चैप्टर 24 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 24 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
Chapter 24 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
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प्रातःकाल आँख खुली तो प्रभा ने पास एक अपरिचित मनुष्य को बैठा देखा। अब मन में किसी प्रकार का आवेग न रह गया था। एक निश्चय की प्रतिमा बन गई थी। जिस यमुना ने उसकी सेवा की, उसकी बहन को प्रसन्न करके, स्वेच्छा से अपना स्थान उसे देकर वह उस सेवा का सहृदय बदला चुकाएगी। अब राजकुमार के भविष्य की भी उसे चिन्ता नहीं रह गई। कारण, इससे अधिक राजकुमार के भविष्य के लिए वह कुछ कर न सकती थी। अब केवल एक कर्तव्य उसकी दृष्टि में रह गया है, वह यह है कि वह राजकुमार की दृष्टि से दूर पृथ्वी में कहीं अदृश्य हो जाए, जिससे उनके गले में रत्नावली के हार पड़ने में कोई संशय न रहे। वह उसे प्यार करते हैं, इतनी स्मृति उसके लिए बहुत है। पत्नी को इससे अधिक और चाहिए भी क्या! दीदी अवश्य किसी कर्तव्य से विवश होकर गई हैं। अब उनसे भी मिलने की ऐसी क्या आवश्यकता है!
उठकर बैठते ही, उस अपरिचित मनुष्य को देखते-देखते, उसके मस्तिष्क में ये भाव चक्कर लगा गए। मन्द गति से सरायन के तट पर चलकर हाथ-मुँह धोया। सोचा, स्वतन्त्र जीवन का यह पहला कार्य हुआ। ‘क्या शान्ति मुख पर विराज रही है!’ अपरिचित मनुष्य एकटक देखता रहा।
प्रभा उसी जगह आकर बैठ गई। जीन पर दृष्टि गई। चिट्ठी निकालकर पढ़ने लगी। कुछ शंका हुई, पर स्थिर होकर वह चिट्ठी उसी तरह रख दी, फिर उस अज्ञात मनुष्य की ओर रुख किया, “तुम कौन हो?”
“कलवाला सिपाही, जिसके पहरे पर आप चारदीवार के भीतर गई थीं।”
“तुम्हारा नाम?”
“महादेव सिंह।”
“फिर क्या हुआ?”
“फिर कोई आया था, कुमारीजी उनके साथ चली गईं। आपको आने में देर हो गई। मेरी बदली का समय आ गया था, रस्सी यों भी निकाल देनी पड़ती।”
“हाँ, तुम्हारी बदली की मुझे याद न थी। तुम उन्हें कुमारीजी कैसे कहते हो?”
“वे हमारे ही यहाँ की कुमारी हैं, मैंने उन्हें बचपन से देखा है।”
“उन्होंने तुमसे क्या कहा?”
“आपकी रक्षा के लिए कहा, स्थान बतलाया कि उस जगह घोड़ा बँधा है। मैं पहरे से छूटकर हर फाटक पर खड़ा होता था कि अगर कोई अड़चन आपको पड़े जब आप फाटक पार कर रही थीं। मैं जल्द बढ़कर दूसरे फाटक पर आ जाता था। आप जब घाटवाला फाटक पार कर गयीं, तब मैं एक बार डेरे गया, फिर यहाँ लौटा, घड़ी-भर की देर हुई होगी। देखा, आप सो गई हैं।”
प्रभा मुस्कुराई, कहा, “तुमने मेरी पूरी रक्षा की, महादेव, तुम मेरे लिए साक्षात् महादेव हुए।”
महादेव नम्र हो गया।
“तुम मुझे पहचानते हो?” मधुर कंठ से प्रभा ने पूछा।
“पहचानता हूँ, कुमारीजी ने चलते समय बतला दिया था।”
प्रभा गम्भीर हो गई। ईश्वर की कृपा सोचकर मन में कृतज्ञ हुई कि इस नाम के साथ प्रिय पति का नाम सम्बद्ध है, पुनः स्मरण में आने के लिए। भरकर बोली, “महादेव, यहाँ तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं?”
“कुमारीजी, जहाँ सिपाही को, सच्चे सिपाहियाने की जगह, गिरा देनेवाली चालें, छल देख पड़ता है, जहाँ पेट भरने के अलावा जीने-मरने का प्रश्न प्रतिक्षण उसे नहीं हल करना पड़ता, वहाँ सिपाही, सिपाही नहीं मजदूर बन जाता है। यह उसके लिए सिर ऊँचा रखने की बात नहीं।
“झुके सिर के लोग सुखी नहीं, इसकी साक्षी वे स्वयं भरते रहते हैं। पर कुमारीजी, अब आपको जल्द यह स्थान छोड़ना चाहिए।”
प्रभा सोचने लगी। कुछ क्षण वातावरण स्तब्ध रहा, ज्यों-ज्यों प्रभा गहन से गहनतर क्षेत्र में प्रवेश करती गई। निकलकर स्थिर दृष्टि सिपाही पर रखते हुए पूछा, “तुम मेरे साथ रहोगे?”
सिपाही खुश हो गया। बोला, “आपके साथ मुझे अच्छा सुख होगा।”
“और लोग तुम्हारा साथ देंगे?”
“मेरे गिरोह के बीस आदमी हैं, उन पर मुझे विश्वास है, वे देंगे।”
“अन्याय के समक्ष। मैं उन्हें धर्म के रास्ते रोटियाँ देने के लिए कहती हूँ।”
“आप लोगों पर हमें पूरा विश्वास है।”
“अब मैं अकेली नहीं हूँ।” प्रभा की आँखें सूर्य का प्रकाश भर रही थीं। सिपाही का हृदय शौर्य से तन गया।
“मुझे आप पर, कुमारीजी पर जैसा विश्वास है।”
“ठीक, मैं उन्हीं के चरण-चिह्नों पर चलती हूँ। जाओ, साथियों को ले आओ। पर तुम लोग इसी राज्य के हो या दूसरे के?”
“इसी के।”
“तुम पर अत्याचार हो सकता है, यदि छुट्टी के बाद न लौटे या मेरे साथ रहने का कारण खुल गया।” पलक मारते सोचकर, “पर चिन्ता नहीं। मैं शीघ्र शक्ति बराबर कर लूँगी, मैं कहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करूँ?”
“कुछ आगे और, गोमती-सरायन का संगम है। गोमती के किनारे, एकान्त है, कोई देखेगा भी तो यहाँ का आदमी सोचेगा।”
सिपाही चलने को हुआ। प्रभा ने पुनः सोचकर कहा, “सुनो, यह जितना अर्थ विलास में खर्च होता है, इसका चौथाई भी तुम्हें नहीं मिलता, समझते हो?”
“जी, हाँ।”
‘”यह अर्थ तुम्हीं देते हो?”
“जी।”
“बलपूर्वक तुमसे लिया जाता है?”
“जी।”
“बलपूर्वक ले लेने में अधर्म है। यदि अक्षमों को उदारता से बाँट दिया जाए?”
“कुछ नहीं।”
“तो यही हमारा उद्देश्य होगा। हम इसी तरह शक्ति बढ़ाएँगे। जब तक समर्थ न हों, कर वे वसूल करेंगे। फिर देखा जाएगा। व्यवस्था ईश्वर की है। मनुष्य तो अपने लाभ के नियम बनाता है। हमारा लक्ष्य ईश्वर है, कार्य दुखों का दूरीकरण, उचित उपाय से। उस अर्थ-ग्रहण में दोष नहीं, जिससे भूखे अन्न पाएँ, यही व्यवस्था स्थित होती है। क्या कहते हो?”
“आप ठीक कहती हैं।”
“अच्छा, बलवन्त तहसील के लिए गए थे, कर लेकर लौटे नहीं। किसी कार्य से जल्द कान्यकुब्ज जा रहे थे। उनके वसूल किए कर का क्या हाल है?”
“मालूम नहीं। वह उसी तरफ से सीधे, सम्भव है, कान्यकुब्ज जाए या जाता हो।”
“हाँ,” प्रभा गम्भीर हो गई, “कर के साथ एक गाँव से दूसरे गाँव तक गाँववालों की सहायता रहती है, यों पाँच-सात आदमी से ज्यादा नहीं रहते-क्यों?”
“जी, हाँ।”
“अच्छा फिर सोचा जाएगा। तुम लोग जल्द जाओ। छुट्टी लेने की क्या आवश्यकता है जबकि निश्चित समय पर फिर हाजिर होना नहीं? – ऐसे ही चले आओ।”
सिपाही डेरे की तरफ गया। प्रभावती घोड़ा साजकर संगम की तरफ चली।
क्रमश:
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