चैप्टर 9 कांच की चूड़ियाँ उपन्यास गुलशन नंदा | Chapter 9 Kanch Ki Chudiyan Novel By Gulshan Nanda

Chapter 9 Kanch Ki Chudiyan Novel By Gulshan Nanda

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Chapter 9 Kanch Ki Chudiyan Novel By Gulshan Nanda

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एक महीना अस्पताल में रहने के बाद बंसी आज अपने घर लौटा था। दांई टांग बेकार हो जाने के कारण काट दी गई थी। अभी वह बैसाखी का सहारा लेकर चलने के योग्य न हुआ था। उसकी अनुपस्थिति में उसके बाल बच्चों की देखरेख का भार रूपा की माँ पर ही था। यदि वह भी इस दुर्भाग्य में आश्रय न देती, तो जाने बंसी के घर की दशा क्या हो जाती।

“रूपा की माँ! इतना बड़ा उपकार चुकाने के लिए तो कई जीवन चाहिए। यदि इन बच्चों की देखभाल तुम न करती तो…” बंसी ने घर में प्रवेश करते ही कहा।

“रहने दो भैया! बच्चे तुम्हारे हैं तो क्या? मेरे कुछ नहीं लगते? इसमें उपकार की क्या बात है?”

अभी बंसी बैठ ही पाया था कि प्रताप की मोटर मकान के सामने आकर रूकी और मंगलू मालिक को दिए हुए आंगन में आ गया। रूपा की माँ उसे देखते ही गंगा को साथ लिए दूसरे कमरे में चली गई। प्रताप ने छिपी दृष्टि से गंगा के यौवन को निहारा और फिर बंसी के पास आकर इस घटना पर खेद प्रकट किया। बंसी ने चारपाई से धड़ उठाकर मालिक के पांव छूने का प्रयत्न किया।

किंतु मंगलू ने सहारा देकर उसे नीचे उतरने से रोक लिया।

“मालिक! आपने कष्ट क्यों किया? दो-चार दिन में मैं स्वयं उपस्थित हो जाता। अब तो ठीक हूँ। बैसाखी के सहारे कुछ चल भी लेता हूँ।” बंसी ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

“बंसी! अब तुम्हें बहुत आराम की आवश्यकता है। यह तो भगवान की दया है कि जान बच गई। पर यह चोट..इस पर यह बुढ़ापा…अधिक हिल डुल से कोई और आपत्ति मोल न ले लेना।” प्रताप ने सहानुभूति प्रकट की।

“नहीं मालिक! यूं बैठे बैठे तो काम न चलेगा। पहले ही मेरी अनुपस्थिति में काम रह गया होगा। फिर काम में मन लगा रहने से घाव शीघ्र भर जायेंगे।”

“बंसी काका! सरकार ने तुम्हारे स्थान पर दूसरा मुंशी रख रख लिया है। तुम्हारे लिए काम की चिंता का कोई कारण नहीं।” मंगलू ने झट मालिक के बात स्पष्ट कर दी।

नौकरी चले जाने की सुनकर बंसी पर मानो बिजली गिरी पड़ी। उसके हाथ पैर कांपने लगे। कुछ देर तो उसे मंगलू की बात पर विश्वास नहीं है, किंतु जब प्रताप ने उसकी बात को दोहराया, तो बेचारा आंतरिक पीड़ा से कराह उठा। वह एक टांग से लड़खड़ाता टांग हुआ चारपाई से उतरा और प्रताप के पांव में गिर पड़ा।

मंगलू ने प्रताप के संकेत पर आगे बढ़ कर उसे उठाया और फिर चारपाई पर बैठा दिया।

“बंसी! प्रकृति ने, भाग्य ने, भले ही तुम से अन्याय किया हो। किंतु कानून तुम्हें कभी धोखा न देगा।कानून से तुम ग्यारह महीने के वेतन के अधिकारी हो और निश्चिंत रहो इसकी तुम्हें कौड़ी कौड़ी मिलेगी।” वह कहकर प्रताप बिना पीछे देख चला गया।

बंसी को यों लगा मानो उसके नाव से पतवार टूट गए हों और वह विवश सा मझधार में आ पड़ा हो। रूपा की माँ उसी समय अपने घर चली गई थी, किंतु गंगा द्वार से लगी दोनों की बातें सुन रही थी। उसके मन में तो आया कि बापू के समान वह भी बढ़कर प्रताप के पांव पकड़ ले और बापू की नौकरी की भीख मांगे। पर वह ऐसा करने का साहस न कर सकी। उन लोगों के बाहर निकलते ही वह बापू के पास आई और उसे सांत्वना देने लगी। बंसी अपनी चिंता में डूबा किसी और ही दुनिया में खोया हुआ था। उसके कानों में मालिक का अंतिम वाक्य गूंज रहा था। शायद वह उसे कानून का सहारा लेने का दंड देने आया था। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करें क्या ना करें।

जब बंसी बड़ी देर तक कौन बैठा रहा है, तो गंगा उसके पास आ बैठी और बोली –

“बापू! तू न घबरा, मैं अभी जिंदा हूँ। यदि मेरे स्थान पर तुम्हारा कोई बेटा होता, तो क्या जीवन का सहारा न होता? अब सब का मुझ पर छोड़ दो। मैं मजबूरी करूंगी, कहीं काम मिल ही जाएगा…घर चलाऊंगी…मंजू शरत को पढ़ाऊंगी।” यह कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा आई और आँसू पलकों में आ गिरे।

बंसी अभी तक अपने विचारों में खोया सिर झुकाये बैठा था। गंगा की बातों ने अचानक उसे झांझोड़ दिया। उसी की चुनरी के छोर से उसने गंगा के आँसू पोछे और बोला, “पगली रो मत। अभी तेरा बाप जीवित है। काम कर सकता है। ठेकेदार का द्वार भले ही बंद हो गया हो, किंतु भगवान का द्वार तो खुला हुआ है। जिसने मुँह दिया है, वह भोजन भी अवश्य देगा।” गंगा की बातों से बंसी का साहस बढ़ गया। थोड़ी देर के लिए वह अपने भविष्य की चिंताओं को भूल गया। टांग कट जाने से उसे ग्यारह महीने का वेतन भी मिलेगा…लगभग ग्यारह सौ रुपये। एक ही बार इतना धन मिल जाने के विचार से उसके हृदय की रूकी हुई गति फिर से चलने लगी। वह सोचने लगा, इन रुपयों से कोई और काम खोज लेगा। चौबे का काम करेगा ही, कुछ यहां से मिल जाएगा। फिर वह दो-चार बच्चों को पढ़ा दिया करेगा। इससे घर का आटा-दाल चल जावेगा। उका मकान पहले ही चौबे के पास गिरवी था…क्यों न वह उसे बेच ही डाले और अच्छी खासी रकम लेकर उसके बदले में कहीं एक कोठरी किराए पर ले ले। ऐसा करने से वह सुगमता से गंगा का ब्याह कर सकेगा। मन ही मन वह कल्पना की कई कड़ियाँ बनकर स्वयं को सांत्वना देता रहा…वह शायद इस बात से अनभिज्ञ था कि इन मामूली कड़ियों का कोई महत्व नहीं, वास्तविकता की एक ठोकर से मकड़ी के जाले के समान यह टूट जाने वाली थी।

हुआ भी ऐसा ही। अगले दिन जब बंसी अपना हिसाब करने मालिक के यहाँ गया, तो उसकी समस्त आशाओं पर पानी फिर गया। उसके हिसाब का खाता पहले से ही तैयार किया रखा था। पिछले महीनों की पेशगी और अस्पताल का खर्च निकाल कर उसके पास केवल डेढ़ सौ रुपया बचता था, जो प्रताप ने उसे गिना दिया। बंसी ने कभी सपने में भी न सोचा था कि ठेकेदार अपने कारिंदे के इलाज के पैसे भी उसी के वेतन में से काट लेगा। वह गिड़गिड़ाकर बोला, “मालिक! दवा दारू तो कानून ने नाते आप ही पर आती है।”

“तुम ठीक कहते हो बंसी। मजदूरों की दवा दारू पर व्यय किए हुए पैसे हम देते हैं, किंतु तुम शायद भूल रहे हो कि तुम मजदूर नहीं थे, खजांची थे, पढ़े-लिखे क्लर्क थे…स्टाफ सूखी वेतन का ही अधिकारी है। तुम्हारे लिए हमने जो कुछ किया वह किया है, यह हमारी कृपा थी, इसलिए कि तुम सबसे पुराने सेवक थे… इसमें कानून का कोई दखल नहीं।”

“मैंने इतनी देर आपकी सेवा की है सरकार। अब भाग्य ने मुझे अंगहीन कर दिया है। इस डेढ़ सौ से मेरा क्या बनेगा? क्या आप मुझ पर और दया नहीं कर सकते।” रुंधे हुए द्वार में हाथ जोड़कर वह बोला।

“समय-समय की बात है बंसी। फंड इससे अधिक की अनुमति नहीं देते। यह रहा तुम्हारा हिसाब और पैसे।” उसने सामने रखे कागज और पैसों की ओर संकेत किया, “अब तुम जा सकते हो।” यह कर कर प्रताप दूसरे काम में लग गया।

प्रताप का यह व्यवहार देखकर बंसी का कलेजा जल उठा। बीस वर्षों की सेवा का यह पुरस्कार मिला था उसे। पर वह कर ही क्या सकता था? मेज पर रखा हिसाब का कागज और डेढ़ सौ रुपए उठाकर मुँह लटकाये बैसाखी पर चलता वह दफ्तर से बाहर चला आया। बाहर कितने ही मजदूर उससे मिलने के लिए एकत्रित हो गए थे। एक ने पूछा, ” काका क्या इनाम मिला स्वामी भक्ति का।”

बंसी ने रूखे स्वर में उत्तर दिया, “बहुत कुछ मिला भैया! यह डेढ़ सौ रुपया और नौकरी से सदा के लिए छुट्टी । भाग्य की बात है, किसी का क्या दोष?”

“दोष क्यों नहीं? यह घोर अन्याय है। तुम इसके विरुद्ध आवाज क्यों नहीं उठाते बंसी काका।” दूसरा बोला।

“मेरी मानो काका! तुम उस पर कानूनी दावा कर दो। तुम को नौकरी से अलग करने का उसे कोई अधिकार नहीं…” एक और ने कहा।

“काका! यह समय से पहले चट्टान का फट जाना कोई आकस्मिक घटना नहीं…एक चाल थी तुम्हें मारने की।” तीसरे ने कहा।

“हाँ हाँ बंसी! लोगों ने अंधेरे में अपनी आँखों से मंगलू को भागते देखा है। वह तुम्हारे प्राणों का बैरी है।” चौथा बोला।

बंसी के कानों में एक साथ कई आवाजें गूंज कर रह गई। उसने दोनों हाथों से अपने कान बंद कर लिए और बिना किसी की बात का उत्तर दिये बढ़ा चला गया।

पर एकाएक उसके पांव रुक गये। उसके सामने कम्मो खड़ी थी। वह पत्थर तोड़ते-फोड़ते उसे देखकर वहाँ आ गई थी। वह पहले से बहुत दुबली हो गई थी और बीमार दिख रही थी। उसके बाल उलझे और धूल में सने हुए थे और उसकी आँखों के नीचे काले गड्ढे बने हुए थे। बंसी चुपचाप उसे देखता रहा। कम्मो आगे बढ़ी और बंसी के सामने खड़ी होकर बोली, “हाँ बंसी काका! तुम्हें अपना अधिकार माननी चाहिए।”

बंसी ने देखा, अब उसके मुँह पर चमक न थी। उस रात वाली हँसी न थी। अब उसके चेहरे पर घोर उदासी थी, जो भोली बाला के मुख पर होती है, जिसे धोखे से वासना का शिकार बना कर कुचल डाला गया हो और अब जिसके पास न यौवन हो, न मान। हां, मन का पछतावा हो। वह बड़ी देर तक बंसी से दृष्टि न मिला सकी और जब उसकी आँख उठी, तो उनमें आँसू थे।

बंसी को खड़ा देखकर फिर मजदूर उसके पास आकर इकट्ठे हो गए। अचानक पीछे से एक कड़कती हुई आवाज आई और अनमने मन से अपने अपने हथियार उठाकर सब काम पर चले गए। यह आवाज प्रताप की थी, जो दफ्तर से बाहर निकल आया था और उन्हें व्यर्थ समय नष्ट करने पर बुरा-भला कह रहा था।

कम्मो और बंसी को एक साथ देखकर प्रताप का माथा ठनका। उसके मन में संशय उठा कि कहीं उससे बदला लेने के लिए बंसी कम्मो से कोई साज बाज तो नहीं कर रहा। अपने भय को क्रोध में छिपाये हुए दूर से ही वह बोला –

“देखो बंसी! कोई अनुचित बात तुमने की, तो मुझसे बुरा कोई न होगा।”

बंसी ने कोई उत्तर न दिया। प्रताप आग बबूला होकर उसके समीप चला आया और फिर वही वाक्य दोहराने लगा।

“कौन सी अनुचित बात?” बंसी के स्वर में स्वयं ही एक दृढ़ता आ गई थी।

“यही, मजदूरों को इकट्ठा करके मेरे विरुद्ध बहकाना।”

“वह उन्हें क्या बहकाएगा मालिक! जिसे स्वयं जीवन ने बहका दिया हो। यह सब मूर्ख हैं, मुझे अपना अधिकार मांगने के लिए कह रहे हैं; किंतु यह नहीं समझते कि अधिकार मानव से मांगा जाता है पशु से नहीं। विनती की उससे करे, जिसके हृदय हों; पत्थरों से की हुई प्रार्थना महान मूर्खता है।”

“बंसी!” प्रताप कड़कते हुए बोला, “जिन मूर्खों की तुम सहायता लेना चाहते हो, वश इस घाटी के पत्थर से भी हीन हैं। इन्हें यह दो पैसे कमाने योग्य भी मैने ही बनाया है। यदि इनमें से किसी ने भी सिर उठाया, तो उसका वही परिणाम होगा, को बारूद फटने से किसी चट्टान का होता है।” प्रताप की आँखें क्रोध से लाल अंगारा बनी हुई थी।

बंसी चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा और फिर बड़े धैर्य से बोला, “यह मत भूलो मालिक! इन निष्प्राण पत्थरों के सीने में भी धड़कन छिपी है और फिर यह बेचारे तो इंसान है।” यह कहकर बंसी ने एक बार कम्मो के उदास चेहरे को देखा और आगे बढ़ गया। जाते-जाते बंसी के कानों में कम्मो के ये शब्द पड़े, “मालिक! बंसी काका झूठ नहीं कहता। वास्तव में निष्प्राण पत्थरों के सीने में भी दिल है।”

प्रताप को कम्मो के मुख से ऐसे शब्दों की आशा कदापि नहीं थी। उसने तीखी निगाहों से कम्मो को देखा और दफ्तर में वापस लौट आया।

बंसी जब घर पहुँचा, तो आंगन में चारपाई पर चौबे जी विराजमान थे। बंसी को देखते ही वह उठ खड़ा हुआ और बोला, “आओ बंसी! बड़ी देर लगा दी तुमने।”

“क्या करूं बैसाखी से चलना पड़ता है, देर हो ही जाती है। जरा साइट पर चला गया था। बंसी के चेहरे में थकान झलक रही थी, जिसकी गवाही उसके माथे पर आई पसीने की बूंदे दे रही थीं।

चौबे को उसकी विवशता से कोई सरोकार न था। उसे और कुछ कहने का अवसर दिए बिना ही चौबे ने ऋण का तगादा कर दिया। बंसी पहले भी निराशा से घिरा था, चौबे की बात सुनकर रुंधे गले से बोला, “कुछ दिन रुक जाओ भैया! चुका दूंगा। अभी तो अस्पताल से आया हूँ। फिर एक नौकरी का सहारा था, वह भी छूट गई।”

“तभी तो कहने आया हूँ। तेरी नौकरी चली गई, अब हमारे ऋण का क्या होगा? ब्याज मिलाकर कुल छः सौ अधिक बनता है।”

“सब चुका दूंगा चौबे। यह बुरे दिन का सदा रहेंगे?”

“और जो ठेकेदार से इतना धन लाए हो, वह सब अकेले ही पचा डालोगे।”

“कितनी बड़ी रकम… केवल डेढ़ सौ रुपये।” बंसी ने कांपते हाथों से जेब के नोट चौबे को दिखाते हुए कहा।

चौबे ने लपक कर वह नोट बंसी के हाथ से छीन लिए और गिनते हुए बोला, “बंसी! हमसे ही हेरा फेरी! निकालो बाकी। अरे! पूरे ग्यारह महीने की पगार मिली है।”

“सच भैया, गंगा कसम…बस इतना ही हाथ लगा है और घर में खाने को दाना तक नहीं।”

“तो मैं क्या करूं? इससे तो ब्याज भी पूरा नहीं होता। देखो बंसी! कहे देता हूँ, यदि अगले महीने बाकी पैसे न मिले, तो मकान नीलम करा दूंगा। अब के एक न सुनूंगा। मेरा नाम भी चौबे है।”

यह कह नोट में जेब डालता हुआ वह चलता बना। बंसी आश्चर्य से उसे देखता ही रह गया। उसके हाथों से बैशाखी छूट गई और वह लड़खड़ाकर गिरने ही वाला था कि गंगा ने लपककर उसे थाम लिया और सहारा देकर चारपाई पर लिटा दिया। अचानक बंसी के हृदय में जोर की पीड़ा उठी और वह सीना दबा के पड़ रहा।

गंगा धीरे-धीरे बाबू की छाती मलते हुए बोली, “बाबू अब तो मैं तुम्हारी एक न सुनूंगी। मुझे घर को चलाने के लिए कोई मेहनत मजदूरी करनी ही पड़ेगी। वरना न जाने क्या हो…”

“नहीं बिटिया..!”

गंगा ने बापू को बात पूरी न करने दी और बीच में बोली, “तुम्हें शायद अपनी बेटी पर विश्वास नहीं रहा बापू। विश्वास करो तुम्हारी गंगा निडर है…वह हर कठिन काम कर सकती है। मैं अब काम न करूंगी, तो तुम्हारा क्या होगा। शरत और मंजू का क्या होगा? मेरी तुम बिल्कुल चिंता न करो, किसी की मजाल है, जो आँख उठाकर भी देखे।”

बंसी बेटी के सामने कुछ न कह सका। वह उस डर, उस संशय को भोली-भाली बाला के सामने व्यक्त न कर सका, जो उसे चिंता में डाले हुए था। यह अबोध लड़की जीवन की कठिनाइयों को न समझ सकेगी। वह उन कांटों से अनभिज्ञ थी, जिनसे वह दुर्गम मार्ग अटा पड़ा था। बेटी के साहस को वह तोड़ना न चाहता था। स्नेह से उसे थपथपाते हुए बोला –

“बेटी यदि तूने यही निश्चय किया है, तो ठीक है। कोई भला सा काम मिल जाए, तो अच्छा हो। मैं उस कमीने ठेकेदार प्रताप की नौकरी करने की तुम्हें कभी आज्ञा नहीं दे सकता।” प्रताप के नाम पर बंसी के माथे पर सिलवटें उभर आई।

दूसरे दिन से ही गंगा को खेतों पर काम मिल गया। धान की बुवाई हो रही थी और किसानों को काम करने वालों की आवश्यकता थी। मुँह अंधेरे से दिन ढले तक वह काम में व्यस्त रहती। शाम को घर लौटती और भोजन बनाती, बापू का मन लगाने का प्रयत्न करती। दिन-रात कामकाज में लगे रहने से उसके मन का बोझ हल्का हो गया, किंतु बंसी के लिए की पीड़ा बढ़ गई थी। वह अपाहिज और विवश था। उसे हर घड़ी एक ही चिंता खाए जा रही थी। गंगा पर कोई आपत्ति न आ जाये। उनका मन फिर न जाये।

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