चैप्टर 34 मैला आँचल फणीश्वरनाथ रेणु का उपन्यास | Chapter 34 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu Novel

चैप्टर 34 मैला आँचल फणीश्वरनाथ रेणु का उपन्यास, Chapter 34 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu Novel, Maila Anchal Phanishwar Nath Renu Ka Upanyas 

Chapter 34 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu

Chapter 34 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu Novel

फुलिया पुरैनियाँ टीसन से आई है।

एकदम बदल गई है फुलिया | साड़ी पहनने का ढंग, बोलने-बतियाने का ढंग, सबकुछ बदल गया है। तहसीलदार साहब की बेटी कमली अँगिया के नीचे जैसी छोटी चोली पहनती है, वैसी वह भी पहनती है। कान में पीतर के फूल हैं। फूल नहीं, फुलिया कहती है-कनपासा | आँचल में चाबी का गुच्छा बाँधती है, पैर में शीशी का रंग लगाती है। “हाँ, खलासी जी बहुत पैसा कमाते हैं शायद। “ अरे ! खलासी के मुँह पर झाड़ू मारो ! वह क्या खाक इतना सौख-मौज करावेगा ? क्या पहनावेगा ? फुलिया ने खलासी को छोड़ दिया है। खलासी को खोक्सीबाग की एक पतुरिया से मुहब्बत था, रोज ताड़ी पीकर वहीं पड़ा रहता धा। तलब मिलने के दिन वह पतुरिया खलासी का पीछा नहीं छोड़ती थी। तलब का एक पैसा इधर-उधर हुआ कि पैर की चट्टी खोलकरहाथ में ले लेती थी। आखिर फुलिया कितना बर्दास करती। टीसन के पैटमान जी नहीं रहते तो फुलिया की इज्जत भी नहीं बचती। फुलिया अब पैटमान जी के यहाँ रहती है। खलासी एक दिन पैटमान से लड़ाई करने आया। टीसनमास्टरबाबू ने कहा कि यदि खलासी टीसन के हाता में आवे तो पकड़कर पीटो। उसी दिन खलासी जो दुम दबाकर भागा तो फिर खाँसी भी नहीं करने आया कभी। पैटमान जी जात के छत्री हैं-तन्त्रिमा छत्री नहीं, असल बुंदेला छत्री : पान-जर्दा खाते-खाते दाँत टूट गए हैं; पत्थर का नकली दाँत लगाते हैं। कहने को नकली दाँत हैं, मगर असली दाँत से भी बढ़कर हैं। चना, भुट्टा और अमरूद सबकुछ चबाकर खाते हैं पैटमान जी। पचीस साल पहले हासाम (आसाम) मुलुक में चाह पीते और पान-जर्दा खाते-खाते दाँट टूट गए हैं, उमेर तो अभी कुछ भी नहीं है। दस बरस से ‘बेवा’ थे, मन के लायक स्त्री मिली ही नहीं। पैटमान जी ने मँहगूदास के लिए एक पुरानी नीली कमीज भेज दी है। कमीज पहनने पर मँहगू को पहचानने में गलती हो जाती है। ठीक रेलवे का आदमी !…बुढ़िया के लिए नई साड़ी भेज दी है। एक बित्ता काली किनारी है।…इस बार के कोटा में असली ‘संतीपुरी साड़ी’ मिलेगी तो फुलिया को भेज देगा। फुलिया कहती है, इस बार माँ को भी साथ ले जाएगी।

फुलिया का भाग ! रमपियरिया की माँ कहती है-“रमिया भी अब बिहाने के जोग हो गई। बिना बाप की बेटी है ! जब से तुम ससुराल हो गई हो, रोज एक बार तुम्हारा जिकर करती है रमिया-‘फुलिया दीदी कब आवेगी ? इस बार फुलिया दीदी आवेगी तो साथ में मैं भी जाऊँगी। यदि उधर कोई बर नजर में आए तो रमिया को भी अपने साथ ले जाओ फूलो बेटी। कोयरीटोले के छोकड़े दिन-दिन बिगड़ते जा रहे हैं।…”

सहदेव मिसर पर तन्त्रिमाटोली का कुत्ता भी भूँकता है ! बहुत दिनों के बाद वह तन्त्रिमाटोली में आया है-फुलिया के बुलाने पर।…दस दिन रहेगी, फिर चली जाएगी। फुलिया अब जात-समाज से नहीं डरती। वह तन्त्रिमा छत्री नहीं, वह असल बुन्देला छत्री की स्त्री है। आँगन में अपने से पकाकर खाती है।…माँ का छुआ भी नहीं खाती !

वह तो मेहमान होकर आई है। उसके जी में जो आवे, वह करेगी। कोई कुछ नहीं बोल सकता।…वह सहदेव मिसर को बैठने के लिए चटाई देती है। एक काँच की छोटी-सी थरिया में सुपारी, सौंफ और दालचीनी के टुकड़े बढ़ा देती है।…तो फुलिया भूली नहीं है उसे ? वाह ! सहर का पानी चढ़ने पर बाहर तो एकदम बदल गया है, पर भीतर जैसा-का-तैसा। काजलवाली आँखें और भी बड़ी मालूम होती हैं। अँगिया और नक्सा कोर की सफेद साड़ी। सहदेव मिसर डरते-डरते कहता है-

“फुलिया !”

“क्या ?” फुलिया मुस्कराती है। सहदेव मिसर का चेहरा एकदम लाल हो रहा है। कान लाल हो गए हैं। नाक के पासवाला सिरा धकधक कर रहा है-“फुलिया, जब से तुम गईं मैंने कभी इस टोले में पैर नहीं दिया।”

“रहने दो ! गहलोतटोले में नहीं जाते थे ?…पनबतिया के यहाँ कौन जाता था ? झूठ मत बोलो।” फुलिया हँसती है।

“नहीं फूलो!”

ढिबरी की रोशनी में सहदेव मिसर फुलिया की आँखों की नई भाषा को पढ़ता है।…हवा के झोंके से ढिबरी बुझ जाती है। फुलिया बालों में महकौआ (सुगन्धित) तेल लगाती है। अँगिया के नीचेवाली छोटी चोली में रब्बड़ (रबर) लगा रहता है शायद ।…फुलिया की देह से अब घास की गन्ध नहीं निकलती है। सौंफ, दालचीनी खाने से मुँह गमकता है।…शहर की बात निराली है। शहर की हवा लगते ही आदमी बदल जाता है। तहसीलदार की बेटी तो कभी शहर गई भी नहीं।…जाति की बन्दिश और पंचायत के फैसले को तो सबसे पहले पंच लोगों ने ही तोड़ा है।…तन्त्रिमाटोली का छड़ीदार है नोखे और उचितदास; जिसे चाल से बेचाल देखेगा, छड़ी से पीठ की चमड़ी खींच लेगा। नोखे की स्त्री रामलगनसिंह के बेटे से फँसी हुई है और उचितदास की बेटी कोयरीटोले के सरन महतो से। पंचायत का फैसला ज्यादा-से-ज्यादा दस दिनों तक लागू रह सकता है। पुश्त-पुश्तैनी से जो रीति-रेवाज गाँव में चला आ रहा है, उसको एक बार ही बदल देना आसान नहीं। जिनके पास जगह-जमीन है, पास में पैसा है, वह भी तो अपने यहाँ का चाल-चलन नहीं सुधार सकते।…बाबूटोली के किस घर की बात छिपी हुई है।…पंच लोग पंचायत में बैठकर फैसला कर सकते हैं, उसमें कुछ लगता तो नहीं। लेकिन पंचायत के फैसले से चूल्हा तो नहीं सुलग सकता ? पंचों को क्या मालूम कि एक मन धान में कितना चावल होता है ! सास्तर में कहा है, ‘जोरू जमीन जोर का, नहीं तो किसी और का।’ और देह के जोर से आजकल सब कुछ नहीं होता। जिसके पास पैसा है वही बोतल मिसर (मिथिला का एक प्रसिद्ध पहलवान) पहलवान है। वही सबसे बड़ा जोरावर है।

…तहसीलदार साहब की बेटी शाम से ही, आधे पहर रात तक, डागडरबाबू के घर में बैठी रहती है; चाँदनी रात में कोठी के बगीचे में डागडर के हाथ-में-हाथ डालकर घूमती है। तहसीलदार साहब को कोई कहने की हिम्मत कर सकता है कि उनकी बेटी का चाल-चलन बिगड़ गया है ?…तहसीलदार हरगौरीसिंह अपनी खास मौसेरी बहन से फँसा हुआ है। बालदेव जी कोठारिन से लटपटा गए हैं। कालीचरन ने चरखा स्कूल की मास्टरनी जी को अपने घर में रख लिया है। उन लोगों को कोई कुछ कहे तो ?…जितना कानून और पंचायत है सब गरीबों के लिए ही ? हुँ !

जमीन के लिए गाँव में नई दलबन्दी हुई। जिन लोगों की जमीन नीलाम हुई है, दर्खास्ते खारिज हुई हैं, वे एक तरफ हैं। जिन्होंने नई बन्दोबस्ती ली है अथवा जमींदार से माफी माँग ली है, सुपुर्दी लिखकर दे दी है या जो जमीन बन्दोबस्त लेना चाहते हैं, वे सभी दूसरी तरफ हैं। गरीबों और मजदूरों के टोलों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। खेलावन के हलवाहों को कालीचरन ने हल जोतने से मना कर दिया है। तहसीलदार हरगौरीसिंह का नाई, धोबी और मोची बन्द करने के लिए कालीचरन घर-घर घूमकर भाखन देता है। गाँव से सारे पुराने बाँध टूट गए हैं, मानो बाढ़ का नया पानी आया हो।…

गरीबों और मजदूरों की आँखें कालीचरन ने खोल दी हैं। सैकड़ों बीघे जमीनवाले किसानों के पास पैसे हैं, पैसे से गरीबों को खरीदकर गरीबों के गले पर गरीबों के जरिए ही छुरी चलाते हैं।…होशियार ! जिन लोगों ने नई बन्दोबस्ती ली है, वे गरीबों की रोटी मारनेवाले हैं…!

कालीचरन ने चमारटोली में भात खा लिया ?

जात क्या है ! जात दो ही हैं, एक गरीब और दूसरी अमीर।…खेलावन को देखा, यादवों की ही जमीन हड़प रहा है।…देख लो आँख खोलकर, गाँव में सिरिफ दो जात हैं।

अमीर-गरीब !

तहसीलदार हरगौरीसिंह काली टोपीवाले नौजवानों से कहते हैं, “इस बार मोर्चे पर जाना पड़ेगा। हिन्दू राज कायम करने के लिए पहले गाँव में ही लोहा लेना पड़ेगा…।”

संयोजक जी आजकल महीने में दो बार घर मेनिआर्डर भेजते हैं। संयोजक जो कहेंगे उसे काली टोपीवाले नौजवान प्राण रहते नहीं काट सकते हैं। आग और पानी में कूद सकते हैं; इसी को कहते हैं अनुशासन !

बावनदास जिला कांग्रेस के नेताओं को खबर देने गया है-“गाँव में जुलुम हो रहा है।”

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