चैप्टर 25 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 25 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
Chapter 25 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
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गंगा के उत्तर पार एक दूसरी आढ़त में घोड़े छोड़कर वीरसिंह और यमुना पैदल कान्यकुब्ज आए, देखा, रामसिंह के कैद होने की वैसी हलचल नहीं जैसी राजा महेन्द्रपाल के छुटकारे के बारे में है। लोग कह रहे हैं, यह सारी सिन्धु की, की हुई कारस्तानी थी, वह राजा महेन्द्रपाल को चाहती थी, लेकर भाग गई, एक दूसरे बेवकूफ धोबी को उनकी जगह फँसा गई। वे चिट्ठियाँ राजा महेन्द्रपाल की छीनी हुई थीं, उन्होंने उनसे काम निकालने के लिए सिन्धु को दी थीं।
वीरसिंह को यह समझते देर न हुईं कि चिट्ठियाँ जबकि रामसिंह के पास थीं और उन्हीं चिट्ठियों के कारण वह गिरफ्तार हुआ है, तब सिन्धु से रामसिंह का भला-बुरा कोई सम्बन्ध जरूर रहा होगा और नर्तकी सिन्धु रामसिंह की मर्जी के खिलाफ राजा महेन्द्रपाल को छुटा न सकती थी। पुनः कुछ पहले महाराज शिवस्वरूप को मिली विद्या नाम की एक नर्तकी के समाचार यमुना से वीरसिंह को मिल चुके थे। निश्चय किया, यह विद्या ही सिन्धु है। विद्या नाम की कान्यकुब्जेश्वर की कोई नर्तकी नहीं। इसकी राजा महेन्द्रपाल के वंश की ओर सहानुभूति है, यह प्रमाण मिल चुका है। शिवस्वरूप महाराज के कहने के अनुसार, यह उनकी जान पहचान की है। कुछ हो, आगे मालूम हो जाएगा। वीरसिंह ने यमुना से सलाह ली।
यह सब पता वीरसिंह ने रामसिंह के अड्डे पर संन्यासी वेश में रहकर लगाया। वहाँ धोबी और धोबिनें रहती थीं। वे सब पछाँह के रहनेवाले थे। संन्यासी वेश वीरसिंह का नाम बाबा अमरनाथ था- यहाँ इस समय इसी नाम से वे मशहूर हैं। रामसिंह-जैसे कुछ साथियों को उन्होंने सिखलाकर तैयार किया था। ये लोग इनकी तपस्या का प्रचार कर रहे थे, और कह रहे थे कि बाबाजी की निगाह में बड़े-छोटे, ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं, वे सभी को सम देखते हैं, मन्त्र देते हैं। इससे कुछ धोबी पहले-पहल फँसे। फिर उनकी देखा-देखी उनकी बिरादरी के और दीक्षित हुए। फिर बाबाजी ने सलाह दी कि कान्यकुब्ज में चलकर बसा जाए तो फायदा ज्यादा होगा। धोबियों का एक गिरोह इस तरह कान्यकुब्ज में आकर बसा। रामसिंह साथ आया। यह यहाँ रहकर कार्य की सिद्धि करने का एक उपाय हुआ। रामसिंह इनमें धोबी बनकर ही रहता था। आपस में बड़ी प्रीति थी। कभी-कभी बाबाजी आते थे। बड़ी आवभगत होती थी। इस बार यमुना को साथ लाकर धोबियों से परिचित कराते हुए कहा कि छँगुनियाँ की भौजी है, देवर को देखने आई है। धोबिनें बड़े स्नेह से मिलीं। बहुत रोई कि छँगुनियाँ पकड़ लिया गया है। यमुना भी रोई। फिर सब ढाढ़स बँधाने लगीं कि अबके सरदार के कपड़े लेकर जाएँगी तो कहेंगी, कर नहीं तो डर क्या है।
अन्यत्र पृथ्वीराज की तरफ से काम करनेवालों में, रामसिंह अपने सच्चे नाम से प्रसिद्ध था, बाबा अमरनाथ को लोग धीरसिंह जानते थे। पूर्व में धीरसिंह की वीरता की बड़ी ख्याति थी। वह लापता भी था। धीरसिंह भी चौहानों में अज्ञात कुलशील महोबिया होकर मिला था। उन्हें संशय न हो, इसलिए मशहूर कर रखा था कि वीरसिंह ने कान्यकुब्ज में ऊदल से मित्रता कर ली थी और महोबे की लड़ाई में लड़ता हुआ काम आ गया है। यहाँ रामसिंह के गिरफ्तार होने का कोई राजनीतिक कारण न मालूम हुआ।
नेत्रपल्लवी द्वारा यमुना से सब कुछ कहकर समझा दिया। निश्चय हो गया कि रामसिंह सिन्धु से मिलकर स्वेच्छया राजा महेन्द्रपाल को मुक्त करने के लिए कैद हुआ है, क्योंकि रागी महेन्द्रपाल की मुक्ति के लिए कान्यकुब्जेश ने आज्ञा दी थी। सिन्धु ने उसे अपना बीनकार कहकर उनसे परिचय दिया था, फिर उनकी आज्ञानुसार आज्ञा पत्र लिखते हुए, ‘रागी’ को अस्पष्ट ‘राजा’ के रूप में रहने दिया था।
क्रमश:
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