उनकी दोनों संतानों में भेद का बीजारोपण हो। इन स्वयंसेवक सम्मतिदाताओं से वह घबरा गई।
माधुरी ने इस क्षोभ को ताड़ लिया। उसने कहा-इस समय तो आपका काम हो ही गया, अब आप लोग जाइए।
तहसीलदार ने सिर झुकाकर विनयपूर्वक विदा ली। चौबेजी भी बाहर चले गए।
श्यामदुलारी ने मौन हो जाने से वहाँ का वातावरण कुंठित सा हो गया। माधुरी जैसे कुछ कहने में संकुचित थी। कुछ देर तक यही अवस्था बनी रही।
फिर सहसा माधुरी ने कहा-क्यों मां ! क्या सोच रही हो ? यह भला कौन-सी बात है इतनी सोचने-विचारने की ! ये लोग तो ऐसी व्यर्थ की बातें निकालने में बड़े चतुर हैं ही। तुमको तो यह काम पहले ही कर डालना चाहिए।
किंतु क्या कर डालना चाहिए, उसे माफ-माफ माधुरी ने भी अभी नहीं सोचा था। वह केवल मन बहलाने वाली कुछ बातें करना चाहती थी। किंतु श्यामदुलारी के सामने यह एक विचारणीय प्रश्न था। उन्होंने सिर उठाकर गहरी दृष्टि से देखते हुए पूछा-क्या ?
माधुरी क्षण-भर चुप रही, तो भी उसने साहस बटोरकर कहा-भाई साहब का नाम उस पर भी चढ़ावा दो, झगड़ा मिटे।
श्यामदुलारी ने सिर झुका लिया। वह सोचने लगीं। उनके सामने एक समस्या खड़ी हो गई थी।
समस्याएं तो जीवन में बहुत-सी रहती हैं, किंतु वे दूसरों के स्वार्थों और रुचि तथा कुरुचि के द्वारा कभी-कभी जैसे सजीव होकर जीवन के साथ लड़ने के लिए कमर कसे हुए दिखाई पड़ती हैं।
श्यामदुलारी के सामने उनका जीवन इन चतुर लोगों की कुशल कल्पना के द्वारा निस्सहाय वैधव्य के रुप में खड़ा हो गया।
दूसरी ओर थी वास्तविकता से वंचित माधुरी के कृत्रिम भावी जीवन की दीर्घकालव्यापिनी दु:ख रेखा। एक क्षण में ही नारी -हृदय ने अपनी जाति की सहानुभूति से अपने को आपाद-मस्तक ढंक लिया।
माधुरी की ओर देखते हुए श्यामदुलारी की आंखें छलछला उठीं। उन्हें मालूम हुआ कि माधुरी उस संपत्ति को इन्द्रदेव के नाम करने का घोर विरोध कर रही है। उसकी निस्सहाय अवस्था, उसके पति की हृदय-हीनता और कृष्णमोहन का भविष्य-सब उसकी ओर से श्यामदुलारी की वृद्धि को सहायता देने लगे।
माधुरी ने कहने को तो कह दिया ! परंतु फिर उसने आंख नहीं उठाई। सिर झुकाकर नीचे की ओर देखने लगी।
श्यामदुलारी ने कहा – माधुरी, अभी इसकी आवश्यकता नहीं है। तू सब बातों में टांग मत अड़ाया कर। मैं जैसे समझूंगी, करूंगी।
माधुरी इस मीठी झिड़की से मन-ही-मन प्रसन्न हुई। वह नहाने चली गई, सो भी रूठने का-सा अभिनय करते हुए। श्यामदुलारी मन-ही-मन हंसी।
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