चैप्टर 8 हृदयहारिणी किशोरी लाल गोस्वामी का उपन्यास | Chapter 8 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas

चैप्टर 8 हृदयहारिणी किशोरी लाल गोस्वामी का उपन्यास | Chapter 8 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas

Chapter 8 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas

Chapter 8 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas

आठवां परिच्छेद : आशा आभास

“रत्नं समागच्छति काञ्चनेन।”

समय सदा बदलता रहता है और उसकी अदला बदली के साथ ही साथ लोगों के दुःख और सुख भी अदल बदल हुआ करते हैं। चाहे काल कहो, या बेला, अथवा समय; किन्तु हैं ये तीनों एक ही। आज कमलादेवी को सतीलोक सिधारे छः महीने के लग भग बीत गए, इतने ही दिनों में बीरेन्द्र के कारण कुसुम का मातृशोक भी बहुत कुछ जाता रहा और बराबर बीरेन्द्र के पास रहने से उसके चित्त ने बहुत कुछ धीरज पाया। यद्यपि अभी तक बीरेन्द्र उसे अपने घर न लेजाकर मुर्शिदाबाद ही में छिपाकर रक्खे हुए थे कि जहांका पता नव्वाब तो क्या, उसकी रूह को भी लगना कठिन था; अर्थात यों कहना चाहिए कि बीरेन्द ने कुसुम को बहुत ही गुप्त रीति से अजीमगंज में लाकर एक बाग के अदर एक बड़े आलीशान मकान में रक्खा था और पहरे चौकी तथा दास दासियों का पूरा पूरा प्रबंध भी कर लिया था; इसलिये कभी कभी बीरेन्द्र कुसुम से दस पांच दिन के लिये अलग होकर अपने घर भी चले जाया करते थे, पर जै दिन कुसुम के साथ वे नहीं रहते, वह बड़ी कठिनाई से उतने दिनों को बिताती थी।

यद्यपि अब कुसुम को किसी बात का कष्ट न था, पर इस चिन्ता ने उसे बहुत ही ब्याकुल कर रक्खा था कि,-‘देखें, ये मुझे अपनाते हैं या नहीं; ‘क्यों कि बीरेन्द इस ढंग की कोई बात अब कुसुम से नहीं करते थे कि जिससे वह यह बात जान सकती कि,- ‘हां, ये मुझे अवश्य अपनावेंगे।’

इसका मुख्य कारण यही था कि कुसुम को माता के शोक में डूबी हुई जानकर बीरेन्द्र ने प्रेम के ढंग की बातें करनी उससे छोड़ दी थीं, जैसा कि वह पहिले, करते थे; यही कारण था कि कुसुम ने उनके मन के भेद को न जानकर अपना मन माना अर्थ लगा लिया और मन ही मन वह यों सोचने लगी कि,-‘क्या कारण है कि ये जैसी प्रेम की बातें मुझसे पहिले किया करते थे, वैसी अब नहीं करते तो क्या अब ये मुझे अपने चरणों में स्थान न देंगे!!!”

किन्तु, यहां पर कुसुम ने बड़ी भूल की और उसके मन ने उसे भरपूर धोखा दिया; क्योंकि उसके अलावे बीरेन्द्र के लिये सुख की कोई और बस्तु संसार में थी ही नहीं।

अहा! प्रेम! तू धन्य है!!! तुझे यदि संसार, जीवन, हृदय और समाज का सार कहें तो अनुचित न होगा।

महर्षियों ने, जो प्रेम को परम धर्म और परमेश्वर का हृदय कहा है, सो बहुत ही ठीक कहा है। यह ऐसा ही है, इसकी उपमा यही है। जो लोग प्रेम के साथ-शुद्ध अशुद्ध, कृत्रिम, वास्तविक,वैध, अवैध आदि विशेषणों का प्रयोग करते हैं, वे बहुत ही भूलते हैं; क्यों कि प्रेम निर्विशेषण है, वह अपना विशेषण आप ही है। प्रेम, जबकि जगदीश्वर का हदय है तो वह कदापि अशुद्ध, कृत्रिम, अवैध आदि नीच विशेषणों का विशेष्य हो ही नहीं सकता, क्यों कि विशेषणवान् प्रेम, ‘प्रेम’ कहला ही नहीं सकता। यह प्रेम तो केवल लोकाचार वा पाशवाचारमात्र है; और जो प्रेम है, उससे संसार वा समाज का मंगल छोड़ कर अमंगल कभी नहीं होता, और जिससे अनिष्ट छोड़कर इष्टसिद्धि कभी नहीं होती, वह कदापि प्रेम कहला ही नहीं सकता। अतएव, हे प्रेम! और हे प्रेमदेव!! हम तुम्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं और तुमसे यही भिक्षा मांगते हैं कि तुम हमारे हदय की प्रलय के अन्त में भी त्याग मत करना।

इस प्रेम की लीलाओं का अंत नहीं, वैसे ही इसका आदि और मध्य भी नहीं है। यह कब, कहां, क्या और कैसी कैसी लीलाएं करने लगता है, इसका भेद पाना बिना उसीकी कृपा के कठिन ही नहीं, बरन असम्भव भी है। देखिए, इस समय वह खिलाड़ी प्रेम कुसुम को कैसे कैसे खेल खिला रहा है!!! कभी कुसुम बीरेन्द्र पर भरोसा करके उन्हें अपना सर्वस्व जानकर मारे खुशी के फूली अंगों नहीं समाती है और कभी वह निराशा से बिकल होकर चारों ओर अंधकार ही अन्धकार देखती और आप ही आप अपने मन का खन कर डालती है!

एक दिन ठीक दोपहर के समय कुसुम अकेली बाग में एक लताकुंज के अंदर संगमर्मर की चौकी पर बैठी हुई फलों का गजरा बना रही थी। थोड़ी देर तक तो वह चुपचाप फूल गूंथती रही फिर एकाएक उसने एक ठंडी सांस खैंची और आपही आप यों कहना आरंभ किया,-

“हा, परमेश्वर! इस आशा-निराशा ने तो मेरे कलेजे को बेतरह मथ डाला! कुछ समझ नहीं पड़ता कि अंत में क्या होना है!!! इस अमाने मन को मैं कितना समझाती हूँ, पर यह निगोड़ा इसकदर मचला हुआ है कि मेरी एक नहीं सुनता। भला, कहां मैं और कहां वे! मुझमें और उनमें आकाश पाताल का अंतर है, ऐसी अवस्था में मेरी आशा क्या पागलपन से खाली कही जा सकती है? और फिर मेरे ऐसे पाटी से भाग कहां हैं!!! खैर, न सही, पर यह तो मेरे बस कीही बात है कि,- ‘मैं सदा कुमारी रहकर अपने जिंदगी के दिन बिता दूं;’ क्योंकि छिन भर के सुख-नहीं नहीं, घोर पाप-के लिये इस शरीरको नरक में डालना, मुझसे कभी न होगा। हाय! कुछ नहीं समझ पड़ता कि उनके मन में क्या है! क्यों कि जैसा वे पहिले मुझपर अपनो प्रेम प्रगट करते थे, मां के मरते ही मानों उनके मन का भाव कुछ बदला हुआ सा मालूम देता है। यद्यपि वे मुझे प्रसन्न रखने के लिये लाख तरह के उपाय करते रहते हैं, पर फिर भी मैं उस पहिले के ऐसे प्रेम की झलक उनमें नही पाती। भगवान जाने, उनके मन में क्या है!!! हाय! कैसी दुराशा है! वामन होकर चांद के पकड़ने के लिये हाथ उठाना, इसीको कहते हैं। सैकड़ों बार मैंने यह चाहा कि उनसे एक दिन साफ़ साफ़ पूछं कि,-‘ आपके मन में क्या है?’ पर जव चार आँखें होती हैं, तो मारे लज्जा के गला रुंध जाता है और कुछ कहते सुनते नहीं बनता। अच्छा, न सही, तो जब कि वे मेरे मन को छीन कर अब उसका बदला चुकाने के समय यों आना-कानी कर रहे हैं तो फिर मैं अब उनके गले का हार बन कर क्यों व्यर्थ यहां पड़ी रहूँ और क्यों न यहांसे झटपट अपना मुंह काला करूं!!!”

इतनेही में पीछे से आकर किसीने उसकी आंखे बंद करली और बहुतही धीरे से कहा,-

“बूझो तो कौन हैं?”

इतनी देर तक कुसुम दुचित्ती होकर आपही आप अपना मन-माना राग अलाप रही थी, पर ज्योंही उसकी आंखें किसीने मीच ली, त्योंही वह चिहुंक उठी और मुस्कुरा कर बोली,-

“सिवा उस महानुभाव महात्मा के और कौन होगा, जिस देवता ने मेरी बड़े गाढे़ समय में सब भांति से वैसी रक्षा की है, जैसी कोई अपने सगे संबंधी की भी न कर सकेगा।”

जिन्होंने कुसुम को आंखें मूंद ली थीं, वे महात्मा बीरेन्द्र थे, सो कसुम के उस ढंग के उत्तर को सुन कर वे उसके सामने आए और संगमर्मर को दूसरी चौकी पर बैठकर बोले-

“क्यों, कसुम। क्या मेरा मुंह ऐसेही जवाब के लायक था, जैसा कि तुमने दिया! यदि मैं यह जानता होता कि अब तुम्हारा चित्त मुझसे उचट कर कहीं और ही ठौर गया हुआ है तो मैं कभी तुम्हारी आंखें न मींचता।

बीरेन्द्र की बातों से कुसुम के मुखड़े पर गहरी लाली छा गई, उसने लजा से सिमट कर अपनी आंखें नीची करली और कुछ कहा सुना नहीं। बीरेन्द्र ने फिर कहा,-

“क्या, अब मेरी बातों के जवाब देने में भी तुम्हें रुकावट है?”

कुसुम ने सिर झुकाए हुए कहा,-“आप यह क्या कह रहे हैं?”

बीरेन्द्र ने कहा,-“जी, मैं यह कह रहा हूं कि आप यहां पर बैठी हुई अभी आप ही आप क्या क्या कह रही थी?”

कुसुम,-“हाय! मुझे आप’आप’ क्यों कहते हैं?

बीरेन्द्र ने कहा,-” जी यह आपके ‘आप’ का जवाब है!”

कुसुम,-“भला, आपकी और मेरी क्या बराबरी है? कहां आप और कहां मैं!”

बीरेन्द्र,-“ठीक है,अब मैंने आपके चित्त के भाव को समझा इसी लिये तो अभी आप, आप ही आप न जाने क्या क्या अनाप शनाप बक रही थीं। आप यह न जाने कि,-‘मुझे किसी बात की कुछ खबर ही नहीं है। मैंने वे सारी बातें अभी अपने कानों से सुनी हैं, जो आप; आप ही आप कह रही थीं; इसलिये मैं यह जानना चाहता हूं कि वह कौनसा बढ़भागी पुरुष है, जिसने बरजोरी आपके मन को छीन कर आपके सुकुमार हृदय पर इतनी गहरी चोट पहुंचाई है? यदि आप मुझे अपना कुछ भी हितू समझती हों तो लाज संकोच छोड कर उस भाग्यवान का पता जल्द बतलाइए तो मैं अभी उसे, चाहे वह जहां पर हो, ढूंढ निकालूं और आपको उसके हाथ सौप कर सदा के लिये सुचित्त हो जाऊं और जगदीश्वर को कोटि कोटि प्रणाम इसलिये करूं कि उस दयामय पर- मात्मा ने सचमुच मुझ अधम के हाथ से एक अनाथिनी बालिका का उद्धार कराया।”

कहते कहते बीरेन्द्र की आंखें भर आईं, पर उधर कुसुम का तो बहुत ही बुरा हाल था; अर्थात बीरेन्द्र के मुख से निकलते हुए एक एक शब्द उस विचारी (कुसुम) के हदय के साथ वह काम कर रहे थे, जो नमक जख्म के साथ करता है। बीरेन्द्र की बातों से कुसुम ने समझ लिया कि,-‘ इन्होंने छिप कर मेरी सारी बातें सुनली;’ इस लिये वह बहुत ही लज्जित हुई, पर जब बीरेन्द्र उसके कलेजे में छुरी चुभोने लगे तो वह उन मर्मभेदी शब्दों से इतनी घायल हुई कि उसके कलेजे का खून पानी होकर उसकी आंखों से बहने लगा। उसकी यह दशा देख बीरेन्द्र से न रहा गया और चट उन्होंने उसका आंसू पोंछ दिया और यों कहा,-

“कुसुम! आज तुम्हें क्या हो गया है, जो आप भी इतनी दुखी होती हो और दूसरे को भी कष्ट पहुंचाती हो।”

आखिर, बिचारी से न रहा गया और उसने बीरेन्द्र की ओर तिरछौहें देख कर कहा,-“तुम्हें इस समय यहां किसने बुलाया है?”

बीरेन्द्र ने मुस्कुराकर कहा,-” यह बात तो तुम्हें अपने मन से ही पूछनी चाहिए। मैं तो केवल इतना ही जानताया कह सकता हूं कि जहां पर कुसुम खिल रहा हो, वहां पर रस का लोभी भौंरा न पहुंचे, यह कभी हो ही नहीं सकता।”

कुसुम ने सिर झुकाए हुए मुस्कुराकर कहा,-” पर उस हरजाई भौरे को इस बात पर जरा भी हया नहीं आती, कि वह कली कली का रस लेता फिरता है और चंपा की ओर तो भूलकर भी नहीं देखता।”

बीरेन्द्र ने मुस्कुराकर कहा,-” इसमें भौंरे का कुछ दोष नहीं है और यदि कुछ है तो वह बिल्कुल कुसुम ही का; क्योंकि उस बिचारे ने जब कि अपनी सारी हया कुसुम के हवाले कर दी तो फिर अब बेहए भौंरे का दोष है या हयादार कुसुम का!!! और फिर चंपा को भौंरे ने छोड़ रक्खा है, या उसे चंपा ने?”

यह एक ऐसी बात थी कि जिसे कुसुम अपने जी को हज़ार रोकने पर भी न रोक सकी और खिलखिला पड़ी; और उसके निराश चित्त में एकाएक आशा की नई लता लहलहा उठी। बीरेन्द्र के चित्त के भाव को न समझ कर, जो उसने इतनी ठोकरें खाई थीं; इसके लिये उसने मन ही मन अपनी हार स्वीकार की और सचमुच हाथ बढ़ाते ही उसने चांद को पा लिया! फिर उम्मने बात उड़ाने के मिस से कहा,-

“हां, तुम कल रंगपुर जाने की बात जो कहते थे, सो कब जाओगे?”

बीरेन्द्र ने इस प्रश्न के ढंग को समझ कर परिहास से कहा,-

“क्या, अब तुम्हें मेरा यहांका रहना भी नहीं सुहाता!”

इतना सुनते हो कुसुम झल्ला उठी और बोली,-” हाय,राम! तुम तो अब इस कदर मेरी बातों को छीलने लग गए हो कि मुझे बोलना भी कठिन होगया है।”

बीरेन्द्र ने कहा-” अच्छा, तो बहुत दिनों तक तुम्हें यह कठिनाई न झेलनी पड़ेगी। सुनो, कुसुम! मैं रंगपुर जिस काम के लिये जाया चाहता हूं, उसमें पहिले तुमसे सम्मति ले लेना बहुत आवश्यक है। देखो, तुम एक बड़े प्रभावशाली महाराज को कन्या हो। यद्यपि दुर्दिन ने तुम्हारे या तुम्हारे कुटुम्ब के साथ घोर अत्याचार करने में कोई बात उठा नहीं रक्खी, किन्तु फिर भी, जबकि तुम्हारी माता तुम्हारा भार मुझे देनाई हैं, तो, मुझे यह उचित है कि,-“जैसे होसके, तुम्हें किसी राजा की रानी बनाऊं और तब जानूं कि,-“आज मैंने अपने एक प्रधान कर्त्तव्य का पालन भली भांति किया।’ मेरी इच्छा है कि तुम्हारा विवाह रंगपुर के राजकुमार (अब महाराज) के साथ कर दूं, क्योंकि वे सब भांति से तुम्हारे योग्य है। वहां तुम बड़े सुख से रहोगी और तुम्हें सुखी देखकर मेरा हिया भी ठंढा होगा; और सबसे बढ़ कर सुख की वान नो तुम्हारे लिये यह होगी कि नरेन्द्रसिंह अभी तक क्वारे हैं और शायद तुम्हारे ऐसी स्वर्गीय देवी को पाकर वे फिर दूसरा विवाह करने की जन्मभर इच्छा ही न करें।”

बीरेन्द्र की इन बातों ने कुसुम की लहलही आशालता पर मानो बन घडग दिया। अब तक वह विचारी जिस बात के लिये कभी आशा करती थी और कभी निराशा; उस संशयात्मक आशा को बीरेन्द्र की बातों ने मानों बिल्कुल मिटा ही दिया। अब बतलाइए, पाठक! अनाधिनी कुसुम क्या करे? जो कुसुम बीरेन्द्र के अलावे और किसीको चाहती ही नहीं और जो वीरेन्द्र के न मिलने से अपनी जिन्दगी को जन्मभर कुमारी ही रह कर बिता देने के लिये मुम्नैद है; भला, बीरेन्द्र की बातों से उसकी क्या दशा हुई होगी! अस्तु, सुनिए,-उसने बीरेन्द्र की बातों से लाल पीली हो, क्रोध से भभक और त्योरी चढ़ाकर कहा,-

“भौरे की बेहयाई की बात, जो तुमने अभी कही थी, वह अब मुझे सची जान पड़ी। सनो जी! मरती बेला मां मेरा हाथ तुम्हें पकड़ा गई हैं, इसलिये अब तुम्हें इस बात का पूरा अधिकार है कि जिसे तुम चाहो, मुझे दे डालो; पर याद रक्खो, मेरे इस शरीर के डालने का अधिकार तुम्हें अवश्य है, कुछ मुझे जीती रखने का नहीं; क्यों कि इस बात को तुम निश्चय जानो कि यदि तुमने मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरे विवाह के लिये उद्योग किया तो उसके पहिले ही मैं अपनी जान दे डालूंगी, या तुम्हारे घर से कहीं अपना काला मंह कर जाऊंगी; क्यों कि मेरी यह दृढ इच्छा है कि मैं बिवाह न करके सदा कुमारी ही रहकर अपनी जिंदगी बिता दूं।”

कहते कहते कुसुम की आंखों से चिनगारी झड़ने लगी और मारे क्रोध के वह थर थर कांपने लगी। उसकी इस अवस्था के मर्म को भली भांति समझ और मुस्कुरा कर बीरेन्द्र ने कहा,-

“सदा कुमारी रहने की बात तो तुम बिल्कुल झूठ कह रही हो। अभी जब कि तुम आप न जाने अपने किस चितचोर को आप ही आप उलाहना दे रही थी, तो मैंने तुम्हारी वे सब बातें ध्यान देकर सुनी थीं; इसलिये यदि तुम्हें महाराज नरेन्द्रसिंह की पटरानी बनना स्वीकार नहीं है तो तुम अपने उसी चितचोर का पता मुझे क्यों नहीं बतलातीं कि मैं उसे खोज निकालूं और तुम्हें उसके हवाले कर, सुखी होऊ!”

बीरेन्द्र की बातों से कुसुम ने उन्हें झिड़ककर कहा,-“देखो जी, जो तुम यों मुझे छेड़ा करोगे तो मैं अपना सिर पीट डालूंगी!”

बीरेन्द्र ने कहा,-” अच्छा, यदि कुछ अपराध मुझसे हुआ हो तो, उसे क्षमा करो!”

“तुम यों न मानोगे-” यों कहकर कुसुम ने अपना गूंथा हुआ एक गजरा बीरेन्द्र के गले में डाल, हाथ जोड़कर कहा,-

बीरेन्द्र! तुम देवता हो! मैं बहुत दिनों से यह चाहती थी कि तुम्हारी कुछ पूजा करूं, पर मुझ कंगली के पास धरा क्या है, जिसे तुम्हें भेंट करती! इसलिये प्यारे, बीरेन्द्र! तुमने मुझ अनाथिनी को एक दिन श्रीठाकुरजी की पूजा के लिए, कई बर्ष हुए याद तो है न-पांच मालाओं के पांच रुपये दिए थे और फिर तभी से तुमने मुझ अनाथिनी के नाथ होकर, जैसी चाहिए, मेरी हर-तरह से भलाई की थी। तुम मेरी माला को बड़े चाव से लेते थे इसलिये आज मैंने रच-पच-कर यह माला तुम्हारे ही लिये बनाई और तुम्हारे गले में डालकर अपना जन्म सफल किया। प्यारे, बीरेन्द्र! बस, इस माला का उचित मूल्य तुम मुझे दे दो, जिसे पाकर मैं सदा के लिए यहांसे बिदा होऊं!”

कहते कहते कुसुम की आंखों से मोतियों की सी लड़ी झरने लगी, जिसे बीरेन्द्र ने अपने पटुके के छोर से रोक लिया और हंस कर कहा,-“अरे, कुसुम! यह क्या किया तुमने? यह तो तुमने मुझे ‘बरमाल’ पहिना दी!!!”

कुसुम ने उस श्लेष का उत्तर उसी प्रकार दिया, कहा,-“हां, बर (अच्छी) माल जानकर ही तुम्हें मैंने भक्तिपूर्वक अर्पण की है! क्या इसका उचित मूल्य देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है!”

इतना कहते कहते उसने तिरछौहें नैनों से बीरेन्द्र की ओर देखा! अब बीरेन्द्र अपने तई न सम्हाल सके और मारे आनन्द के इतने विह्वल हो गए कि उन्होंने झपटकर कसम को अपने से लगा लिया और कहा,-” प्यारी, कुसुम! जैसे सर्वस्व दान देकर बलि ने भगवान् श्रीबामनजी को सदा के लिये अपना रिनियां बना लिया था, वैसे ही तुमने भी आज अपना सर्वस्व देकर मुझे सदैव के लिये अपना बिना दाम का —“

इसके बाद बीरेन्द्र जो ‘शब्द’कहा चाहते थे, कुसुम ने उनका मुंह बंदकर उस शब्द का कहना रोक दिया।

बीरेन्द्र ने फिर कहा,-“प्यारी, कुसुम! सच्ची बात तो यह है कि अब तक मैं तुम्हें नाहक भूलभुलैयां में डालकर रुला रहा था; इसलिए कि तुम्हारे इस भाव को देख-देख-कर मुझे अपार आनन्द होता था; नहीं तो जिस दिन पहिले पहिल मैंने तुम्हें माला बेंचती हुई बाजार में देखा था, उसी दिन मैंने अपना मन बिना कुछ सोचे बिचारे ही-तुम पर निछावर कर दिया था; और क्यों, कुसुम! तुमने रंगपुर के महाराज से विवाह न कर मुझ सरीखे एक अदने सिपाही को क्यों पसंद किया, जो कि किसी भांति भी कृष्णनगरकी राजकन्या के योग्य बर नहीं होसकता?”

कुसुम ने प्रेम से गद्गद होकर कहा,-“प्राणनाथ! भला, जिन बातों से मेरे कलेजे में ठेस लगती हो, उन्हें बारम्बार दोहरा-तेहरा-कर कहने में तुम्हें कौनसा सुख मिलता है! तुम सच जानो, मैं धर्म की साक्षी देकर कहती हूँ कि मैं तुम्हारी पत्नी बन, तुम्हारे साथ बियाबान जंगल में जाकर कुटी में रहना बहुत अच्छा समझती हूं, पर किसी दूसरे कीरानी होकर राजप्रासाद में रहना नहीं चाहती।”

बीरेन्द्र ने कहा,-” प्रियतमे! आज मुझ सा भाग्यवान पुरुष कदाचित त्रैलोक्य में कोई भी न होगा!”

कुसुम,- “नहीं नहीं, यों नहीं, बरन यों कहना चाहिए कि आज मुझ सी बढ़भागिन स्त्री विधाता की सृष्टि में दूसरी न होगी!”

बीरेन्द्र,-“अच्छा, सुनो, मेरी इच्छा है कि मैं तुम्हें अब रंगपुर ले चलूं, क्योंकि मैं वहां के महाराज नरेन्द्रसिंह का सेनापति हूं, इसलिये बहुत दिनों तक राज्य से बाहर ही बाहर मैं नहीं रह सकता।”

कुसुम,-“तो मैंने कब नाहीं किया है? तुम्हारी जो इच्छा हो सो करो, या मुझे जहां चाहो, ले चलो।”

इतने ही में वहां चम्पा पहुंच गई, इसलिये उन दोनों प्रेमियों को साथ छोड़ना पड़ा ।

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