चैप्टर 6 अंतिम आकांक्षा सियारामशरण गुप्त का उपन्यास | Chapter 6 Antim Akanksha Siyaramsharan Gupt Ka Upanyas
Chapter 6 Antim Akanksha Siyaramsharan Gupt Ka Upanyas
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मेरे घर से चालीस-पचास गज की दूरी पर दीना कोरी का घर था । अधिक सुरक्षित समझ कर माँ को वहीं पहुँचा दिया गया। दो घन्टा चुपचाप डाकुओं की प्रतीक्षा कर लेने पर भी जब किसी ओर से पत्ता भी उड़कर नहीं आया, तब निश्चितन्त होकर मैं माँ को देखने चला। ‘दीना, दीना!’ कह कर मैंने बाहर सड़क पर से आवाज दी। डाकुओं की निशाचरी माया से वह अच्छी तरह परिचित था । इसलिए कचहरी के नियमानुसार जब तक अपने निश्चय की मिसिल का पेटा ‘कौन, क्या और किसलिए’ के उत्तरों से भर न लिया, तब तक स्वर पहचान कर भी उसने घर के किवाड़ नहीं ही खोले ।
माँ ने मुझे देखकर पूछा- तू इधर-उधर क्यों फिर रहा है ?
मैंने कहा – माँ, डर की कोई बात नहीं, मैं सावधान हूँ। यही देखने के लिए चला आया था कि तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं।
“अच्छा तो फिर यहीं बैठ जा, अकेले अच्छा नहीं लगता”- कहकर माँ ने मुझे वहीं बन्दी कर लिया।
बैठ कर मैंने दीना का घर इधर-उधर देखा। छोटी-छोटी कोठरियों के बीच में बहुत छोटा आँगन था। उसके एक कोने में पानी भरे मिट्टी के दो-तीन घड़े रक्खे थे; उसी तरह के, जैसे मेरे ढोरों वाले घर में गोबर थापने के लिए मैली-कुचैली हालत में एक ओर पड़े रहते हैं । घड़ों के नीचे से फैल कर पानी ने आसपास चारों ओर काफी कीचड़ कर रक्खा था; इसलिए घड़ों तक पहुँचने के लिए ईंटें रखकर, उनका एक छोटा पुल-सा बना दिया गया था। आँगन के कोने में घर का बरसाती पानी बाहर निकालने के लिए नाबदान था। आजकल जितना पानी सूर्य से जबर्दस्ती छीनते बनता, उसे छोड़ वह एक बूँद भी अपने गोदाम से बाहर न जाने देता था। थोड़ी ही देर में उसका दुर्गन्ध से मेरा सिर भिन्नाने लगा ।
हाथ में कुछ लिये हुए दीना ने आकर कहा- भैया, तनिक उठो तो, मैं इसे बिछा दूँ । नीचे जमीन गड़ती होगी।
मैंने देखा, उसके हाथ में एक गन्दी कँथरी थी; न जाने कितनी पुरानी, जिसके सर्वाङ्ग में गलित कुष्ठ ऐसा कुछ था । मैंने उस ओर से मुँह फेरकर कहा – आवश्यकता नहीं। मैं ठीक बैठा हूँ।
पास बैठकर दीना बातचीत करने लगा। बोला- भैया, विक्रमसिंह को मैंने देखा है।
उत्सुक होकर मैंने पूछा- कहाँ, कब? – और तुमने उसे देखा तो इसकी खबर थाने में क्यों न दी?
वह कुछ घबरा – सा गया। बोला- नहीं भैया, उसके लिए इस तरह नहीं कहना चाहिए। उसे देवी का इष्ट है। वह सब जान जाता है कि कौन कहाँ उसके बारे में क्या कह रहा है। यह सब झूठ है कि उसके साथ सौ दो सौ आदमी हैं। जब चाहता है, तभी माया के आदमी खड़े कर देता है। थानेदार तो क्या उसे अँगरेज़ भी नहीं पकड़ सकता।
मैंने प्रश्न किया- तुमने उसे देखा कहाँ ?
वह कहने लगा- मैं नदी के उस पार से आ रहा था, जंगल में ही मुझे रात हो गई । भूतों वाली महन्त की बावड़ी के पास पहुँचकर मैंने देखा कि बड़ के नीचे एक बढ़िया पहाड़ी घोड़ा बँधा है। पूँछ और सिर हिलाकर हिनहिनाता हुआ जमीन पर टापें पटक रहा है। मैंने मन में कहा- छल है ! और महावीर का सुमिरन करने लगा। सामने ही कारतूसों की पेटी पहने और बगल में बन्दूक लटकाये हुए दो लम्बे- तड़ेगे जवान दिखाई दिये। डर के मारे मेरी साँस रुक गई। मुझे चुपचाप आगे बढ़ते देख उनमें से एक ने कहा- ‘इस आदमी को पकड़ लो ।’ दूसरे ने हँसकर उत्तर दिया- ‘यह भी कोई आदमी है; इससे मक्खी तक तो मर नहीं सकती।’ दौड़कर जब तक अपने गाँव की मेंड़ पर नहीं आ गया, तब तक फिर मैंने साँस तक नहीं ली।
“तो फिर तुमने यह कैसे जाना कि विक्रमसिंह वही था?”
“वाह भैया, यह तुमने खूब कही! क्या मैं इतना भी नहीं जान सकता? मैं बाजी लगा कर कह सकता हूँ कि विक्रमसिंह को छोड़कर वह और कोई हो ही नहीं सकता। उसके तेज से मेरी आँखें झँप गईं?”
इस सम्बन्ध में उससे कुछ कहना व्यर्थ था । चुपचाप बैठा बैठा मन ही मन न जाने में कितनी बातें सोचने लगा। दीना की यह झोपड़ी मेरे रहने के घर की सीमा में ही आ सकती है, परन्तु आज के पहले मेरी आँखें इसे अच्छी तरह देख भी न सकीं। मैं जिस दुर्गन्ध में दो मिनट नहीं बैठ सकता, वह इसका घर है, वह इसका सौभाग्य है और इस सौभाग्य के कारण न जानें यह कितनों की ईर्ष्या का पात्र है ! इस कोरी के पूर्वजों के बनाये हुए वस्त्र न जाने कब से मेरे वंश के गौरव और प्रतिष्ठा की वृद्धि करते आये हैं, आज इसके घर की यह अवस्था। जिस वस्त्र पर प्रतिदिन यह सुख के साथ सो सकता है, वह इतना मैला कुचैला और कदर्य है कि उसकी एक झलक भी धूल के झोंके की तरह, मेरी आँखों को उस ओर टिकने नहीं देती। इस घर की छोटी से छोटी वस्तु में भी एक इतिहास है, एक कहानी है; फिर भी मैं कुछ नहीं जानता । विदेशी साहित्य के कितने ही किसान मजदूरों से मेरा परिचय है। उनकी विपत्ति – गाथा से आँखों में आँसू भर कर बीसियों बार मन ही मन मैं अपनी सहृदयता के दम्भ का अनुभव कर चुका हूँ। परन्तु मेरे लिए इस दीना के पास ऐसा कुछ नहीं जो मुझे उसकी ओर आकर्षित कर सके । विलासिता की अगणित वस्तुओं की भाँति, हमारी करुण- भावना को जागृत करने के लिए दरिद्र और दुःखी भी बाहर से ही आने चाहिए। शिक्षित होकर हमने यही सीखा है !
एकाएक मेरा मन न जानें कैसा हो उठा । उत्तेजित होकर सोचने लगा – भला हो इस विक्रमसिंह का ! इसके कारण हमें आज अपने एक पड़ौसी को इस तरह देखने का मौका तो मिला। इसके अन्ध-विश्वास और कायरता की हँसी उड़ाने का हमें कोई अधिकार नहीं । हथियार- बन्द दो-चार डाकुओं के आने की खबर से ही अवसन्न और अर्द्धमृत हुए सारे के सारे जिस गाँव के ऊपर अँधेरे की कालिख पुत गई है, उसमें जो स्थान दीना का है वही मेरा आ भाई विक्रमसिंह, आ ! तेरे लिए अस्त्र कानून की कोई बाधा नहीं । यदि तेरे लिए एक बन्दूक यथेष्ट न हो तो आवश्यकतानुसार दूसरे अस्त्र लाकर आज ही इस गाँव को धुएँ के साथ उड़ा दे । तुझ पर आज किसी भी निर्दयता का दोषारोपण कर सकने का मेरा मुँह नहीं ।
मेरी इस चंचलता का अनुभव माँ ने उस अँधेरे में भी कर लिया। बोलीं- बैठा बैठा इस तरह क्या सोच रहा है।
आह यह कण्ठ- स्वर ! इसके सामने मेरी कोई भी उद्दण्डता नहीं टिक सकती। मृदु होकर मैंने कहा- कुछ नहीं, मैं तनिक बाहर जाना चाहता हूँ ।
“तो मैं भी चलती हूँ” – कहकर माँ मेरे ही साथ उठ खड़ी हुईं।
घबरा कर दीना कहने लगा-हें हें माई ! यह क्या करती हो? बैठो भैया, बैठो। तुम बाहर निकले और विक्रमसिंह प्रकट हुआ। उसे महावीर का इष्ट है। आज मंगलवार है न, डाके का
दिन। तुम्हें ऐसा लड़कपन न करना चाहिए।
क्रमश:
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