चैप्टर 5 हृदयहारिणी किशोरी लाल गोस्वामी का उपन्यास | Chapter 5 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas
Chapter 5 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas
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पांचवां परिच्छेद : उचित उद्योग
“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः ।”
कुटिल काल की टेढ़ी चाल बराबर ही बदला करती है, यहां तक कि बड़े बड़े त्रिकालज्ञ विद्वानों ने भी काल की इस बिलक्षण चाल का भेद नहीं पाया है। कहने का प्रयोजन यह कि जब तक संसार का अस्तित्व बना रहेगा, काल की अनिवार्य गति भो बराबर इसी प्रकार बदलती हुई चली जायगी; इस गति का रोकना मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है।
देखिए, एक दिन वह भी था कि जब हमारा भारतवर्ष ससागरा पृथ्वी का सिरमौर बना हुआ था, यहीं के मण्डलेश्वर नृपति गण सारे भूमण्डल का शासन करते थे, इसी देश में पहिले पहिल सबगुनआगरी लक्ष्मी और सरस्वती ने जन्म लिया था, सारे संसार में सब मांति की विद्या यहीं के विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा फैलाई गई थीं और इसी देश के विद्वानों से शिक्षा पाकर सभी असभ्य देश के रहनेवाले भी सभ्यता की चोटी तक पहुंचे थे; इस बात के अनगिनतिन प्रमाण इतिहास पुराणों में भरे पड़े हैं। देखिए, भगवान मनुजी क्या कह रहे हैं,-
“एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वस्वं चरित्र शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः।
वाल्हीका यवनाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः॥”
किन्तु, हा! एक दिन यह भी है कि वही स्वाधीन भारत कराल काल की कुटिल गति से अपनी सनातन की स्वाधीनता खोकर मुसल्मानों का गुलाम हुआ और फिर जहां तक होना चाहिए था, इस देश, यहां की विद्या, धर्म, कीर्ति, मर्यादा, जाति और समाज का खूब ही नाश हुआ। यहां तक कि आज दिन रामायण और महाभारत आदि इतिहासों की पुरानी बातें लोगों को बिलकुल झूठ या सपने की सी प्रतीत होने लगती हैं। क्या यह उसी सत्यानाशी काल की टेढ़ी चाल का नमूना नहीं है कि जिसने भारत को उन्नति की ऊंची चोटी से एक दम रसातल के अंधेरे गढ़े में लेजा कर पटक दिया है!!!
जिस काल ने भारत की स्वाधीनता को मिट्टी में मिलाया, उसीकी अनिवार्य गति से मुसलमानों का प्रतापसूर्य भी कई सौ बरस तक खूबही तपकर अन्त में पश्चिम के महासागर में सदैव के लिये जाकर डूब गया और ब्रिटानियन (अंग्रेज़ ) सौदागरों ने सौदागरी के बहाने से इस देश को हड़प लिया। यद्यपि यह देश फिर भी पराधीनता की बेड़ी से जकड़ाही रह गया; पर इतना अच्छा हुआ कि अंग्रेजों ने मुसलमानों के अत्याचार से इस अधमरे देश का पिण्ड छुड़ाया। यद्यपि अभी तक अंग्रेज़ों ने उस उत्तम नीति का व्यवहार भारतवालियों के साथ प्रारम्भ नहीं किया है, जैसा कि वे अपने गोरे भाइयों के साथ करते हैं, पर तो भी यहां वालों को इस बात पर संतोष है कि उनका गला अत्याचारियों से छूटा। इसीसे कहना पड़ता है कि काल की महिमा का कोई पार नहीं पा सकता, वह चाहे सो करे!!!
इतिहासों से यह बात भलीभांति प्रगट होती है कि मुसलमानों ने जब, जिस देश को अपने आधीन किया, छल, कपट और दुराचार के कारण; और जहां ये गए, वहां लूट, खसोट, फूकने, जलाने ढाहने, उजाड़ने, लौंडी, गुलाम बनाने, और हिन्दूधर्म तथा समाज को सत्यानाश करने ही में अपनी बहादुरी दिखलाई। यद्यपि इनमें भी कई बहुत अच्छे और न्यायप्रिय बादशाह तथा नवाब हए हैं, पर अधिक संख्या अत्याचारियों ही की इतिहासों में भरी पड़ी है।
यह उपन्यास बंगदेश की घटनाओं से संबंध रखता है, इसलिये यहां पर हम बंगदेश में मुसलमानी हुकूमत का कुछ हाल लिख देना उचित समझते हैं।
बंगदेश की स्वाधीनता का नाश करनेवाला पहिला नव्वाब बख्तियार खिलजी हुआ, जो जात का अफ़गान था और दिल्ली के गुलाम बादशाह कुतबुद्दीन का भेजा हुआ बंगदेश (सन् १२०३ ई०) में आया था। इसके बाद बंगाले के कई हाकिम हुए, जिनमें गयासुद्दीन सभो में नेक था (सन् १२२० ई०)
फिर (सन् १२२७ ई०) सुगन खां नव्वाब हुआ और उसके बाद तुगरल ख़ां और उसके अनन्तर (सन् १२८२ ई०) नासिरुद्दीन। फिर क्रम से नासिरुद्दीन के दो बेटे कैकयस और फ़ीरोज़शाह बंगाले के हाकिम हुए। फ़ीरोज़शाह के मरने पर उसका बड़ा बेटा शहाबुद्दीन (सन् १३१८ ई०) बंगदेश का हाकिम हुआ; पर थोड़े ही दिनों बाद दिल्ली के बादशाह गयासुद्दीन ने बंगाले में आकर उसे गद्दी से उतार, उसके भाई नासिरुद्दीन को गद्दी दी। कुछ दिन पीछे जब मुहम्मद तुग़लक दिल्ली का बादशाह हुआ, (सन्१३३५ ई०) तो उसने क्रम से वहादुरशाह और बहराम खां को बंगाले का हाकिम बनाया।
बहराम ख़ां के मरने पर उसका गुलाम फ़क़ीरुद्दीन (सन् १३३८ ) बंगाले का स्वाधीन नव्वाब हुआ और उसके मरने पर उसका बेटा मुज़फ्फ़र ग़ाज़ी। फिर (सन् १३५८ ई०) मग़सुद्दीन, फिर उसका बेटा सिकन्दशाह, तदनन्तर सिकन्दर का लड़का गयासुद्दीन नव्वाब हुआ (सन् १३८६ ई०) और फिर उसे मारकर दिनाजपुर के महाराजा गणेश ने बंगदेश पर (सन् १४०५ ई०) अपनी हुकूमत कायम की।
उसके मरने पर उसका बेटा ‘यदू’ मुसलमान हो गया और जलालुद्दीन मुहम्मद अपना नाम रखकर बंगदेश का हाकिम हुआ और उसके बाद उसका बेटा अहमदशाह।
अहमदशाह के मरने पर मुसलमानों ने शमसुद्दीन के बंश के नासिरुद्दीन को बंगाले का हाकिम बनाया और उसके मरने पर उसका बेटा बर्बरशाह मालिक हुआ। फिर (सन् १४८७ ई०) उसके गुलामों में से उसे मार एक हाकिम बन गया और फिर यहां तक मार काट बढ़ी कि दीवान सैयद अलाउद्दीन हबशी गुलामों को मार (सन् १४९४ ई०) आप हाकिम बन बैठा। उसके बाद उसका बेटा नशरतशाह हाकिम हुआ। तदनन्तर उसके भाई महमूदशाह ने उसके पुत्र फ़ीरोजशाह को मार, तख्त पर अपना कब्जा किया; किन्तु थोड़ेही दिनों पीछे (सन १५३६ ई०) शेरशाह ने उसे मार कर बंगाले की बागडोर अपने हाथ में ली। शेरशाह के मरने पर उसके बेटे आदि कई बंगाले के हाकिम हुए, पर अन्त में सुलेमान नामक मुसलमान ने (सन् १५६३ ई०) बंगाले में अपना दबदबा जमाया। उसके मरने पर उसका बेटा बारिदशाह नव्वाब हुआ, पर दूसरे साल उसे मार कर दायूदखां नव्वाब हुआ; किन्तु अकबरशाह ने उसे निकाल कर अपनी ओर से हुसेनकुलीखां को (सन् १५७६ ई० बंगाले का हाकिम बनाया। यहांसे बंगाले की हुकूमत पठानों के हाथ से निकल कर मुगलों के हाथ में गई।
सन् १५७८ ई० में हुसेनकुलीखां के मरने पर उनका लड़का मुज़फ्फ़रखां बंगाले का नबाब हुआ, पर गोलमाल करने के कारण वह निकाला गया और उसकी जगह पर राजा टोड़लमल और फिर राजा मानसिंह बंगाले की हुकूमत करते रहे।
फिर (सन् १६०५ ई०) अकबरशाह के मरने पर जहांगीर ने कुतुबखां को बंगाले का हाकिम बनाया। इसके बाद क्रम से जहां-गीरकुलोखां, शेखइस्लामखां, कासिमखां, इबराहिमखां (नूरजहांबेगम का भाई) और शाहजहाँ (जहांगीर का लड़का) बंगाले के हाकिम हुए और सन् १६२८ ई० में शाहजहां ने बादशाह होकर कासिमखां को बंगाले की हुकूमत दी। उसके बाद इसलाम खां मसहदी (सन् १६३७ ई०) और फिर शाहजहां का दूसरा बेटा, जिल का नाम सुजा था, बंगाले के सूबेदार हुए। सुजा के मारे जाने पर मीर जुमला बंगाले का सूबेदार हुआ और उसके बाद नूरजहाँ का भतीजा शाइस्ताखां। (सन् १६६४ से सन् १६८६ तक)
तदनन्तर इब्राहीमखां बंगाले का हाकिम हुआ और सच तो यह है कि हिन्दुस्तान में अंग्रेजों की जड़ जमाने वाला यही था, जिसने बादशाह औरंगजेब को बहुत कुछ लिख पढ़कर अंग्रेजों के ख़ातिरखाह बहुतेरे सुभीते करा दिए थे। फिर मुर्शिदकुली खां (सन् १७०१ ई०) बंगाले का नव्याब हुआ। इसके मरने पर सर्फ राज़ ख़ां बंगाले का हाकिम हुआ, पर थोड़े ही दिनो बाद उसे मार कर नेकनाम अलीवर्दीखां नव्वाब हुआ। यह अंग्रेजों की चालबाजी और शक्ति को भलीभांति समझ गया था, इसलिये उसने सौदागरी के मामले में उनसे कभी छेड़छाड़ नहीं की। यद्यपि उस के मुसाहबों ने अग्रेजों के विरुद्ध उसे बहुत कुछ उभाड़ा, पर वह किसीकी पट्टो में न आया और उसने अपने मुसाहबों से साफ़ कह दिया कि,-
“भाइयों! थल में आग लगे तो वह मुश्किल से बुझाई जा सकती है, पर जो जल में ही आग लगे तो वह कैसे बुझाई जास-केगी? देखना थोड़े ही दिनों में ये सफेदरू सौदागर सारे हिन्दुस्तान पर कब्जा कर लेंगे।” आखिर, उस दीर्घदर्शी नव्वाब अली- वर्दीखां की भविष्यवाणी अन्त को सच ही हुई।
अलीवर्दीखां की तीन लड़कियां थीं,-“नूरी, शीरी और इमामन; जो उसके भाई हाजी अहमद के तीनों बेटों,-निवाइस महम्मद, सैयद अहमद और जैनुद्दीन को ब्याही गई थीं। अलीवर्दी खां ने अपने तीनों दामादों में से बड़े निवाइस महम्मद को ढांके का, बिचले सैयद अहमद को उड़ीसे का और छोटे जैनुद्दीन को बिहार का हाकिम बनाया था। फिर जब जैनुद्दीन को लड़का हुआ और वह बड़ा हुआ तो उसे अलीबर्दीखां ने अपना उत्तराधिकारी बनाया; उसीका नाम सिराजुद्दौला था।
सन् १७५६ ई० में सदाशय अलीवर्दीखां मर गया और उसके पहिले ही सिराजुदौला के दोनों चचा निवाइस महम्मद और सैयद अहमद भी मर गए थे, जिनमें सैयद अहमद, जो उड़ीसे का हाकिम था, अपने बेटे सकतजंग को अपना उत्तराधिकारी बना गया था। आखिर, अलीवर्दीखां का जानशीन नाती सिराजुद्दौला बंगाले के तख्त पर बैठा और मुर्शिदाबाद को उसने अपनी राजधानी बनाई। फिर तो उसने कैसे कैसे भयानक अत्याचार और कुकर्म किए और कैसी राक्षसी निर्दयता का परिचय दिया, इसका साक्षी इतिहास है। इसके साथ अंग्रेजों की कैसी कैसी लड़ाइयां हुई, यह बात इतिहास में भली भांति लिखी हुई है, जिसके दोहराने की आवश्यकता नहीं है। हां, यहाँ पर केवल इतना ही कहना है कि बंगाले का अन्तिम नव्वाव सिराजुद्दौला ही हुआ। यद्यपि उसके बाद भी मीरजाफ़र आदि कई नव्वाब हुए, पर वे अंग्रेज़ सौदागरों के हाथ के निरे खिलौने थे, इस लिये उनका यहां पर नाम गिनाना व्यर्थ है। हां, तो सिराजुद्दौला ने लड़ाई में अपने भाई सकतजंग को भी मार डाला था। यदि उसके सेनापति मीरजाफरखां, ख़जानची, राजा रायदुर्लभ और महाधनी, महाजन, जगतसेठ महताबराय, सेठ अमीचंद आदि लोग उसके अत्याचार से घबरा कर उससे विश्वासघात न करते और क्लाइब से न मिल गए होते तो अंग्रेजों के लिए इतनी जल्दी सिरजुद्दौला का दूर करना कठिन होता,किन्तु अंग्रेज़ जाति महा उद्योगी है और लक्ष्मी या राजलक्ष्मी उद्योगी पुरुष को ही आलिङ्गन करती है। यही कारण है कि आज दिन यह जाति भारत-साम्राज्य का उपभोग करती है।
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