चैप्टर 68 वैशाली की नगरवधु आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास | Chapter 68 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel
Chapter 68 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel
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राजसूय समारम्भ : वैशाली की नगरवधू
वसन्त ऋतु का प्रारम्भ था । सुन्दर शीतल मृदु सुगन्ध वायु बह रही थी । लता – गुल्म पल्लवित और द्रुम – दल कुसुमित हो रहे थे। श्रावस्ती के राजसूय की बड़ी भारी तैयारियां हो रही थीं । महाराज प्रसेनजित् की साकेत से अवाई हो रही थी । सब मार्ग-वीर्थी पताकाओं , स्वस्तिकों,ध्वजाओं से सजाए गए थे। सब सड़कें छिड़काव से ठंडी की हुई थीं । स्थान-स्थान पर कुसुम – गुच्छों के द्वार – मंडप और तोरण बनाए गए थे। शीतल चन्दन और जलते हुए अगरु की सुगन्ध महक रही थी । जहां -तहां देश -विदेश के सौदागर और धनिक जन राजपथ की शोभा निहारते घूम रहे थे । महाराज प्रसेनजित् उज्ज्वल वेश धारण किए, बारहों मल्ल बन्धुओं से रक्षित हो , एक भीमकाय हाथी पर बैठे हुए, राजमहालय की ओर आ रहे थे । शोभायात्रा में देश-विदेश के राजा , राजप्रतिनिधि , माण्डलिक और गण्यमान्य सेट्टि , ब्राह्मण श्रोत्रिय , परिव्राजक तथा ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ , जटिल सब कोई थे। राजमहालय में पहुंच राजा ने पहले अन्त : पुर में जा परिवार की स्त्रियों से भेंट की । राजमहिषी मल्लिकादेवी ने उनका पूजन किया । फिर उन्होंने खुली राजसभा में देश-विदेश से आए राजवर्गियों का स्वागत – सत्कार किया। उनके द्वारा लाई उपानय – सामग्री को साभार स्वीकार किया . काम्बोज के संघपति ने उत्तरापथ की अलभ्य वस्तुएं उपानय में भेजी थीं , जिनमें नन्दिनगर के बने हुए भेड़ , बिल्ली और मूषक के रोम से बने सुवर्ण-चित्रित मूल्यवान् वस्त्र , अजानीय अश्व , अश्वतरी और ऊंट थे । कुरु , पांचाल संघ राज्य के शासक धनञ्जय और श्रुतसोम तथा गणपति राजा दुर्मुख बहुत – से वायु – तुल्य वेग से चलनेवाले , अच्छी जाति के अश्व और बहुत – से रत्न भेंट में लेकर स्वयं आए थे। अस्सक के राजा ब्रह्मदत्त , कलिंगराज सत्तभू , कम्पिला के राजा भरत , विदेहराज रेणु , कासिराज धत्तरथ भी विविध मूल्यवान् वाहन , आसन, पलंग,पोशाक, बहुमूल्य मणियों और मोतियों से सुशोभित हाथीदांत के बने विचित्र कवच , विविध शस्त्र , सुशिक्षित घोड़ों से जुते हुए तथा सोने के तारों से खचित , व्याघ्रचर्म से मढ़े हुए रथ ,हाथी, कम्बल , रत्न ,नाराच, अर्धनाराच आदि सामग्री लाए थे । रोरुकसौवीर साकल के राजा बहुत – सा सुवर्ण तथा कार्पासिक देश की षोडशी, कुन्तला, अलंकृता सैकड़ों दासियों को भेंट में लाए थे। मद्र देश के राजा स्वर्णघटों में मलयगिरि के सुवासित चन्दन का अर्क और दर्द गिरि का अगरु, चमचमाते मणि – माणिक्य तथा सोने के तारों से बने हुए महीन वस्त्र लाए थे। दक्षिण से भोजराज्य , विदर्भ राज्य , अस्सक और दण्डक राज्यों के प्रतिनिधि बहुत – से तेजस्वी रत्न , चांदी, अलंकार, शस्त्र और वस्त्र लेकर आए थे। विदिशा के नागराज शेष के पुत्र पुरङजय भोगी ने अलभ्य विषहर मणि तथा दो सौ सुन्दरी नागकन्याएं भेजी थीं । हज़ारों गौसेवक , ब्राह्मण, श्रोत्रिय , शूद्र, संकर और व्रात्य महाराज प्रसेनजित् को प्रसन्न करने के लिए विविध उपहार लेकर आए थे। जंगली जाति के सरादार रत्न , मूंगा, स्वर्ण, भेड़, बकरी ऊंट , गाय आदि पशु, फल – फूल , फूलों का मधु आदि सामग्री भेंट में लाए थे ।
ये सब राजा – महाराजा और सरदार – जमींदारी भीड़ के मारे भीतर घुसने का स्थान न पाकर बाहर द्वार पर ही खड़े थे। सैकड़ों ग्रामवासी प्रधान घी से भरे सोने – चांदी के घड़े हाथों में लिए राह न मिलने के कारण बाहर ही खड़े रह गए थे। कुरु के जनों और पहाड़ी राजाओं ने ब्राह्मणों और श्रोत्रियों के काम की बड़ी – बड़ी सुन्दर मृगछालाएं तथा मज़बूत पहाड़ी टटू भेजे थे। कलिंगराज सत्तभू दरवाज़े पर भीड़ देखकर मूल्यवान् रत्नजटित गहने और हाथीदांत की मूठों वाले खड्ग तथा काली गर्दनवाले और सौ कोस तक दौड़नेवाले हज़ार खच्चर भीतर भेजने की व्यवस्था कर अपने देश को लौट गए। उत्तरकुरु के देवदिव्य औषध, अम्लान , पुष्पमाल, कदली और मृगचर्म लेकर आए खड़े थे। क्रूरकर्मा असभ्य किरात , खस और दर्दुर विविध पशु -पक्षियों का शिकार लेकर तथा पांच सौ युवती दासियां लेकर आए थे ।
अनेक राजा लोगों ने द्वार पर जाकर देखा कि दण्डधर दौवारिक लोगों की राह रोककर विनयपूर्वक कह रहे हैं – “ भन्ते , तनिक ठहरिए । यथासमय क्रमशः आप भीतर जा सकेंगे। महाराज आपके उपानय भी ग्रहण करेंगे। मगध के सम्राट् श्रेणिक बिम्बसार ने लम्बे दांतों तथा सुनहरी झूलोंवाले सौ मस्त हाथी और इतने ही वायुवेगी अश्व , जो सुनहरी साज से सजे थे, भेंट भेजे थे। इसी प्रकार अनेक राजा- महाराजा , गणपति , सेट्ठी, नगरसेट्टि और पौर जानपद प्रमुखों ने विविध उपानय वस्तुएं महाराज प्रसेनजित् को प्रसन्न करने के लिए भेजी थीं । पश्चिमी गान्धार के अधिपति कलिंगसेन ने आम के पते के समान रंगवाले अपूर्व सोलह अश्व और दो सौ नवनीत – कोमलांगी गान -वाद्य – यूत -निपुणा कुमारियां भेजी थीं ।
आगत जनों के लिए कोसलपति ने स्वागत – सत्कार की समुचित व्यवस्था की थी । सहस्रों सेवक, दास , कमकर लोगों को खिलाने-पिलाने, ठहराने तथा उनके वाहनों की व्यवस्था में लगे हुए थे। सैकड़ों कर्णिक लेखा-जोखा लिख-लिखकर उपानय सामग्री कोठार में पहुंचाते तथा रसद तोल रहे थे। कहीं कच्ची रसद तोल -तोलकर बांटी जा रही थीं ,कहीं अन्न पकाया जा रहा था । साधु, श्रमण,निगण्ठ , श्रोत्रिय लोग भक्ष्य , भोज्य , चूष्य , लेह , चव्य आदि विविध पदार्थों का आस्वाद ले रहे थे। चारों ओर ऐसा कोलाहल हो रहा था कि कान नहीं दिया जाता था । जगह – जगह पुण्याह पाठ हो रहा था । अभ्यागतों को भोजन , वस्त्र ,स्वर्ण, गौ , रत्न दान दिया जा रहा था । यज्ञ -कार्य के निमित्त अजित केसकम्बली,हिरण्यकेशी, बोधायन , भारद्वाज , शौनक , जैमिनि , गौतम , शाम्बव्य ,कणाद, औलूक, सांख्यायन , वैशम्पायन पैल , सायण,स्कन्द कात्यायन आदि वेद- वेदांग – वेत्ता , षडंग वेदपाठी, षोडषोपचार संस्कर्ग, षष्ठी तन्त्र , गणित ,शिक्षा, कल्प ,व्याकरण, छन्द व्युत्पत्ति , ज्योतिष तथा नीति – शास्त्रादक ज्ञाता महाश्रोत्रिय अट्टासा ब्राह्मण प्रमुख कर्ता नियत किए गए थे, जिनमें से प्रत्येक की सेवा के लिए राजा ने सोलह- सोलह रूपगुणालंकृता दासियां नियत की थीं । सहस्र ऊध्वरता ब्रह्मचारी नित्य स्वर्ण- थाल में हविष्य भोजन करते और अखण्ड सामगान करते थे। राजाओं और सरदारों की लाई हुई सहस्रों जंगली गायें जहां – तहां बंधी थीं । जगह- जगह यज्ञ बल के पवित्र पशु , बछड़े, वृषक और अन्य पशु बंधे थे। ऐसा प्रतीत होता था कि सब देश और सारे संसार की संपदा और जानपद इस समय श्रावस्ती में एकत्र हो गए हैं ।
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