चैप्टर 5 दीवाने होके हम रोमांटिक सस्पेंस नॉवेल | Chapter 5 Deewane Hoke Hum Romantic Suspense Novel In Hindi Read Online

चैप्टर 5 दीवाने होके हम रोमांटिक सस्पेंस नॉवेल | Chapter 5 Deewane Hoke Hum Romantic Suspense Novel In Hindi Read Online

Chapter 5 Deewane Hoke Hum Romantic Suspense Novel In Hindi 

Chapter 5 Deewane Hoke Hum Romantic Suspense Novel In Hindi 

रूपल की नज़र अब भी प्रेमी जोड़े पर टिकी थी, जो एक-दूसरे में इस कदर खोये हुए थे कि उन्हें ज़माने की न कोई फ़िक्र थी न परवाह। मेज़ पर पड़ी कॉफ़ी उनकी एक नज़र की आस में ठंडी हुई जा रही थी। लड़की के चेहरे का नूर पीने के बाद लड़के को कॉफ़ी का ख़याल आया। उसने प्याला धीरे-से लड़की की तरफ़ सरका दिया और दोनों हाथ बांधकर आँखों में प्यार भरकर उसे निहारने लगा। लड़की ने नज़रें झुकाकर प्याले को देखा, फिर पलकें झपकाकर लड़के को। लड़के ने आँखों से इशारा किया और लड़की ने मुस्कुराते हुए दोनों हाथों में प्याला थामकर अपने होंठों से लगा लिया। एक सिप के बाद प्याला लड़के की तरफ़ सरक चुका था। उसने मुस्कुराते हुए प्याला उठाया और एक सिप लेकर फिर लड़की की तरफ सरका दिया। एक-एक सिप का ये सिलसिला तब तक जारी रहा, जब तक कॉफ़ी ख़त्म न हो गई। प्यारे से जोड़े की उस प्यारी-सी हरक़त को देख रूपल के ज़ेहन में उस दिन की याद ताज़ा हो गई, जब इसी तरह कॉफ़ी का एक प्याला उसके सामने रखा था।

उस दिन कॉलेज के बाद घर न जाकर वह सारांश से मिलने आई थी। उनका मीटिंग पॉइंट यही कॉफ़ी हाउस था और सारांश उनकी कार्नर वाली फ़िक्स टेबल पर बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था।

रूपल के सामने रखी कुर्सी पर बैठते ही उसने पूछा, “कॉफ़ी लोगी?”

“जानते तो हो, मैं कॉफ़ी नहीं पीती।” रूपल ने ‘ना’ में सिर हिलाया।

“ओ.के.! तो चाय?”

“मूड नहीं है।” रूपल ने फिर इंकार कर दिया।

“तो फिर दूध?” वह हँस पड़ा, “मैं सोचता हूँ कि दूध तो तुम ज़रूर लोगी?”

“हाँ! पर सिर्फ़ बॉर्नवीटा के साथ।” रूपल भी उसके मज़ाक में शामिल हो गई।

वह ज़ोर से हँस पड़ा और काफ़ी देर तक हँसता ही रहा। रूपल प्यार भरी नज़रों से उसका हँसता हुआ चेहरा निहारती रही। सांवली रंगत के उसके चेहरे के फ़ीचर्स काफ़ी शार्प थे और उसकी हँसी दुनिया की सबसे प्यारी हँसी थी। कुछ अलहदा सी थी उसकी हँसी, जिसमें शामिल होने का नहीं, बल्कि दूर से निहारने का जी चाहे। इसलिए जब भी वह हँसता, रूपल उसे यूं ही जी भरकर निहारा करती। 

“क्या देख रही हो?” ख़ुद को निहारता पाकर उसने भौहें उचकाकर रूपल से पूछा।

रूपल ने अचकचाकर नज़रें हटा ली।

“क्या हुआ? तुम्हारा हूँ, जितना चाहो देख सकती हो।” उसने प्यार से कहा, तो रूपल शरमाकर मुस्कुरा दी। सारांश ने इशारे से बैरे को बुलाया और एक कप कॉफ़ी ऑर्डर कर दी। कुछ ही देर में सफेद रंग के प्याले में अपनी सौंधी महक बिखेरती कॉफ़ी दोनों के सामने मेज़ पर रखी हुई थी। 

“चलो आज बॉर्नवीटा बेबी को कॉफ़ी पीना सिखाते हैं।” कहते हुए कॉफ़ी का प्याला सारांश ने रूपल की तरफ सरका दिया, “जल्दी से एक सिप ले लो।”

“नहीं! मुझे पसंद नहीं है।” रूपल सिर हिलाकर बोली।

“देखो, नखरे मत दिखाओ! कॉफ़ी है, ज़हर नहीं।” पहले तो उसने आँखें दिखाई, फ़िर मिन्नत करने लगा, “प्लीज मेरे लिए…बस एक सिप।”

रूपल इंकार न कर सकी, “ओ.के.! पर बस एक ही सिप।” 

उसने कॉफ़ी का प्याला उठाकर एक छोटा-सा सिप ले लिया, फिर ऐसा चेहरा बनाया कि सारांश अपनी हँसी नहीं रोक पाया, “बहुत टार्चर हो रहा है ना आज तुम पर।” 

‘हाँ’ में सिर हिलाकर रूपल ने प्याला सारांश की तरफ सरका दिया। सारांश की नज़र प्याले पर पड़ी। सफ़ेद रंग के प्याले पर रूपल के होंठों का गहरा निशान बन गया था। ये रूपल की सारांश के साथ डेट के रोमांच में लगाई गई गहरी लिपस्टिक का कमाल था।

होंठ चबाकर सारांश ने प्याला उठाया और प्याले पर बने रूपल के होंठों के निशान पर अपने होंठ रख दिए।

“ये मेरी ज़िन्दगी की बेस्ट कॉफ़ी है।” रूपल की आँखों को भीतर तक भेदते हुए प्याला टेबल पर रखकर वह बोला।

उसकी बात का कोई रोमांटिक जवाब देने के बजाय रूपल खिलखिलाकर हँस पड़ी। रूपल की खिलखिलाहट उसे हैरत में डाल गई।

“क्या हुआ? ऐसी क्या फनी बात कह दी मैंने?” उसने पूछा।

रूपल ने हँसते हुए अपनी उंगली उसके होंठों की तरफ उठा दी, “तुम्हारे होंठों पर मेरी लिपस्टिक लग गई है, ऐसा लग रहा है जैसे कि…” कहते-कहते वह रुक गई। 

“जैसे कि…” सारांश ने बात पकड़ ली।

“कुछ नहीं! जाने दो ना।” रूपल शर्मायी, उसे पता था कि वह क्या समझ रहा हैं।

“ऐसे कैसे जाने दूं। बताओ, जैसे कि…”

“पागल हो तुम, चलो पोंछो इसे।”

सारांश ने रूपल की आँखों में देखते हुए अंगूठा अपने होंठों पर फ़िराया।

“अब ठीक है ना! किसी को कुछ शक तो नहीं होगा?” उसने मज़ाकिया लहज़े में पूछा, तो रूपल शरमा गई।

“पता है रूपल, मैंने तुम्हें अपने कप से कॉफ़ी का सिप लेने क्यों कहा?” कॉफ़ी खत्म कर सारांश ने पूछा।

रूपल को कोई जवाब नहीं सूझा। कॉफ़ी तो कॉफ़ी होती है। एक प्याले से पी जाये या अलग प्यालों से, स्वाद तो वैसा ही देगी, जैसी बनी होगी। उसने ‘ना’ में सिर हिला दिया।

सारांश ने हाथ बढ़ाकर रूपल का हाथ थाम लिया और उसे सहलाते हुए बोला, “अपनी ज़िन्दगी की हर छोटी-बड़ी चीज़ तुमसे बांटना चाहता हूँ रूपल और ये कॉफ़ी महज़ एक शुरूवात है। चाहता हूँ कि ज़िन्दगी के हर लम्हे में, मेरी ख़ुशी में, मेरे ग़म में तुम शामिल हो। क्या मेरी ज़िन्दगी में शामिल होना चाहोगी? क्या मेरे साथ अपनी ज़िन्दगी बांटना चाहोगी? क्या बनोगी मेरी हमसफ़र?”

रूपल की आँखें भर आई। प्यार और आँसुओं में गहरा रिश्ता ज़रूर है। ये कभी न रोने वाले शख्स को भी रोना सिखा देता हैं। रूपल की आँखों से बहते आँसू उसके प्यार की गहराई बयां कर रहे थे, जिसमें सारांश का दिल भीगने लगा था।

“रोओ मत रूपल! तुम्हारी आँखों में आँसू नहीं देख सकता मैं। कभी तुम्हारे आँसुओं की वजह बन गया, तो सच कह रहा हूँ, खुद को तुमसे दूर कर लूंगा मैं।”

सारांश की इस बात पर रूपल उदास हो गई, “ऐसी बातें मत करो सारांश। अभी तो तुम पूरी तरह से मेरी ज़िन्दगी में आये भी नहीं हो और जाने की बात कर रहे हो। मुझे छोड़कर कभी मत जाना….कभी भी नहीं….वादा करो मुझसे।”

“अरे! मैं तो बस एक बात कह रहा था और तुम उदास हो गई। देखो मैं तुम्हारे साथ हूँ और हमेशा रहूंगा। तुम्हें छोड़कर कभी भी कहीं भी नहीं जाऊंगा। ये वादा है मेरा। पर हाँ, तुम्हें भी ये वादा करना होगा कि तुम कभी नहीं रोओगी। जानती हो इस दुनिया में कोई चीज़ मुझे सबसे प्यारी है, तो वो है तुम्हारी मुस्कराहट। वादा करो कि तुम हमेशा मुस्कुराती रहोगी।”

“मैं वादा करती हूँ।”

पहली मोहब्बत का पहला वादा था उनका। बड़ी सहजता से दोनों ने एक-दूसरे से वादा कर दिया था। मगर न सारांश अपना वादा निभा पाया, न ही रूपल। वह चला गया और अपने साथ रूपल की मुस्कराहट, उसकी हँसी भी ले गया। उसे गये हुए तीन बरस बीत चुके थे। पर रूपल की ज़िन्दगी वहीं ठहर गई थी। वह नहीं लौटा, न जाने कभी लौटेगा भी या नहीं!! मगर रूपल को उसका इंतज़ार था। इंतज़ार दुनिया का सबसे मुश्किल काम है, रूपल जानती थी। मगर क्या करे, ज़िन्दगी में उसके हिस्से यही आया था। हरदम, हर पल वह सोचती…कब खत्म होगा ये इंतज़ार? होगा भी या नहीं? कहीं ये कभी ख़त्म न होने वाला इंतज़ार तो नहीं? 

एक सिप से शुरू हुई कॉफ़ी आहिस्ता-आहिस्ता रूपल की ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बन गई। वैसे ही, जैसे पहली मुलाक़ात के बाद सारांश उसकी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बन गया था। हालांकि, ज़िन्दगी का एक मोड़ ऐसा आया, जब वह साथ छोड़ गया, पर कॉफ़ी ने साथ नहीं छोड़ा। रूपल को कम-से-कम इस बात की तसल्ली थी कि दर्द के अलावा भी उसका दिया हुआ कुछ है, जो उसके साथ है।

उसने बैरे को बुलाकर कॉफ़ी ऑर्डर की और ऑर्डर सर्व होने का इंतज़ार करने लगी। सामने रखी कुर्सी खाली थी, जो उसे मुँह चिढ़ा रही थी। वह मुँह फेरकर खिड़की के बाहर देखने लगी। जाने क्यों वह चाहे न चाहे, ख़ुद को इंतज़ार करता हुआ ही पाती थी। अक्सर उसके ज़ेहन में ये सवाल उठता – ‘क्या इंतज़ार ही मेरा मुक्क़दर है?’ तीन बरस अपनी ज़िन्दगी के हर लम्हे उसने इंतज़ार किया उसका, जो शायद पलटकर कभी आने वाला ही नहीं था और उस वक़्त कॉफ़ी हाउस में गुज़रते उन लम्हों में वह इंतज़ार कर रही थी उसका, जो शायद न आता तो बेहतर होता।

बारिश थम चुकी थी। मौसम साफ़ हो चुका था। मिलने का तयशुदा वक़्त कब का निकल चुका था। मगर आने वाले शख्स का कोई अता-पता न था।

कॉफ़ी हलक से उतारते हुए वह सोचने लगी – ‘वो ज़माना लद गया शायद, जब इंतज़ार करवाने का हक़ सिर्फ लड़कियों का हुआ करता था। आजकल के लड़के तो लड़कियों से भी दो कदम आगे हैं। लड़की आधा घंटा पहले आकर इंतज़ार कर रही है और उन जनाब की कोई खैर-ख़बर ही नहीं!’

उस शख्स की लेट-लतीफ़ी रूपल के मन में चिड़चिड़ाहट पैदा कर रही थी। उसका दिल चाह रहा था कि फ़ौरन वहाँ से चली जाये। लेकिन ये न मुमकिन था, न मुनासिब। वह मन मसोस कर बैठी रही, क्योंकि घर पर उन्हें जवाब भी तो देना था, जो उसकी इस वक्त इस कॉफ़ी हाउस में मौज़ूदगी की वजह थे – माँ सावित्री देवी और भाई देवेन्द्र। उन्होंने ज़ोर ना डाला होता, तो शायद वह यहाँ बैठी किसी अनजाने शख्स का इंतज़ार न कर रही होती। 

वह कई बार देवेन्द्र को अपना फ़ैसला सुना चुकी थी कि उसे नहीं मिलना किसी से, नहीं करनी शादी। लेकिन हर बार उसकी बात अनसुनी कर दी गई। दूसरी तरफ़, सावित्री देवी का इमोशनल अत्याचार भी कुछ कम न था। उन दोनों की टीम के आगे उसकी ज़िद कभी ठहर ही नहीं पाई। मगर इस बार वह साफ़-साफ़ कह आई थी कि ये आख़िरी बार है, जो वह किसी से मिलने जा रही है। अगर बात नहीं बनी, तो वे लोग उसे शादी के लिए कभी मजबूर नहीं करेंगे।

तय हुआ कि दोनों परिवारों के मेल-मिलाप के पहले लड़का-लड़की बाहर ही कहीं मिल लें। उसके बाद ही रिश्ते की बात आगे बढ़ाई जाये। ताकि यदि किसी वजह से बात न बन पाये, तो कम-से-कम रिश्तेदारों को ताने कसने का मौका न मिल सके। घर से नज़दीकी को देखते हुए मीटिंग पॉइंट एम.पी.नगर कॉफ़ी हाउस चुना गया।

बारिश थमे एक घंटे से भी ज्यादा का वक़्त गुज़र चुका था। रूपल तीन कप कॉफ़ी हलक से उतार चुकी थी। मगर वह शख्स अब तक नदारत था। धीरे-धीरे रूपल की चिड़चिड़ाहट उबाल मारने लगी – ‘क्या लड़का है? शादी के पहले ही कोई लड़का एक लड़की को ऐसे इंतज़ार करवायेगा, तो भगवान जाने शादी के बाद क्या करेगा? लड़की की ज़िन्दगी तो बस एक लंबा इंतज़ार बनकर रह जायेगी। और जहाँ तक मेरा सवाल है, ये इंतज़ार ही तो है, जिससे मैं छुटकारा पाना चाहती हूँ।’

रूपल के चेहरे के भाव हर घड़ी रंग बदल रहे थे। ऊपरी फ्लोर पर बैठे शख्स की काले चश्मे के पीछे छुपी आँखें रूपल के चेहरे पर आते-जाते हर भावों को बड़े गौर से देख रही थीं।

“सब्र का इम्तिहान भी क्या इम्तिहान है; जब टूटता है, तो तूफ़ान आता है।” बुदबुदाते हुए वह उठा और तेजी से सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आ गया। काउंटर पर मैनेजर के पास जाकर उसने रूपल की तरफ़ इशारा किया और बोला, “एक कॉफ़ी उन मैडम के लिये। कॉफ़ी के साथ ये स्लिप भी उन्हें पास कर देना।” 

उसने स्लिप मैनेजर की तरफ सरकाई, कॉफ़ी के पैसे दिये और तेज कदमों से बाहर निकल गया।

इंतज़ार करते-करते रूपल के सब्र का बांध तकरीबन टूट चुका था। वह उठने का मन बना रही थी कि बैरा ट्रे में कॉफ़ी लिए उसकी मेज़ के पास आया और मेज़ पर कॉफ़ी रख दी।

“आप शायद किसी और का ऑर्डर ले आये हैं। ये कॉफ़ी मैंने ऑर्डर नहीं की।” रूपल कुछ हैरत में बोली।

“मैडम! हमारे कॉफ़ी हाउस का ट्रेडिशन है – हर दिन एक स्पेशल कॉफ़ी एक स्पेशल गेस्ट के लिये। आज वो स्पेशल गेस्ट आप हैं।” कहकर उसने कॉफ़ी का प्याला मेज़ पर रखा और चला गया।

रूपल की हैरान नज़रें बैरे को जाते हुए देखती रही और जब मेज़ पर रखे कॉफ़ी के प्याले की ओर मुड़ी, तो प्याले के नीचे दबी एक छोटी सी स्लिप पर अटक गईं।

‘ये क्या है? स्पेशल कॉफ़ी के साथ स्पेशल मैसेज!!’ सोचते हुए रूपल ने प्याले के नीचे दबे स्लिप को खींच लिया और उसे देखने लगी। वह स्लिप कोरी थी। हैरान रूपल स्लिप को फेंकने को हुई, तभी उसकी नज़र स्लिप के दूसरी ओर पड़ी, जहाँ एक छोटी सी स्केच बनी हुई थी। वह स्केच रूपल की थी – उसकी खिड़की से बाहर झांकती हुई स्केच। रूपल का दिल एक पल को ज़ोर से धड़का। पुरानी यादें सतह पर तैरने लगी। मगर उसने ख़ुद को संभाला और स्लिप पर लिखे मैसेज को पढ़ने लगी – 

‘मत करो परवाह उसकी, जिसे परवाह नहीं वक्त की!’

रूपल ने सिर उठाकर देखा। बैरा आस-पास नज़र नहीं आया। उसने काउंटर की तरफ़ नज़र दौड़ाई, तो वहाँ मैनेजर फोन पर बात करने में मशगूल नज़र आया। रूपल स्केच को गौर से देखने लगी और उसके ज़ेहन में फिर पुरानी यादें तैरने लगी।

“नहीं!” बड़बड़ाकर उसने सिर झटका और स्लिप पर लिखे मैसेज को दोबारा पढ़ने लगी।

‘सच है! जिसे आपके वक़्त की परवाह नहीं, उसकी परवाह क्यों की जाये? अब मुझे एक मिनट भी यहाँ नहीं ठहरना।’ उसने एकदम से फैसला कर लिया।

एक लम्हा गंवाये बगैर उसने स्लिप अपने पर्स में डाला और पर्स हाथ में दबाकर कुर्सी से उठने लगी। तभी सफ़ेद शर्ट, काली पेंट, काला कोट पहने एक टिपिकल कॉर्पोरेट ब्रांड लड़का मेज़ के दूसरी छोर पर आकर खड़ा हो गया और तकरीबन हाँफते हुए बोला, “रूपल राइट!!”

क्रमश:

कौन आया है रूपल से मिलने? क्या होगा इस मुलाक़ात का अंजाम? पढ़ें अगले भाग में। 

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Author  – Kripa Dhaani

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