चैप्टर 3 नारी सियारामशरण गुप्त का उपन्यास | Chapter 3 Nari Siyaramsharan Gupt Novel
Chapter 3 Nari Siyaramsharan Gupt Novel
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जमना की नींद उचटी हुई थी। उसके मन में न जाने कितनी बातें आ- जा रही थीं। जितना वह उन्हें हटाने का प्रयत्न करती, वे उतने ही वेग से और आतीं।
कोठरी का दिया नित्य के अनुसार ठंडा कर दिया गया था। कोई वस्तु वहाँ सूझती न थी । जान पड़ता था, जैसे कोठरी के बन्द साँचे में ढलकर वहाँ अँधेरे का एक बड़ा-सा थक्का जम गया है।
पास में पड़े हल्ली के खुर्राटे की आवाज सुनाई पड़ती थी और बस चारों ओर सुनसान ही सुनसान । बीच-बीच में कहीं से किसी कुत्ते का भूकना सुनाई सुनाई पड़ता था । उस समय ऐसा लगता था कि यह जैसे उस निस्तब्धता की ही कोई बोली हो ।
जमना के जागने के लिए यह समय बहुत सुभीते का था । इस समय दूसरा कोई आकर विचारों की लड़ी नहीं तोड़ सकता। वह बरसों से अकेली पड़ गई थी, इस बात का अनुभव पूर्ण रूप से वह ऐसे ही में कर सकती है।
इधर-उधर करवट बदलते-बदलते वह कब सो गई, यह उसे मालूम न हुआ। वह सो गई तब भी उसने अपने को चलते-फिरते और देखते हुए पाया।
देखने लगी कि किसी अनजान स्थान में वह पहुँच गई है। चारों ओर धान के हरे खेत लहरा रहे हैं । हल्ली कहता था, कलकत्ते में धान बहुत होता है। धान के खेत तो हैं, परन्तु यहाँ कहीं कोई आदमी नहीं है । जहाँ तक दिखाई देता है, बस हरियाली ही हरियाली है। ऐसे में वह अकेली जाय कहाँ? कोसों तक किसी के होने का चिह्न तक दिखाई नहीं देता ।
सहसा थोड़ी दूर उसे एक भेड़ा दिखाई दिया। कुछ स्त्रियाँ ऐसी सुनी गई हैं जो आदमी को भेड़ा बनाकर रखती हैं। वह घबरा गईं। भेड़ा गर्दन मोड़कर जमना की ओर देखता है और झट से आगे बढ़ जाता है । उसके पीछे चलने से वह अपने को रोक न सकी। उस प्राणी में ऐसा ही कुछ आकर्षण था ।
जमना चली जा रही है, बराबर चली ही जा रही है। उसके पैर दुखने लगे हैं, फिर भी बीच में वह रुक नहीं सकती। गाड़ी के पीछे रस्सी से बँधी किसी की डाल की कटी हुई शाखा की तरह वह अपने आप आगे घिसटती चली जा रही है। इधर-उधर की झाड़ी में उलझकर कब उसका वस्त्र फटता है, कब शरीर में खरोंच लगती है इसका विचार करने की शक्ति उसमें नहीं ।
एक बार उसकी दृष्टि भेड़े पर से उचटी और उसी समय वह दृष्टि से ओझल हो गया। अब चारों ओर फिर वही सुनसान इस सुनसान से अपने को वह कैसे बाहर निकाले ? अब यहाँ धान के हरे-हरे खेत भी नहीं रहे। यह कोई भयङ्कर वन है। कहानी में सुना हुआ कदलीवन । इसका तो कहीं ओर छोर ही नहीं मिलता। अपने को निस्सहाय पाकर एक जगह बैठकर वह आँसू बहाने लगी। हाय ! यह भेड़ा भी अपने घर के आदमी जैसा ही निरदई निकला ।
थोड़ी देर रोते-रोते उसने सिर उठाया कि सामने बहुत दूर दो आदमी छाया – से दिखाई दिये। नहीं, ये दोनों पुरुष नहीं है। एक पुरुष है, दूसरी स्त्री । उठकर वह फिर चलने लगी ।
अब उसने स्पष्ट देखा, – अरे यह तो उसका पति है। मन ही मन प्रश्न किया- साथ की वह स्त्री कौन है ?
उधर उस स्त्री ने जमना की ओर उँगली करके पूछा – इसी को ला रहे थे ? कौन है यह?
जमना सन्न रह गई । जैसे उसकी छाती पर किसी ने मानो बोझ रख दिया हो। वह चिल्ला पड़ना चाहती है, पर उसकी जीभ काम नहीं देती ।
वृन्दावन ने उधर उस स्त्री से कहा- गाँव की एक औरत; वही जिसके बारे में बात हुई थी।
हाय राम ! गाँव की एक औरत – वही, जिसके बारे में बात हुई थी ! जमना जोर से सिर पीटने लगी।
देखकर वह स्त्री ताली पीटकर हँसी । बोली- बड़े मजे की औरत है यह तुम्हारे गाँव की !
वृन्दावन भी साथ-साथ मुँह फेरकर हँसने लगा ।
जमना के सारे शरीर में आग सी लग गई। इसी के फेर में पड़े हैं! इसके साथ कैसे घुल मिलकर हँसते हैं, मुझसे बात तक नहीं पूछते । छिः छि: कैसी ओछी औरत है ! न रूप रंग में अच्छी, न बातचीत में। अच्छे रङ्गीन कपड़े पहन लिये और समझती है, हम हैं सो कोई नहीं ।
जमना झपटकर पास पहुँची कि उस स्त्री ने रूप बदल लिया। ओ मेरी मैया, इसके तो बड़े-बड़े दाँत निकल आये। यह आदमी खाने वाली डायन है।
वह एक साथ जोर से चिल्ला पड़ी और उसकी आँख खुल गई।
“माँ क्या हुआ, क्या हुआ ?” – कहकर हल्ली भी अपनी खटिया पर उठकर बैठ गया ।
चिड़ियाँ चहकने लगी थीं, परन्तु अन्धकार कुछ-कुछ अब भी था । जान पड़ता था कि प्रभात के स्वागत में किसी अलौकिक धूपदानी ने यह सुगन्धित धूप ही सब ओर एक-सा फैला दिया है।
लड़के को जागा देखकर जमना लजा गई । बोली- डर मत हल्ली, मैं सपना देख रही थी ।
हल्ली ने विस्मित होकर पूछा-सपना देख रही थीं तो इस तरह जोर से चिल्ला क्यों उठीं?
“ऐसा ही सपना था । “
“सबेरे का सपना सच्चा होता है। सच्चा नहीं होता हैं क्यों माँ? मुझे ऐसा सपना कभी नहीं आता।” अपने स्वप्न न आने के सोच में वह माँ से सपने का ब्यौरा पूछना भूल गया। जमना म्लान मन से कपड़े लपेटकर खाट उठाने लगी।
क्रमश:
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