चैप्टर 8 नारी सियारामशरण गुप्त का उपन्यास | Chapter 8 Nari Siyaramsharan Gupt Novel
Chapter 8 Nari Siyaramsharan Gupt Novel
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मदरसे से आने पर हल्ली को इस बात का बड़ा खेद हुआ कि घर में हो जाने वाले उस कौतुकपूर्ण काण्ड को वह स्वयं अपनी आँखों नहीं देख सका। साँप कितना बड़ा था, कहाँ से आया, उसमें कितना विष था, ऐसे अनेक प्रश्नों की उसने झड़ी लगा दी। उस साँप के कारण हो सकने वाली दुर्घटना के कल्पित भय से जमना अब भी घबरा रही थी। इसी से बार-बार वही चर्चा छेड़ने के लिए वह हल्ली पर बेतरह झुंझला उठी ।
हल्ली नीचे बैठकर उस ताक में ध्यान से देख रहा था कि साँप ने अपना बिल कहाँ बनाया होगा। कहीं कुछ न दिखाई देने पर उसने भीतर हाथ डाला ही था तब तक भीतर से जमना ने उसे देख लिया । एक हाथ से अपनी ओर घसीटकर उसने उसके एक थप्पड़ जमा दी। बोली- इसमें हाथ क्यों डालता है रे ! – उसे ऐसा भय लगा मानो अब भी इसमें वहीं साँप बैठा है।
हल्ली ने हँसकर कहा- इतना डरती क्यों हो माँ? महादेवीजी तो अपने गले में साँप का गुलूबन्द लपेटे रहते हैं।
उसकी बात अनसुनी करके जमना ने कहा खबरदार जो अब कभी ऐसी जगह हाथ डाला ।
हल्ली बोला- मैं यहाँ होता तो उसे दूध पिलाता । कटोरी में वह अपनी छोटी-सी जीभ से लप लप करता हुआ दूध पीता । उस समय कितना भला मालूम होता, वाह !
जमना अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए वहाँ से हट गई।
थोड़ी देर बाद हल्ली अजीत का हाथ पकड़े हुए आकर बोला- काका कहीं जा रहे थे, मैं इन्हें पकड़ लाया हूँ। कहानी सुनूँगा ।
जमना को याद आया सबेरे जिस काम के लिए आये थे, उसी के लिए अब भी जा रहे होंगे। मैं तो भूल ही गई थी। झट से उठकर उसने चबूतरे पर बाँस की एक चटाई बैठने के लिए डाल दी ।
अजीत के नीचे लटके हुए पैरों से लिपटकर हल्ली बात करने लगा। उसने पूछा—उस साँप को मार डाला काका?
“जङ्गल में दूर छोड़ आया हूँ बेटा। मैं मारता नहीं।”
“तुम्हें काटता नहीं ? – मन्त्र से बस हो जाता है?”
“हाँ, मन्त्र से बस में हो जाता है । परन्तु कहीं ऐसा भी होता है कि किसी-किसी पर कोई भी मन्त्र काम नहीं करता।” – कहकर अजीत ने तिरछी दृष्टि से जमना की ओर देखा । वह दूसरी ओर मुँह करके देखने लगी ।
अजीत की पिछली बात पर ध्यान न देकर हल्ली बोला- तुम मुझे अपना मन्त्र – जन्त्र सिखा दो काका ।
“सिखा दूँगा जब बड़े हो जाओगे ।”
“कितना बड़ा, तुम्हारे जितना ?”
इस ओर से असफल होकर वह कहानी कहने के लिए अनुरोध करने लगा। उसके बार-बार हठ करने पर अजीत ने कहा -लो सुनो। एक गाँव में एक इस्त्री रहती थी।
हल्ली ने कहा – हूँ ।
“वह इस्त्री देखने में ऐसी थी जैसे किसी राजा की बेटी हो। परन्तु एक ऐब उसमें बहुत बड़ा था। जो हठ वह पकड़ लेती उसे छोड़ना न जानती थी।”
“मूरख होगी?”
“यह मुझे नहीं मालूम। तो हाँ, उसके था एक लड़का।”
“कितना बड़ा?”
“तुम्हारे जितना ही । वह बड़ा समझदार था । कभी किसी को सँग न करता कि कहानी कहो।”
विरक्त होकर हल्ली कुछ कहना ही चाहता था, तब तक अजीत ने आगे कहा- और लोग उसे हल्ली हल्ली कहा करते थे ।
मुँह फेरकर हल्ली ने कहा- जाओ मैं नहीं सुनता। कहानी न सुनाकर तुम तमासा करते हो। इस समय तुम्हारा मन नहीं है, परन्तु कल मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं।
वह वहाँ से चला गया ।
थोड़ी देर चुप रहकर अजीत बोला- तुम बुरा मान रही होगी कि मैं किसी बुरे मतलब से तुम्हारे पास आता हूँ।
जमना चुप बनी रही।
अजीत ने फिर कहा-मेरा यहाँ आना तुम बुरा ही समझती हो, पर मैं नहीं समझता। ऐसा होता तो सबेरे का साँप मुझे डस लेता। फिर भी तुम कहो तो न आया करूँ।
कातर होकर जमना कह उठी-मैंने कब कहा है कि न आया करो ।
“तब ठीक है। मैंने सोचा था, तुम रोक दोगी तब भी न रुकूँगा। मेरे मन में कोई पाप नहीं है, तब डर काहे का। मैंने तुमसे फिर घर बसा लेने के लिए कहा था । उसमें कुछ बुराई नहीं है। अपने यहाँ बाप-दादों के यहाँ से होता आया है।”
सबेरे की घटना के कारण जमना का हृदय कृतज्ञता से भरा था ? बार-बार सोचकर वह काँप चुकी थी कि यदि आज उस समय ये न आते तो न जानें कैसा अनर्थ हो जाता। इसी से अजीत की बात का कोई कड़ा उत्तर वह न दे सकी वैसे ऐसी बात के विषय में वह असहिष्णु हो गई थी।
जमना ने कहा- सबेरे कोई जरूरी बात कहने आये थे?
“उसी के लिए इस समय भी आ रहा था। कोई भले भूल जाय, भूलने वाला मैं नहीं हूँ। ऐसी-ऐसी बातें मुझे याद रह जाती है”-
“बात क्या थी?”
“कौन बात ? – अच्छा वह वही तो कह रहा हूँ। मैं इस बीच में सदर गया हुआ था। थानेदार बहुत भले आदमी हैं, बहुत मेहरबान हैं। कोई पेचीदा मामला आता है तो मुझे छोड़ते नहीं हैं। फौरन कास्टिबिल को हुकुम करते हैं- जाओ माते को हमारा सलाम बोलो ! इसी से इस बार भी उने साथ जाना पड़ा था। वहाँ हलवाई की दूकान पर पूरियाँ खाकर, मिठाई अच्छी नहीं लगती, इससे पूरियाँ ही खाता हूँ । मैं कचहरी की ओर झपाटे से जा रहा था, तब तक बड़े बाजार के चौमुहाने पर मुझे जगराम मिल गया ।”
जमना चौंक पड़ी। जगराम उस व्यक्ति का नाम था जिसके साथ वृन्दावन परदेश भागा था। वह बोली- जगराम नयेगाँव वाले ?
“हाँ, वह नहीं तो और कौन ? अब वह बाबू हो गया है। जानती हो बाबू कैसा होता है? हाथ-पैर बेंत की छड़ी जैसे, मुँह चुसी आम की गुठली – सा खुली लाँग की बगलगी धोती पर कमर तक काले रंग का बण्डा कोट पहने। कोई कैसा ही स्वाँग भर ले, पर मैं ऐसा नहीं हूँ कि वह मेरी आँख में धूल डाल सके। देखते ही दूर से मैंने पहचान लिया – जगराम है। शिबू बोला, जगराम नहीं है। तब मैंने उसका नाम लेकर पुकारा । वह तुरन्त मेरे पास आ गया ।”
जमना ने पूछा- फिर कुछ बात हुई?
“बात नहीं हुई तो पुकारा किसलिए था । कहता था, वहाँ का हवा-पानी माफिक नहीं बैठा, इसलिए यहीं आ गया हूँ! बाबू लोग होते ही ऐसे हैं । तनिक सी हवा में उड़ जायँ और डूबने के लिए भी उन्हें कोई गहरा पानी न चाहिए; फिर वहाँ तो जहाँ देखो वहीं जलकल की मोटी धार टूटती रहती है।”- कहकर अजीत हँसने लगा ।
जमना को इस समय यह हँसी बहुत बुरी लगी । बोली- उनके बारे में बात नहीं हुई?
“किनके, वृन्दावन के बारे में? समय ही कहाँ था। साढ़े दस बज चुके थे और कचहरी खुल जाती है ठीक दस बजे ।”
जमना क्षुब्ध होकर बोली- तुम्हें दूसरे की क्या फिकिर मैं आप जाकर सब पता ले आऊँगी।
“मुझे किसी की फिकिर नहीं है? तो मैं उसे पास बुलाता ही क्यों? बिन्द्रावन के बारे में बात छिपी ही कौन-सी है, जो मैं उससे पूछता फिरता । तुम्हीं से एक सवाल करता हूँ। बताओ, वे अब तक जीते होते तो जगराम के साथ दिखाई क्यों न दिये ? बेईमान, दूसरे को अपने साथ मरने के लिए ले गया और आप अकेला लौट आया है। तुम सब जानती हो ! सपने में-
जमना बैठी थी, उठकर खड़ी हो गई। भौंह तानकर उसने कहा- फिर वैसी ही बात! तुम चाहते हो सब कोई मर जायँ तब मैं तुम्हारी बाँदी हो जाऊँगी। मैं इतनी नादान नहीं हूँ जो कुछ न समझूँ। परन्तु तुम भी समझ लो, इस तरह बुरा ताकने से किसी का सत्यानाश नहीं होता ।
तेजी में हाथ की चूड़ियाँ खनकाकर वह झट से भीतर चली गई ।
अजीत चुपचाप जहाँ का तहाँ बैठा रहा। थोड़ी देर बाद भीतर के दरवाजे के पास जाकर उसने कहा- तुम नाराज हो गई हो जमना, परन्तु इसमें नाराज होने की कोई बात न थी । मैं सोचता था, जगराम की कही हुई बातें तुम्हें क्यों अपने मुँह से सुनाऊँ? फिर भी तुम कहती हो, मुझे किसी की फिकिर नहीं है! जगराम को लिवा लाकर यहाँ खड़ा कर दूँगा, तब तो मानोगी ? – तो अब जाऊँ ? –
भीतर से जमना का कोई उत्तर नहीं मिला। वहाँ वह कपड़ों में मुँह छिपाकर सिसक सिसककर रो रही थी ।
क्रमश:
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