चैप्टर 44 वैशाली की नगरवधु आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास | Chapter 44 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

चैप्टर 44 वैशाली की नगरवधु आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास | Chapter 44 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

Chapter 44 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

Chapter 44 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

गर्भ-गृह में : वैशाली की नगरवधू

गर्भगृह में माधव ब्रह्मचारी के साथ हठात् अम्बपाली को आते देख भगवान् वादरायण व्यास ने आश्चर्यमुद्रा से कहा—

“अरे देवी अम्बपाली!”

माधव ब्रह्मचारी ने ज्योंही वह अतिश्रुत नाम सुना, वह अचकचाकर अम्बपाली की ओर ताकता रह गया।

अम्बपाली ने पृथ्वी पर गिरकर प्रणिपात किया। भगवान् वादरायण ने स्वस्ति कहकर कहा—”तुम्हारा कल्याण हो, जनपदकल्याणी अम्बपाली कहो, तुम्हारा यह अकस्मात् आगमन क्यों?”

“अविनय क्षमा हो, मैं प्रथम से बिना ही आदेश पाए चली आई। किन्तु सर्वदर्शी भगवत्पाद ने इस अकिञ्चन के विश्राम-आतिथ्य की जो असाधारण व्यवस्था की, उससे मैं अति कृतार्थ हुई।”

“किन्तु-किन्तु!…” भगवान् वादरायण ने तरुण बटुक की ओर प्रश्न-सूचक दृष्टि से देखा।

ब्रह्मचारी ने अटकते हुए कहा—”भगवत्पाद का आदेश यथाशक्ति पालन किया गया है।”

“क्या रात्रि में और कोई अतिथि नहीं आए?”

माधव ने सावधान मुद्रा से कहा—”एक राजवर्गी सामन्त भी हैं।” इसी समय एक छाया ने गर्भगृह में प्रवेश किया। उसे देखकर भगवान् वादरायण कुछ असंयत हुए! उन्होंने दोनों हाथ उठाकर कहा—

“मगध-सम्राट की जय हो!”

तब तक मगध-सम्राट का मस्तक भगवान् वादरायण के चरणों में झुक गया।

सम्राट का नाम सुनते ही माधव स्तम्भित हो गया। वह अपनी अविनय पर विचार करने लगा। भगवत्पाद के संकेत से उसने आसन की व्यवस्था की।

स्वस्थ होकर बैठने के बाद सम्राट ने हंसकर कहा—”भगवत्पाद का आशीर्वाद विलम्ब से मिला। प्रसेनजित् ने मुझे करारी हार दी है, अभियान के समय मैं भगवत्पाद के दर्शन नहीं कर सका। वार्षभि विदूडभ ने मुझे डुबोया। उसी ने लिखा था कि श्रावस्ती पर अभियान का यही समय है, बूढ़े कामुक महाराज प्रसेनजित् अब कुछ न कर सकेंगे, वे कौशाम्बीपति उदयन से उलझे हुए हैं और सेनापति कारायण से मिलकर मैं सम्पूर्ण सेना में विद्रोह कर दूंगा।”

“और सम्राट् उसी के बल पर श्रावस्ती पर चढ़ दौड़े!” भगवान् वादरायण ने मन्द स्मित करके कहा। सम्राट ने लज्जा से सिर झुका लिया। भगवान् वादरायण फिर बोले—

“बन्धुल मल्ल और उसके बारह परिजनों के विक्रम का विचार नहीं किया?”

“आर्य वर्षकार ने आपत्ति की थी, वे पूरी शक्ति चम्पा-विजय में लगाकर तब इधर ध्यान देने के पक्ष में थे।”

कुछ देर चुप रहकर भगवान् वादरायण ने कहा—

“आप आए कब?”

“मध्य रात्रि के बाद। मैं अश्व पर निकला था, पर राह में वह मर गया। तब नौका पर चला। एक स्थल पर नौका उलट गई। तब मैं तैरकर मध्य रात्रि में यहां पहुंचा। आयुष्मान् मधु का मैंने रात आतिथ्य-ग्रहण किया और उसी की कुटिया में रात व्यतीत की।”

भगवान वादरायण ने प्रश्नसूचक दृष्टि से माधव की ओर देखा। मधु ने लज्जित होकर कहा—”अविनय क्षमा हो, मैं सम्राट को पहचान न सका। गुरुपद का आदेश कदाचित्…” वह अम्बपाली की ओर देखकर चुप हो गया।

अम्बपाली की ओर अभी तक सम्राट् की दृष्टि नहीं गई थी। अब उन्होंने भी इधर देखा। घृत-दीप के मन्द-पीत प्रकाश में अम्बपाली उन्हें एक सजीव चम्पक-पुष्प-गुच्छ-सी दीख पड़ी।

इसी समय भगवान् वादरायण खिलखिलाकर हंस पड़े। दोनों ने चकित होकर उनकी ओर देखा। उन्होंने कहा—

“खूब हुआ, सम्राट के लिए जो व्यवस्था की गई थी, उसका देवी अम्बपाली ने उपयोग किया, फलतः सम्राट को माधव की कुटिया के काष्ठफलक पर रात्रि व्यतीत करनी पड़ी।”

अम्बपाली ने आगे बढ़ और करबद्ध हो सम्राट् का अभिवादन किया। फिर मधुर कण्ठ से कहा—”सम्राट् की जय हो! मुझसे अनजाने ही यह अपराध हो गया है।”

सम्राट ने हंसकर कहा—”आप्यायित हुआ यह जानकर, कि जनपदकल्याणी देवी अम्बपाली ने मेरे लिए नियोजित कक्ष में शयन-सुख उठाया, और हर्षित हुआ।”

“अनुगृहीत हुई!”

“भला एक अनुग्रह तो स्वीकार किया देवी अम्बपाली ने। मुझे प्रसेनजित् से पराजित होने का क्षोभ नहीं है।” सम्राट ने हंसकर दोनों हाथ फैलाए।

भगवान् वादरायण ने हंसकर कहा—

“लाभ है, लाभ है, सुश्री अम्बपाली, तो मैं आज रात्रि में तुमसे वार्तालाप करूंगा।”

जैसी आज्ञा भगवन्! उसने प्रथम भगवान् वादरायण को और फिर मगध सम्राट को सिर झुकाकर अभिवादन किया और कक्ष से चली गई।

एकान्त होने पर भगवान ने कहा—

“तो आपकी महत्त्वाकांक्षा ने वर्षकार की बात पर विचार नहीं करने दिया?”

“इसी से तो भगवन् करारी हार खाई, परन्तु…।”

“वैशाली में ऐसा अवसर न आने पाएगा, क्यों?”

“भगवत्पाद जब हृद्गत भाव से अवगत हैं तो मैं आशीर्वाद की आशा करता हूं।”

“सम्राट् को उसकी क्या आवश्यकता है! विजय के लिए उनकी सेना और कूटनीति यथेष्ट है।”

“किन्तु यह तो भगवत्पाद का कोप वाक्य है। भगवान् प्रसन्न हों!”

भगवान वादरायण ने मन्द हास करके कहा—

“नहीं-नहीं सम्राट्, कोप नहीं। परन्तु सम्राटों और विरक्तों का दृष्टिकोण सदा ही पृथक् रहता है।”

“परन्तु भगवन् जहां जनपद-हित और व्यवस्था का प्रश्न है, वहां सम्राट् और विरक्त एक ही मत पर रहेंगे।”

“फिर भी सम्राट विरक्त सदैव कत्र्तव्य पर विचार करेगा और सम्राट अधिकारों पर। ये ही अधिकार युद्ध, रक्तपात और अशांति की जड़ हैं—यद्यपि वे सदैव जनपद-हित और व्यवस्था के लिए किए जाते हैं।”

“अविनय क्षमा हो भगवन्, इस युद्ध, रक्तपात और अशांति में भी एक लोकोत्तर कल्याण-भावना है। भगवान् भलीभांति जानते हैं कि छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्य छोटे-छोटे स्वार्थों के कारण परस्पर लड़ते रहते हैं, साम्राज्य ही उन्हें शांत और समृद्ध बनाता है। साम्राज्य में राष्ट्र का बल है, साम्राज्य जनपद की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है।”

भगवत्पाद हंस दिए। उन्होंने कहा—”इसी से सम्राट् छोटे-से वैशाली के गणतन्त्र को मगध साम्राज्य में मिलाना चाहते हैं?”

सम्राट् ने कुछ लज्जित होकर कहा—”भगवन्, स्वाधीनता सर्वत्र ही अच्छी वस्तु नहीं है, यह दासता की ध्वनि है और इसके मूल में आपाद अशांति, अव्यवस्था और उत्क्रान्ति है।”

भगवान् ने किंचित हास्य कर कहा—”तो कौशाम्बीपति उदयन ने श्रावस्ती अभियान में आपको सहायता नहीं दी?”

“यही तो हुआ भगवन्, विदूडभ ने यही तो कहा था कि कौशाम्बीपति ससैन्य सीमाप्रांत पर सन्नद्ध हैं; ज्योंही मगध सैन्य का आक्रमण होगा, वे उस ओर से घुस पड़ेंगे।”

“यह अभिसन्धि कदाचित् बन्धुल मल्ल ने पूरी नहीं होने दी?”

“नहीं भगवन्! आर्य यौगन्धरायण ने उदयन को आक्रमण न करके हमारे युद्ध का परिणाम देखने की सम्मति दी। यौगन्धरायण मृत मांस खाना चाहता था।”

भगवान् वादरायण जोर से हंस दिए! सम्राट भी हंसे।

“मैं भगवत्पाद के हास्य का कारण समझ गया। कदाचित् कौशाम्बीपति यौगंधरायण की सम्मति अमान्य करते, पर गान्धारनन्दिनी कलिंगसेना का अनुरोध न टाल सके। देवी कलिंगसेना ही के लिए उदयन ने कोसल पर आक्रमण किया था, परंतु कलिंगसेना ने ही जब यह संदेश भेजा कि मैंने कोसलेश को आत्मसमर्पण कर दिया है, कौशाम्बीपति का मेरे लिए अभियान धर्मसम्मत नहीं है। तब कौशाम्बीपति निरुपाय हो युद्धविरत हो गए।”

भगवान् वादरायण ने कहा—”तो सम्राट् अब नित्यकर्म से निवृत्त हो विश्राम करें। अभी और बातें फिर होंगी।” वे उठ खड़े हुए। सम्राट भी उठे। भगवान् ने कहा—”मधु, सम्राट के लिए…।”

सम्राट् ने बाधा देकर कहा—”नहीं-नहीं… भगवन्! मधु की कुटिया मुझे बहुत प्रिय है और मधु उससे भी अधिक।”

“कदाचित् इसलिए कि वह साधु कम और सैनिक अधिक है।”

“भगवन्! मुझे मधु-जैसे सैनिकों की बड़ी आवश्यकता है!”

“तो सम्राट् जैसे प्रसन्न हों।”

तीनों गर्भ-गृह से बाहर निकले।

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