चैप्टर 28 : ज़िन्दगी गुलज़ार है | Chapter 28 Zindagi Gulzar Hai Novel In Hindi

Chapter 28 Zindagi Gulzar Hai Novel In Hindi

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२५ दिसंबर – ज़ारून

आज मैंने कशफ़ मुर्तज़ा को देख ही लिया. उस कशफ़ मुर्तज़ा को, जिससे मिलने के लिए मैं पिछले सात साल से बेक़रार था और ये मुलाक़ात बहुत गैर-मुतवक्के (अप्रत्याशित) थी.

जब मैं फैसलाबाद आया था, तो मेरे वहम-ओ-गुमान (कल्पना) में भी नहीं था कि वो मुझे वहाँ मिलेगी. मैं तो सिर्फ़ टेस्ट मैच देखने के लिए फैसलाबाद आया था, क्योंकि लाहौर में बोर हो रहा था. इसलिए सोचा कि चलो क्रिकेट ही सही तफ़रीह (मन-बहलाव) का कोई सामान तो हो और फिर यहाँ मेरा कज़िन आरिफ़ भी तो पोस्टेड था, तो सोचा इसी बहाने उसे भी मिल लूंगा.

आज टेस्ट मैच का खात्मा होने पर दोनों टीम्स के स्टाफ को दावत दी गई थी और आरिफ़ के साथ मैं भी उस दावत में गया था. डिनर से पहले जब रस्मी तक़रीरों (भाषणों, व्याख्यानों) का सिलसिला शुरू हुआ, तो सबसे पहली तक़रीर उसकी थी. वो स्टेज पर आकर रस्मी कलिमात (बातें, शब्द, अल्फ़ाज़) दुहराती रही थी और मैं उसका ज़ायज़ा लेता रहा. वो आसमानी रंग के कॉटन सूट में मलबूस (लिबास पहना हुआ था) थी और उसके ऊपर उसने काली जैकेट पहनी हुई थी, जिसके बटन सामने खुलते थे और इसे आस्तीनों से फोल्ड किया हुआ था. उसके बाल स्टेप्स में कटे हुए थे. मैं नहीं जानता कि कॉलेज में भी उसने बाल कटवाए हुए थे या नहीं, क्योंकि उसके सिर पर हमेशा बड़ी सी चादर होती थी. एक और तबदीली, जो मैंने उसमें देखी थी – वो उसकी मुस्कराहट थी. वो अपनी तक़रीर के दौरान मुसलसल (लगातार) मुस्कुराती रही थी और कॉलेज में मैंने उसे मुस्कुराते कम ही देखा था. अपनी तक़रीर (भाषण, व्याख्यान) ख़त्म करके वो स्टेज से उतर आई थी और मेरी नज़रें उसकी सीट तक उसको देखते हुए गयी.

उस वक़्त तक मैं नहीं जानता था कि उसने मुझे देखा है या नहीं और अगर देखा था, तो क्या पहचाना था या नहीं. डिनर के कुछ देर पहले वो आरिफ़ के पास आई थी और आरिफ़ उसे लेकर मेरी तरफ़ आ गया और मैं उस लम्हे बहुत नर्वस था क्योंकि मैं जानता था कि अब आरिफ़ उसके साथ मेरा तारूफ़ करवाएगा और मैं उसके रद्द-ओ-अमल (प्रतिक्रिया) के बारे में फ़िक्रमंद था, लेकिन जब आरिफ़ ने उससे मेरा तारूफ़ करवाया, तो उसकी आँखों में कोई शनासाई (जान-पहचान, परिचय) नहीं झलकी थी. उनसे बड़े रस्मी तरीके से मुझसे दुआ सलाम की. मैं उसके अंदाज़ पर हैरान रह गया था कि उसने मुझे पहचाना क्यों नहीं. मेरे नाम पर, मेरे चेहरे को देख कर उसे इतना बे-तासीर (जिसमें असर न हो, अभाव-कारी) तो नहीं रहना चाहिए था.

डिनर के बाद वो चाय का कप लेकर हाल से बाहर निकल गई. मेरा दिल चाहा कि मैं उसे अपनी शिनाख्त (पहचान, परिचय) करवाऊं. वो बरामदे के सतून (बरामदा के खंभे) के पास खड़ी चाय पी रही थी. उसके एक हाथ में चाय का कप और दूसरा हाथ जैकेट की जेब में था. वो लॉन को देख रही थी. मेरे कदमों की चाप पर उसने गर्दन मोड़कर मुझे देखा था.

“कशफ़ आपने मुझे पहचाना.”

उसे अपनी जानिब (तरफ़, दिशा, ओर) मुतवज्जह (मुँह किया, रुख किया) देख कर मैंने कहा. बड़ी नज़रों से उसने मुझे देखा था, फिर पेपर कप को रोल करके लॉन में फेंकते हुए कहा, “बहुत अच्छी तरह, क्योंकि उस हवाले से मैंने बहुत कम लोगों को याद रखा है और जिन्हें मैं याद रखती हूँ, उन्हें कभी भूलती नहीं हूँ ज़ारून ज़ुनैद.”

उसका लहज़ा इस कदर सर्द था कि मैं चाहते हुये भी ख़ुद को किसी ग़लतफ़हमी में मुब्तला (डालना, पड़ना, फंसना) नहीं कर सका. फिर वो वहाँ से चली गई थी. वो वाकई बदल गयी थी. उसने मेरी आँखों में आँखों डालकर बात की थी और एक लम्हे के लिए भी मेरी आँखों से उसने नज़रें नहीं हटाई थी और कॉलेज में वो किसी से बात करते हुए हमेशा इधर-उधर देखा करती थी. मैं उसकी आँखों का तासीर (असर, प्रभाव) नहीं भूल पाया हूँ. बिल्कुल सर्द आँखें. बर्फ़ की सलाखों की तरह. बिल्कुल इंसान के अंदर उतर जाने वाली नज़रें. कम-अज-कम मैं तो जान गया हूँ कि मैं उसे भूला नहीं हूँ. आखिर मुझे ये तवक्को (उम्मीद) क्यों थी कि वो सब कुछ फ़रामोश (भूलना) कर चुकी होगी. क्या वो सब कुछ फ़रामोश कर देने वाला था और फिर जब आज तक मैं कॉलेज के उस वाक्ये को नहीं भूल पाया, तो वो कैसे भूल सकती है? लेकिन आज पहली दफ़ा मेरा दिल चाहा कि काश वो सब कुछ भूल चुकी होती.

अब जब मैं डायरी लिख रहा हूँ, तो मेरे ज़हन में सिर्फ़ एक ही सोच है कि मैं उससे दोबारा कैसे मिलूं. मैं उसके दिल से अपने लिए बदगुमानी (कुधारणा, बुरा ख़याल) का ज़हर निकालना चाहता हूँ. क्यों? ये मैं नहीं जानता. मैं तो अब तक इस कैफ़ियत से ही नहीं निकला हूँ, जो आज उसे अपने सामने देखकर मुझ पर तरी (भिगा गई है, तरावट ले आई है) हो गई थी. आज तक किसी औरत को देख कर मैं वैसे ज़ज्बात से दो-चार नहीं हुआ, जैसे आज हुआ हूँ. ऐ खुदा! क्या ज़रूरी था कि तू कशफ़ को बनाता.     

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