चैप्टर 5 : ज़िन्दगी गुलज़ार है | Chapter 5 Zindagi Gulzar Hai Novel In Hindi

Chapter 5 Zindagi Gulzar Hai Novel In Hindi

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१३ दिसंबर कशफ़

पता नहीं कभी-कभी मैं खुद को कण्ट्रोल क्यों नहीं पाती. क्या होता, अगर आज मैं ख़ुद पर काबू रखती, लेकिन मैं हमेशा गलती कर के पछताने वालों में से हूँ.

कॉलेज में ज़ारून के साथ होने वाली उस पहली झड़प के बाद मैंने ख़ुद को काफ़ी संजीदा कर रखा था, लेकिन कुछ एक हफ्ते से उसका रवैया बहुत ख़राब हो गया था. तकरीबन हर क्लास में वो ऐसे टॉपिक पर बात शुरू कर देता, जिस पर मैं बोलूं और हर उस पॉइंट पर इख्त्लात करता, जिसे मैं पेश करूं. मैं हर दफ़ा उसे नज़र-अंदाज़ करती रही, लेकिन आज मेरे सब्र का पैमाना लबरेज़ हो गया.

आज सर अबरार पाकिस्तान की फॉरेन पालिसी के बारे में कुछ पॉइंट डिस्कस कर रहे थे और क्लास को उस पर रिमार्क्स देने के लिए कह रहे थे. जब तब्सिरा (राय देना/समीक्षा/अभियक्ति) करने के लिए मेरी बारी आई, तो मैंने कहा, “मग़रिबी (पश्चिमी देश/शख्स) के साथ हमें अच्छे ताल्लुकात रखने चाहिए, लेकिन मुल्की मफ़ादात (भलाई) की कीमत पर नहीं, क्योंकि आज की दुनिया में तो हमेशा कमज़ोर ममालिक (दूसरे देश) भी अच्छे ताल्लुकात के लिए अपने मफ़ादात (भलाई) का सौदा नहीं करते, सो हमें भी किसी के सामने नहीं झुकना चाहिए और मुल्की मफ़ादात पर सौदा करने के बजाय ऐसे ही सर्द-ओ—गर्म ताल्लुक ठीक है.”

ख़िलाफ़ तवक्को मेरी बात पर ज़ारून जुनैद ने कुछ नहीं कहा, फिर अचनाक सर अबरार को पता नहीं क्या ख्याल आया और उन्होंने क्लास से पूछा कि कौन से स्टूडेंट्स फॉरेन सर्विस में जाना चाहते हैं.

चंद लोगों ने हाथ खड़ा किया था. इनमें ज़ारून जुनैद भी शामिल था. सर अबरार ने मुस्कुरा कर ज़ारून को देखा और पूछा, “ज़ारून आप फॉरेन सर्विस में क्यों जाना चाहते हैं?”

उसने फ़ौरन कहना शुरू कर दिया था, “सबसे बुनियादी वजह तो ये हैं कि इसमें मुस्तकबिल (भविष्य) बहुत रोशन और महफूज़ रहता है. फिर ये प्रोफ़ेशन बहुत ग्लैमरस और चैलेंजिंग है. और फिर आप इस पोजीशन में होते हैं कि मुल्क के लिए कुछ कर सकें.”

मुझे उसका जवाब बहुत फॉर्मल सा लगा. वही मुल्क के लिए कुछ करने के रस्मी ज़ुमले.

“अच्छा ज़ारून अगर आप फॉरेन सर्विस ज्वाइन कर लेंगे, तो आप किन ममालिक के साथ ताल्लुकात बेहतर करने की कोशिश करेंगे और क्यों?”

वो कुछ देर खामोश रहा, फिर अपने मख्सूस (ख़ास/विशिष्ट) अंदाज़ में बोलने लगा, “वैसे तो एक डिप्लोमेट का काम ही यही होता है कि वो हर मुल्क के साथ बेहत ताल्लुकात रखने की कोशिश करे, लेकिन मग़रिबी ममालिक के साथ ख़ास तौर पर हमारे ताल्लुकात अच्छे होने चाहिये. इसकी बुनियादी वजह ये है कि हमारी इकॉनमी अमेरिका और यूरोप से मिलने वाले कर्ज़ों पर खड़ी है. फिर इन मुल्कों को हम नाराज़ कैसे कर सकते हैं. इनकी मदद के बगैर हम अपने आपको कैसे क़ायम रखेंगे. एक सुई तक तो हम बना नहीं सकते और बात करते हैं, कौमी मफ़ादात (भलाई) की.”

सौदा ना करने पर उसका इशारा वाजई तौर पर मेरी तरफ था.

“ऐसा दावा वही कौम अफोर्ड कर सकती है, जो क़ुरबानी देना जाती हो. हमारे यहाँ तो अगर गोश्त की कीमत बढ़ जाए, तो उसे कण्ट्रोल करने के लिए हम सिर्फ़ २ दिन भी गोश्त खाना नहीं छोड़ सकते. हाँ, अगर मामला सिर्फ़ नारे लगाने का हो, तो वो बड़े शौक से लगते हैं, बल्कि वहाँ भी लगाते हैं, जहाँ इसकी ज़रूरत भी नहीं होती क्योंकि हम एक नारे-बाज़ और करप्ट कौम है. हैरत की बात ये है कि हम फॉरेन पॉलिसी हाट (बाज़ार) जैसे जगह पर भी ज़ेर-ए-बहस (चर्चाधीन) लाने से नहीं चूकते. एक पाकिस्तानी के लिए तो ये बात अब्दी (endless, unlimited) हस्सास (भावनात्मक) है कि उसे फॉरेन पोसिली जैसे मसले पर बहस करने का मौका मिल रहा है और फिर हम जोश में जाते हैं और अफ़सोस की बात यही है कि हमें उन चीज़ों पर जोश आ जाता है, जिस पर हमें होश से काम लेना चाहिए. जैसे अभी मोहतरमा कशफ़ फ़रमा रही थी कि कौमी मफ़ादात (भलाई) पर सौदा किये बगैर अगर अच्छे ताल्लुकात कायम होते हैं, तो ठीक है, वरना जैसे ताल्लुकात हैं, वैसे ही रहने दें. तो मोहतरमा अगर सिर्फ़ अमेरीका ही हमारे साथ पूरी ट्रेड नहीं, सिर्फ़ हमारा कॉटन एक्सपोर्ट का कोटा खत्म कर दे, तो हमारा मुल्क एक हफ्ता भी नहीं चल सकता. हम इमदाद (चंदा/सहायता) पर जिंदा रहने वाली कौम हैं और इमदाद (चंदा/सहायता) पर जिंदा रहने वाली कौम हर चीज़ का सौदा करने पर मजबूर होती हैं, फिर वो कौमी मफ़ादात (भलाई) हो या जाती मफ़ादात (भलाई). वैसे भी अगर आम ज़िन्दगी में तो हर शख्स अमेरिका या यूरोप जाने को तैयार है. चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी कीमत अदा करनी पड़े. इसलिए मेरे ख्याल से फॉरेन पॉलिसी पर इस किस्म के अहमक़ाना (मूर्खतापूर्ण) बयानात की गुंज़ाइश नहीं होती, जैसे बयां कुछ देर पहले मोहतरमा कशफ़ दे रही थी.”

पूरी गुफ़्तगू में उसका लहज़ा इस कदर आमीज़ (बद्तर) था कि मैं चुप नहीं रह सकी, “सबसे पहली बात ये हैं कि मैं यहाँ फॉरेन पॉलिसी नहीं बना रही हूँ. जो मेरे खयालात का असर इस पर होगा. वो मेरे जाति खयालात थे और हर एक को अपनी मर्ज़ी से बोलने की इज़ाज़त होती है. हाँ, मगर आपके इल्ज़ामात का जवाब मैं ज़रूर देना चाहूंगी.”

फिर मैं उसके नाम, निहाद वा लायेल (बुनियाद, पैदाइश) के परखच्चे उड़ाती हुई चली गई. उसने २-३ बार मुझे रोकने की कोशिश की, मगर वो कामयाब नहीं हुआ. मैं जानती हूँ कि उसने काफी इन्सल्ट महसूस की थी, लेकिन सर अबरार की क्लास से निकलने के फौरन बाद वो मेरे पास आया था. उसका चेहरा सुर्ख हो रहा था और वो यकीनन मुझसे कुछ कहना कहता था. लेकिन फिर चंद लम्हों के बाद मेरे बराबर वाली कुर्सी को ठोकर मारते हुये बाहर में सुकून की साँस लिया, वरना जिस वक़्त वो मेरे पास आकर खड़ा हुआ था, तब मेरी साँस हलक में अटक गयी थी कि पता नहीं वो क्या करे या क्या कहे और अपने हाथों की लरज़िश को छुपाने के लिए मैंने फाइल में रखे हुये कागजात को उलटना-पलटना शुरू कर दिया था.

मैं उस पर ये ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी कि मैं उससे खौफ़जदा हूँ. लेकिन बहरलाल आज मैं वाक़ई उससे डर गयी थी. जिस वक़्त मैं क्लास में इस पर तस्दीक कर रही थी, तब मैंने हरगिज़ ये नहीं सोचा था कि वो मेरे बातों को इतनी संजीदगी से लेगा. आखिर, उसने भी तो मुझ पर तस्दीक की थी. लेकिन मैंने तो उस जैसे रॉड-ओ-अम्मल (जवाब/response) का इज़हार नहीं किया था. लेकिन यहाँ पर ही तो पैसे का फ़र्क आ जाता है.

शायद इन लोगों के पास रुपया होता है, उनकी अना (इगो) इसी तरह हर्ट होती है और मेरे जैसे लोगों की तो कोई अना होती ही नहीं है. शायद उसका गुस्सा ठीक ही था.

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