चैप्टर 5 अंतिम आकांक्षा सियारामशरण गुप्त का उपन्यास | Chapter 5 Antim Akanksha Siyaramsharan Gupt Ka Upanyas
Chapter 5 Antim Akanksha Siyaramsharan Gupt Ka Upanyas
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दिन का विश्राम है रात और रात का विश्राम दिन; परन्तु समय का कोई विश्राम नहीं । न वह दिन देखता है न रात; रात दिन चलते रहना ही उसका काम है। देखते ही देखते दिनों की भाँति कई बरस बीत गये । बड़ों से बच कर, जिनके सामने चिरकाल तक हम बच्चे ही बने रहते हैं, — मैं कहना चाहता हूँ कि बचपन की अवस्था को अब मैं पार कर चुका था। मुन्नी भी अब वह मुत्री न थी, पहले जिसे मैं हाथों पर लेकर ऊपर उछाल दिया करता था । परन्तु हाँ, रामलाल की प्रकृति हमसे कुछ भिन्न थी । कटकर आती हुई पतंग को देखकर उसे लूटने के लिए अब भी वह पहले जैसा ही चंचल दिखाई देता था। उसका जीवन किसी ऐसे चन्द्रमा के समान था जो नवमी की तिथि तक निरन्तर बढ़कर भी अपनी द्वितीया का बाँकपन नहीं छोड़ता। सबसे विचित्र तो यह है कि लड़कपन के किसी काम से रोके जाने पर वह निस्संकोच भाव से कह देता – वाह, लड़का नहीं तो क्या अभी मैं बूढ़ा हो गया !
अध्ययन के अति भोजन से मेरी जठराग्नि मन्द पड़ गई थी। इसलिए मैं देखता था कि स्वयं तृप्त हो जाने पर भी अपने भोजनों से माँ को तृप्त कर देने की शक्ति मुझमें न थी । सम्भवतः रामलाल यह बात समझता था। इसलिए इस कमी की पूर्ति वह ऐसे मनोरंजक ढंग से करता कि मुझे बहुत अच्छा मालूम होता। समझ-बूझ कर वह ऐसे समय भीतर पहुँचता जब माँ रसोईघर से बाहर के किसी काम में लगी होतीं ।
“माँ, मुझे बहुत भूख लगी है।”
“भूख लगी है तो क्या करूँ, और पहले क्यों नहीं आया? बाहर घन्टे भर से बैठा बातें तो बना रहा था। जा, फिर आना; अभी अवकाश नहीं ।” – माँ झुंझला कर कहतीं ।
“नहीं माँ, सचमुच बहुत भूख लगी है। —तुम नहीं मानतीं तो लो, मैं ये कन्डा-लड़कियाँ सब साफ किये देता हूँ? रसोई के लिए तुम्हीं तंग होगी।” – कह कर रामलाल किसी लकड़ी का छिलका उचेल कर दाँतों से कुतरने लगता ।
इस प्रचण्ड क्षुधा से पराजित होकर माँ को हाथ का काम छोड़ना ही पड़ता।
भोजन करते-करते अचानक वह कह उठता – आज तो मंगल है, तुम्हारे व्रत का दिन । थोड़ी दूर बैठ कर उसका भोजन देखती हुई माँ कुछ रुखापन प्रकट करके कहतीं है सो क्या करें।
“कुछ नहीं; मैं सोच रहा था, व्रत के दिन तो तुम नाम मात्र का भोजन करती हो। हम लड़कों के लिए ही अच्छे-अच्छे व्यंजन बनते हैं। – आज तो आलू का मोहनभोग बना होगा?” “बना है सो अभी खा तो चुका।”
रामलाल सिर झुकाकर बड़े ध्यान से अपनी पत्त देखने लगता। कहता- कहाँ माँ, इसमें तो एक किनका भी नहीं है। और जब पत्त में फिर से मोहनभोग आ जाता हो तो भोलापन दिखा कर कहता – यह है ! यह तो खा चुका था; फिर से व्यर्थ परोस दिया। और फिर तेजी के हाथ चलाने लगता ।
वह केवल भोजन – वीर ही न था काम करने में भी उसकी बराबरी का आदमी मिल सकना कठिन है। जुट जाता तो दो-दो तीन-तीन आदमियों का काम अकेले दी निबटा देता। फिर भी अभी तक हम उसका परिचय नहीं पा सके थे। अचानक एक दिन सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य का वह दिन आ पहुँचा।
मुन्नी की सगाई प्रतिष्ठित कुटुम्ब में सुन्दर वर के साथ हो चुकी थी। हम लोग विवाह की तैयारी में थे। रात के आठ बजे का समय था । हिसाब लगाया जा रहा था कि विवाह के खान-पान के लिए घी कितना चाहिए, शक्कर कितनी और इसी तरह बहुत कुछ। एकाएक घर में आतंक छा गया कि डाकू आ रहे हैं। क्षणिक किंकर्तव्यविमूढ़ता के ही अनन्तर ऐसी दुर्घटना का प्रतिकार करने के लिए अच्छी से अच्छी जो तैयारी की जा सकती थी, तुरन्त की जाने लगी। अर्थात् जो भाग सकते थे, भाग कर इधर-उधर जा छिपे और डर के मारे जो स्त्रियाँ और बच्चे इतना भी नहीं कर सकते थे, उन्हें आश्वासन देकर पूर्ण तत्परता के साथ मुहल्ले की ऐसी दरिद्र झोपड़ियों में ले जा कर बिठा दिया गया, जिनके लिए डाकुओं को तो क्या महाजनों और सेठों को भी कोई आकर्षण नहीं हो सकता। लोहे की तिजोरी से निकाल कर सोना चाँदी और काम के कागज पत्र भी ऐसे स्थान पर छिपा दिये गये जहाँ से उन्हें फिर प्राप्त करने में रखने वाले को भी कुछ याद करना पड़े। किन्तु यह सब निकल जाने पर भी लोहे की तिजोरी खाली न थी। उसमें सोने-चाँदी की वे नकली चीजें रख दी गई थीं, जो डाकुओं के तात्कालिक सन्तोष के लिए हमारे ऐसे किसी किसी गृहस्थ के यहाँ, बहुत पहले से तैयार कराके संकट काल के साक्षी ब्रह्मास्त्र की तरह आदर के साथ रख छोड़ी जाती हैं।
इसके अतिरिक्त हमारे यहाँ एक दुनाली भी थी। ढाई तीन हजार की बस्ती में अस्त्र – कानून की यह कृपा हमारे ऊपर ही थी । परन्तु इस कानून ने अहिंसा का जो धर्म सारे के सारे देश पर लाद दिया है उसके संक्रामक प्रभाव से हम लोग भी मुक्त न थे। फिर भी अपनी दुनाली को हम न भूल सके। इस मानसी हिंसा में हमें आपद्धर्म का ही भरोसा था। आपद्धर्म विद्रोही ही सही, है तो धर्म! अतएव दुनाली के साथ गनपत जमादार सामने वाले घर के ऊपरी खण्ड में ऐसी जगह बिठा दिया गया, आवश्यकता पड़ने पर, जहाँ से डाकुओं के ऊपर अनायास ही गोलाबारी की जा सके।
यह काम तत्परता के साथ शीघ्र किया गया कि कोई भी हममें से किसी पर कर्त्तव्यहीनता का दोषारोपण नहीं कर सकता। वास्तव में हम लोग डाकुओं के लिए बहुत पहले से तैयार थे। डाकू विक्रमसिंह के कारण इन दिनों चारों ओर दूर-दूर तक बहुत आतंक था। यह डाकू अभी नया ही था, इसके डर की तीक्ष्णता अभी तक किसी को सह्य नहीं हो सकी थी। भूकम्प की भाँति किसी अलक्ष्य में अपनी तैयारी करके वह किसी भी जगह अचानक प्रकट हो सकता था । प्रत्येक दूसरे-तीसरे दिन उसकी किसी न किसी निर्दयता का समाचार सुनना ही पड़ता था । पहले भी दो-तीन बार हमारे गाँव में उसके आ पहुँचने के समाचार आ चुके थे। ये समाचार आधुनिक विज्ञान की सहायता के बिना ही क्षण भर में गाँव के इस छोर से उस छोर तक आश्चर्यजनक रीति से फैल जाते थे। साँझ का दिया जलने के पहले ही सारा का सारा बाजार तुरन्त बन्द हो जाता और घर-घर ताले से पड़े हुए दिखाई देने लगते। अच्छी तरह यह सब हो चुकने के अनन्तर दूसरे दिन मालूम होता – डाकू न थे, हमने तो पहले ही कह दिया था; उनके यहाँ कोई बड़ा मेहमान आया था, उसको उस जंगल में चिड़ियाँ मारते देख कर उस डरपोक ने व्यर्थ ही गाँव भर में हो-हल्ला कर दिया – डाकू आये, डाकू आये ! इस बार भी ऐसा ही हो सकता था। परन्तु सम्भावना को ध्रुव मान कर निष्क्रिय बैठ रहना हम बुद्धिमानों का काम नहीं । आपत्ति पहले इसी तरह धोखा देती है और फिर धोखे ही धोखे में अचानक गले आ पड़ती है । विक्रमसिंह के कारण पुलिस भी कम परेशान न थी । बराबर वह उसका पता लगा रही थी। गाँव के दरोगा मुझे एक दिन अचानक मिल गये । टहलने के समय भी उसी की बात उनके भीतर चक्कर काट रही थी । मुझसे पूछने लगे – भाई, तुम तो बताओ, यह विक्रमसिंह कौन है और इसका पता कैसे लगे?
मैंने कहा- हाँ मैं बता सकता हूँ। सुन कर दारोगा साहब की आँखें आनन्द से चमकने लगीं। शीघ्रता से कहने लगे- हाँ बताओ भाई, बताओ। मैंने उत्तर दिया – सुनिए; विक्रमसिंह डाकू है और उसका पता लगाने का ढंग यही है जो आप इस समय कर रहे हैं। मुझ जैसे आदमियों को छोड़ कर आप उसका पता दूसरी जगह नहीं पा सकते ।
दारोगा साहब झेंप गये। बोले- नहीं नहीं, मेरा मतलब यह न था । आप लोग भी क्या, — जरा जरा सी बात पर नाखुश हो जाते हैं !
क्रमश:
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