चैप्टर 35 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 35 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

चैप्टर 35 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 35 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 35 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 35 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

सारी परिस्थिति सुधर गई, दिवस के बाद की शान्त सन्ध्या की गौरी उदास स्वरों से यमुना के प्राणों में बजने लगी, जैसे कर्मों के भार से श्रान्त हो चिर-विश्राम चाहती है; आज तक जिस सफलता से होकर आई, वह साधन के भीतर उसे क्षुब्ध किए हुए थी, उसका वह फल उसके सुखभोग के योग्य नहीं, वह उससे भी दूर किसी अदृश्य, अस्पृश्य, अज्ञात तत्त्व में, लोक-लोचनों में अन्धकार द्वारा ढँके हुए दिन की तरह छिप जाना चाहती है: यह चिर-विदा ही उसकी दृष्टि में शान्ति के रूप से है।

प्रभावती में दीदी के प्रति अचल श्रद्धा रहती हुई भी भेद का अंकुर उग चला था। वह कुछ मधुर था, कुछ तीव्र। इसीलिए लालगढ़ की लटवाली परिस्थिति का जिक्र दूसरे दिन उसने दीदी से किया तो, पर रक्षा के लिए स्वयं तैयार रहने का प्रदर्शन कर कोई उपाय न पूछा, उसने अन्य उपाय की चिन्ता भी नहीं की। दुर्बल पिता को लड़कर परास्त करने की ही सोची थी। यमुना इस भाव-परिवर्तन को समझकर मुस्कुराती रही कि प्रभा अब अपने साफल्य का चित्र आप तैयार कर लेती है। अपेक्षित समय में जब कान्यकुब्ज की सेना न आई, दो दिन और हो गए, तब उकताकर दीदी से प्रभा परामर्श करने गई। यमुना ने बहका दिया। महाराज के हाथ भेजी गई चिट्ठी का हाल पूछने पर बहका दिया। कहा कि बेचारा ब्राह्मण मारा-मारा फिरता है, वह निर्दोष है, उसे घर रहने की आज्ञा हो जाए और सताया न जाए, इस भाव का एक पत्र उसने देवी पद्मावती को लिखा है, साथ अपना परिचय भी और यह कि प्रभा ने स्वेछा से कुमारदेव को अपना पति निर्वाचित किया है, इसकी वह साक्षी है। चिट्ठी देकर महाराज को लौट आने के लिए कह दिया है; आज्ञा आ जाने पर जाएँगे।

इसी समय राजराजेश्वरी के नाम राजा महेश्वरसिंह का पत्र आया। वे उसके साथ हैं, उनकी एकमात्र सुशील कन्या की बाँह गहकर उसने सदा के लिए पिता को बाँध लिया है, पहले उसके विवाह के सम्बन्ध में जो भ्रम उन्हें था, वह अब दूर हो गया, वे लालगढ़ लूटने के लिए जा रहे थे, राह से इस गलती का जो प्रमाण उन्हें मिला, इसके लिए वे कृतज्ञ हैं; अब कन्या के और उसके पक्ष में यदि कान्यकुब्जेश्वर की कृपा छोड़नी पड़े तो यह भी उन्हें स्वीकृत है। वे अपने कृत्यों की उससे और पुत्री से क्षमा चाहते हैं, कान्यकुब्ज की सेना वापस गई।

पत्र ऐसा था कि उसमें न तो यमुना के पत्र का उल्लेख था, न लालगढ़ आते हुए दलमऊ लौट जाने का खुला कारण। प्रभावती इसका भीतरी भेद न समझ पाई। उसने दीदी को पत्र दिखाकर कहा कि अब कान्यकुब्जेश्वर को दबाकर पत्र लिखना चाहिए; मनवा अपनी तरफ है। दलमऊ भी आ गया, परिस्थिति ऐसी है कि कान्यकुब्जेश्वर विरोध न करेंगे। सत्य विचार के लिए बाध्य होंगे। यमुना ने कहा, हाँ ठीक है, लिखो। विनीत दृष्टि से प्रभा ने निवेदन किया कि शब्दावली यमुना कहती जाए, वह लिख लें। यमुना ने वैसा ही किया।

न्याय प्रकट हो जाने पर रामसिंह को यमुना ने राजा महेश्वरसिंह को फेरनेवाली घटना सिन्धु से कहकर बोझ हल्का कर लेने की आज्ञा दी। इस तरह प्रभावती को भी रहस्य मालूम हुआ। लज्जित होकर एक बार फिर दीदी से उसने क्षमा-प्रार्थना की और दीदी से सीखने के लिए बहुत कुछ है कहकर वश्यता प्रकट की।

न्याय-फल प्रचारित हो जाने पर प्रभा ने यथेष्ट धन देकर महाराज को विदा किया। साथ के सिपाहियों को भी दूना पुरस्कार दिया और धीरे-धीरे हट जाने की आज्ञा दी। पहले के चूने हुए सिपाही रह गए। विद्या को लेकर जाने के लिए रामसिंह से भी कहा; पर उसने प्रभा के उद्देश्य पर ही जीवन व्यतीत करने की इच्छा जाहिर की, कहा कि राजराजेश्वरी को अब विद्या या सिन्धु के रूप में उतारना वह उसका अपमान समझता है, वह जिस जीवन को अपनी पूजा के योग्य मानता है, यह राजराजेश्वरी का वही जीवन है। इसी की छाँह में वह शीतल रहेगा। प्रभा ने रामसिंह को राजराजेश्वरी की सेना का सेनापति बनाया। फिर विशृंखल होकर, एक-एक, दो-दो करके, सब संकेत-स्थल के लिए रवाना हो गए। प्रभा ने सासजी के चरण स्पर्श कर उनकी बहू बहुत जल्द मिलेगी, कहकर बिदा ली और दीदी के साथ नैमिषारण्य आई।

यहाँ दीदी को कई बार गुरु से बातें करते हुए सुना। जिनकी कभी-कभी प्रशंसा सुनी थी, उन्हें प्रत्यक्ष देखा। उनकी पुष्ट देह की शान्त दृष्टि के सामने अपने आप प्रभा का मन नत हो गया। बातों से भक्ति ने प्रगाढ़ भाव धारण किया। गुरु की कृपा योग्य शिष्य-शिष्या पर क्या रूप धारण करती है, दीदी से अनेक प्रमाण वह प्राप्त कर चुकी है। उसे सबसे अधिक आश्चर्य उस दिन हुआ, जब यमुना ने गुरु से शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करने की आज्ञा माँगी और गुरु के यह कहने पर कि संचित क्षत्रितेज को धारण करने की आवश्यकता है, इसलिए राजकुमार को भिक्षालब्ध भोजन उचित न होगा – ऐसे वह गुरु के आश्रम में रह सकती है, उसने कहा था कि मेरी सखी स्वामिनी प्रभा के कुछ अलंकार गंगातट पर गाड़े हुए हैं उनसे पति के साथ उसके अन्तिम दिन बिना भिक्षाभ्रमण के कट जाएँगे। सुधार न चल सका, कहकर गुरु हँसे। फिर कहा, ज्ञान के कोष में कितना है, उसका पूरा पता नहीं चलता, इसलिए अपनी सोची हुई कुछ क्षण के लिए पूरी हुई देख पड़ने पर भी वह अपूर्ण रह जाती है, उसका रूप ज्ञान में ही कुछ देख पड़ता है। अच्छा है, यहाँ से एक दूसरा अनुभव होगा कि स्थान से भी सब स्थानों में सुधार किस प्रकार होता है। और एक सुधार कभी-कभी कितने सहस्राब्दियों की अपेक्षा में रहता है।

नत हो प्रभा ने मन्त्र के लिए प्रार्थना की। तीन दिन तक निष्ठापूर्वक रहने के बाद आने की गुरु ने आज्ञा दी।

समय पूरा कर प्रभा गई। गुरु ने कहा, तुम्हारे लिए मन्त्र की आवश्यकता क्या? तुम तो स्वयं उत्तीर्ण हो, तुम्हारा उद्देश्य सफल है, तुम्हारी विशुद्धता अपनाने के लिए पंडिता त्रियामा तपस्या करे। देवी, इसी रूप से मैं मिलूँ!

प्रभा मन्त्रमुग्ध मौन मिलती ध्वनित निःस्पन्द खड़ी रही। गुरु की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह चली। वह क्या देख रहे थे न समझी। उनकी वह दर्शन-मुद्रा हृदय में अंकित हो गई। मन नई स्फूर्ति से उमड़ आया।

क्रमश: 

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