चैप्टर 9 प्यार का पागलपन लव स्टोरी नॉवेल | Chapter 9 Pyar Ka Pagalpan Love Story Novel In Hindi

चैप्टर 9 प्यार का पागलपन रोमांटिक नॉवेल, Chapter 9 Pyar Ka Pagalpan Romantic Novel In Hindi

Chapter 9 Pyar Ka Pagalpan Romantic Novel In Hindi

Chapter 9 Pyar Ka Pagalpan Romantic Novel In Hindi

साजन नैना के ख़यालों में डूबा था, वहीं रमेश और सलोनी वापस जाने की तैयारी में थे। सलोनी साजन के कान में बोली, “चलें!”

साजन ने सिर हिलाकर हामी भर दी। रमेश ने खड़े होकर नरेन्द्र से कहा, “अच्छा खन्ना साहब! अब हम लोग निकलते हैं। काफ़ी देर हो गई। और बैठे, तो होशंगाबाद पहुँचने में देर हो जायेगी।“ 

सलोनी और साजन भी खड़े हो गये।

“कुछ देर और रुक जाते भाई साहब!” रानी खड़े होते हुए बोली। नरेन्द्र और पिया भी तब तक खड़े हो चुके थे। 

“नहीं बहन जी! देर हो जायेगी। भोपाल ठहरना होता, तो थोड़ी देर और रुक जाते, पर हमें आज ही होशंगाबाद निकलना है।“ 

“ठीक है मेहता साहब! आगे जैसा हो….कॉल कीजियेगा।“ नरेन्द्र ने कहा।

“बिल्कुल बिल्कुल…!” रमेश ने जवाब दिया और वे लोग दरवाज़े की तरफ बढ़ गये। उसी समय नैना भी सीढ़ियों से उतरकर नीचे पहुँच गई। 

उसे देखकर नरेन्द्र कुछ याद करते हुए बोले, “नैना! साजन के कपड़े लौटाने पड़ेंगे ना…तुम भी तो भोपाल में ही हो। ऐसा करो उसका नंबर ले लो और तुम उसे अपना नंबर दे दो।“

न चाहते हुए भी नैना ने साजन को अपना मोबाइल नंबर दे दिया और उसका नंबर ले लिया। 

सभी बाहर आये। साजन, रमेश और सलोनी अपनी गाड़ी में बैठे और सबसे विदा लेकर भोपाल की ओर रवाना हो गये।

गेट बंदकर अंदर आते हुए नरेन्द्र ने कहा, “कितना अच्छा लड़का है…शांत, समझदार, तमीज़दार….भई लड़का मुझे तो पसंद है। तुम क्या सोचती हो रानी?”

“लड़का तो अच्छा है जी…पिया को भी पसंद आ ही गया होगा।“ रानी पिया के कंधे पर हाथ रखकर बोली।

“मम्मी, मैं सोचकर बताउंगी…इतनी जल्दी भी क्या है? और फिर उनकी भी तो पसंद है ना!” पिया जल्दी से बोली।

“भई मेरी पिया को कोई इंकार कर ही नहीं सकता।“ रानी की आवाज़ में आत्मविश्वास झलक रहा था।

नैना शांति से उनकी बात सुन रही थी और सोच रही थी – ‘खुश जाओ अभी….एक-दो दिन में सारी ख़ुशी हवा हो जानी है।‘

अंदर आकर सब अपने-अपने कमरों में चले गये।

अपने कमरे में आकर नैना बाथरूम में गई और वाश बेसिन का नल खोल लिया। वह झुककर धीरे-धीरे पानी के छींटे चेहरे पर मारने लगी।

‘उफ़्फ़, कितना हेक्टिक डे था।‘ – सोचते हुए वो सीधी हुई, तो सामने लगे आइने में जो दिखाई पड़ा, उसे देखकर उसकी आँखें फटकर बाहर आ गई। वह झट से पलटी और कमर पर हाथ रखकर खीझकर चिल्लाई, “अपना अंडरवियर भी छोड़कर गया है ये।“

उसकी नज़र सामने हैंगर पर लटक रहे साजन के गंदे कपड़ों और अंडरवियर पर थी। उसके ज़ेहन में साजन की बात कौंधी, “एहसान उतारना है ना, तो कपड़े अपने हाथों से धोना और प्रेस करना।“

“मुझे नहीं उतारना किसी का अहसान।“ बड़बड़ाते हुए नैना बाथरूम का दरवाज़ा खोलकर बाहर जाने को हुई, मगर फिर जाने क्या हुआ कि पलटकर उसने हैंगर से साजन के कपड़े उतारे और बाल्टी में वाशिंग पाउडर घोलकर उसमें डुबो दिये। 

उधर कार ड्राइव कर रहे साजन के होंठों पर मुस्कान अब तक सजी हुई थी और ज़ेहन में नैना का चेहरा तैर रहा था। ऑफिस जाना, काम करना, वापस घर आना, कभी-कभी कलीग या दोस्तों के साथ वक़्त गुज़ार लेना, कई सालों से उसकी ज़िन्दगी का यही बोरिंग रूटीन था। मगर आज उसे ज़िन्दगी में एक अलग ही मज़ा महसूस हुआ…एक मस्ती…एक सुरूर…और उस मस्ती की लहर में वो संजीदगी का नक़ाब फेंककर डूबने लगा था। आज उसका दिल इतना खुश था कि वो गुनगुनाते हुए ड्राइव कर रहा था।

उसे गुनगुनाते देखकर पीछे की सीट में बैठी सलोनी आगे झुककर सामने की सीट में बैठे रमेश के कान में फुसफुसाई, “लगता है पिया पसंद आ गई इसे…देखो कैसे गुनगुना रहा है। पूछो तो…!”

“अभी नहीं बाद में!” रमेश ने धीरे-से कहा।

“बाद में कब? अभी पूछो।“ सलोनी ने ज़ोर दिया।

गला साफ़ करते हुए रमेश ने साजन ने पूछा, “…तो…कैसी थी?”

“वैसी ही थी…बदमाश….शरारती….” साजन ख़यालों में खोया-खोया ही बोला।

“बदमाश…शरारती…!” अब सलोनी साजन की तरफ आगे झुककर बोली, “अरे वो तो बड़ी सुशील और बड़ी प्यारी लड़की थी।“ 

साजन हड़बड़ा गया और कसकर स्टीयरिंग संभालते हुए बोला, “…म…म…मेरा मतलब है…मेरा मतलब…”

“अरे साफ़ साफ़ बोला ना…पिया पसंद आई क्या तुझे?“

“माँ मैं बाद में बताऊंगा…सोचकर!” साजन अनमने ढंग से बोला।

“क्या सोचना है…कितनी प्यारी लड़की है…तू हाँ बोल, तो वापस जाकर अभी तेरी शादी करा दें…”

“माँ…सब्र करो…मैं बता दूंगा ना।“ साजन ने खीझकर कहा और अपना पूरा ध्यान ड्राइविंग में लगा दिया। अब उसके होंठों की मुस्कान भी उड़ चुकी थी और ज़ेहन में तैरते ख़याल भी।  

भोपाल पहुँचकर साजन ने रमेश और सलोनी को होशंगाबाद के लिए ट्रेन में बैठाया और घर आ गया। उस वक़्त तक़रीबन सात बज रहे थे। अंधेरा घिर आया था। लाइट ऑन कर वह अपने बेडरूम में ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ा हो गया। वहाँ खड़े-खड़े उसे नैना के कमरे का ड्रेसिंग टेबल याद आ गया, जिसमें उसे आइने में अपने पीछे खड़ी नैना दिखाई दे रही थी। नैना उसके ख़यालों में इस क़दर छाई हुई थी कि उसे अपने आइने में भी उसका अक्स नज़र आने लगा। वह झट से पलटा, मगर वहाँ कोई नहीं था। अपने सिर पर चपत जमाते हुए वह खुद में बड़बड़ाया, “ये किसके बारे में सोच रहा है साजन? उस लड़की से नफ़रत है तुझे…चिढ़ है…भूल गया सब कुछ….!”

ये ख़याल आते ही उसने सिर को यूं झटका दिया, मानो नैना का ख़याल ज़ेहन से निकाल फेंकने की कोशिश कर रहा हो। वह किचन में चला गया और फ्रिज़ से पानी की बोतल निकालकर पानी पीने लगा। उसी समय उसका मोबाइल घनघनाया। मोबाइल स्क्रीन पर ‘तुषार’ नाम चमक रहा था।

“हाँ तुषार…बोल!” कॉल पिक कर साजन ने कहा।

“क्या कर रहा है यार?” दूसरी तरफ से तुषार की आवाज़ आई।

“बस अभी लौटा हूँ।“

“अंकल आंटी?”

“दोनों निकल गये होशंगाबाद के लिये।“

“अब डिनर का क्या प्लान है?” तुषार ने पूछा।

“अभी कुछ सोचा नहीं!”

“तो आजा मेरे घर…साथ डिनर करते हैं। दिन भर से मैं भी बोर हो रहा हूँ….”

“नहीं यार थक गया हूँ।“ साजन अनमने ढंग से बोला।

“तो यहाँ आकर तुझे कौन से पत्थर तोड़ने हैं और मेरा घर है ही कितनी दूर…दो घर छोड़कर ही तो है…बहाने मत बना…आजा….मैं वेट कर रहा हूँ तेरा।“ तुषार ने ऑर्डर देने वाले अंदाज़ में कहा और साजन का जवाब सुने बिना ही कॉल काट दी।

कुछ देर बाद साजन तुषार के घर के आंगन में उसके साथ बैठा हुआ था। तुषार और साजन एक ही कॉलेज से पढ़े हुए थे और अब बी.एच.ई.एल. में एक ही डिपार्टमेंट में थे। इस तरह उनकी दोस्ती काफ़ी पुरानी थी। दोनों के क्वार्टर भी आस-पास थे, इसलिए दोनों अक्सर शाम को इसी तरह आंगन में कुर्सियाँ डालकर बैठा करते और गप्प मारा करते थे।

उनके सामने स्टूल पर चाय के दो कप रखे थे और एक प्लेट में बिस्किट्स।

“क्या किया दिन भर?” साजन ने तुषार से पूछा।

“कुछ नहीं यार…दिन भर घर पर ही पड़ा रहा। सोच रहा था, कोई मूवी देख आऊं, पर अकेले जाने का मन नहीं हुआ…तू भी तो नहीं था…और बता, तेरा कैसा रहा?”

साजन मुस्कुरा दिया, “कुछ नहीं यार…वो तो मैं माँ और पापा के कारण वहाँ चला गया था।“   

“पर लगता है पिया पसंद आ गई है…खोया-खोया सा लग रहा है।“ तुषार साजन का चेहरा गौर से देखते हुए बोला।

“नहीं तो!” साजन ने सिर झटकते हुए कहा।

“मगर कुछ सोच तो रहा है तू….”

“नहीं…एक्चुअली…उसकी बड़ी बहन….” साजन के मुँह से निकला।

“बड़ी बहन??” तुषार हैरानी से बोला, “बड़ी बहन तो पसंद नहीं आ गई तुझे?“

क्रमश:

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Author  – Kripa Dhaani

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