चैप्टर 8 तितली जयशंकर प्रसाद का उपन्यास | Chapter 8 Titli Jaishankar Prasad Novel In Hindi
Chapter 8 Titli Jaishankar Prasad Novel In Hindi
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पूस की चांदनी गांव के निर्जन प्रांत में हल्के, कुहासे के रूप में साकार हो रही थी। शीतल पवन जब घनी अमराइयों में हरहराहट उत्पन्न करता, तब स्पर्श न होने पर भी गाढ़े के कुरते पहनने वाले किसान अलावों की ओर खिसकने लगते। शैला खड़ी होकर एक ऐसे ही अलाव का दृश्य देख रही थी, जिसके चारों ओर छ: सात किसान बैठे हुए तमाखू पी रहे थे। गाढ़े की दोहर और कंबल उनमें से दो ही के पास थे और सब कुरते और इकहरी चद्दरों में ‘हू-हा’ कर रहे थे।
शैला जब महुए की छाया से हटकर उन लोगों के सामने आई तो, वे लोग अपनी बात-चीत बंद कर असमंजस में पड़े कि मेम साहब से क्या कहें। शैला को सभी पहचानते थे। उसने पूछा-यह अलाव किसका है ?
महंगू महतो का सरकार -एक सोलह बरस के लड़के ने कहा।
दूर से आते हुए मधुबन ने पूछा-क्या है रामजस ?
मधु भइया, यही मेम साहब पूछ रही थीं।- रामजस ने कहा।
मधुबन ने शैला को नमस्कार करते हुए कहा-क्या कोई काम है ? कहीं जाना हो तो मैं पहुंचा दूं।
नहीं-नहीं मधुबन ! मैं भी आगे के पास बैठना चाहती हूँ।
मधुबन पुआल का छोटा-सा बंडल ले आया। शैला बैठ गई। मधुबन को वहाँ पाकर उसके मन में जो हिचक थी, वह निकल गई।
महंगू के घर के सामने ही एक अलाव लगा था, महंगू वहाँ पर तमाखू-चिलम का प्रबंध रखता। दो-चार किसान, लड़के-बच्चे उस जगह प्राय: एकत्र रहते। महंगू की चिलम कभी ठंडी न होती। बुड्ढा पुराना किसान था। उस गांव के सब अच्छे टुकड़े उसकी जोत में थे। लड़के और पोते गृहस्थी करते थे, वह बैठा तमाखू पिया करता। उसने भी मेम साहब का नाम सुना था, शैला की दयालुता से परिचित था। उसकी सेवा और सत्कार के लिए मन-ही-मन कोई बात सोच रहा था।
सहसा शैला ने मधुबन से पूछा-मधुबन ! तुम जानते हो, बार्टली साहब की नील-कोठी यहाँ से कितनी दूर है ?
वह कल के लड़के हैं मेम साहब ! उन्हें क्या मालूम कि बार्टली साहब कौन थे, मुझसे पूछिए। मेरा रोआं-रोआं उन्हीं लोगों के अन्न का पला हुआ है-महंगू ने कहा।
अहा ! तब तुम उन्हें जानते हो ?
बार्टली को जानता हूँ। बड़े कठोर थे। दया तो उनके पास फटकती न थी-कहते-कहते अलाव के प्रकाश में बुड्ढे के मुख पर घृणाकी दो-तीन रेखाएं गहरी हो गई। फिर वह संभलकर कहने लगा – पर उनकी बहन जेन माया-ममता की मूर्ति थी। कितने ही बार्टली के सताए हुए लोग उन्हीं के रुपए से छुटकारा पाते, जिसे वह छिपाकर देती थीं। और, मुझ पर तो उनकी बड़ी दया रहती थी। मैं उनकी नौकरी कर चुका हूँ। मैं लड़कपन से ही उन्हीं की सेवा में रहता था। यह सब खेती-बारी गृहस्थी उन्हीं की दी हुई है। उनके जाने के समय मैं कितना रोया था !- कहते-कहते बुड्ढे की आंखों से पुराने आंसू बहने लगे।
शैला ने बात सुनने के लिए फिर कहा-तो तुम उनके पास नौकरी कर चुके हो ? अच्छा तो वही नील-कोठी –
अरे मेम साहब, वह नील कोठी अब काहे को है, वह तो है भुतही कोठी! अब उधर कोई जाता भी नहीं, गिर रही है। जेन के कई बच्चे वहीं मर गए हैं। वह अपने भाई से बार-बार कहती कि मैं देश जाऊंगी, पर बार्टली ने जाने न दिया। जब वह मरे, तभी जेन को यहाँ से जाने का अवसर मिला। मुझसे कहा था कि – महंगू, जब बाबा होगा, तो तुमको बुलाऊंगी उसे खेलाने के लिए, आ जाना,मैं दूसरे पर भरोसा नहीं करूंगी। – मुझे ऐसा ही मानती थीं। चली गईं, तब से उनका कोई पक्का समाचार नहीं मिला। पीछे एक साहब से, – जब वह यहाँ का बंदोबस्त करने आया था, सुना-कि जेन का पति स्मिथ साहब बड़ा पाजी है, उसने जेन का सब रुपया उड़ा डाला। वह बेचारी बड़ी दु:खी हैं। मैं यहाँ से क्या करता मेम साहब !
शैला चुपचाप सुन रही थी। उसके मन में आंधी उठ रही थी, किंतु मुख पर धैर्य की शीलता थी। उसने कहा-महंगू, मैं तुम्हारी मालकिन को जानती हूँ।
क्या अभी जीती हैं मेम साहब – बुड्ढे ने बड़े उल्लास से पूछा। उसके हाथ का हुक्का छूटते-छुटते बचा।
नहीं, वह तो मर गई। उनकी एक लड़की है।
अहा ! कितनी बड़ी होगी ! मैं एक बार देख तो पाता ?
अच्छा, जब समय आवेगा तो तुम देख लोगे। पहले यह तो बताओ कि मैं नील-कोठी देखना चाहती हूँ , इस समय कोई वहाँ मेरे साथ चल सकता है ?
सब किसान एक दूसरे का मुँह देखने लगे। भुतही कोठी में इस रात को कौन जाएगा। महंगू ने कहा – मैं बूढ़ा हूँ, रात को सूझता कम है।
मधुबन ने कहा-मेम साहब, मैं चल सकता हूँ।
साहस पाकर लड़के रामजस ने कहा-मैं भी चलूंगा भइया।
मधुबन ने कहा-तुम्हारी इच्छा !
कंधे पर अपनी लाठी रखे, मधुबन आगे, उसके पीछे शैला तब रामजस, तीनों उस चांदनी में पगडंडी से चलने लगे। चुपचाप कुछ दूर निकल जाने पर शैला ने पूछा-मधुबन, खेती से तुम्हारा काम चल जाता है ? तुम्हारे घर पर और कौन है ?
मेम साहब ! काम तो किसी तरह चलता ही है। दो-तीन बीघे की खेती ही क्या ? बहन है बेचारी, न जाने कैसे सब जुटा लेती है। आज-कल तो नहीं, हाँ जब मटर हो जाएगी, गांवों में कोल्हू चलने ही लगे हैं, तब फिर कोई चिंता नहीं।
तुम शिकार नहीं करते ?
कभी-कभी मछली पर बंसी डाल देता हूँ। और कौन शिकार करूं ?
बहन तुम्हारी यहीं रहती हैं ?
हाँ मेम साहब, उसी ने मुझे पाला है – कहते हुए मधुबन ने कहा-देखिए, यह गड्ढा है। संभलकर आइए। अब हम लोग कच्ची सड़क पर आ गए हैं।
अच्छा मधुबन। तुमने यह तो कहा ही नहीं कि तितली कहाँ है, दिखाई नहीं पड़ी। उस दिन जब रामनाथ उसको लिवा ले गया, तब से तो उसका पता न लगा। उसका क्या हाल है ?
सब कठोर हैं, निर्दय हैं – मन-ही-मन कहते हुए अन्यमनस्क भाव से मधुबन ने अपना कंधा हिला दिया ?
क्या मधुबन ! कहते क्यों नहीं।
उसी दिन से वह बेचारी पड़ी है। उधर सुना है कि तहसीलदार ने बेदखली कराने का पूरा प्रबंध कर लिया है ! मेम साहब, गरीब की कोई सुनता है ? आप ही कहिए न ! किसी ब्याह में रमुआ ने दस रुपए लिए। वह हल चलाता मर गया। जिसका ब्याह हुआ उस दस रुपए से, वह भी उन्हीं रुपयों में हल चलाने लगा। उसके भी लड़के यदि हल चलाने के डर से घबराकर कलकत्ता भाग जाएं, तो इसमें बाबाजी का क्या दोष है ?
कुछ नहीं -शैला ने कहा।
फिर आप तो जानती नहीं। यह तहसीलदार पहले मेरे यहाँ काम करता था। गुदाम वाले साहब से, एक बात पर उभाड़कर, मेरे पिताजी को लड़ा दिया। मुकदमे में जब मेरा सब साफ हो गया, तो जाकर यह धामपुर की छावनी में नौकरी करने लगा। इसको दानव की तरह लड़ने का चसका है, सो भी अदालत का ही। नहीं तो किसी एक दिन इसकी लड़ने की साध मिटा देता। मैं किसी दिन इसकी नस तोड़ दूं, तो मुझे चैन मिले। इसके कलेजे में कतरनी-से कीड़े दिन-रात कलबलाया करते हैं।
यह तहसीलदार तुम्हारे यहाँ …अरे यह बात मैं क्रोध में कह गया मेम साहब, जो समय बीत गया, उसे सोच कर कया करूंगा। अब तो मैं एक साधारण किसान हूँ। शेरकोट का …
चलते-चलते शैला ने कहा-क्या, शेरकोट न ! हाँ-तहसीलदार ने कहा था कि शेरकोट ही बैंक बनाने के लिए अच्छा स्थान है ! कहाँ है वह ?
मधुबन गुर्रा उठा भूखे भेड़िए की तरह। उस ठंडी रात में उसे अपना क्रोध दमन करने से पसीना हो गया। बोला नहीं।
शैला भी सामने एक ऊंचा-सा टीला देखकर अन्यमनस्क हो गई जो चांदनी रात में रहस्य के स्तूप-सा उदास बैठा था।
रामजस सहसा पीछे से चिल्ला उठा-अब तो पहुँच गए मधुबन भइया !
मधुबन ने गंभीरता से कहा-हूँ।
शैला चुपचाप टूटी हुई सीढ़ियों से चढ़ने लगी। उस नीरस रजनी में पुरानी कोठी, बहुत दिनों के बाद तीन नए आगंतुकों को देखकर, जैसे व्यंग्य की हंसी हंसने लगी। अभी ये लोग दालान में पहुँचने भी न पाए थे कि एक सियार उसमें से निकलकर भागा। हाँ, भयभीत मनुष्य पहले ही आक्रमण करता है। रामजस ने डरकर उस पर डंडा चलाया। किंतु वह निकल गया।
शैला ने कहा-मैं भीतर चलूंगी।
चलिए, पर अंधेरे में कोई जानवर …
मधुबन चुप रहा। आगे उसके मन में शेरकोट में बैंक बनाने की बात आ गई। वह चुपचाप एक पत्थर पर बैठा गया। शैला भी भीतर न जाकर झील की ओर चली गई। पत्थरों की पुरानी चौकियां अभी वहाँ पड़ीं थीं। उन्हीं में से एक पर बैठकर वह सूखती हुई झील को देखने लगी। देखते-देखते उसके मन में विषाद और करुणा का भाव जागृत होकर उसे उदास बनाने लगा। शैला को दृढ़ विश्वास हो गया कि जिस पत्थर पर वह बैठी है, उसी पर उसकी माता जेन आकर बैठती थी। अज्ञात अतीत को जानने की भावना उसे अंधकार में पूर्व-परिचितों के समीप ले जाने का प्रयत्न करने लगी। जीवन में यह विचित्र श्रृंखला है। जिस दिन से उसे बार्टली और जेन का संबंध इस भूमि से विदित हुआ, उसी दिन से उसकी मानस-लहरियों में हलचल हुई। पहले उसके हृदय ने तर्क-वितर्क किया। फिर बाल्यकाल की सुनी हुई बातों ने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी माता जेन ने अपने जीवन के सुखी दिनों को यहीं बिताया है। अवश्य उसकी माता भारत के एक नील-व्यवसायी की कन्या थी। फिर जब उसके संबंध में यहाँ प्रमाण भी मिलता है, तब उसे संदेह करने का कोई कारण नहीं। अज्ञात नियति की प्रेरणा उसे किस सूत्र से यहाँ खींच लाई है, यही उसके हृदय का प्रश्न था। वह सोचने लगी, यहाँ पर उसकी माता की कितनी सुखद स्मृतियां शून्य में विलीन हो गई। आह ! उसके दु:ख से भरे वे अंतिम दिन कितने प्यार से इन स्थलों को स्मरण करते रहे होंगे। इसी झील में छोटी-सी नाव पर उस अतीतकाल में वह कितनी बार घूमकर इसी कोठी में लौटकर चली आई होगी। उसे कल्पना की एकाग्रता ने माता के पैरों को चाप तक सुनवा दी। उसे मालूम हुआ कि उस खंडहर की सीढ़ियों पर सचमुच कोई चढ़ रहा है। वह घूमकर खड़ी हो गई, किंतु रामजस और मधुबन के अतिरिक्त कोई नहीं दिखाई दिया। वह फिर बैठ गई और दोनों हाथों से अपना मुँह ढंककर सिसकने लगी।
माता का प्यार उसकी स्मृति मात्र से ही उसे सहलाने लगा। उस भयावने खंडहर में माता का स्नेह जैसे बिखर रहा था। वह जीवन में पहिली बार इस अनुभूति से परिचित हुई। उसे विश्वास हो गया कि यही उसका जन्म-जन्म का आवास है, आज तक वह जो कुछ देख सकी थी, वह सब विदेश की यात्रा थी। आंखों के सामने दो खड़ी के मनोरंजन करने वाले दृश्य, सो भी उसमें कटुता की मात्रा ही अधिक थी, जो कष्ट झेलने वाली सहनशील मनोवृत्ति के निदर्शन थे। आज उसे वास्तविक विश्राम मिला। वह और भी बैठती, किंतु मधुबन ने कहा-रामजस, तुमको जाड़ा लग रहा है क्या ?
नहीं भइया, यही सोचता हूँ कि कहीं एक चिलम …
पागल, यहाँ से गांव में जाकर लौटने में घंटों लग जाएंगे।
तो न सही-कहकर वह अपनी कमली मुट्टियों में दबाने लगा। शैला की एकग्रता भंग हो गई। उसने पूछा- मधुबन, क्या हम लोगों को चलना चाहिए ?
रात बहुत हो चली, वह देखिए, सातों तारे इतने ऊपर चढ़ आए हैं ! छावनी पहुँचते-पहुँचते हम लोगों को आधी रात हो जाएगी।
तब चलो-कहकर शैला निस्तब्ध टीले से नीचे उतरने लगी। मधुबन और रामजस उसके आगे और पीछे थे। वह यंत्र-चालित पुतली की तरह पथ अतिक्रम कर रही थी, और मन में सोच रही थी, अपने अतीत जीवन की घटनाएं। दुर्वृत्त पिता की अत्याचार-लीलाएं फिर माता जेन का छटपटाते हुए कष्टमय जीवन से छुट्टी पाना, उस प्रभाव की भीषणता में अनाथिनी होकर भिखमंगों और आवारों के दल में जाकर पेट भरने की आरंभिक शिक्षा, धीरे-धीरे उसका अभ्यास, फिर सहसा इन्द्रदेव से भेंट-संध्या के क्रमश: प्रकाशित होने वाले नक्षत्रों की तरह उसके शून्य, मलिन और उदास अंतस्तल के आकाश में प्रज्वलित होने लगे। वह सोचने लगी –
नियति दुस्तर समुद्र को पार कराती है, चिरकाल के अतीत को वर्तमान से क्षण-भर में जोड़ देती है, और अपरिचित मानवता-सिंधु में से उसी एक से परिचय करा देती है, जिससे जीवन की अग्रगामिनी धारा अपना पथ निर्दिष्ट करती है। कहाँ भारत, कहाँ मैं और कहाँ इन्द्रदेव ! और फिर तितली !- जिसके कारण मुझे अपनी माता की उदारता के स्वर्गीय संगीत सुनने को मिले, यह पावन प्रदेश देखने को मिला !
उसके मन में अनेक दुराशाएं जाग उठीं। आज तक वह संतुष्ट थी। अभावपूर्ण जीवन इन्द्रदेव की कृतज्ञता में आबद्ध और संतुष्ट था। किंतु इस दृश्य ने उसे कर्मक्षेत्र में उतरते के लिए एक स्पर्द्धामय आमंत्रण दिया। उसका सरल जीवन जैसे चतुर और सजग होने के लिए व्यस्त हो उठा।
वह कच्ची सड़क से धीरे-धीरे चली जा रही थी। पीछे से मोटर की आवाज सुन पड़ी। वह हटकर चलने लगी। किंतु मोटर उसके पास आकर रुक गई। भीतर से अनवरी ने पुकारा -मिस शैला हैं क्या ?
हाँ।
छावनी पर ही चल रही हैं न ? आइए न।
धन्यवाद। आप चलिए , मैं आती हूँ। – अन्यमनस्क भाव से शैला ने कह दिया पर अनवरी सहज में छोड़ने वाली नहीं। उसने अपने पास बैठे हुए कृष्णमोहन से धीरे-से कहा-यह तुम्हारी मामी हैं, उन्हें जाकर बुला लो।
शैला उस फुसफुसाहट को सुनने के लिए वहाँ ठहरी न थी। आगे बढ़कर कृष्ण्ामोहन ने नमस्कार करके कहा-आइए न।
शैला कृष्णमोहन का अनुरोध न टाल सकी। मोटर के प्रकाश में उसका प्यारा मुख अधिक आग्रहपूर्ण और विनीत दिखाई पड़ा।
शैला ने मधुबन से कहा-मधुबन, कल छावनी पर अवश्य आना। कृष्णमोहन के साथ शैला मोटर पर बैठ गई।
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