चैप्टर 29 नीलकंठ गुलशन नंदा का उपन्यास | Chapter 29 Neelkanth Gulshan Nanda Novel In Hindi Read Online

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Chapter 29 Neelkanth Gulshan Nanda Ka Upanyas 

Chapter 29 Neelkanth Gulshan Nanda Novel In Hindi

साँझ की ठंडी हवा अठखेलियाँ कर रही थी। आनन्द कारखाने के काम से निबटारा पाकर उस घाटी की ओर बढ़ता जा रहा था, जिसका कण-कण उसका जाना-पहचाना था।

वह झील के किनारे पहुँचा, जो कभी उसके मन की गहराइयों में अपना प्रतिबिम्ब डालती थी। वह नीला जल और उसके किनारे खड़ा छोटा-सा बंगला-चुपचाप और सुनसान-सा, उसके मन में एक चुभन-सी उठी। उसके पाँव उसी ओर उठते गए। न जाने अब यहाँ कौन रहता है?

जैसे ही उसने अपने पाँव सीमेंट के चबूतरे पर रखे, उसका हृदय घबराहट से धड़कने लगा। उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। वहाँ कोई भी न था, जान पड़ता था कि वह मकान एक समय से उजाड़ पड़ा है।

पौधों में आहट हुई और कोई उधर बढ़ा। वह यहाँ का पुराना माली था, जो आनन्द को देखकर ठिठक गया। आश्चर्य में कुछ क्षण वह उसे वहीं खड़ा देखता रहा और दौड़कर आनन्द के पास आकर बोला-

‘बाबूजी-आप!’

‘हाँ काका मैं। कहो आजकल कौन रहता है यहाँ?’

‘यह तो उजड़ा पड़ा है बाबूजी! जब से आप गए हैं, कोई इसे किराए पर लेता ही नहीं।’

‘क्यों?’

‘कहते हैं अशुभ स्थान है। न जाने क्या-क्या बकते हैं।’

‘क्या कहते हैं हम भी तो सुनें।’

‘छोटा मुँह बड़ी बात। कहते हैं बाबूजी का दिमाग खराब हो गया है, उनकी पत्नी भाग गई, हर रात वह उसे ढूंढने यहाँ चले आते हैं।’

आनन्द उसकी यह बात सुनकर हँसने लगा। जब वह चुप हुआ तो उसकी यह हँसी घाटी में गूंजने लगी।

‘देखो काका’-बात को बदलते हुए आनन्द ने माली से कहा-‘आज हम तुम्हारे बंगले को आबाद करेंगे। आज रात यहीं सोएंगे। वह बंशी बाबू हैं ना कारखाने के खजांची, उनके यहाँ मेरा सामान रखा है, भागकर ले आओ और हाँ उनके घर कहना-आज मैं खाना नहीं खाऊँगा, मन ठीक नहीं।’

माली की बात सोचकर वह डर गया और फिर अपनी मूर्खता पर हँसने लगा। उसे लगा जैसे सचमुच ही वह पागल है और इस सुनसान में बेला को ढूंढ रहा है, जैसे वह यहीं-कहीं छिपी बैठी है। उसने पाँव की ठोकर से कमरे का बंद किवाड़ खोला।

कमरे में बिलकुल अंधेरा था। आनन्द ने दीवार को टटोलकर बिजली का बटन दबा दिया।

उजाला होते ही उसकी हल्की-सी चीख निकल गई। किंतु वह शीघ्र ही साँस रोककर उसे दबा गया और आश्चर्य से सामने की खिड़की को देखने लगा। कोई स्त्री पीठ किए खिड़की से बाहर झांक रही थी। कमरे में और कोई न था। न वहाँ कोई सामान था। कमरे का अकेलापन बतला रहा था कि इसमें बड़े समय से कोई नहीं ठहरा।

आखिर इस उजाड़ में यह सुंदरी कौन? इस प्रश्न को मस्तिष्क में लिए उसने ध्यानपूर्वक उसे देखना आरंभ किया। आसमानी रंग की रेशमी साड़ी, मशीन से बने केश गर्दन पर झूमते हुए, अभी वह असमंजस में उसे देख रहा था कि वह अपने स्थान से सरकते हुए पहलू बदलने लगी।

जैसे ही दोनों की आँखें चार हुईं, आनन्द कांप गया। आश्चर्य से उसके शरीर में एक ठंडी रौ-सी दौड़ गई। वह बेला थी, जो आज अपने जीवन की शिखा पर आनन्द को देख रही थी।

आनन्द के कांपते होंठों से बस इतना निकला-‘तुम।’

और उसने अपना मुँह फेर लिया। क्षण-भर खड़े रहकर वह लम्बे-लम्बे डग भरता बाहर निकल गया। उसे अनुभव हुआ जैसे प्रसन्नता की पींग बढ़ाते हुए उसकी रस्सी टूट गई हो और वह धड़ाम से नीचे गिरा हो। बेला की तीखी दृष्टि विष बनकर उसके हृदय में उतर गई। वह विस्मित था कि इस उजाड़ में वह अकेली क्या कर रही है। उसे अब उसके निश्चयों से डर-सा लगने लगा था।

सामने झील के तल पर सरसराती आवाज में उससे अपने अपाहिज भाई की चीखें सुनाई दीं। उसे विश्वास-सा होने लगा कि बेला ही उसके भाई की मौत की जिम्मेदार है।

एकाएक इस असमंजस में आनन्द के मन में बदला लेने का विचार प्रबल हो उठा, बीनापुर का कण-कण उसे बदले पर उभारने लगा।

यह सुनसान स्थान, बस्ती से दूर, बेला का अकेला होना, कितना सुंदर अवसर है दहकती हुई ज्वाला को ठंडा करने का, क्यों न आज इस नागिन का सर कुचल दूँ, संध्या ने भी तो उस शाम उसे यही आदर्श दिया था।

‘विष को विष काटता है। विष में थोड़ा-सा अमृत मिलाइए। बेला को अपने साथ ले जाइए; इस जगमगाती दुनिया से बहुत दूर बियावान पहाड़ों की चोटियों पर; जहाँ से झरने का पानी घाटियों में झरझर की गूंज भर देता है, फिर चुपके से उसी शोर में बेला को सदा के लिए गाड़ दीजिए।’

‘हाँ-हाँ, यह ठीक है। किंतु इतना कड़ा मन वह कहाँ से लाए? उसकी बांहों में वह शक्ति कैसे आएगी, जो उसे धकेल सकें और फिर जब गिरते समय बेला की चीख उस घाटी में गूंजेगी तो क्या वह सहन कर सकेगा-क्यों नहीं? बेला भी तो एक स्त्री होते हुए अपने में साहस ले आई थी, उसके अपाहिज भाई को झील में डुबोते समय उसका मन तो नहीं डोला, उसकी चीख भी तो इस घाटी में गूंजी होगी, उसके कानों के पर्दों से टकराई होगी, उसने भी तो सुनने की शक्ति पैदा की थी, फिर वह पुरुष होते डगमगा रहा है, नहीं-नहीं, वह अवश्य बदला लेगा, इस नागिन का सिर कुचलेगा।

एकाएक उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा और वह चौंक गया। किसी की ध्वनि हवा के साथ सरसराई-‘आनन्द?’

उसने मुड़कर देखा। वह बेला थी, जिसकी आकृति सूर्यास्त के बादलों में से छनकर आती हुई किरणों की लालिमा में चमक रही थी।

दोनों चुप थे। परंतु दोनों के अंतःस्थल में हलचल थी। आज के दृश्य उस रंगीन शाम की याद दिला रहे थे, जब बेला खंडाला की पहाड़ियों पर इसी तरह आनन्द के संग झूमती हुई जा रही थी; ऐसे ही बादल थे; झरनों की मधुर गूंज थी और वही प्रकृति की गोद, इसके पश्चात् आनन्द को अपना निर्णय बदलना पड़ा था।

पर आज का तूफान उन उमड़ती घटनाओं के साथ सीने में बिजली-सी छिपाए था, जिसमें राख कर देने की शक्ति है; ऐसी गरज थी, जो घाटी में गूंजते झरनों की आवाज में एक भयभीत शोर भर दे; आज सुबह इस उमड़ती घटा को वह सदा के लिए दबा देना चाहता था।

दोनों कटी हुई पहाड़ी की चोटी पर जा ठहरे, जिसके एक ओर पानी झरना बनकर खड्डे में गिर रहा था। वह झुककर खड्डे में झांकने लगी। आनन्द भी उसके सामने आ ठहरा और उसके कंधे का सहारा लेकर नीचे खड्डे में गिरते पानी को देखने लगा।

उसकी उंगलियाँ मचल रही थी। वह उस क्षण की प्रतीक्षा में था, जब बेला एक पाँव आगे रखे और वह उसे खड्डे में धकेल दे। पानी के इस शोर में नीचे जाती बेला की चीखों से घाटी गूंज उठेगी-एक तूफान उठेगा और फिर सदा के लिए शांति छा जाएगी।

बेला ने देखा कि आनन्द किसी भयानक विचार में डूबा है-मुख पर कालिमा बिखर रही है-शरीर से पसीना ऐसे छूट रहा है मानों धौंकनी से भाप निकल रही हो। आनन्द ने बेला को अपनी ओर यों देखते देखा तो होंठों पर बनावटी मुस्कान ले आया और बोला-

‘कितना विचित्र दृश्य है नीचे।’

‘आप ठीक कहते हैं।’ बेला के स्वर में गंभीरता थी, ‘इतना सुंदर दृश्य, पानी का तेज बहाव और फिर अकेलापन-दूर-दूर तक किसी का गुजर नहीं, फिर प्रतीक्षा कैसी?’

‘प्रतीक्षा? किसकी?’ आश्चर्य से देखते आनन्द ने पूछा।

‘मंजिल तो आ गई, इससे ऊँची चोटी और कोई नहीं है। साहस कीजिए, अंधेरा बढ़ रहा है और आप यह भी न जान पाएंगे कि आपने अपनी बेला को किस खड्डे में धकेला था।’

‘बेला!’ आनन्द के मुँह से चीख निकली। दूर दो बादल आपस में टकराए और एक भयानक गरज उत्पन्न हुई-आनन्द ने बेला को बांहों में जकड़कर सीने से चिपका लिया। बेला की आँखों से निकलते आँसू उसकी छाती को भिगो रहे थे।

दोनों मौन खड़े एक-दूसरे से चिपके बादलों में खड़े रहे। झूमती हुई घटाओं ने बरसना शुरू कर दिया। दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े ढलान पर भागने लगे।

एक विचित्र खिंचाव था, एक अनोखा बंधन था, जो दोनों को एक-दूसरे के समीप ला रहा था। पानी की बौछार को चीरते हुए दोनों भागे जा रहे थे।

जब दोनों ने पुराने बंगले में पाँव रखा तो झेंपकर रुक गए। सामने माली बैठा उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। अपना सामान देखकर आनन्द ने उसका धन्यवाद किया और बोला-‘अच्छा काका, अब आराम करो। बरसात बढ़ती जा रही है।’

‘और आपका खाना…’

‘कुछ नहीं, आज हमें भूख नहीं।’

माली मुस्कराता हुआ बाहर चला आया। आनन्द ने चोर दृष्टि से बेला को देखा, जो भीगे कपड़ों में सिमटी खड़ी थी, फिर वह किवाड़ बंद करने माली के पीछे चला गया।

बेला खिड़की के पास खड़ी होकर देखने लगी। बरसात का पानी छप-छप करता झील से गिर रहा था। हवा के झोंके कभी-कभी तो पानी की बौछार को खिड़की के भीतर तक ले आते और भीगी बेला को और नहला जाते।

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