चैप्टर 4 देवदास : शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास | Chapter 4 Devdas Novel By Sharat Chandra Chattopadhyay

Chapter 4 Devdas Novel In Hindi

Chapter 4 Devdas Novel In Hindi

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माता ने आश्चर्य से पूछा- ‘देवा, क्या कॉलेज की छुट्‌टी हो गई?’

दो दिन देवदास ने बड़ी चुस्ती के साथ बिताये। उसकी जो अभिलाषा थी वह पूरी नहीं हो रही थी पार्वती से किसी निर्जन स्थान पर भेंट नहीं होती। दो दिन बाद पार्वती की भी माँ ने देवदास को सामने देखकर कहा- ‘अगर इधर आ गये हो, तो पार्वती के विवाह तक ठहर जाओ।’

देवदास ने कहा- ‘अच्छा।’

दोपहर के समय पार्वती नित्य बांध से जल लाने के लिए जाती थी। बगल में पीतल की कलसी लेकर आज भी वह घाट पर आयी, देखा, निकट ही एक बेर के पड़ की आड़ में देवदास जल में बंसी फेंककर बैठे है। एक बार उसके मन में आया कि लौट चले, एक बार मन मे आया कि चुपके से जल भरकर ले चले। किंतु जल्दी में वह कुछ भी स्थिर न कर सकी। कलसी को घाट पर रखते समय संभवतः कुछ शब्द हुआ, इसी से देवदास की दृष्टि से उस ओर खिंच गयी। उसने पार्वती को देख, हाथ के इशारे से बुलाकर कहा- ‘पत्तो, सुन जाओ!’

पार्वती धीरे-धीरे पास जागर खड़ी हुई। देवदास ने एक बार मुख उठाया, फिर बहुत देर तक शून्य दृष्टि से जल की ओर देखते रहे। पार्वती ने कहा- ‘देव दादा, मुझे कुछ कहते हो?’

देवदास ने किसी ओर देखकर कहा- ‘हूं बैठो।’

पार्वती बैठी नहीं, सिर नीचा किये खड़ी रही। किन्तु जब कुछ देर तक कोई बातचीत नहीं हुई, तो पार्वती ने धीरे-धीरे एक-एक पांव घाट की ओर बढ़ाना आरंभ किया। देवदास ने एक बार सिर उठाकर उसकी ओर देखा फिर जल की ओर देखकर कहा- ‘सुनो!’

पार्वती लौट आयी, किन्तु फिर भी देवदास ने कोई बात नहीं कही, यह देख वह लौट गयी। देवदास निस्तब्ध बैठे रहे, थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर देखा, पार्वती जल लेकर जाने की तैयारी कर रही है। यह देख वह हंसी हटाकर घाट के ऊपर आ खड़े हुए – ‘मैं आया हूँ।’ पार्वती ने केवल खड़ा रख दिया, कुछ बोली नहीं।

पार्वती कुछ देर तक चुपचाप खड़ी रही, अंत में अत्यंत मीठे स्वर से पूछा- ‘क्यों?’

‘तुमने लिखा नहीं था?’

‘नहीं।’

‘यह क्या पत्तो! उस रात की बात भूल गयी?’

‘नहीं; किन्तु उस बात से अब काम ही क्या?’

उसका कंठ-स्वर स्थिर, किन्तु रूखा था। देवदास उसका मर्म नहीं जान सके, कहा- ‘मुझे क्षमा करो,मैं तब इतना नहीं समझ सका था।’

‘चुप रहो, ये सब बाते मुझे नहीं सुहाती।’

‘मैं जिस तरह से होगा, माँ-बाप को राजी करूंगा। सिर्फ तुम…!’

पार्वती ने देवदास के मुँह की ओर एक बार तीखी नजर से देखकर कहा- ‘तुम्हारे ही माँ-बाप है, मेरे नहीं? क्या उनकी इच्छा-अनिच्छा से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है?’

देवदास ने लज्जित होकर कहा- ‘क्यों नहीं है पत्तो, पर वे लोग तो राजी हैं, सिर्फ तुम…!’

‘तुम कैसे जानते हो कि वे लोग राजी हैं, वे बिल्कुल राजी नहीं हैं।’

देवदास ने हँसने की व्यर्थ की चेष्टा करके कहा- ‘अरे नहीं, वे लोग राजी है; यह मैं अच्छी तरह से जनता हूँ। सिर्फ तुम…!’

पार्वती ने बीच मे ही बात काटकर तीव्र कंठ से कहा- ‘सिर्फ मैं तुम्हारे साथ? छि…!’ पलक मारते देवदास की दोनों आँखें अग्नि की तरह जल उठी। उसने अवरुद्ध कंठ से कहा- ‘पार्वती, क्या मुझे भूल गयी।’

पहले पार्वती भी कुछ चंचल हो उठी, किन्तु दूसरे ही क्षण आत्म-संवरण कर शांत और कठिन स्वर से उत्तर दिया- ‘नहीं, भूलूंगी क्यों? लड़कपन से ही तुम को देखती आयी हूँ। होश संभला, तभी से तुमसे डरती हूँ- क्या उसी डर को तुम दिखाने आये हो? पर क्या मुझे भी तुम नहीं पहचानते?’ यह कहकर वह निर्भीक दोनों आँखों को ऊपर उठाकर खड़ी हो रही।

पहले देवदास के मुँह से कोई बात नहीं निकली, फिर कहा- ‘सर्वदा से मुझसे तुम डरती ही आयी हो और कुछ नहीं?’

पार्वती ने दृढ़ स्वर से कहा – ‘नहीं और कुछ नहीं।’

‘सच कहती हो?’

‘हाँ, सच कहती हूँ। तुम पर मेरी कुछ भी श्रद्धा नहीं है।मैं जिसके यहाँ जा रही हूँ, वे धनवान, बुद्धिमान, शांत और स्थिर हैं। वे धार्मिक हैं। मेरे बाप मेरा भला सोचते हैं, इसी से वे तुम्हारे जैसे अज्ञान, अव्यवस्थित वित्त, दुर्दान्त मनुष्य के हाथ मुझे किसी तरह नहीं देना चाहते। तुम रास्ता छोड़ दो।’

एक बार देवदास ने कुछ इधर-उधर किया। एक बार रास्ता छोड़ने के लिए भी तैयार हुए; परन्तु फिर दृढ़ता के साथ मुँह उठाकर कहा- ‘इतना अहंकार?’

पार्वती ने कहा – ‘क्यों नहीं? तुम कर सकते हो और मैं नहीं? तुम में रूप है, गुण नहीं, मुझ में रूप भी है, गुण भी है… तुम बड़े आदमी हो, लेकिन मेरे पिता भी भिक्षुक नहीं हैं। इसे छोड़ मैं स्वयं भी तुम लोगो से किसी अंश में हीन नहीं रहूंगी।’

देवदास अवाक्‌ रह गये। पार्वती ने फिर कहना आरंभ किया- ‘तुम क्या सोचते हो कि तुम मुझे हानि पहुँचाओगे?हाँ, अधिक नहीं, तो कुछ हानि अवश्य पहुँचा सकते हो, यह मैं जानती हूँ। अच्छा वही करो। मुझे सिर्फ रास्ता दो।’

देवदास ने हत्‌बुद्धि होकर कहा- ‘हानि किस तरह पहुँचा सकता हूँ?’

पार्वती ने तत्क्षण उत्तर दिया- ‘अपवाद लगाकर वह बात तुम कहोगे।’

यह बात सुनकर देवदास वज्रहत की तरह देखते रहे। उनके मुख से केवल यही बात निकली- ‘अपवाद लगाऊंगा, मैं?’

पार्वती ने विषैली हँसी हँसकर कहा- ‘जाओ, बचे हुए समय मे मेरे नाम में कलंक लगाओ। उस रात मैं तुम्हारे पास अकेली गयी थी, इसी बात को लेकर लोगो में चारों ओर फैलाओ। इससे मन की बड़ी सांत्वना मिलेगी।’ यह कहते-कहते पार्वती के दर्पित कु्रद्ध होठ कांपते-कांपते स्थित हो गये।

किन्तु देवदास के हृदय में क्रोध और अपमान से ज्वलामुखी पर्वत की भांति भीषण अग्नि सुलग रही थी। उन्होंने अव्यक्त स्वर से कहा – ‘तुम क्या झूठी बदनामी उठाकर मैं सांत्वना पाऊंगा।?’ – और उसी समय बंसी के मुठिये को घुमाकर, पकड़कर भीषण कंठ से कहा- ‘सुनो पार्वती, इतना रूपवान होना ठीक नहीं, अहंकार बहुत बढ़ जाता है।’ कह कहकर तनिक धीरे स्वर से कहा- ‘देखती नहीं हो, चन्द्रमा इतना सुंदर है, इसी से उसमें कलंक का काला धब्बा लगा है। कमल कितना श्वेत है, इसीलिए उसमें काले भौरें बैठते है। आओ, तुम्हारे मुँह में भी कुछ कलंक का चिन्ह दे दूं।’

देवदास के संयमकी सीमा जाती रही। उन्होंने दृढ़ मुट्‌ठी से बंसी के मुठिये को पकड़कर इतने जोर से पार्वती के सिर मे मारा कि लगने के साथ ही सिर बायी भौ के नीचे तक फूट गया। पल भर मे सारा मुख खून से सराबोर हो गया।

पार्वती पृथ्वी पर गिर पड़ी। कहा- ‘देव दादा, क्या किया?’

देवदास ने बंसी टुकड़े-टुकड़े कर, पानी में फेंक उत्तर दिया- ‘अधिक कुछ नहीं जरा-सा कटा गया है।’

पार्वती आकुल कंठ से रो उठी- ‘बाप रे बाप, देव दादा!’

देवदास ने बारीक कुरते को फाड़कर पानी मे भिगोकर बांधते हुए कहा- ‘घबराओ नहीं पत्तो, यह हल्की-सी चोट जल्दी ही अच्छी हो जायेगी, सिर्फ दाग रह जायेगा। यदि कोई इसके विषय मे पूछे तो झूठी बात कहना, नहीं तो अपने कलंक की बात प्रकट करना।’

‘अरे बाप रे बाप!’

‘छिः! ऐसा न कहो पत्तो! विदाई के अंतिम दिनो में सिर्फ एक निशान बनाये रखने के लिए यह चिन्ह दे दिया है। इस सोने से मुख को तुम आरसी में कभी-कभी देखोगी तो?’ यह कहकर उत्तर पाने की कोई अपेक्षा न कर देवदास चलने के लिए तैयार हुए।

पार्वती ने व्याकुल होकर रोते-रोते कहा- ‘उफ! देव दादा!’

देवदास लौट आये। आँख के कोने में एक बिंदु जल था। बहुत स्नेह-भरे कंठ से कहा- ‘क्यों, पत्तो?’

‘किसी से कहना मत।’

देवदास ने क्षण-भर में ही खड़े होकर झुककर पार्वती के केशो के ऊपर उठाकर अधर स्पर्श कर कहा- ‘छिः! तुम क्या कोई दूसरी हो? शायद तुम्हें याद न हो, बचपन में मैंने शरारत से कई बार तुम्हारे कान मल दिये हैं।’

‘देव दादा, मुझे क्षमा करो।’

‘यह तुम्हें नहीं कहना होगा भाई, क्या सचमुच ही मुझे भूल गयी पत्तो? मैंने कब तुमको क्षमा नहीं किया है?’

‘देव दादा…!’

‘पार्वती, तुम तो जानती ही हो, मैं अधिक बातें नहीं कर सकता। बहुत सोच-विचार कर कोई काम मुझसे नहीं हो सकता, जो मन में आता है वही कर बैठता हूँ।’ यह कहकर देवदास ने पार्वती के सिर पर हाथ रखकर आर्शीर्वाद देते हुए कहा- ‘तुमने अच्छा ही किया। मेरे यहाँ रहकर संभवतः तुम सुख नहीं पाती, किन्तु तुम्हारे इस देव दादा को अक्षय स्वर्ग सुख मिलता।’

इसी समय बांध की दूसरी ओर से आदमी आ रहे थे। पार्वती धीरे-धीरे जल लेने के लिए उतरी थी।

देवदास चले गये। पार्वती जब घर लौटकर आयी, तो दिन ढल गया था। दादी ने उसे देखकर कहापत्तो, क्या पोखरन के पानी लाती हो?’

किन्तु उसके मुँह की बात मुँह में ही रह गयी। पार्वती के मुँह की ओर देखते ही चिल्ला उठी- ‘बाप रे बाप, यह क्या हुआ?’

घाव से अब भी खून बह रहा था। कपड़े का टुकड़ा प्रायः खून से तर हो गया था। रोते-रोते कहा‘बाप रे बाप, तेरा ब्याह है पत्तो!’

पत्तो ने सहज भाव से उत्तर दिया- ‘घाट पर पांव फिसल जाने से सिर के बल र्इंटो पर गिर पड़ी थी, जिससे कुछ चोट आ गयी।’

इसके बाद सब मिलकर सुश्रुषा करने लगे। देवदास ने सच कहा था- ‘आघात अधिक नहीं है।’

चार-पांच दिनो में ही वह सूख गया। इसी भांति आठ-दस दिन बीत गये। फिर एक दिन रात के समय हाथीपोता गाँव के जमीदार भुवनमोहन चौधरी वर बनकर विवाह करने के लिए आये। उत्सव बहुत तड़क-भड़क के साथ नहीं मनाया गया। भुवन बाबू नासमझ आदमी नहीं थी- इस प्रौढ़ावस्था में दूसरा विवाह करने के समय छोकरा बनकर आना ठीक नहीं।

वर की उम्र चालीस वर्ष नहीं, कुछ ऊपर ही है, गौरवर्ण और मोटा-सा थुलथुल शरीर है। कच्चीपक्की मूँछे मिलाकर खिच्ड़ी हो रही थी और सिर का अगला भाग सफाचट हो रहा था। वर को देखकर कोई हँसा और कोई चुप ही रहा। भुवन बाबू शांत गंभीर मुख से किसी अपराधी की भांति विवाह मंडप मे आकर खड़े हुए। कोहबर में स्त्रियों ने उनके साथ हँसी-मजाक नहं किया। कारण, ऐसे विज्ञ, गंभीर मनुष्य के साथ हँसी करने का किसी को साहस नहीं हुआ। शुभ-दृष्टि के समय पार्वती किचकिचाकर देखती रही। होठ कोण में थोड़ी हँसी की रेखा भी थी। भुवन बाबू ने छोटे बच्चो की तरह दृष्टि नीची कर ली। गांव की स्त्रियाँ खिलखिलाकर हँस रही थी। चक्रवर्ती महाशय इधर-उधर दौड़-धूप कर रहे थे। प्रवीण जमाता को पाकर वे कुछ व्यस्त से हो उठे। जमीदार नारायण मुखोपाध्याय आज कन्या-पक्ष के सब कर्ता-धर्ता थे। वे पक्के-प्रबंधकर्ता थे। किसी भी तरह की त्रुटि नहीं होने पायी। शुभ कर्म भली-भांति समाप्त हो गया।

दूसरे दिन प्रातःकाल चौधरी महाशय ने एक बॉक्स गहना बाहर निकालकर रख दिया। ये सब गहने पार्वती के शरीर में जगमगा उठे। माता ने उसे देख आंचल से आँख का आँसू पेछा। पास ही जमीदारिन खड़ी थी, उन्होंने सस्नेह तिरस्कार करके कहा- ‘आज आँख का आँसू बहाकर अशुभ न करो!’

संध्याके कुछ पहले मनोरमा ने पार्वती को एक निर्जन घर में ले जाकर आर्शीवाद दिया। कहा- ‘जो हुआ, अच्छा ही हुआ, अब देखोगी कि तुम पहले से कितने सुखी हो।’

पार्वती ने थोड़ा हँसकरर कहा- ‘हाँ होऊंगी। जम के साथ-साथ कल थोड़ा परिचय हुआ है न!’

‘यह कैसी बात?’

‘समय पर सब देख लोगी।’ मनोरमा ने बात को दूसरी ओर घुमाकर कहा- ‘यदि तुम्हारी इच्छा हो तो एक बार देवदास को इस सोने की प्रतिमा को लाकर दिखाऊं?’

पार्वती चमक उठी- ‘ला सकती हो बहिन! क्या एक बार बुलाकर नहीं ला सकती?’

मनोरमा का कंठ स्वर सिहर उठा- ‘क्यों पत्तो?’

पार्वती ने हाथ का कड़ा घुमाते-घुमाते अन्यमनस्क भाव से कहा- ‘एक बार उसके पांव की धूल को सिर पर चढ़ाऊंगी, आज जाऊंगी न!’

मनोरमा ने पार्वती को छाती से लगा लिया, फिर दोनों बहुत देर तक रोती रही। संध्या हो गयी, अंधकार बढ़ गया। दादी ने द्वार ठेलकर बाहर से ही कहा- ‘ओ पत्तो, ओ मनो, तुम लोग जरा बाहर आना बहिन!’

उसी रात पार्वती स्वामी के घर चली गयी।

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