चैप्टर 7 : कुएँ का राज़ ~ इब्ने सफ़ी का नावेल हिंदी में | Chapter 7 Kuen Ka Raaz Ibne Safi Novel In Hindi

Chapter 7 Kuen Ka Raaz Novel In Hindi

Chapter 7 Kuen Ka Raaz Novel In Hindi

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खून की बौछार

सेक्रेटरी की मौत की वजह से सारी कोठी पर एक अजीब किस्म का माहौल पैदा हो गया था. लोग इस तरह से चल-फिर रहे थे, जैसे उन्हें किसी के जाग उठने का डर हो. अलबत्ता कभी-कभी परवेज़ के बचकाने कहकहे उस ख़ामोशी को तोड़ देते थे.

नवाब साहब दिन भर लाइब्रेरी की किताबें उलटते-पलटते रहे, लेकिन गुमशुदा किताब न मिली. फ़रीदी की दलील की बिना पर वह मान गये थे कि सेक्रेटरी को ज़हर देकर मार डाला गया है, लेकिन शैतानी मामले वाला ख़याल उनके ज़ेहन में ठहरा हुआ था. वे सोच रहे थे कि शायद भूतों की आड़ लेकर कोई सेक्रेटरी पर हाथ साफ़ कर गया. उसकी मौत की वजह से उन्हें परेशानी ज़रूर थी. एक तो यह कि वह उनके घर का पालक था और परेशानी की दूसरी वजह यह थी कि पुलिस वाले अब आये दिन बेकार में आकर उनका दिमाग चाटेंगे.

लाइब्रेरी से वापस आने के बाद फ़रीदी और हमीद ने अपने-अपने कमरों में जाकर कपडे बदले. ग़ज़ाला ने हर बार फ़रीदी से आराम करने को कह, लेकिन उसने टाल दिया और उसके साथ पुरानी इमारत के खंडहरों को देखने के लिए चला गया. हमीद भी उसके साथ थे. डेढ़ घंटे दोनों वहाँ रहे, लेकिन कोई ख़ास बात मालूम न हो सकी. वहाँ से लौट कर वे आग उगलने वाले कुएँ की तरफ़ आये. फ़रीदी बड़ी देर तक आँखें फाड़-फाड़कर कुएँ की गहराई  देखता रहा, लेकिन दिन के वक़्त भी उसमें इतना अंधेरा था कि उसकी तह नहीं दिखायी दे रही थी.

“क्यों भई हमीद, क्या ख़याल है.” फ़रीदी हमीद की तरफ़ मुड़ कर बोला, “इसमें पानी तो नहीं मालूम होता.”

“मैं भी यही सोच रहा था.”

“जी हाँ, इसमें पानी नहीं.” ग़ज़ाला बोली.

“और उसके अंदर छाये हुये अंधेरे से पता चलता है कि यह बहुत गहरा  है.” 

“उसकी गहराई का अंदाज़ा आज तक नहीं लगाया जा सका.” ग़ज़ाला बोली, “लेकिन मैंने….”

“हाँ कहिए, रुक क्यों गयी….” फ़रीदी ने कहा.

“कुछ नहीं…”

“लेकिन आपने किसी को उसमें उतरते देखा है.”

“आपको कैसे मालूम हुआ?” ग़ज़ाला डरी हुई आवाज़ में बोली.

“आपके जुमले के अंदाज़ और आपकी घबराहट से मैंने अंदाज़ा लगाया कि अपने किसी को उतरते देखा है. लेकिन किसी वजह से बताना नहीं चाहती.”

“आप ठीक समझे, मुझे ख़ुद अपनी इस कमज़ोरी पर बार-बार गुस्सा आता है, लेकिन क्या करूं.”

“तो आप किसी वजह से डरती है.”

“और वग एअजः मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम.”

“अजीब बात अहि.”

“मुझे दरअसल उकी आँखों से खौफ़ मालूम होता है…क्यों? यह मैं नहीं बता सकती.”

“ओह तो शायद आपका इशारा तारिक़ की तरफ़ है.”

“तो क्या आपको भी उसकी आँखे खौफ़नाक मालूम होती है.”

“बिल्कुल नहीं…मैं जानता हूँ कि वह नशे के तौर पर साँप का ज़हर इस्तेमाल करता है.”

“नशे के तौर पर साँप का ज़हर….” ग़ज़ाला हैरत से बोली.

“हाँ-हाँ…” यह कोई ताज्ज़ुब की बात नहीं. चीनियों में इसका आम रिवाज़ है.”

“तो क्या इसी वजह से उसकी आँखें इतनी खौफ़नाक है?”

“जी हाँ….” फ़रीदी ने बात का रुख बदलते हुए कहा, “हाँ, तो आपने उसे कब इस कुएँ में उतरते देखा था.”

ग़ज़ाला ने उस रात की सारी कहानी फ़रीदी को बता द्दी.

“आइये, वापस चलें.” फ़रीदी ने लौटने के लिए मुड़ते हुए कहा. उसकी आँखे फिर गहरी सोच का पता दे रही थी. अभी वे कुछ कदम गये होंगे कि परवेज़ उछलता-कूदता हुआ आ गया. उसने हाथ में दूध पीने की शीशी थी और दूसरे में लकड़ी की एक बंदूक.”

फ़रीदी को देखकर दूध की शीशी उसने ज़मीन पर फेंक दी और बंदूक तानकर खड़ा हो गया.

“बताओ, तुमने मेला तोता क्या किया…मेला तोता मंगवा दो, नहीं तो गोली…माल दूंगा.”

“ओह चाचा जान, ख़ुदा के लिए आप अपने कमरे से बाहर न निकला कीजिए.” ग़ज़ाला शर्माते हुए बोली.

“तू क्यों बोलती है.”

ग़ज़ाला ख़ामोश हो गयी.

परवेज़ अभी तक फ़रीदी के सामने अपनी लकड़ी की बंदूकताने खड़ा था. हमीद हँसी के मारे बेहाल हो रहा था. लेकिन फ़रीदी बिल्कुल संजीदा था.

“ओह, मुझे अफ़सोस है.” फ़रीदी ने संजीदगी से कहा, “लेकिन मैं आपको दूसरा मंगवा दूंगा.”

“अच्छा, लेकिन वैसा ही हो.” परवेज़ बंदूक नीची करते हुए बोला.

“ठीक है…”

“नहीं, वैसा नहीं, हम लाल तोता लेंगे.”

“जैस आप कहेंगे, वैसा ही मंगवा दिया जायेगा.”

“अच्छा, अब अंदर चलिए….” ग़ज़ाला परवेज़ का हाथ पकड़ कर उसे उसके कमरे की तरफ़ ले जाते हुए बोली.

फ़रीदी और हमीद अपने-अपने कमरों की तरफ़ आये, रास्ते में तारिक़ मिला.

“कहिये इंस्पेक्टर साहब…कोई ख़ास बात.” तारिक़ बोला.

“अभी तक तो ख़ास बात नहीं हुई, लेकिन जल्द ही कोई ख़ास बात रोशनी में आने वाली है.”

“मैं पाक मतलब नहीं समझा.”

“उस कुएँ के बारे में आपका क्या ख़याल है.” फ़रीदी ने उसकी बात उड़ाते हुए अचानक पूछा.

“कुआँ…!” तारीक़ चौंक कर बोला. लेकिन फिर संभलकर कहने लगा, “यकीनन वह एक बहुत पुराना कुआँ है.”

“मेरा खयाल है कि इस कुएँ में कोई ख़ज़ाना है.” फ़रीदी आँख मार कर धीरे से बोला.

“हो सकता है.” तारिक़ लापरवाही से बोला.

“मगर उसमें उतरना यकीनन ख़तरे से ख़ाली नहीं.” फ़रीदी ने कहा.

तारिक़ उसे घूर रहा था, अचानक उसकी आँखों में अजीब किस्म की चमक पैदा हो गयी.

“ओह, तो आप उसमें उतरने का इरादा रखते हैं. मैं आपको कभी उसकी राय नहीं दूंगा.”

“क्यों…?” फ़रीदी ने पूछा.

“इसलिए कि ख़ुद मई एक बार ऐसी बेवकूफ़ी कर चुका हूँ.” तारिक़ ने कहा और अपने नेवले की पीठ पर हाथ फेरने लगा.

“आप तो कहते थे कि यह शैतानी मामला है. फिर आपके दिल में कुएँ में उतरने का ख़याल कैसे आया?”

“यूं ही सिर्फ़ अपने तज़ुर्बे में इज़ाफा करने के लिए….”

“खैर! हाँ, तो फिर….!”

“मैं ज्यादा दूर नहीं जा सका.”

“क्यों…”

“उसमें अनगिनत साँप रहते हैं.”

“खैर, यह कोई ग़ैरमामूली बात नहीं.”

“और अजीब बात यह है कि उनके छेद कुएँ की दीवारों में हैं.”

“ओह, तब तो छेद में पैर रख कर आसानी से तह तक पहुँचा जा सकता है.” फ़रीदी ने कहा.

तारिक़ इस तरह मुस्कुराया जैसे कोई बूढ़ा आदमी किसी बच्चे की बेतुकी बात पर मुस्कुराता है.

“मैंने आपकी दिलेरी की काफ़ी तारीफ़ सुनी है.” तारिक़ ने कहा, “लेकिन यह चीज़ इतनी आसान नहीं.”

“मैं तो आपको कभी उस कुएँ में उतरने न दूंगा.” हमीद बोला.

“आखिर तुम मुझे इतना बेवकूफ़ क्यों समझते हो?” फ़रीदी हमीद की तरफ़ मुड़कर बोला.

“यही तो मैंने कहा आप जैसा समझदार ऐसी बेवकूफ़ी कैसे कर सकता है?” तारिक़ ने कहा.

“खैर, देखा जायेगा.” फ़रीदी ने कहा और आगे बढ़ गया.

फ़रीदी कमरे के दरवाज़े पर रूककर सिगार सुलगाने लगा. हमीद अंदर दाखिल हो चुका था.

तभी फ़रीदी की हमीद की चीख सुनाई दी और वह फ़ौरन कमरे में पहुँचा. अंदर पहुँच कर फ़रीदी ने देखा कि हमीद सिर से पैर तक खून में नहाया हुआ था.

“अरे, ययः क्या….?” फ़रीदी के मुँह से अचानक निकला.

हमीद ख़ामोश था. ऐसा मालूम हो रहा था, जैसे वह बुत बन गया हो. अचानक चीख मारकर वह कमरे से बाहर भागा. फ़रीदी भी उसके पीछे भाग रहा था. कोठी के सारे लोग हमीद और फ़रीदी को इस हाल में देख कर चीखने लगे. फ़रीदी ने हमीद को गेट के क़रीब पकड़ा.

“आखिर क्या बात है, कुछ बताओ तो सही.” फ़रीदी ने कहा.

“मैं एक मिनट के लिए…भी…यहाँ नहीं ठहर सकता.” हमीद ने कांपते हुए खा.

“आखिर क्यों…?”

“देखिए…यह खून…की….बौछार…!”

“तुम्हारे चोट तो नहीं आयी?”

हमीद ने जिसकी साँस फूल रही थी ‘नहीं’ में सिर हिला दिया.

“फिर क्या हुआ?”

“मैं जैसे…ही कमरे में…दाखिल हुआ…मेरे सिर पर खून की तेज बौछार.”

“अबे वाह रे गधे, तो इस तरह भागने की क्या ज़रूरत थी.” फ़रीदी ने उसके कंधे पर हाथ मारते हुए कहा.

“जनाबे आला, मैं डरपोक ही सही.” हमीद बोला, “लेकिन एक जासूस के लिए ज़रूरी नहीं कि वह भूतों से कुश्ती लड़े.”

“बेवकूफ़ हो अच्छे-ख़ासे.” फ़रीदी ने कोठी की तरफ़ भागते हुए कहा.

रास्ते में ग़ज़ाला मिली…उसने भाग-दौड़ की वजह पूछनी शुरू की.

“ऊपर जाने का रास्ता…जल्दी कीजिए.”

उसने सीढ़ी की तरफ़ इशारा किया और फ़रीदी दौड़ता हुआ सीढ़ी चढ़ने लगा. ग़ज़ाला भी उसके पीछे साथ दौड़ने लगी.

“ज़रा जल्दी कीजिए…मेरे कमरे की छत…”

“इधर आइये…” ग़ज़ाला हाँफती हुई बोली, “वह उधर….इस दीवार के क़रीब से शुरू होती है.”

फ़रीदी घुटनों के बल बैठ कर छत का जायज़ा लेने लगा. कुछ दूर हटकर शीशे की रौशनदान के क़रीब उसे खून के छींटे दिखायी दिये.

फ़रीदी बेताबी से खड़ा हाथ मल रहां था.

“आखिर बताइए भी तो क्या बात है?” ग़ज़ाला बेचैनी के साथ बोली.

“फ़रीदी ने थोड़े-से शब्दों में उसे सारा वाक़या बताया.

“अफ़सोस कि हमीद की बेवकूफ़ी से वह भूत निकल गया…वरना…”

“क्या मतलब?”

“ज़रा ये खून के छींटे देखिए.” फ़रीदी ने रोशनदान की तरफ़ इशारा करते हुये कहा, “उस शीशे को उठाकर पिचकारी से खून फेंक देना कौन सी बड़ी बात है.”

“ओह…” ग़ज़ाला उसे हैरत से देखते हुए बोली, “शुरू ही से मैं इन सब हरक़तों को किसी आदमी की हरक़त समझ रही हूँ.”

“और वह आदमी….” फ़रीदी ने पूछा.

“मैं अपने शक का इज़हार पहले ही कर चुकी हूँ.”

फ़रीदी सोच में डूब गया.

“खैर, देखा जाएगा.”

दोनों नीचे उतर आये. हमीद अभी तक उसी हालत में लोगों की भीड़ में घिरा हुआ खड़ा था.

“जाओ जाकर बाथरूम में कपड़े बदलो.” फ़रीदी ने गुस्से में कहा.

हमीद ने कुछ कहना चहा, मगर ख़ामोश हो गया.

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