चैप्टर 29 : ज़िन्दगी गुलज़ार है | Chapter 29 Zindagi Gulzar Hai Novel In Hindi

Chapter 29 Zindagi Gulzar Hai Novel In Hindi

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२६ मार्च – कशफ़

कल जब मैंने ज़ारून जुनैद को देखा था, तो मुझे ये तवक्को (उम्मीद) नहीं थी कि आज वो मेरे ऑफिस आ जायेगा. जब पी.ए. ने मुझे उसका कार्ड लाकर दिया, तो चंद लम्हों के लिए मैं हैरान रह गई थी क्योंकि मुझे ये उम्मीद नहीं थी कि मेरे रात के कर्ट बिहेवियर के बावजूद अगले ही दिन दोबारा मेरे सामने आ खड़ा होगा.

“‘इन साहब को इंतज़ार करने के लिए कहो, जब मेरे पास काम खत्म हो जायेगा, तब मैं उनसे मिल लूंगी.”

पी.ए. मेरी बात पर हिचकिचाते हुए बोला था, “लेकिन मैडम! उन्हें इस तरह इंतज़ार करवाना ठीक नहीं होगा.”

मैं जानती थी कि वो कार्ड पढ़ चुका है और फॉरेन मिनिस्ट्री के एक आदमी को बिला-वजह इंतज़ार करवाना अपना सर्विस रिकॉर्ड ख़राब करवाने के बराबर था और शायद यही बात वो मुझे समझाने की कोशिश कर रहा था.

“मैंने आपसे जो कहा था, आप वहीं करें.”

इस दफ़ा मेरा लहज़ा सख्त था. इसलिये वो ख़ामोशी से चला गया. फिर मैं मामूल (routine) के काम सर-अंज़ाम देती रही. लंच ऑवर के दौरान पी.ए. ने मुझे फिर से उसकी मौजूदगी के बारे में बताया और मैंने उसे दोबारा इंतज़ार करवाने के लिए कहा. लंच इंटरवल के बाद पी.ए. दोबारा मेरे पास आया.

“मैडम! अब ले आऊं उन्हें?”

“आप इस क़दर बेचैन क्यों हो रहे हैं? मैंने कहा ना जब मुझे फ़ुर्सत मिलेगी, मैं उनसे मिलूंगी. अगर वो इंतज़ार कर सकते हैं तो करें, वरना चले जायें.”

मेरा लहज़ा इतना बिगड़ा हुआ था कि उसने कुछ कहने की कोशिश ही नहीं की. मैं दोबारा अपने काम में मशरूफ हो गयी.

ऑफ़ टाइम खत्म होने से पहले मैंने पी.ए. को बुलवाया और मामूल की हिदायत दी.

“वो साहब अब भी बैठे हैं?”

“जी मैडम! ले आऊं अंदर?” मेरे पूछने पर उसने फ़ौरन कहा था और मैंने सिर हिला दिया.

चंद लम्हों के बाद ज़ारून जुनैद दरवाज़ा खोलकर अंदर आ गया था.

“जी फ़रमाइए, किसलिए ज़हमत की आपने?” मैंने उसके अंदर आते ही पूछा था. वो मेरी बात पर मुस्कुराने लगा.

“आप बैठने के लिए नहीं कहेंगी मुझे?”

“मैंने तुम्हें अंदर आने दिया, ये काफ़ी नहीं है?”

“मेरे ख़याल में मुझे ख़ुद ही बैठ जाना चाहिए. इतने लंबे इंतज़ार के बाद इतना हक़ तो बनता है मेरा.”

ये कह कर बड़े पुरुसुकून अंदाज़ में कुर्सी खींचकर बैठ गया. मैं कुछ देर उसे देखती रही. फिर इण्टरकॉम पर पी.ए. को अंदर बुलाया. पी.ए. के अंदर आने तक वो मुस्कुराता रहा. पी.ए. के अंदर आने पर मैंने उससे कहा.

“बारी साहब! इस शख्स को अच्छी तरह देख लें, अगर ये दोबारा यहाँ आये और मुझसे मिलने पर इसरार (ज़िद) करे, तो इसे धक्के देकर यहाँ से निकाल दीजियेगा.”

ज़ारून के चेहरे का उड़ा हुआ रंग देख कर मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी. उसके चेहरे से मुस्कराहट गायब हो गयी थी.

“बस मुझे आपसे यही कहना था. अब आप जा सकते हैं.” पी.ए. बौखलाया हुआ सिर हिलाता मेरे कमरे से निकल गया.

“तुम्हें याद होगा, जब तुमने मुझे कॉलेज में थप्पड़ मारा था, तो मैंने तुमसे कहा था, मैं उस वक़्त का इंतज़ार करूंगी, जब मैं तुमसे उससे ज्यादा ज़ोरदार थप्पड़ मार सकूं और ये वही वक़्त था, जिसका मुझे इंतज़ार था, लेकिन मैं तुम पर हाथ नहीं उठाऊंगी क्योंकि जो कुछ मैंने तुम्हारे साथ किया है, वो किसी थप्पड़ से कम नहीं है. आइंदा यहाँ आने की ज़हमत मत करना. नाउ गेट आउट फ्रॉम हियर.”

वो मेरी बात पर सुर्ख चेहरे के साथ एक झटके में खड़ा हो गया, “जिस ओहदे पर तुम हो और जिस कुर्सी पर बैठ कर तुम ये समझ रही हो कि तुमने दुनिया फ़तह कर ली है, इसे ख़त्म करने के लिए मेरा एक ही फोन काफ़ी है और फिर तुम उस ओहदे पर नहीं रहोगी, जिसके बलबूते पर तुम मुझे यहाँ से निकाल रही हो.”

मैं उसकी बात पर मुस्कुराई थी, “चलो कोशिश करके देख लो. मैं तुम्हारी ताक़त, पहुँच और कमीनगी तीनों से वाकिफ़ हूँ, फिर भी खौफज़दा नहीं हूँ. तुम मेरा करियर ख़त्म कर सकते हो, दुनिया नहीं. मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे कहने पर मुझे ओ-एस.डी. बना दिया जायेगा या मेरे ख़िलाफ़ कोई इन्क्वारी शुरू करवा दी जाएगी. ऐसी आज़माइशों से मैं नहीं घबराती. आदी हूँ इनकी. हाँ, तुम्हारे जैसे आसाईशों (Luxury) के आदी डर जाते हैं. मैं हर चीज़ का समाना करने के लिए तैयार हूँ, लेकिन तुम्हें जो करना है, वो तो तुम यहाँ से जाने के बाद ही करोगे, अभी तो नहीं कर सकते. नाउ, गेट आउट ऑफ़ माय रूम एंड दो व्हाटएवर यू लाइक. बट एट प्रेजेंट आई ऍम द बॉस हियर.”

वो चंद लम्हों के लिए मुझे देखता रहा और फिर कुर्सी को ठोकर मारता हुआ बाहर चला गया.

मैं जानती हूँ वो जो कह रहा था, वो करवा सकता है, मैं अब खौफज़दा नहीं हूँ. आज से चंद साल पहले अगर वो मुझसे मिलता, तो मैं कभी भी उससे इस तरह बात नहीं कर सकती थी, क्योंकि ये जॉब मेरी कमज़ोरी थी और मेरे सिर पर जिम्मेदारियों के पहाड़ थे, मगर आज हालात वैसे नहीं हैं, फिर उसे कैसे बख्श देती.

वो उन चंद लोगों में शामिल है, जिनसे मैंने ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा नफ़रत की है. मुझे लाइब्रेरी में कहा गया उसका एक-एक लफ्ज़ याद है. मैं आज भी उस एक हफ्ते को नहीं भूली हूँ, जब मैं हॉस्टल के कमरे में चेहरे पर तकिया रख कर रोया करती थी, ताकि मेरे रोने की आवाज़ किसी और तक ना पहुँचे. ना मैं आज तक वो शाम भूली हूँ, जब मैं हॉस्टल में छत से छलांग लगा देना चाहती थी. इस शख्स ने कॉलेज में मुझे ज़लील कर दिया था. क्या चीज़ थी, जिसकी इसके पास कमी थी, फिर भी उसने मुझे नीचा दिखाने की कोशिश की थी. मेरी ज़ात को उसने अपने दोस्तों के सामने चेस-बोर्ड बनाना चाहता था, जिस पर वो अपनी मर्ज़ी के मोहरे अपनी पसंद के मुताबिक चला सके.

क्या था मेरे पास? खूबसूरती न दौलत, न उस जैसी ज़ेहनियत (अक्लमंदी, सूझबूझ), न वो फैमिली बैकग्राउंड, न स्टेटस, न उस जैसी क़ाबिलियत. सिर्फ़ इज्ज़त थी और वो भी वो खाक में मिला देना चाहता था और अब वो फिर मेरे सामने आ गया है. पर अब मैं सात साल पहले की कशफ़ नहीं हूँ. अब मुझे किसी चीज़ की परवाह नहीं है. मेरे लिए यही एहसास काफ़ी है कि मैंने अपनी तौहीन का बदला चुका दिया.

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