चैप्टर 33 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 33 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

चैप्टर 33 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 33 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 33 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 33 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

राजा महेश्वरसिंह दलमऊ पहुँचने के लिए रवाना हुए। उन्होंने सरदारों को रानी पद्मावती की पत्रिका दिखलाई, कहा कि सती रानी बराबर अपने हाथ से अपना चित्र खींचकर उन्हें पत्र लिखती थीं। सामयिक मनोभाव सामने मुकुर रखकर खींचे चित्र में पत्र की शब्दावली के साथ मिला देती थीं। यह पत्र किसी दूसरे का लिखा हुआ नहीं, नीच महेन्द्रपाल को पकड़कर जल्द लालगढ़ लूटेंगे, इस प्रकार एक-दो काज होंगे, महेन्द्रपाल को महाराजाधिराज के सामने पकड़ ले जाने पर जो निष्कर भूमि पुरस्कार-स्वरूप मिलेगी, वह सरदारों में बराबर बाँट देंगे, अगर महेन्द्रपाल भग गया तो भी उसे यह पता नहीं लगा होगा कि हम लालगढ़ के लिए रवाना हुए हैं, वह यही समझेगा कि संवाद पाकर हम दलमऊ के लिए ही कान्यकुब्ज से चले हैं। इसलिए वह लालगढ़ के कीमती सामान उठा न ले जाएगा, जो कुछ उसे लेना रहा होगा, वह ले चुका होगा। इतना समझाने पर भी सरदारों ने आज्ञा के खिलाफ सलाह न दी। उन्होंने कहा कि राजाज्ञा को शिरोधार्य न करने पर अपराध पुरस्कार से गुरुतर होगा। पर राजा महेश्वर को अपनी लगी बुझानी थी। उन्होंने और भी कहा कि कहेंगे कि लालगढ़ में ही महेन्द्रपाल को कैद किया है, पर फिर भी सरदारों की ताल न हुई। आखिर महेन्द्रसिंह ने विशेषाधिकार का प्रयोग किया। सरदार और सेना विवश होकर साथ चली। रास्तेभर किसी तरह धैर्य रहा, पर ज्यों-ज्यों नजदीक होते गए और महेश्वरसिंह अधिक सतर्क करते गए और क्रमशः किले तक कहीं कुछ न मिला, त्यों-त्यों सरदार और सेना के तेवर बदले। प्रकट कुछ न कहा, पर आपस में सलाह कर सरदारों ने उसी वक्त दो अश्वारोही महेश्वरसिंह के कर्त्तव्य के संवाद देने के लिए कान्यकुब्ज भेज दिए। महेश्वरसिंह को इसका पता न हुआ, वे लज्जित होकर सरदारों से कुछ देर के लिए विदा होकर दुर्ग के भीतर गए।

महाराज शिवस्वरूप रानी को पत्र देकर लौट आए थे। रानी बैठी विचार कर रही थी कि दासी ने महाराज के आने की खबर दी। रानी उठकर खिन्न स्वागत कर पति को कक्ष में ले गई। राजा महेश्वरसिंह आग हो रहे थे। नाराज बैठते हुए पत्र बढ़ाते हुए कहा, “यह क्या लिखा है?”

“यह?” आश्चर्य से पत्र लेती हुई, “यह मैंने नहीं लिखा!” पढ़कर “यह क्या रहस्य है?”

“तुमने नहीं लिखा?”

“न, यहाँ ऐसी कोई बात हुई है? मैं क्यों लिखने लगी?”

“अब निस्तार नहीं!” राजा महेश्वरसिंह मस्तक पर हाथ रखकर अर्द्धशयान हो गए।

“क्यों?” शंका और आवेग से उच्छ्वसित होकर रानी ने प्रश्न किया।

राजा महेश्वरसिंह उतरे गले से सारा हाल संक्षेप में कहने लगे।

“तो यह प्रभा का किया छल होगा। एक पत्र मेरे पास आया है। देखो।” रानी ने वह पत्र निकालकर राजा को दिया। लिखा था :

रानी प्रभावती को मणिपुर की राजकुमारी त्रियामा का यथोचित।

देवी,

आप मेरी मातृतुल्या हैं। मैं ही आपके वहाँ दासी यमुना के रूप में रह चुकी हूँ। मेरे अपर समाचार जो मेरे राजकुमारी-जीवन से विवाह के अन्त तक हैं, आपको विदित हैं। इसलिए मेरा दासी बनकर रहने का अर्थ आपको सब अनायास ज्ञात हो जाएगा। में प्रभा की दासी होकर भी उसे छोटी बहन समझती थी। मुझे न जानती हुई भी प्रभा मेरे आदर्श में ढल रही थी और एक दिन पूरी-पूरी ढल गई। मैं बराबर उसके साथ थी। राजकुमार देव को सच्चे हृदय से उसने वरण किया। इसके बाद की घटना आपको मालूम है। फिर कान्यकुब्ज तक मैं उसके साथ रही। रास्ते में मेरे बड़े भाई बलवन्त को उसी ने घायल किया। जहाँ पिता स्वयं विरोधी थे, वहाँ न्याय की आशा उसने छोड़ दी। अब राजराजेश्वरी नाम की एक प्रबल पराक्रमवाली स्त्री से उसका सखी-भाव स्थापित हो गया है। कान्यकुब्जेश्वर का कर लूटकर इस समय लालगढ़ दुर्ग पर वह अधिकार किए हुए हैं। यदि उसके पिता अपने अपराध के लिए उससे तीन दिन के भीतर क्षमा-प्रार्थना न करेंगे तो वह दलमऊ दुर्ग को लूटने के लिए चौथे दिन यहाँ से प्रस्थान करेगी। उसके साथ अभी केवल पच्चीस सहस्र शिक्षित सेना है, लूटा हुआ तथा लालगढ़ का कोष भी। उसकी वश्यता स्वीकार करने पर उसके पिता को कान्यकुब्जेश्वर का भय न रहेगा, कारण वह कान्यकुब्जेश्वर को सत्यमार्ग पर आने पर बाध्य करेगी। इस समय मणिपुर भी एक प्रकार उसी के अधिकार में है। बलवन्त वहाँ प्रवेश नहीं पा सकते। मेरे नाम से मेरी छोटी बहन रत्नावली ने सिपाहियों को उभाड़कर अपनी तरफ कर लिया है। निरपराध राजकुमार को कान्यकुब्ज के षड्यन्त्र से निर्वासन-दंड मिला, यह अन्याय रत्नावली के लिए असह्य हुआ, उसने राजकुमार को रोक रखा।”

नमिता कन्या

‘त्रियामा’

पढ़कर महेश्वरसिंह स्तब्ध रह गए। अत्यन्त भय हुआ था, अब बचने का अंकुर उगा हुआ देख पड़ा। पत्नी से बोले, “बड़ी भूल हुई।”

“किसलिए?”

“इसलिए कि सत्य छोड़कर असत्य-पक्ष ग्रहण किया। अपनी कन्या, उसके सुख का विचार न किया!”

रानी रोने लगी।

कुछ देर तक दोनों मौन रहे। एक दासी ने आकर कहा कि सरदार किसुनसिंह मिलना चाहते हैं।

सरदार किसुनसिंह कान्यकुब्ज से आए थे। राजा महेश्वरसिंह ने रानी से आने का संक्षिप्त वृत्तान्त कहा: फिर जोश में आकर बोले, “अपने ही हाथों अपनी कन्या का भविष्य बिगाड़ा है, अब उन्हीं से क्षमा प्रार्थना भी करूँगा।”

रानी पद्मावती की सजल आँखों के भीतर से मर्मभरी बिजली झलक आई। बोली, “अवश्य कीजिए। गिरे पिता को उठानेवाली पुत्री क्षमा करने के लिए ही तो आती है?”

राजा महेश्वरसिंह बाहर आए। सरदार क्रुद्ध खड़ा था। उसे देखकर महेश्वरसिंह बोले, “अच्छा हुआ कि हम लोग यहाँ चले आए, वहाँ राज-राजेश्वरी की पंचविंश सहस्र सेना पड़ाव डाले हुए हैं। दुर्ग पर भी उसी का अधिकार है। कान्यकुब्ज का कोष उसी ने लूटा है। बात दूसरी तरह सत्य हुई। व्यर्थ सैन्यक्षय होता। तुम लोग कान्यकुब्ज लौट जाओ। मैं महाराजाधिराज को सूचित करता हूँ।”

सरदार लौट गया।

महेश्वरसिंह पत्र लिखने बैठे।

क्रमश: 

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