चैप्टर 4 अंतिम आकांक्षा सियारामशरण गुप्त का उपन्यास | Chapter 4 Antim Akanksha Siyaramsharan Gupt Ka Upanyas
Chapter 4 Antim Akanksha Siyaramsharan Gupt Ka Upanyas
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खलियान गाँव से कुछ दूर था। रविवार के दिन वहाँ जाने के लिये मैं अकेला निकल पड़ा। समझता था, मार्ग मेरा जाना हुआ है। पहले दो एक बार मैं वहाँ हो आया था। परन्तु गाँव के बारह कुछ दूर जाकर मैं एक विचित्र गोरखधन्धे में पड़ गया। दो पगडंडियाँ बाई तरफ गई थीं दो चार दाई तरफ। कटे हुये खेतों के बीच में भी आने जाने वालों ने बहुत-से नये मार्ग बना लिये थे। गाँव के लोग इन सबमें से किसी एक को किस तरह पहचान लेते हैं, मेरे लिये यह एक समस्या थी। रंग-रूप, आकार-प्रकार इन सबका एक; न कोई छोटा और न कोई बड़ा । अपने परिचय के विषय में सब समान रूप से चुप । किसी पुस्तक के बीच किसी अज्ञात भाषा के उद्धरण को छेड़ते हुये आगे का अंश पढ़कर हम अपने आप ठीक ठिकाने पर आ जाते हैं; यहाँ यह भी सम्भव न था । इसलिए उन पगडंडियों के अनुग्रह पर ही अपने को छोड़कर मुझे आगे बढ़ना पढ़ा ।
बहुत दूर निकल जाने पर, उस ओर से आते हुए एक किसान ने ‘राम राम !’ करके मुझसे कहा – इधर कहाँ जा रहे हो भैया?
रुक कर मैंने कहा – अपने बड़े खेत के खलिहान तक घूमने के लिए जा रहा था।
“तुम्हारा रास्ता तो पीछे छूट गया। भैया, तुम जैसे बड़े आदमियों का काम इधर अकेले आने का थोड़े है। बड़े मालिक (मेरे पिता) की भी जब कभी खेतखलिहान देखने की मौज होती थी तब हमेशा चार छः नौकर साथ रहते थे। तुम्हें भी किसी को साथ लेकर आना चाहिए ।मैं काम से जा रहा हूँ, नहीं तो तुम्हें मैं ही वहाँ तक पहुँचा आता। देखो, इस पगडंडी से जाकर सामने वह जो इमली का पेड़ दीख रहा है-“
मैंने सामने की ओर देखा, वहाँ बहुत से पेड़ दिखाई दिये। अब इनमें से कौन पेड़ इमली है और कौन आम; मेरे लिए यह जानना कठिन था। फिर भी मैंने कहा- अच्छा।
“तो बस उस खेत की मेंड़ को बाई ओर छोड़कर सीधे चले जाना।”
इस तरह बार-बार अपनी भूल का संशोधन परिशोधन करता हुआ बड़ी कठिनता से मैं अपने खलिहान पर पहुँचा ।
वहाँ काम करने वालों को बड़ा विस्मय हुआ । मानों पैदल ही सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके मैं वहाँ पहुँचा होऊँ। रतना ने कहा- भैया, अकेले इतनी दूर कैसे चले आये; कहीं रास्ता तो नहीं भूले ?
किसना ने उसे फटकारते हुए कहा- बेशऊर कहीं का! यहाँ तक भी न आ सकते? उनकी अङ्गरेजी की पोथी में दुनिया भर की बातें लिखी हैं। बम्बई, कलकत्ता और न जाने कहाँ-कहाँ की ।
इसके बाद उसने गिटपिट गिटपिट करके अङ्गरेजी पढ़ने की नकल की ।
मैंने पूछा- रामलाल कहाँ है ?
वह बोला- कौन रामलाल ?
एक दूसरे आदमी ने कहा- अरे रमला की बात कह रहे हैं, रमला की! भैया, ऐसा वज्री लड़का तो दूसरा नहीं देखा। इसे वहीं बुला लो तो चैन पड़े। दिन भर ऊधम करता रहता है। किसी काम के लिए कहो तो सौ बहाने । अभी-अभी रोटी खाकर नहर के बम्बे पर पानी पीने गया है। नवाब का बेटा है न, इस कुएँ का पानी खारी लगता है !
मैंने विस्मय से पूछा -रोटी खाने का यह कौन समय है ?
“भैया, यह खेत है, घर नहीं कि जब जी चाहा भीतर जाकर मालकिन के हाथ-पैर जोड़े और दो-चार फुलके झट से पेट में डालकर हाथ-मुँह पोछते हुए बाहर निकल आये। यहाँ तो फुरसत पाकर जब कोई घर से रोटी दे जाय तभी समय है। हाँ, आज कुछ देर हो गई।”
“तो क्या वह इतनी देर तक भूखा ही बना रहा?”
“वह भूखा रहेगा तो हो चुका। रतन की एक रोटी जबर्दस्ती छीन कर खा गया। और फिर यहाँ तो ढेर के ढेर गेहूँ-चने हैं। दिन भर खाता रहता है।”
“कच्चे ही?”
छने चनों के ढेर के पास खड़े हुए एक आदमी ने कुछ चने उठा कर अपने मुँह में डालते हुए कहा- भैया, यह अन्न-देवता है; कच्चा भी किसको मिलता है ?
सुन कर दूसरे लोग हँसने लगे। अँगरेजी की पोथी में दुनियाँ भर की बातें पढ़ा हुआ मैं, मानों इतनी साधारण बात भी नहीं जानता ।
थोड़ी देर में ही रामलाल दिखाई दिया- एक भैंस की पीठ पर चढ़ा हुआ। एक हाथ में मोटी छड़ी जैसी कोई लकड़ी थी और दूसरे में हाल की तोड़ी हुई एक अमिया । उसे ऊपर उछाल कर उसी हाथ में बार- बार गुपक रहा था। दूर से देखते ही रतन ने कहा- देखी भैया, रमला की शैतानी ? यह ऐसे ही काम करता रहता है। भैंस बेंतर हो तो नीचे गिराकर सीधा जमराज के यहाँ भेज दे।
मुझे हँसी आ गई। इसी बीच में रामलाल ने मुझे देख लिया। देखते ही झट से भैंस की पीठ पर से नीचे कूद पड़ा और लकड़ी मार मार कर उसे इस प्रकार भगाने लगा, मानों नाज खाने के लिए अनधिकार प्रवेश करके वह उसकी सीमा के भीतर आ गई हो।
मेरे पास आकर बोला- भैया, बहुत दिनों में यहाँ आये? आज मैं अपने आप वहाँ आने की सोच रहा था। साथ में डोर पतंग नहीं लाये ? लाते तो बड़ा मजा रहता ।
मैंने कहा – लड़ाने के लिए यहाँ दूसरा तो कोई है ही नहीं ।
“अरे दूसरा कोई नहीं है तो क्या हुआ, हम अपने आप ही तानते। सचमुच बड़ा अच्छा रहता।”
बड़बड़ाते हुए एक किसान ने आकर कपड़े की बँधी हुई झोली में से एक ढेर कच्ची अमियाँ नीचे गिराते हुए कहा- देखो भैया, इस रमला की शैतानी ! मेरे आम पर चढ़कर ये अमियाँ झड़ा आया है। कच्ची है, अब यह नुकसान हुआ या नहीं? रखवाली पर बूढ़ी डोकरी थी, उसके रोकने पर उसे मुँह से चिढ़ा कर भाग आया। बड़े आदमी का नौकर समझ कर कोई कुछ नहीं कहता। नहीं तो गुस्सा ऐसा आता है कि अच्छी तरह धुनक दूँ, जिसमें फिर हमेशा को याद रहे ।
रामलाल ने टेढ़ी नजर से उसे देखते हुए कहा – अमियाँ क्या गिराई हैं? अपने आप हवा से झड़कर गिर गई और झूठ-मूठ मेरा नाम लेते हैं। डोकरी बिना कारण मुझसे चिढ़ती है। कहती है इस पेड़ के नीचे से रास्ता नहीं है, उधर से जाओ। मैंने तो कुछ कहा नहीं, नहीं तो झोंटा पकड़ कर-
किसान ने भड़क कर कहा-सुन लो भैया रतन, सुन लो इस लड़के की बात! मेरा नुकसान करके उलटा मुझी को डाँट रहा है। ये अमियाँ हवा की गिरी है? देखो, देखो- “
आदमियों ने बड़ी कठिनता से समझा बुझाकर उसे वहाँ से रवाना कर पाया। उसके चले जाने पर रतन ने कहा- देख लिया भैया, तुमने इसका हाल ? यह हम सब की बदनामी करायगा। मुनीम कक्का से कह कर इसे यहाँ से बुला लो। उनके हंटर पड़ेंगे तभी यह मानेगा ।
रामलाल के मुँह पर निश्चिन्तता का ऐसा भाव था, मानों उसकी शिकायत की चिट्ठी ऐसे लेटर बाक्स में डाली गई है जिसमें की चिट्ठियाँ कभी निकाली ही नहीं जाती। उसने कहा- दादा, नाखुश क्यों होते हो, मैं अभी चिलम भर कर लाता हूँ।
रतन को छोड़कर और सब लोग हँस पड़े। एक ने कहा- भैया, समझे इसकी बात? अभी-अभी इतनी फटकार पड़ चुकी है, फिर भी शरारत करने के लिए तैयार है। चिलम में तमाखू की जगह न जानें कौन कौन – सी सूखी पत्तियाँ घर लायगा और कहेगा-लो दादा, पियो तमाखू !
रतन उसके ऊपर एक तिरछी नजर डाल कर चुप रह गया। अपनी हँसी रोकते हुए रामलाल ने मुझसे कहा- चलो भैया, तुम्हें यहाँ घुमा- फिरा दूँ।
चलते-चलते मैंने कहा- रामलाल, घर पर तो तू ऐसा नटखट न था।
“घर पर तो माँ हैं, तुम हो, दादा हैं।”
“और कक्का नहीं?”
रामलाल ने मुँह विचका कर उपेक्षा के भाव से कहा – हूँ, – क्या मैं उन्हें डरता हूँ। माँ को बुरा लगेगा, इसी से कभी कुछ नहीं कहता।
“परन्तु उन्हीं ने तो मुझे खलिहान पर भेजा है कि कोई नौकर- चाकर यहाँ से कुछ टरका – टरकू न दे।”
“इसी से सब लोग मुझसे जलते हैं, मैं उनका अफसर हूँ।”
मुझे हँसी आई। बोला- इन बड़े-बड़े पूरे आदमियों का तू इतना छोटा अफसर।
सरल विस्मय से उसने कहा- क्यों, क्या छोटा आदमी अफसर नहीं हो सकता? उस दिन टोप लगाये जंट साहब गाँव देखने आये थे। उनके मूछें भी नहीं निकली थीं। लोग कहते थे, छोकड़ा है, – ताजा – विलायत; कोई बात समझता नहीं। फिर भी बड़ी-बड़ी भूरी मूँछों वाले झुक झुक कर सलाम करते थे।
“तो तू इन लोगों का ऐसा ही अफसर है?”
“हाँ भैया, अफसरी में बड़ा मजा है। मैंने कागज का एक टोप बनाया था, इन लोगों ने उसे फाड़फूड़ कर फेंक दिया है। साहब बन कर कुरसी की तरह कुएँ की जगत पर तनकर मैं बैठ जाता हूँ और हुक्म देता हूँ – तुम काला आदमी, हमारे लिए तमाखू का चिलम भर लाओ।”—कहते-कहते हँसी के मारे वह स्वयं लोट-पोट होने लगा।
“फिर तमाखू की चिलम आ जाती है?”
“आती कब है । अपने हरुआ चपरासी को हुक्म देना पड़ता है- पाकड़ो सुअर काला आदमी को; हमारा बात नहीं सुनता।”
“किसी को बुरा नहीं लगता?”
“बुरा क्यों लगेगा, सुनकर सब खुश होते हैं। दिन भर यहाँ यही आनन्द रहता है।”
चुपचाप चलते-चलते रामलाल ने नीरवता भंग करते हुए कहा- भैया, सुनी, इस हल्का की बदमाशी?
“क्या ? – हल्का तो सीधा-साधा बड़ा गरीब है। “
“सीधा-साधा नहीं, उसमें बड़े गुन हैं। कल साँझ के झुटपुटे में लोटा लेकर जल्दी-जल्दी दिशा के लिए जा रहा था। मैंने झट से पीछे से उसका हाथ पकड़ कर लोटा औंधा दिया । नीचे जमीन पर सेर डेढ़ सेर गेहूँ फैल गये। मेरे पैर पकड़क कर रोने लगा- भैया किसी से कहना नहीं। आकर अभी बिनिया कह गई थी, आज दिन में घर पर रोटी नहीं बनी; नाज न था। और सबका दुःख तो देख लिया जा सकता है, परन्तु बूढ़ी डोकरी का नहीं। कहती है; जब तक सब न खा लेंगे, मैं न खाऊँगी। इसी से – | मैंने कहा – डोकरी की माया थी तो नाज बाजार से क्यों नहीं खरीदा? कहने लगा-पैसे हों तब न – यहाँ तो ऋण के मद्धे काम कर रहा हूँ। उसकी सूरत देखकर मुझे दया तो आ गई, परन्तु है बड़ा बदमाश। मेरी आँखों में धूल डालना चाहता था ! “
सुन कर मैं सुस्त सा पड़ गया। थोड़ी देर चुप रह कर मैंने कहा- तूने यह क्या किया? उसे नाज ले जाने देता। बेचारी बुढ़िया के ऊपर भी तुझे दया न आई।
उसने मेरी ओर ताकते हुए कहा- वाह भैया, तुमने यह अच्छी कही। ऐसा हो तो सबका सब माल यहीं खेत पर से उड़ जाय । नौकर- चाकरों के घर का हाल तो ऐसा होता ही है। तो क्या कोई इसलिए किसी की चोरी करे? धर्म-कर्म भी तो कुछ है। कई बार मेरे घर भी दिन-दिन भर रोटी नहीं बन सकी। परन्तु बप्पा कहते हैं, धीरज धरने से सब ठीक हो जाता है। भगवान् रात-रात तक सबका पेट भरते हैं।
रामलाल की कोई बात ऐसी न थी, जिसके विरुद्ध मैं कुछ कह सकता। फिर भी न जाने क्यों उस दिन का मेरा सारा आनन्द क्षण भर में ही कहाँ किस जगह चला गया। मैंने पूछा- कक्का से तो तूने अभी तक यह बात नहीं कही?
“अभी तक तो वे मुझे मिले ही नहीं।”
“तो अब न कहना । “
रामलाल ने चुपचाप सिर हिला दिया ।
क्रमश:
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