चैप्टर 5 मनोरमा : मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास | Chapter 5 Manorama Novel By Munshi Premchand Read Online

Chapter 5 Manorama Novel By Munshi Premchand

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चक्रधर की कीर्ति उसके पहले ही बनारस पहुँच चुकी थी। उसके मित्र और अन्य लोग उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो रहे थे। जब वह पाँचवे दिन अपने घर पहुँचे, तो लोग मिलने और बधाई देने आ पहुँचे। नगर का सभ्य समाज मुक्त कंठ से उनकी तारीफ कर रहा था। यद्यपि चक्रधर गंभीर आदमी थे; पर अपनी कीर्ति की प्रशंसा से उन्हें सच्चा आनंद मिल रहा था। और लोग तो तारीफ कर रहे थे, मुंशी वज्रधर लड़के की नादानी पर बिगड़ रहे थे। निर्मला तो इतना बिगड़ी कि चक्रधर से बात न करना चाहती थी।

शाम को चक्रधर मनोरमा के घर गये। वाह बगीछे में दौड़-दौड़ कर हजारे से पौधों को सींच रही थी। पानी से कपड़े लथपत हो गए थे। उन्हें देखते ही हजारा फेंककर दौड़ी और पास आकर बोली – “आप कब आये बाबू जी! मैं पत्रों में रोज वहाँ का समाचार देखती थी और सोचती थी कि आप यहाँ आयेंगे तो आपकी पूजा करूंगी। आप ना होते, तो वहाँ जरूर दंगा हो जाता। आपको बिगड़े हुए मुसलमानों के सामने अकेले जाते हुए जरा भी शंका ना हुई?

चक्रधर ने कुर्सी पर बैठे हुए कहा – “जरा भी नहीं! मुझे तो यही धुन थी इस वक्त कुर्बानी ना होने दूंगा। इसके सिवाय दिल में और कोई खयाल ना था। मैं तो यही कहूंगा कि मुसलमानों को लोग नाहक बदनाम करते हैं। फसाद से वे भी उतना ही डरते हैं, जितना हिंदू। शांति की इच्छा भी उन्हें हिंदुओं से कम नहीं है।

मनोरमा – “मैंने तो जब पढ़ा कि आप उन बौखलाये हुए आदमियों के सामने नि:शंक भाव से खड़े थे, तो मेरे रौंगटे खड़े हो गये। मैं उस समय वहाँ होती, तो आपको पकड़ कर खींच लाती। अच्छा, तो बतलाइए कि आपसे वधुजी ने क्या बातें की?  (मुस्कुराकर) मैं तो जानती हूँ, आपने कोई बातचीत न कि होगी, चुपचाप बैठे रहे होंगे।

चक्रधर शर्म से सिर झुकाकर बोले – “हाँ, मनोरमा हुआ तो ऐसा ही। मेरी समझ में नहीं आता था कि बातें क्या करूं। उसने मुझसे एक बार कुछ बोलने का साहस भी किया…”

मनोरमा – “आपको देखकर खुश तो बहुत हुई होंगी!”

चक्रधर (शरमा कर) – “किसी के मन का हाल मैं क्या जानू!”

मनोरमा ने अत्यंत सरल भाव से कहा – “सब मालूम हो जाता है। आप मुझसे बता नहीं रहे हैं। कम से कम इच्छा तो मालूम हो ही गई होगी। मैं तो समझती हूँ जो विवाह लड़की की इच्छा के विरुद्ध किया जाता है, वो विवाह ही नहीं है। आपका क्या विचार है?”

चक्रधर बड़े असमंजस में पड़े। मनोरमा से ऐसी बातें करते उन्हें संकोच होता था। डरते थे कि कहीं ठाकुर साहब को खबर मिल जाये – मनोरमा जी कह दे – तो वह समझेंगे, मैं इसके सामाजिक विचारों में क्रांति पैदा करना चाहता हूँ। अब तक उन्हें ज्ञान ना था कि ठाकुर साहब के विचारों के आदमी है। हाँ, उनके गंगा स्नान से आभास होता था कि वह सनातन धर्म के भक्त हैं। सिर झुकाकर बोले – “मनोरमा हमारे यहाँ विवाह का आधार प्रेम और इच्छा पर नहीं, धर्म और कर्तव्य पर रखा गया है। इच्छा चंचल है क्षण-क्षण में बदलती रहती है। कर्तव्य स्थायी है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता।“

सहसा घर के अंदर से किसी के कर्कश शब्द कान में आये। फिर लौंगी का रोना सुनाई दिया। चक्रधर ने पूछा – “यह तो लौंगी रो रही है?”

मनोरमा – “जी हाँ! आपसे तो भाई साहब की भेंट नहीं हुई? गुरुसेवक सिंह नाम है। कई महीनों से देहात में जमींदारी का काम करते हैं। है तो मेरे सगे भाई और पढ़े लिखे भी खूब है, लेकिन भलमनसी छू भी नहीं गई। जब आते हैं, लौंगी अम्मा से देर तक करार करते हैं, ना जाने उससे इन्हें क्या अदावत है।“

इतने में गुरुसेवक लाल-लाल आँखें किये निकल आये और मनोरमा से बोले – “बाबूजी कहाँ गए हैं? तुझे मालूम है, कब तक आयेंगे। मैं आज ही फैसला कर लेना चाहता हूँ। चक्रधर तो बैठे देखकर वह कुछ झिझके और अंदर लौटना ही चाहते थे कि लौंगी रोती हुई आकर चक्रधर के पास खड़ी हो गई और बोली – “बाबूजी को समझाइए कि मैं अब बुढ़ापे में कहाँ जाऊं? इतनी उम्र तो इनमें कटी, अब किसके द्वार पर जाऊं? मैंने इन्हें अपना दूध पिलाकर पाला है। मालकिन के दूध ना होता था और अब मुझे घर से निकालने पर तुले हुए हैं।“

गुरसेवक सिंह की इच्छा तो न थी कि चक्रधर से इस कलह के संबंध में कुछ कहे; लेकिन जब लौंगी ने उन्हें पंच बनाने में संकोच ना किया, तो वह खुल पड़े। बोले – “इससे यह पूछिए कि अब यह बुढ़िया हुई, इसके मरने के दिन आये, क्यों नहीं किसी तीर्थ स्थान में जाकर अपने कलुषित जीवन से बचे हुए दिन काटती। मरते दम तक घर की स्वामिनी बनी रहना चाहती है। दादाजी भी सठिया गए हैं; उन्हें मान-अपमान की जरा भी फिक्र नहीं। इसने उन पर ना जाने क्या मोहनी डाल दी है कि इनके पीछे मुझसे लड़ने पर तैयार होते हैं। आज मैं निश्चय करके आया हूँ कि इसे घर के बाहर निकाल कर ही छोड़ूंगा या तो यह किसी दूसरे मकान में रहे , या किसी तीर्थ स्थान को प्रस्थान करें।“

लौंगी – “तो बच्चा सुनो, जब तक वह जीता है, लौंगी इसी घर में रहेगी और इसी तरह रहेगी। जब वह ना रहेगा, तो जो कुछ सिर पर पड़ेगी झेल लूंगी। मैं लौंडी नहीं हूँ कि घर से बाहर जाकर रहूं। तुम्हें यह कहते लज्जा नहीं आती? चार भांवरे फिर जाने से ही ब्याह नहीं हो जाता। मैंने अपने मालिक की जितनी सेवा की है और करने को तैयार हूँ कि कौन ब्याहता करेगी? लाये तो हो बहू। कभी उठाकर एक लुटिया पानी भी देती है? नाम से कोई ब्याहता नहीं होती। सेवा और प्रेम से होती है।

यह कहती हुई लौंगी घर में चली गई। मनोरमा चुपचाप से झुकाये दोनों की बातें सुन रही थी। उसे लौंगी इसे सच्चा प्रेम था। मातृ-स्नेह का जो कुछ सुख उसे मिला था, लौंगी से ही मिला था। उसकी माता तो उसे गोद में छोड़कर परलोक सिधारी थी। उस एहसान तो वह कभी ना भूल सकती थी। अब भी लौंगी उस पर प्राण देती थी। इसलिए गुरु सेवक की यह निर्दयता उसे बहुत बुरी मालूम होती थी।

एकाएक फिटन की आवाज आई और ठाकुर साहब उतर कर अंदर गये। गुरु सेवक सिंह भी उनके पीछे-पीछे चले। वह डर रहे थे कि लौंगी अवसर पाकर कहीं उनके कान न भर दे।

जब वह चले गये, तो चक्रधर ने कहा – “यह तो बताओ कि तुमने इन चार-पाँच दिनों में क्या काम किया?”

मनोरमा – “मैंने तो किताब तक नहीं खोली। आप नहीं रहते, तो मेरा किसी काम में जी नहीं लगता। आप अब कभी बाहर न जाइयेगा।“

चक्रधर ने मनोरमा की ओर देखा, तो उसकी आँखें सजल हो गई, सोचने लगे बालिका का हृदय कितना सरल, कितना उदार, कितना कोमल और कितना भावमय है।

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