चैप्टर 32 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 32 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

चैप्टर 32 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 32 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 32 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 32 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

प्रभावती को प्रवेश मिल गया। कर्णसिंह वीरसिंह का सहायक रह चुका था। यमुना को पहचानता था। रानी कमला भी यमुना को देख चुकी थीं। यमुना का नाम सुनकर लालगढ़ के सभी लोग खिल गए। अभी तक ज्ञान न था। अब तो, जानकर कि वह लड़ने के लिए फौज लेकर आई हैं और डाकुओं की रानी किसी राजराजेश्वरी से उनका मिलने का यही कारण है, लोग फिर से आनन्द में मत्त हो गए। फिर उन्हें प्रतिकार की आशा होने लगी। कान्यकुब्ज से लूटने के लिए दस सहस्र फौज लेकर आनेवाले महेश्वरसिंह का सामना करने के लिए अब आस्फालन करने लगे। लालगढ़ के भीतर और बाहर अपूर्वा नगरी हर्ष के समुद्र-सी उद्वेल हो उठी। कान्यकुब्ज की सेना निश्चित रूप से परास्त होगी, यह सबका विश्वास हुआ। पाँच हजार सेना लालगढ़ की थी। नगर के लोग मिलकर पच्चीस हजार से भी अधिक हुए जा रहे थे, राजराजेश्वरी की सेना अकेली, कान्यकुब्ज वाली सेना से ड्योढ़ी थी। प्रभा की सेना को रसद की सुविधा हो गई। रत्न तोड़वाकर उसने भिन्न-भिन्न वणिकों से रसद का प्रबन्ध कर दिया। दुर्ग के चारों ओर कायदे से प्रभा की सेना के पड़ाव पड़ गए। भीतर कुछ चुने हुए आदमी गए। महाराज, यमुना, राजराजेश्वरी, प्रभा और कुछ जन।

प्रभा से पहले-पहल जब यमुना मिली, उसने देखा प्रभा पुलकित होती हुई भी धीर है। पहले का जैसा खुला रूप इस बार नहीं; जैसे एक निश्चय उसमें बँध चुका है, वह बालिग हो गई है, इसलिए इस बार शिष्टाचार पहले से अधिक है। यमुना समझ गई कि इसके अर्थ हैं, मैं अपने विषय में वश्यता स्वीकार नहीं करती। कुछ न बोली। उस पर हुआ कार्य पूरा समझकर चुप रही। खुली विद्या से, जबसे उसे पूरी पहचान के बाद की प्रभा की तरह नम्र और भक्तिमयी देखा। देखती रह गई, प्रदीप-सी शान्त जल रही थी, सारा पाप जल चुका था। मूर्तिमती रागिनी साकार कला बन रही थी। इस पर प्रभावती ने राजराजेश्वरी की तरह सम्वर्द्धित कर सज्जित किया था।

दुर्ग में रानी कमला के पदों में प्रभा ने भूमिष्ठ प्रणाम किया। अश्रु-पुलकित रानी मुख चूमकर, “दुख बहुत मिला?” कहकर अपनी विवशता सोचकर सिसक-सिसककर रोने लगीं। विनीत स्वर से प्रभा को ही धैर्य देना पड़ा। अनेक प्रकार से उसने सासुजी को सान्त्वना दी। “ऐसे स्थलों पर धैर्य रखने की शिक्षा आप लोगों से मुझे मिली है, मैं उसका उपयोग करती हुई शान्ति पाती हूँ और अब पूर्ण विश्वास हो गया है कि मैं स्वयं महाराजाधिराज जयचन्द को न्याय के पथ पर आने को विवश करूँगी,” विनीत भाव से सासुजी को समझाया। रानी आश्वस्त हुई। रनवास में खुशी के फव्वारे फूटने लगे।

रात्रि के समय, बहू के आने की खुशी में, रानी ने प्रतिष्ठित राजपुरुषों, ब्राह्मणों, कलाविदों तथा धनिकों को देवियों सहित आमन्त्रित किया। नगरी की प्रसिद्ध नर्तकियों को भी आमन्त्रण मिला। आतिथ्य-सत्कार का बृहत् समारोह होने लगा। बहू देखने का नगर भर में निमन्त्रण फिर गया। देवियाँ उपहार, निछावर आदि ले-लेकर बहू का मुख देखने के लिए चलीं। दुख और चिन्ता के बाद यह आनन्द महानन्द में परिणत हो गया।

प्रभा रानी के पास थी। विद्या और यमुना अलग-अलग प्रकोष्ठों में। यमुना चिन्ताशील, प्रभा की माता रानी पद्मावती को पत्र लिख रही थी। भावों को कई बार मनोयोगपूर्वक देखा। फिर महाराज को देखती हुई बोली, ‘आज यहाँ बड़े जोरशोर का गाना है, अगर आज ही काम पर भेजें तो आपको कुछ बुरा लगेगा, और रात को, मुमकिन है, आपको रास्ता न मिले और आप डरें भी, लेकिन यह समझ लीजिएगा कि रानी पद्मावती का पत्र है, आपके सिवा दूसरा नहीं जा सकता और कल दोपहर तक पत्र उन्हें मिल जाना चाहिए। अगर आप गाना सुनते रहे रातभर तो आप समझिएगा।”

“सवारी पर तो जाना है,” महाराज ने जल्दी में कहा।

“सवारी पर और मेहनत पड़ती है। सुना है, आपकी बीबी साहबा भी रानी कमलाजी की खुशी में राजराजेश्वरी के नाम से कुछ गाने और नाच भेंट करनेवाली हैं।” कहकर यमुना महाराज को देखती हुई मुस्कुराई।

“हमें नहीं मालूम,” उड़ी निगाह से देखते हुए महाराज ने कहा। “अब आपको कैसे मालूम होगा? अब आपकी बीबी थोड़े ही हैं! – अरे महाराजिन अब तो राजराजेश्वरी हैं। जाइए पूछिए।”

“हे कुमारीजी, जान पड़ता है, राजराजेश्वरी कोई है नहीं! हमें तो न उहाँ देख पड़ी, न इहाँ। बस नामै नाम है।” महाराज जिज्ञासा की दृष्टि से देखते रहे।

“नाम बड़े, दरशन थोड़े, क्यों महाराज?” यमुना मुस्कुराई।

महाराज ने भी नीचे ऊपर के दाँत निकाल दिए। फिर चिट्ठी लेकर अँगोछे में लपेटकर कमर में बाँधकर विद्या के कमरे में गए। दरवाजा बन्द करके उसके पलंग पर बैठ गए, और बड़े विश्वस्त स्वर से कहा, “एक बड़ा संशय मन में है।”

“कह डालो झटपट,” कहकर मजे की एक चपत मारी महाराज के गाल में, “अँह, उड़ गया, मच्छर काट रहा था।”

महाराज का संशय दूर हो गया। सचेत होकर गाल एक बार सुहलाकर बोले, “यह राजराजेश्वरी कौन है?”

“ऐं! अन्धे हो?”

महाराज घबरा गए, बोले, “हम तो-“

“तुम तो एक सच्चे बेवकूफ हो। कह दिया, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ। पर यह मैंने कब कहा कि मैं विद्या हूँ, राजराजेश्वरी नहीं?”

महाराज कुछ खुश होकर कुछ अहमक बनकर बैठे देखते रहे। विद्या महाराज की हथेली अपनी हथेली में लेकर स्वर में नारी-हृदय की सारी चंचलता भरती हुई बोली, “अच्छा, तुम इतने दिन से तो मेरे साथ हो, कहा, कुछ समझ पाए कि मैं कौन हूँ!”

निश्छल कंठ से महाराज ने कहा, “समझे तो कुछ नहीं!”

“तो राजराजेश्वरी को ही क्या समझोगे जिसे कभी नहीं देखा!”

महाराज को फिर चक्कर-सा आने लगा।

मुस्कुराकर देखती हुई महाराज की एक उँगली दबाकर बोली, “देखो, तुम्हारी कुमारीजी, प्रभावती मेरी चेली है, इतना समझे या नहीं!”

“हाँ, इतना तो अब समझ में आ गया।”

“तो तुम क्या समझते हो कि तुम्हारी कुमारीजी किसी नाचनेवाली की चेली होतीं?”

“हम कुछ नहीं समझते?”

“तभी तो मैं तुम्हें प्यार करती हूँ। कोई दूसरा मर्द होता, तो मन्त्र पढ़कर फूँक देती तो दुनिया के उस पार उड़कर गिरता।”

महाराज ताज्जुब की निगाह से देखने लगे।

“मेरी उम्र क्या समझते हो? तुमने सोचा होगा, इसकी उम्र बीस साल की होगी, मुझसे छोटी है, इसलिए बुजुर्गाने की शेखी में रहते हो। मेरी उम्र पाँच सौ पचहत्तर साल की है, मेरे छनाती के छनाती तुमसे बुड्ढे हैं। सौ साल तक मैं बंगले में रही, सारा जादू वहाँ का सीखा। उसी के बल से सदा जवान रहती हूँ।”

महाराज को शिथिल देखकर बोली, “पर तुम घबराओ मत। तुम ब्राह्मण हो। मैं ब्राह्मण को मानती हूँ, नहीं तो मेरी विद्या भ्रष्ट हो जाए। एक बार सिर्फ चलेगी जैसे तुमको उड़ाना चाहूँ तो उड़ा दूँगी, पर फिर वह विद्या अपने घर चली जाएगी। तुम आराम करो, मैं आती हूँ। आज मेरा नाच है, देखकर बतलाना कैसा लगा।”

“हम नाच न देखेंगे, हमको काम है, सोचेंगे। पिछली रात उठकर जाना है।”

आँखें ऊपर को उठाकर, भौंहें टेढ़ी कर, कुछ सोचती हुई-सी, जरा देर बाद बोली, “हाँ ठीक है, समझ गई,” कहकर चादर ओढ़कर बाहर निकली।

यमुना पलंग पर पड़ी हुई विचार में मग्न थी। तरह-तरह के भावी चित्र बना-बिगाड़ रही थी। इसी समय मधुर आवाज आई-“दीदी!”

“आओ।”

धीरे पदक्षेप से विद्या भीतर गई और दोनों हाथों से पलंग पर यमुना के पदपद्म ग्रहण कर माथा रखकर प्रणाम किया।

“रामसिंह के लिए चिन्ता तो नहीं?” छोटी बहन को देखती हुई जैसे, यमुना ने प्रश्न किया।

विद्या समझ गई। पुलकित होकर बड़ी उतावली से पूछा, “क्या छूट गए? – कैसे हैं, दीदी?”

यमुना उठकर बैठ गई और बाँह पकड़कर पलंग पर बैठा लिया, “खूब, तुम भी एक ही मिलीं। अच्छे हैं रामसिंह धोबी, मैं उनकी भौजी बनी थी। विचार में ऐसे ही छोड़ दिए गए। साथ आए हैं। काम से राह पर रह गए। दो-एक दिन में आ जाएँगे। बिचारे ब्राह्मण को धोखे-ही-धोखे में रखा।”

लाज से नत होकर विद्या बोली, “कुछ हो, ब्राह्मण की सरलता अन्यत्र नहीं मिल सकती।” फिर देर तक पहले दिन वाली बातें कहती रही। यमुना मिलाती गई, महाराज ने लौटकर झूठ बयान किया था। दोबारा महाराज से मिलने की बातें और रामसिंह के पास से वीरसिंह की वह तसवीर ले के हाल साद्यन्त कहे और दाहिनी बाँह खोलकर वीरसिंह की वह तस्वीर दिखाई। यमुना ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। फिर, “तुमने खूब पता लगाया, मैं रामसिंह से सारा वृत्तान्त सुन चुकी हूँ, तुम यथार्थ देवी हो, तुममें उर्वशी, देवी दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी, सबके गुण वर्तमान हैं,” कहकर सम्वर्द्धित किया।

“दीदी, प्रभावती के स्वागत में आज मैंने महफिल में उतरने का संवाद भेजा है। आपसे उनकी प्रसन्नता के हाल पाकर मैं अपने को सँभाल नहीं सकती, इतना आनन्द है। प्रार्थना है, उस वक्त आप वहाँ अवश्य रहें, मुझे उत्साह मिलेगा। और यह भी कहें कि मैं किस तरह उतरूँ, वाद्य का भी अच्छा प्रबन्ध होना चाहिए। यह आप ही कर सकती हैं।” विद्या कहकर नतदृष्टि रह गई।

यमुना हँसी। सरल स्वर से बोली, “बहन, वहाँ प्रभावती का स्वागत हो रहा है। महफिल में उसका स्थान भी वैसा ही रहेगा। वह युवराज की परिणीता प्रथम स्त्री है, भविष्य में रानी होगी। मैं यहाँ के सेनापति की पत्नी हूँ। मुझे राज-कन्या समझती हुई भी रानी कमला सेनापति तथा सरदारों की महिलाओं में ही स्थान देंगी, नहीं तो बनता नहीं, मैं भी इस प्रथा को व्यवहारोचित मानती हूँ, और मुझे उनमें बैठने का अपमान-ज्ञान नहीं, पर प्रभा मुझे देखकर अपने आसन पर न रहेगी, इसलिए में जाना नहीं चाहती, सिर्फ जेवनार में जाऊँगी, और अलग तुम्हें बगल में बैठाकर भोजन के बाद चली आऊँगी। मुझे स्थिति की पर्यालोचना से समय भी नहीं। हाँ, तुम्हारे लिए जहाँ तक अच्छा होगा, बाजे का प्रबन्ध करा दूँगी, क्यों, उदास क्यों हो।”

“प्रभा आपको छोड़कर महफिल में बैठेगी नहीं। जेवनार में भी नहीं। मैं उससे पूछ लूँ। आप अभी तक उनके सेनापति की स्त्री हैं? तीन-पाँच करें तो लूट मचवा दूँ। मेरा नाम सुन चुकी हैं सब।”

यमुना खिलखिला दी- “हाँ-हाँ, लूट लेना तुम्हारे लिए कौन बड़ी वात है? बहुत रवाँ दाँव, चलता अस्त्र है। क्या कटाक्ष खेलता है आँखों पर! हाँ, कुछ न पहनकर, केवल साड़ी में, सिर्फ नुपूर बाँधकर प्रदर्शन करो। रहना भी तो राजराजेश्वरी की तरह होगा।”

“मैंने भी यही सोचा था दीदी। आपने मन की बात छीन ली।”

इसी समय रानी कमला की दासी आई। प्रणाम कर यमुना से बोली, “युवरानीजी आने की आज्ञा चाहती हैं।”

“ले आओ।”

रानी को सजाई, पूर्ववत् आभरण-भारा प्रभा मन्द-गुंजित पद आई और नत होकर प्रणाम किया। यमुना ने ठोड़ी स्पर्शकर स्नेह सूचित किया और पलंग पर बैठी देखती-देखती सजल हो गई। आर्द्र कंठ से कहा, “आज अकेली हो?”

प्रभा की भी आँखें छलछला आईं।

नत मुख निश्चला बैठी हुई अपने को सँभालकर बोली, “दीदी, चलो जेवनार के लिए बुलाने आई हूँ। पहले-पहल देवता-पूजन करूँगी, अकेली नहीं कर सकती। महिलाएँ आ गई हैं। मेरा आना उन्हें अस्वाभाविक-सा लगा। आलोचनाएँ भी बहुत अच्छी नहीं। मैं राजराजेश्वरी की आश्रिता हूँ, यह मेरी हीनता बहुत आँखों में मर्यादा ला रही है और जेवनार में मैं तो इन्हें अलग न करूँगी, पर शायद क्षत्राणियाँ पहले से मुझे अलग किए बैठी हैं- अलग ही बैठेंगी।”

“हूँ!” यमुना अत्यन्त गम्भीर होकर द्वार की ओर देखती रही।

विद्या संकुचित होकर जैसे अपने में समा गई प्रभा एक बार बादल से बाहर निकल आई।

विद्या को देखती हुई बोली, “मैं समझती हूँ, राजराजेश्वरी का यही वेश ठीक होगा,” चिबुक पकड़कर, “शोभने, महत्ता सदा क्षुद्रताओं को अपने भीतर रखती है, तभी वह महत्ता है। चलो, प्रभावती तुम्हारे कारण यहाँ आने में सफल हुई है; चौहान होकर तुम वहाँ इन्हीं से श्रेष्ठत्व प्राप्त करो। देखा जाए, क्या होता है।” आगे-आगे निराभरणा प्रिय-प्रवाहिका यमुना, मध्य में विद्युल्लता विद्या, पीछे नीलांचला साक्षात् प्रभा रनवास को चलीं।

देवी यमुना को देखने के साथ ही समवेत समस्त क्षत्राणियाँ रानी कमला के साथ-साथ किसी अज्ञात प्रेरणा से जैसे उठकर खड़ी हो गईं। रानी ने हाथ पकड़कर अपने सर्वोच्च आसन पर बिठाना चाहा। पर संयत स्वल्प सम्मान रानी के प्रति प्रदर्शित कर यमुना ने कहा, “यह आप ही के योग्य है। हमारे साथ चूँकि चौहान महिला देवी राजराजेश्वरी वर्तमान हैं, इसलिए हमें उन्हीं का उचित सम्मान करना चाहिए। वे अपनी अभिन्न-हृदया सखी देवी प्रभावती के साथ इस आसन पर बैठें।” एक-एक हाथ दोनों का पकड़कर दो कदम बढ़कर यमुना ने छोड़ दिया। दोनों आज्ञा मानकर चुपचाप जाकर बैठ गईं। वहीं एक दूसरे श्रेष्ठ आसन पर रानी की बैठाल सरदारों की महिलाओं के साधारण देवियों में जाकर यमुना ने हँसकर आसन ग्रहण किया। क्षण-मात्र में सभा की भावना बदल गई। एकटक सब एक बार प्रभा और एक बार राजराजेश्वरी को देख रही थीं। क्या शान्ति और क्या तेजस्विता है प्रभा के रूप में! उधर क्या भंगिमा, क्या कला है राजराजेश्वरी की मुखकान्ति में।

पश्चात् एक-एक कर सब महिलाएँ प्रभा से मिलीं, उपहार दिए, रानी मधुर स्वल्प शब्दों में सबका परिचय देती रहीं। इसके बाद देवपूजन-विधि पूरी करने को आईं। ब्राह्मण-देवियाँ प्रदर्शिका हुई। यमुना ने कहा, “यहाँ देवी राजराजेश्वरी देवी प्रभावती के कुल-देवता का पहले पूजन कर राजवंश को लगे अज्ञात अपराधों की क्षमा-प्रार्थना करेंगी, इसके बाद देवी प्रभावती उनके प्रीत्यर्थ यथारीति पूजन कर कुल-प्रवेश करेंगी।”

ऐसा ही किया गया। विद्या ने अन्तःकरण से देवता से प्रार्थना की, वे राजा महेन्द्रपाल के अपराधों को क्षमा कर दें।

पूजन के पश्चात् जेवनार में विद्या का वही आसन रहा। वह अज्ञातकुल-शीलवाली नहीं। चौहान-जाया होकर प्रभावती के दक्षिण रही। वाम पार्श्व में यमुना स्वयं बैठी। वहाँ प्रभावती यमुना की आज्ञा को मानकर चल रही थी, इसीलिए शान्ति-भंग करने की इच्छा उठने पर भी दबा गई। बाहर समागत पुरुषों का आदर-स्वागत, भोजन-पान चल रहा था, कुलीन ब्राह्मणों के द्वारा उच्च कर्मचारीगण करा रहे थे। सार्वजनिक सभा में प्रभावती के आने की सब लोग उतावली लिए जल्द-जल्द प्राथमिक अंग पूरे कर रहे थे।

राजराजेश्वरी के साथ आए हुए लोग, जो दुर्ग के बाहर पड़ाव डाले पड़े थे, वे सब व्यूह-रचना के अनुसार वहीं रहने के लिए आदिष्ट थे। उनके सरदार भी वहीं थे। उन्हें ऐसी ही आज्ञा थी। समझा दिया गया था कि दुर्ग में राजराजेश्वरी के सम्मान में आनन्द मनाया जा रहा है, वहाँ के लोग उसमें शरीक होंगे। विजय करके लौटने पर उनके लिए वहाँ इनसे भी अच्छा प्रदर्शन किया जाएगा।

यमुना ने पुराने अच्छे कलाविदों के नाम लेकर उन्हें आने के लिए बुलाया। मालूम हुआ कि वे सब आमन्त्रित होकर पहले से आए हुए प्रतीक्षा कर रहे हैं।

पुरुषों की सभा यथाविधि बैठा दी गई। यमुना के निर्देशानुसार महिलाओं को लेकर दासियाँ यथास्थान बैठा आईं। फिर प्रभा को लेकर रानी चलीं। साथ-साथ यमुना और विद्या। पहले के विचारानुसार आसन बड़ा रखवाया गया था। बीच में प्रभा को आगे कर रानी कमला बैठीं, दाहिने राजराजेश्वरी, बाएँ यमुना। दोनों ओर के निरलंकृत सौन्दर्य के बीच आभरणों से जगमगाती प्रभा क्या शोभा दे रही है!- लोगों की दृष्टि बँध रही थी।

दासियाँ आज्ञा की प्रतीक्षा में पीछे खड़ी थीं। एक को बुलाकर यमुना ने कहा, “देवी राजराजेश्वरी के महाराज को देखो, सो रहे हों तो जगा दो, भोजन कराकर यहाँ ब्रह्म-मंडली में बैठा दो। मेरा नाम लेकर कहना कि नाच देखने के लिए जल्द बुलाया है।”

नृत्य-गीत शुरू हो गया। अपूर्वा की अपूर्वा वीर-वनिताएँ पूरी सजकर आई थीं। युवरानी के स्वागतार्थ सबके हृदय में स्नेह उमड़ रहा था, फिर जब अपूर्वा और लालगढ़ पर विपत्ति के बादल छाए हुए थे, वे तेज हवा जैसी दूर के बहती हुई बादलों को उड़ा देने के लिए आई हैं। आज उनकी प्रसन्नता से प्राप्ति भी अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक होगी। वे पूर्ण सम्पन्न हैं। इतना वैभव, इतनी शक्ति लालगढ़ नहीं दर्शित कर सका।

अगरु की सुगन्ध से सभा-मंडप सुवासित हो रहा था। प्राचीन प्रथानुसार रंग-मंच पर नर्तकियों जगमगा रही थीं। वीणा और मुरज मिल चुके थे। रानी ने संगीत के श्रीगणेश के लिए आज्ञा दी। प्रवीणा सुन्दरी उठी। कोमल कोयल-कंठ से, अपना ही विरचित स्वागत-गीत गाया। निष्कम्प दृष्टि से देखती हुई, प्रभा ने इंगित से बुलाकर पुरस्कृत किया। इस प्रकार मुरला, मंजरी आदि कई नारियों के नृत्य-गीत हुए। सभास्थ लोगों की पूरी तृप्ति हुई। विद्या स्थिर बैठी हुई तोल रही थी। यमुना रह-रहकर विद्या के व्यक्त मनोभावों को देख लेती थी। इसी समय उत्तर के द्वार से एक सन्तरी ने आकर संवाद दिया, “देवी यमुना से मिलने के लिए उनका अश्वारोही दूत आया हुआ है।” बड़ी उत्कंठा से देवी यमुना ने दूत को आने के लिए कहा, फिर स्वयं प्रभा से उठकर गई। प्रभावती और विद्या की पलकों पर विचार की रेखा खिंच गई। नृत्य-गीत चलता रहा।

यमुना रामसिंह को अपने कक्ष में ले गई। घोड़ा दूसरे सेवक के सुपुर्द कर दिया। रामसिंह का आना ही सफलता सूचित कर रहा था। पर समझकर भी यमुना उतावली न रख सकी। स्नेहार्द्र कंठ से पूछा, “क्यों सफल हुए?”

फिर चरणधूलि लेकर गर्वित मस्तक उठाकर रामसिंह बोला, “हाँ, भाभीजी।”

“कैसा हुआ?”

“मुझे और उल्टा कान्यकुब्ज की ओर चलना पड़ा। मत्त चाल से आ रहे थे हमारे अनुमान तक नहीं पहुँचे। पहुँचकर मैंने पत्र दिया। रानी पद्मावती की मूर्ति देखकर ही सूख गए। पत्र पढ़कर मारे घबराहट के संज्ञा-शून्य हो गए। मुझसे पूछा, ‘महेन्द्रपाल के साथ कितने आदमी होंगे?’ मैंने कहा, ‘सप्त सहस्र, अब दुर्ग टूटता ही है’। न जाने क्यों, आधे सिपाही आपके आने के बाद से धीरे-धीरे निकल गए। मैं गंगा की ओर वाले जीने से उतरकर नाव से होकर गाँव गया, वहाँ से घोड़ा लेकर आया। रानी बेहाल हैं। कहा है, मृत्यु से पहले एक बार दर्शन कर लूँ, बस इतनी ही कामना है।’

यमुना हँसी – “फिर?”

“फिर सारा क्रम बदल गया। मुझसे बोले, “हम जल्द दलमऊ आते हैं। जाओ संवाद दो, चिन्ता न करें, महेन्द्रपाल के दिन अब समाप्त समझें। मारे घबराहट के पत्र नहीं लिख सके। मैंने कहा, अभी उड़ता हूँ।” कहकर अपना रास्ता लिया।”

पूरी मुस्कान हँसकर यमुना ने कहा, “यहाँ का हाल तो मालूम हो गया होगा?”

“हाँ, बाजार में सुना। चारों ओर से पड़ाव देखकर एक राह चलते से पूछा। मालूम हुआ, राजराजेश्वरी की सहायता आई है, अपने आदमी हैं। यह राजराजेश्वरी कौन हैं?”

“तुम्हारी श्रीमतीजी।”

“अच्छा?”

“क्यों। सन्देह हो रहा है?”

“नहीं, मैंने कहा, सब ओर अधिकार रखती हैं।”

“प्रभावती ने उन्हें राजराजेश्वरी बनाया है।”

संक्षेप में यमुना ने सारा हाल कहा, फिर कहा, “अपना हाल किसी से कहना मत, विद्या से भी नहीं, अभी किसी को नहीं मालूम।” फिर सस्नेह भोजन कराकर सभा में चलने के लिए पूछा। रामसिंह तैयार हो गया। सबको देखने की प्रबल उत्सुकता हुई। राजराजेश्वरी के रूप में विद्या गाएगी, नृत्य दिखलाएगी, ये उनकी सफलता में और आनन्दवर्द्धक हुए। उसे लेकर यमुना फिर सभा में आई और एक उत्तम स्थान पर उसे आसीन करा अपने आसन पर बैठ गई।

यमुना ने इस तरह रामसिंह को ले जाकर बैठाया था कि विद्या को न मालूम हो। दूत के नाम से विद्या समझी भी नहीं कि रामसिंह है। यमुना के आते ही प्रभावती से राजराजेश्वरी ने उतरने के लिए कहा। प्रभा ने यमुना की आज्ञा ली। यमुना पूर्ण प्रसन्न थी, कहा, “अवश्य, इनका प्रदर्शन अवश्य रखूँगी। अपनी रुचि के अनुसार गाना नहीं सुना, बहुत दिन हो गए।” प्रभावती ने सासुजी से कहा कि सभा में योग्यजन से यह कहला दें कि अब देवी राजराजेश्वरी इस आनन्द में अपना नृत्यगीत दर्शित करेंगी, उनका परिचय इतना यथेष्ट है कि दुर्ग की रक्षा के लिए आई हुई यह समस्त सेना उन्हीं की है। देवी कमला ने अपने पुरोहितजी को बुलाकर समझा देने के लिए कह दिया। सभा में उन्होंने घोषणा कर दी।

सुनकर उसी सादे वेश में विद्या उठी, जैसे शुभ्र वस्त्रधारिणी साक्षात् सरस्वती नृत्य-संगीत की मूर्ति में भक्तों को तृप्त करने के लिए जा रही हों। गति-गति खिल रही थी। लोग उस संयत चपला को देख रहे थे, रूप की मोहिनी महिमा से बँधे हुए। प्रशंसा के शब्द भी इधर-उधर से उठ रहे थे-हम लोगों पर देवीजी की बड़ी कृपा हुई, ऐसी ही दृष्टि सदा रहे, हमारी नम्र प्रार्थना है। यमुना ने प्राचीन वाद्यकारों के नाम कहकर मंच पर ले जाने के लिए दासियों को भेज दिया। महाराज ताज्जुब में आकर राजराजेश्वरी को देख रहे थे। रामसिंह अपनाव की पूरी स्वतन्त्रता से खिला हुआ साधना के बाद जैसे सिद्धि को देख रहा हो।

वादकों ने वाद्य लिए। वीणावादक से विद्या ने कहा, विष्णुताल के बोल बजाइए, सामयिक जो रागिनी पसन्द करें उसमें भरकर। वीणा में बोल बजने लगे, मृदंग संगति कर चला, विद्या ने नूपुर बँधवा लिये। यमुना मुस्कुरा रही थी, देखकर दृष्टि से प्रोत्साहन दिया, प्रभा स्तब्ध थी। ताल-ताल पर, भावना में भरी हुई विद्या विष्णु की सृष्टि-रक्षा के भाव को गति, इंगित और भंगिमाओं से स्पष्ट करती हुई रागिनी की मूर्ति बन रही। बड़ी तालों पर नृत्य सहज काम नहीं। समझदार दंग थे। यमुना कलावती की मर्मज्ञता पर तुष्ट। समा बँध गया। रामसिंह नृत्य-गीत का इतना समझदार न था। धोबी बन गया। रानी मन्त्रमुग्ध-सी रह गई। विष्णुताल पर नृत्य समाप्त कर, विद्या ने रुद्रताल पर वैसे ही दूसरे राग में बजाने के लिए कहा जो रुद्ररूप को व्यंजित करे। कुशल वृद्ध वीणावादक बजाने लगे। रुद्र का प्रलयंकर रूप ध्यान में लाकर विद्या तांडव नृत्य करने लगी। एक-एक गहन अभिव्यक्ति उच्छ्रवसित सागर-तरंग-सी उठने लगी। विनाश का निर्मम भाव प्रति स्थिति भंग से व्यक्त हो चला, जैसे सत्य-सत्य नटराज नारी से बँधकर प्रकट हो गए। मुहुः स्पन्दित हृदय यमुना उठकर खड़ी हो गई। आज पहले-पहल यमुना की दृष्टि में आश्चर्य मुद्रित हुआ। उसके राजराजेश्वरी होने में जो शंका महाराज को थी, वह दूर हो गई, इतना ही वे समझे।

नृत्य समाप्त कर, कुछ क्षण विश्राम करने के लिए विद्या बैठी। स्तुति शब्द से सभा गूंजने लगी। यमुना ने हार्दिक धन्यवाद देकर कहला भेजा कि अधिक परिश्रम की आवश्यकता नहीं, लास्य का एक अच्छा उदाहरण देकर नृत्य समाप्त कर देना ठीक होगा, गीत दो-एक स्वल्प बाद को नृत्य सम्बद्ध हो जाएँ। दूसरी दासी के हाथ प्रशंसा में पान भेजे। विद्या को लास्य के लिए ताम्बूल रक्ताधरा होने की जरूरत थी। कुछ थक भी गई थी। पान से गला सिंच रहा था। यमुना की मर्मज्ञता पर बहुत प्रसन्न हुई।

स्वस्थ होकर, तीन ताल की चीजें बजाने के लिए कहकर उठी। सौन्दर्य की भावना में रँगकर स्वप्न की ज्योतिर्मयी प्रेयसी बनी हुई तारक-तरल दृष्टि से सभा को एक बार देखा। मुख, भौंह, आँख, हाथ, पैर की प्रतिगति बदलकर सुन्दर बन गई, पार्थिव आकर्षणों में सर्वश्रेष्ठ उठते पैर के साथ मालूम हो रहा था, साकार सुरभि समीर पर चल रही है। देह किरण से हँसती। एक-एक आवर्त में सारी सभा निछावर हो रही थी। क्या तैयारी, क्या ड्योढ़, क्या तेहरी, क्या छल, पलकें बँध गईं। लास्य समाप्त कर विद्या ने यमुना की आज्ञा के अनुसार नृत्य के बँधे वैसे ही तीन तालों में भिन्न-भिन्न रागिनियों के गीत गाए, और अपार प्रशंसा पर चरण रखती हुई, वैसे ही बँधे नूपुरों से अपने आसन पर आकर बैठी। गहरी पहचान की मधुर मुस्कान से प्रभावती ने सम्वर्धित किया, सेविका नूपुर खोलकर दे आई।

औरों के गाने होने लगे। कुछ देर बाद यमुना विद्या को लेकर चली गई। कर्त्तव्य-वश प्रभावती बैठी रही। विद्या से रामसिंह के आने का हाल कहकर कक्ष में प्रतीक्षा करने के लिए कहा, और समझा दिया कि महाराज की द्विविधा मधुरता से दूर कर देना अच्छा होगा, फिर महाराज को बुला देने के लिए कहकर अपने कक्ष में चली गई

महाराज सीधे विद्या के अर्थात् अपने कमरे में गए। प्रदीप जल रहा था। उसके प्रकाश को मन्द करती हुई अपने नृत्य के छन्द की तरह विद्या बैठी थी। सम्मान की दृष्टि से महाराज ने देखा। विद्या उठी। अपनी स्वाभाविक चाल से महाराज के पास जा पैरों पर सिर रखा, कहा, “महाराज ब्राह्मण तो दया की मूर्ति होते हैं, आप मुझे क्षमा कीजिए!”

“क्या हुआ?” महाराज आश्चर्य में भरकर बोले।

“मैंने तुमसे छल किया है, पर उस समय वही उपाय था।”

“क्या छल?”

“मैं ब्याही हुई हूँ, शत्रुओं के हाथ से मुक्ति पाने के लिए तुम्हारा सहारा लिया था।”

महाराज ने सम्मान की दृष्टि से देखा, फिर सिर झुकाए हुए यमुना के कक्ष में चले गए।

क्रमश: 

Prev | Next | All Chapters 

अप्सरा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास 

नारी सिया रामशरण गुप्त का उपन्यास

प्रेमाश्रम मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास 

अदल बदल आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *