चैप्टर 82 वैशाली की नगरवधु आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास | Chapter 82 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

चैप्टर 82 वैशाली की नगरवधु आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास | Chapter 82 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

Chapter 82 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

Chapter 82 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

 नाउन : वैशाली की नगरवधू

नगर के प्रान्त – भाग में एक नाउन का घर था । घर कच्ची मिट्टी का था परन्तु इसकी स्वच्छता दिव्य और आकर्षक थी । नाउन घर में अकेली रहती थी । यौवन उसका चलाचली पर था , परन्तु उसकी देहयष्टि अति मोहक , आकर्षक और कमनीय थी । उसकी आंखें चमकदार थीं , परन्तु उनके चारों ओर किनारों पर फैली स्याही की रेखाएं नाउन के चिर विषाद को प्रकट कर देती थीं । उसका हास्य शीतकाल की दुपहरी की भांति सुखद था । वह श्याम लता के समान कोमलांगी तथा आकर्षक थी । नृत्य , गान , पान -वितरण , अंगमर्दन , अलक्तक – लेपन आदि कार्यों में वह पटु थी । उसके इन्हीं गुणों के कारण राजमहालय से लेकर छोटे – बड़े गृहस्थ गृहपतियों के अन्तःपुरों तक उसका आवागमन था ।

इसी नाउन के घर में सोम और कुण्डनी ने डेरा डाला था । राजनन्दिनी को खोकर सोम बहुत उदास और दुःखी दीख पड़ते थे। वे विमन से मागध सैन्य का संगठन कर रहे थे। सेनापति उदायि प्रच्छन्न भाव से उनसे मिलते रहते थे। यज्ञ समारोह की भीड़ – भाड़ और देश – देशान्तर के समागत लोगों से मिलकर उनके विचार , भावना जानने का सोम को यह बड़ा भारी सुयोग प्राप्त हुआ था । परन्तु विमन और खिन्न होने के कारण वे अधिकतर इस नाउन के घर पर चुपचाप कई – कई दिन पड़े रहते थे। कुण्डनी छद्मवेश में बहुधा अन्तःपुर में जाती रहती थी । नाउन भी कभी – कभी उसके साथ जाती थी । आवश्यकता से अधिक स्वर्ण पाकर नाउन बहुत प्रसन्न थी और दोनों अतिथियों को अभिसारमूर्ति समझ उनकी खूब आवभगत करती और उनकी प्रत्येक इच्छा की पूर्ति करने की चेष्टा करती थी ।

कुण्डनी ने बड़ी हड़बड़ी में बाहर से आकर सोते हुए सोम को जगाकर कहा-“ सोम , भयानक समाचार है ! ”

“ क्या लोग हमारा छिद्र पा गए हैं ? ”

“ नहीं – नहीं, महाराज प्रसेनजित् और विदूडभ, दोनों ही राजधानी में नहीं हैं । ”

“ राजधानी में नहीं हैं तो कहां गए ? ”

“ यही हमारी गवेषणा का विषय है। ”

“ तुमने कहाँ सुना ? ”

“ राजमहालय में । ”

“ परन्तु नगर में तो कोई हलचल नहीं है ? ”

“ नगरवासियों से यह समाचार छिपाकर रखा गया है । ”

“ यह कैसी बात है ? ”सोम उठकर बैठ गया । फिर कहा – “ अब कहो , तुमने कहां सुना ? ”

“ देवी कलिंगसेना के प्रासाद में । ”

“ किसके मुंह से । ”

“ आचार्य अजित केसकंबली के मुंह से । वे आज प्रातःकाल ही देवी कलिंगसेना को अनुष्ठान कराने के बहाने उनके प्रासाद में गए वहां विचार -विनिमय हुआ । महाराज प्रसेनजित् को राजकुमार ने बन्दी करके अज्ञात स्थान पर भेज दिया है । ”

“ यह तो मैं पहले ही समझ गया , परन्तु कुमार विदुडभ ? ”

“ उन्हें सम्भवतः बन्धुल मल्ल ने बन्दी कर लिया है । ”

“ बन्धुल क्या यहां है ? ”

“ वे कल ही सीमान्त से आए हैं । ”

“ तो कुण्डनी, इस सम्बन्ध में हमें क्या करणीय है ? ”

“ देवी कलिंग तुम्हें देखना चाहती हैं । ”

“ किसलिए ? ”

“ राजकुमार की मुक्ति के लिए वे तुमसे सहायता की याचना करेंगी। ”

“ परन्तु मैं क्यों सहायता करूंगा ? ”

“ देवी ने चम्पा की राजकुमारी की मुक्ति में हमारी सहायता की थी ? ”

“ की थी । ”सोम ने धीरे – से कहा। वे उठकर टहलने लगे। कुछ देर बाद उन्होंने कहा – “ कुण्डनी, मैं इसी समय आर्य उदायि से मिलना चाहता हूं। ”

“ ठहरो सोम , मुझे बताना होगा , किसलिए ? ”कुण्डनी की मुद्रा कठोर हो गई ।

सोम ने रूखे स्वर में कहा – “ अकथ्य क्या है ? मागधों के लिए यह स्वर्ण- सुयोग है ,

मागध बदला लेंगे। कोसल- जय का यह स्वर्णयोग है। वे कोसल को आक्रान्त करेंगे । ”

“ परन्तु किससे बदला लेंगे सोम ? ”

“ कोसलों से ? ”

“ कहां हैं वे कोसल , विचार तो करो ! क्या तुम विश्वासघात करने जा रहे हो सोम ?

“ किससे ? क्या शत्रु से ? उसमें विश्वासघात क्या है ? मेरे पास इस समय दस सहस्र मागध सेना है, मैं दो घड़ी में कोसल को आक्रान्त करके कोसल का अधीश्वर बन जाऊंगा। फिर मैं चम्पा की राजनन्दिनी को परिशोध दूंगा । ”

“ किस प्रकार ? ”

“ कोसल की पट्टराजमहिषी बनाकर । ”

“ तो सोम , विद्वानों का यह कथन सत्य है कि जन्म से जो पतित होते हैं उनके विचार हीन ही होते हैं । ”

“ इसका क्या अभिप्राय है कुण्डनी ? ”

“ यही कि तुम अज्ञात -कुलशील हो ! मैंने तुम्हारा शौर्य और तेज देख तुम्हें कुलीन समझा था , पर अब मैंने अपनी भूल समझ ली । ”

“ क्या ऐसी बात ? ”सोम ने कुण्डनी के मस्तक पर खड्ग ताना ।

“ सत्य है, सत्य है, यह समुचित होगा । पहले कुण्डनी का वध करो, फिर मित्र के साथ विश्वासघात करके कोसल का सिंहासन और चम्पा की राजकुमारी को एक ही दांव में प्राप्त करो। ”

“ मित्र के साथ विश्वासघात क्यों ? सोम ने चिल्लाकर कहा ।

“ क्या तुमने राजकुमार को मित्र नहीं कहा ? क्या उन्होंने राजकुमारी को धरोहर नहीं कहा ? क्या उन्होंने और राजमाता ने कुमारी की रक्षा करने में हमारी सहायता नहीं की ? क्या तुमने खड्ग छूकर राजकुमार से नहीं कहा था कि मित्र , यह खड्ग तेरी सेवा को सदा प्रस्तुत है ? ”

सोम ने खड्ग नीचे रख दिया । वे चुपचाप पृथ्वी पर बैठ गए । बहुत देर तक चुप रहने के बाद उन्होंने कहा

“ कुण्डनी, क्या करना होगा ? ”

“ कर सकोगे ? ”

“ और उपाय ही क्या है कुण्डनी ? ”

“ सत्य है, नहीं है । कल तुम्हें महालय में जाना होगा । ”

“ किस प्रकार ? ”

“ आचार्य का ब्रह्मचारी बनकर आशीर्वाद देने । ”

“ आचार्य ने क्या ऐसा ही कहा है ? ”

“ यही योजना स्थिर हुई है। और भी एक बात है। ”

“ क्या ? ”

“ मैंने वचन दिया है कि मैं युवराज की रक्षा करूंगी । तुम यदि न करोगे तो मुझे करनी होगी , सोम ! ”

“ मैं जब तक जीवित हूं , मैं करूंगा; तुम केवल मेरा पथ -प्रदर्शन करो। शुभे कुण्डनी , मैं तुम्हारा अनुगत सोम हूं। ”

“ तो सोम , प्रभात में हमें महालय चलना होगा । सारी योजना वहीं स्थिर की जाएगी। परन्तु अभी हमें एक काम करना है। ”

“ क्या ? ”

“ दीहदन्त के अड्डे पर जाना होगा। ”

“ वह तो बहुत दूषित स्थान है । ”

“ परन्तु हमें वहां जाना होगा। ”

“ क्यों ? ”

“ राजकुमार का पता वहीं लगने की सम्भावना है। ”

“ तो मैं वहां जाता हूं। ”

“ नहीं , हम तीनों को जाना होगा। नाउन उस पापी को पहचानती है। ”

“ नाउन क्या इस अभियान में विश्वसनीय रहेगी ? ”

“ वह सर्वथा विश्वास के योग्य है। ”

“ तब जैसी तुम्हारी इच्छा ! ”

“ तो हम लोग एक मुहूर्त में तैयार होते हैं । अभी एक दण्ड दिन है। ठीक सूर्यास्त के बाद हमें वहां पहुंचना होगा । तब तक तुम भी एक लुच्चे मद्यप का रूप धारण कर लो । ”

कुण्डनी का यह वाक्य सुनकर सोम असंयत होने पर भी हंस दिया । कुण्डनी चली गई ।

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