चैप्टर 31 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 31 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
Chapter 31 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
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कान्यकुब्ज से राजा महेश्वरसिंह के प्रस्थान करने के दिन प्रभावती लालगढ़ के उत्तर वाले मैदान में अपनी सेना अलग-अलग टुकड़ियों में बाँटकर एकत्र करने लगी। उसने अपने विश्वस्त अनुचरों में जिन्हें दक्ष समझा था, एक-एक सेना का नायकत्व उनमें एक-एक को दिया था। जिन गाँवों की उसने सहायता की थी, उनके लोग संवाद पाते ही साथ देने को चल दिए थे। वेतन अधिक मिलने का प्रकाश्य रूप से प्रचार किया गया था। भूखे लोग अपनी तलवार बाँधकर ढाल लेकर सेना में भर्ती होने को चल पड़े थे। इस प्रकार प्रभावती के साथ प्रायः पंचदश सहस्र सेना थी। एक-एक फौज उसके एक-एक सरदार के अधीन, दूसरी से कुछ फासला रखकर, चली आ रही थी। देखते-देखते लालगढ़ के उत्तर समुद्र-सा गरजने लगा। लालगढ़ पर जो विपत्ति का वज्र कान्यकुब्ज के विचार में टूटा था, उसका संवाद वहाँ फैल चुका था। सब श्रीहत हो रहे थे! कुमारदेव की माता मुरझाई हुई बैठी थीं। वहाँ अभी यह संवाद न पहुँचा था कि लालगढ़ की जब्ती की भी आज्ञा उसी दिन हुई थी और राजा महेश्वरसिंह कान्यकुब्ज की दस हजार सेना के साथ चढ़ाई करनेवाले हैं। प्रभावती की सेना को एकत्र होते देख नगर तथा दुर्ग के लोग कुछ समझ न सके कि वह किसकी सेना है और उसके आने का कारण क्या है। भय से लोग विवर्ण हो गए। उन पर पहले ही इतना अधिक दुःख पड़ चुका था कि लड़ने के लिए उनका हाथ न उठ रहा था। सेना भी उनके पास इतनी अधिक न थी। सब त्रस्त हो रहे थे, नगर में चारों ओर आतंक छाया हुआ था।
प्रभा एक जंगली कुंज में विद्या के साथ बैठी हुई आगे के कार्यक्रम पर विचार करने लगी।
“जैसी कि पहले मैंने कुमार को सोचकर लिखा था, तदनुकूल यहाँ राजराजेश्वरी का अभिनय करो।” गम्भीर होकर प्रभा ने कहा।
“तो?”
“तो, सम्भव है, दुर्ग के लोग आसन्न विपत्ति से उद्धार पाने के लिए तुम्हारी शरण में आएँ, तुम लिखो भी कि इस-इस तरह राजा महेन्द्रपाल और कुमार पर अन्याय किया गया है। प्रभावती ने हमारी शरण ली है-कुमार का पत्र प्रमाण है- अतः हम दुर्ग की रक्षा के लिए आए हैं। राजा महेश्वरसिंह आज चलकर शीघ्र किला लूटने के लिए पहुँचेंगे। हमारी इच्छा है कि तुम लोग निश्चिन्त होकर हमसे सहयोग करो। हम यहाँ से सच्चे प्रमाण राजा महेन्द्रपाल और कुमार के निर्दोष होने पर भेजेंगे। अभी तक कहीं पैर न जम सकने के कारण प्रभावती अनुकूल कार्य नहीं कर सकी।”
“बुरी नहीं सलाह।”
“फिर जल्दी करो।”
इन्हीं संकेतों पर विद्या ने एक दीर्घ पत्र कुमारदेव की माता रानी कमला को लिखा और राजराजेश्वरी नाम से साक्षर कर दिया।
पत्र पहुँचाने के लिए महाराज को भेजा, लिख दिया कि ये महाराज शिवस्वरूप दलमऊ के रहनेवाले हैं. प्रभावती के मामले में बलवन्तसिंह और महेश्वरसिंह से डरकर घर छोड़ा था। अनेक प्रकार से पत्र में धैर्य दिया।
महाराज पत्र लेकर चले।
जब यमुना लालगढ़ की सरहद पर पहुँची, तब उत्तर की तरफ गर्द उड़ती हुई देखकर शंका करने लगी। अनेक प्रकार की बातें मन में आने जाने लगीं। पहले तो यह सोचा कि राजा महेश्वरसिंह के चलने की तिथि गलत बतलाई गई। यह भी एक राजनीतिक चाल है। वे सीधे रास्ते न आकर, दूसरे रास्ते से आए। अब रामसिंह बेकार बैठा रहेगा। फिर सोचा, सम्भव है, रत्नावली ने कुमार की सहायता दी हो, वहाँ खबर पहुँची हो। वह कुमार को चाहती है, यह अनुमान यमुना कर चुकी थी। एक टीले के पीछे घोड़ा खड़ा किए इसी प्रकार की चिन्ताओं में पड़ी थी, जी व्याकुल हो रहा था, वहाँ जाने का एक उपाय सोच रही थी, इसी समय महाराज का घोड़ा गोल से बाहर निकलकर किले की ओर बढ़ता हुआ दिख पड़ा। साथ-साथ यमुना ने भी घोड़ा बढ़ाया। कुछ निकट आकर महाराज को पहचाना, धैर्य हुआ, अधिक मात्रा में आनन्द भी। इस प्रकार महाराज का आना सूचित कर रहा था कि दल मित्र का है, शत्रु का नहीं। कुछ और तेज घोड़ा बढ़ाकर यमुना ने महाराज को आवाज दी। नाम लेकर पुकारते हुए आदमी की ओर गौर से महाराज ने देखा। यमुना को पहचानकर घोड़ा रोक दिया। बड़े खुश हुए। अब वे यमुना को सच्चे रूप में पहचान चुके थे। सम्मान देने के विचार से घोड़े से उतर पड़े। यमुना की अब दासी-रूप में न रह सकती थी। घोड़े पर बैठी हुई लगाम हाथ में लिए दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
मधुर हँसकर महाराज ने कहा, “देवी, आसिरवाद गँवार बराँभन का यह है कि तुम्हारा सोहाग अचल होय, और हमारे अपराध क्षमा होयँ।” महाराज की आँखों से आँसू बहने लगे।
यमुना घोड़े से उतर पड़ी। बोली, “बराँभन, इतनी दीनता उठा सकूँ वह शक्ति मुझमें नहीं। आपकी अनन्त मूर्खता इस अलौकिक तत्त्व में दबी है, मेरे समस्त कृत्य यहाँ परास्त हैं।”
फिरकर महाराज को एक पेड़ की छाँह में ले गई, वहाँ छुटने के बाद से अब तक की समस्त बातें मालूम कीं। सब सुनकर प्रभावती के भाव-परिवर्तन पर कुछ देर सोचती रही।
“चलो,” यमुना ने कहा, “मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूँ। फिर तुमसे जरूरी दूसरा काम है। दूसरा उसे नहीं कर सकता। तुम्हारा घोड़ा थका होगा। काम हो जाए, फिर यहीं से दूसरा सुस्ताया घोड़ा ले लेंगे।”
दोनों घोड़े पर सवार हो लालगढ़ के उत्तरवाले फाटक पर पहुँचे। रानी कमला के नाम जरूरी पत्र सुनकर सिपाही ने अपने सरदार को खबर दी। वह आया और पत्र लेकर रनवास भेजवा दिया। यमुना ने सरदार कर्णसिंह को बुला देने के लिए कहा। कहा कि कहना कुमारदेव का जबानी हाल है। कर्णसिंह तत्काल आया। यमुना को देखकर देर तक खोया हुआ-सा खड़ा रहा। फिर होश में आ पैर छुए। पूछा, “भय्या के क्या समाचार हैं?”
“अच्छे हैं,” कहकर यमुना एकान्त में ले गई, फिर कुछ बातें समझाकर, प्रभावती को बुला लेने के लिए रानीजी से कहने को कहकर जल्द भेज दिया।
क्रमश:
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