चैप्टर 36 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 36 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

चैप्टर 36 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 36 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 36 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi

Chapter 36 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi

दिन का तीसरा पहर है। गोमती धीरे-धीरे बह रही है। सामने वन की हरियाली दूर तक फैली हुई और जगह-जगह झाड़, छोटे-बड़े पेड़, ढाक और जंगली वृक्षों का वन। चिड़ियाँ एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त को पार करती हुई। मधुर-मधुर हवा संसार के स्थावर और जंगम सभी को हृदय से लगाकर शान्त करती थी। सूर्य की स्वर्गीय किरणें सुनहली दृष्टि से विश्व के प्रतिचित्र को देखती हुई गोमती के किनारे एक टीले पर यमुना और प्रभावती बैठी हुईं मन्द स्वर से वार्तालाप कर रही हैं, आँखों की चितवन जैसे किसी की प्रतीक्षा के रहस्य में चंचल है। वीरसिंह जिस मुहूर्त तक बैठने के लिए कह गए हैं, वह पार हो चुका है। डरे हुए पशु कभी-कभी उधर से निकल जाते हैं।

“वह आ रहे हैं!” यमुना सजग होकर बोली और तीर-कमान सँभालने लगी।

प्रभावती ने भी कन्धे से कमान उतार ली, तीर जोड़ा। सवारों को देखती रही।

सवार एक बगल से निकले। उनके सामने शिकार था-एक चीता दोनों घोड़े पर। चीता सामने के गुल्म की ओर भगता हुआ। टीले की बगल से इसी समय सवारों ने तीर मारे। साथ ही दो तीर और छूटे, और सवारों के तीरों की बीच डाँड़ी पर लगे। वार कट गए। चीते ने घूमकर एक बार देखा और झाड़ी के भीतर हो रहा। सवारों की तेज निगाह यमुना और प्रभावती पर पड़ी।

सवार नजदीक थे। टीले के पास घोड़े बढ़ाए। बिलकुल सामने आ गए। यमुना और प्रभावती बैठी रहीं। टीले पर बैठी हुई सवारों से कुछ ऊँचे पर थीं। यह निश्चय कर लिया कि ये महाराज पृथ्वीराज और महाराजकुमारी संयोगिता हैं।

संयोगिता की भौंहें तनी हुईं। पृथ्वी भी गर्व की दृष्टि से देख रहे थे। यमुना और प्रभा की चितवन शान्त, जैसे कोई घटना नहीं घटी।

“तीर क्यों काटे?” हीन समझनेवाली निगाह से देखती हुई संयोगिता ने पूछा।

यमुना ने प्रभा को मौका दिया। उसके कुछ क्षण के मौन ने प्रभावती को समझा दिया कि उत्तर उसी को देना है। सोचकर प्रभावती बोली, “इसीलिए कि यह ऋषिभूमि है, यहाँ लोग भक्ति की भावना से आते हैं।”

“हमें तुम्हारी शिक्षा की जरूरत नहीं, तुम्हें मालूम हो।” और तेज गले से कहा।

“तुम्हारा या किसी का भ्रम-शोधन कर देना यहाँ हर एक का काम है।” बैठी हुई वैसी ही निर्भयता से प्रभावती ने कहा।

“तुम्हें मालूम है-मैं कौन हूँ।” कहती हुई संयोगिता अपमानित होने के भाव से क्षुब्ध हो गई।

“यह तो तुम्हीं को मालूम न होगा; तुम्हारी किसी भी उपाधि को ऋषिभूमि के लोग उपाधिमात्र समझेंगे।” और शान्त होकर प्रभा बोली।

“तो फिर उपाधि का प्रयत्न किया जाए?” प्रखर दृष्टि से देखती हुई संयोगिता बोली।

“क्यों कसर रहे? तभी तुम्हें भी मालूम होगा।” हँसकर प्रभावती ने उत्तर दिया। यमुना स्थिर खड़ी देखती रही।

“तकरार अच्छी नहीं। इनके भाव में क्रोध नहीं।” पृथ्वी ने संयोगिता से कहा।

संयोगिता ने व्यक्तित्व और प्रतिभा समझी। बातचीत करने के विचार से घोड़े से उतर पड़ी। पृथ्वी भी उतरे। दोनों टीले पर चढ़ने लगे। घोड़े यथास्थान खड़े रहे। पास आने पर दोनों ने उठकर बैठाया। फिर पूर्ववत् बैठ गई।

“यह वन मेरा है, और तुम मेरी ही जगह मुझसे छेड़ कर रही हो।” कुछ संयत होकर संयोगिता बोली, “तुम स्त्री हो नहीं तो।”

“नहीं तो आज ही तुम्हारा हरण होता,” कहकर प्रभा मुस्कुराई।

“यानी?” संयोगिता खड़ी हो गई।

और सब भी खड़े हो गए। – “यानी मैं तुम्हारे लिए क्षत्रियत्व का पूरा परिचय देती।”

“तुम जानते हो-मैं कौन हूँ?”

“सम्भव, पर तुम भी जानती हो?”

“नहीं, कौन हो तुम?”

“राजराजेश्वरी।”

“डाकू?”

“नहीं, महाराजाधिराज कहलानेवाले राठौरपति का कर लूटनेवाली, उनसे स्पर्धा रखनेवाली, तुम्हें मालूम हो कि तुम्हारी सारी मर्यादा इस समय मेरे हाथ में है।” पृथ्वीराज का तलवार के कब्जे में हाथ गया कि तुरन्त यमुना बोली, “बहुत विचार कर, चौहानपति!- -यह सिरसागढ़ नहीं है कि एक मलखान को आप बहुतों ने घेरा है। दिल्ली पहुँचना दूभर हो जाएगा। आपके साथी नहीं आ रहे। हमारे तो बहुत निकट हैं। इंगित पर टूटेंगे। विहार के विचार से आपने अपने सिपाहियों का इधर आना रोक दिया है – कुछ सरदारों से गुप्तरूप कहकर और मैं अकेली भी आपकी स्पर्धा से नहीं डरती। पर मानती हूँ कि आप वीर हैं। वीर की मर्यादा नष्ट न कीजिएगा।”

पृथ्वी की मुट्ठी कब्जे में ढीली पड़ गईं। यदि पृथ्वी बन्द हो गए तो सारी बात बिगड़ जाएगी, सोचकर संयोगिता घबराई। प्रभा से बोली, “मैंने त्रुटि की। मुझे अपनी स्थिति के भाव ने धोखा दिया। मैं क्षमा चाहती हूँ।”

“किसके लिए?” हँसकर प्रभा बोली, “कुमारी, तीर कटवाने के अपराध के लिए या पृथ्वीराज के साथ विहार करने की त्रुटि के लिए?”

संयोगिता लज्जा से नत हो गई, बोली, “हमारी श्रेष्ठता सेना के कारण है। यों एक व्यक्ति एक ही व्यक्ति के बराबर है। मैंने शिकार को तीर मारा। जिस तरह शिकार मेरा लक्ष्य था, उसी तरह मेरा तीर दूसरे का लक्ष्य हो सकता है।”

“और सूक्ष्म,” पृथ्वीराज बोले।

“और बाण-विद्या-विशारद चौहानपति को इस प्रकार अपना लक्ष्यवेध सिद्ध कर दिखाना भी किसी के लिए अनुचित नहीं कहा जा सकता।” प्रभावती बोली।

पृथ्वीराज को प्रसन्नता हुई। संयोगिता भी सम्मान प्राप्ति से संकोच रहित हो गई। बोली, “मैंने ‘तुम’ का प्रयोग अपनी श्रेष्ठता पर विचार कर किया था। यह भी मेरा भ्रम था। प्रसंग भी वैसा ही पड़ गया। अब मैं सत्य-सत्य सखी-भाव से ‘तुम’ कहूँगी। तुम ‘डाकू’ हो, यह न जाने क्यों अच्छा नहीं लगता।”

“राजराजेश्वरी डाकू नहीं। साधारण मनुष्यों पर समान भाव रखनेवाली, उनके हित की चिन्ता करनेवाली केवल एक वीरांगना है।” शिष्ट स्वर से प्रभा ने कहा।

“मैं हृदय से कहती हूँ, मैं भी साधारण कुमारियों की तरह एक कुमारी हूँ, और अनेक आपत्तियों में फँसी हुई।”

“मैं जानती हूँ।” प्रभा बोली।

“मैं चाहती हूँ, तुम्हारी एक सखी के प्रति सहानुभूति हो और तुम उसकी रक्षा करो।”

संयोगिता के स्वर में एक सत्य-सत्य दुर्बलता बज रही थी। प्रभा यद्यपि बहु विवाहवाले भाव से घृणा करती थी, फिर भी यहाँ सत्य प्रेम की मर्यादा उसके हृदय में प्रतिष्ठित हो गई। इस भाव का विरोध वह न कर सकी। क्यों पृथ्वीराज के प्रति उसका प्रेम हुआ, यह भाव दूर हो गया, बल्कि प्रेम के प्रति उसकी सहानुभूति पैदा हुई। बोली, “बहन, मैं सब प्रकार तुम्हारे साथ हूँ।”

“मुझे तुम्हारी और (यमुना की तरफ देखकर) इसकी अत्यन्त आवश्यकता है और इस प्रकार कि लोग मेरे ही यहाँ चलकर रहें मेरी अन्तरंग सखी बनकर। मैं महाराज-कुमारीवाला व्यवहार आप लोगों से न करूँगी। एक सखी बनकर ही रहूँगी। चौहानपति सब प्रकार समर्थ हैं, परन्तु मैं अपने लिए उनकी शक्ति का ह्रास न देख सकूँगी और आप लोग जानती हैं, राजरूप में मुझे पति-वरण करना ही होगा। महाराज चौहानपति मेरे लिए मेरी सखियों की सहायता से शृंगार की ही दृष्टि से देखेंगे।”

कुछ क्षण स्तब्धता छाई रही। यमुना ने सोचकर कहा, “बहन, मैं अपने जीवन का निश्चय कर चुकी हूँ। अब यही साधना करती हुई भविष्य पार करना चाहती हूँ।”

संयोगिता की आँखों में यथार्थ ही प्रार्थना अंकित थी। निराश होकर जैसे प्रभा की ओर उसने देखा।

“मैं तुम्हारे साथ हूँ,” प्रभा बोली, “तुम्हारे लिए प्राण देते भी मुझे आपत्ति न होगी।” संयोगिता की ठोड़ी पकड़कर ऊपर उठाई। सूर्यास्त की किरणें उस नवीन म्लान मुख पर पड़ रही थीं।

क्रमश: 

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