चैप्टर 23 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 23 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

चैप्टर 23 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 23 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 23 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

Chapter 23 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi 

रात का तीसरा पहर अभी पूरा नहीं हुआ, वैसे ही सजी हुई विद्या हाथ में दीपक लिए अकेली काराद्वार पर उपस्थित हुई। महाराजाधिराज की इस नर्तकी से कान्यकुब्ज के सैनिक तुष्ट रहते थे। इसका एक कारण था, अधिक उपार्जन-सम्मान पानेवाली अपर नर्तकियों में जैसे विद्या में अहंकार न था, स्नेह के विचार से यह महाराजाधिराज के अधिक निकट पहुँची हुई थी, सिपाहियों से सरदारों तक सभी को यह रहस्य ज्ञात था। बात सबसे बड़ी जो थी, वह यह कि राज्य-विभाग के हर एक मनुष्य को विद्या मीठी मुस्कान से स्नेहसिक्त कर देती थी; उसका ऐश्वर्य स्नेह था। सिपाही दर्प से लड़ता स्नेह से नम्र होता है।

रहस्यमय स्नेह की दृष्टि परवाने के साथ कारा-कर्मचारी के सामने बढ़ी। खड़ा सिपाही भी देख रहा था। कर्मचारी ने कहा, “राजा महेन्द्रपाल की मुक्ति का आज्ञा-पत्र है।” परवाने को देखते हुए रख लिया। सिपाही काराद्वार खोलने लगा।

विद्या सभंग अंगों से नम्र होकर बोली, “आपकी आज्ञा हो तो मैं राजा महेन्द्रपाल को रास्ता दिखाकर ले आऊँ। आपके किसी सिपाही को कष्ट देना नहीं चाहती।”

जहाँ अन्य स्वार्थ का लेश नहीं रहता वहाँ भी सुन्दरी युवती की दृष्टि और स्वर का प्रसाद लोग चाहते हैं। कर्मचारी को इस निरुपमा नर्तकी की इच्छा पूर्ति में केवल दृष्टि और स्वर का प्रदान न मिल रहा था, आकांक्षा और दूर, उसकी प्रशंसा से होनेवाली भविष्योन्नति के ध्रुव नक्षत्र पर थी, मार्ग न रोकने के लिए सिपाही को आज्ञा दी। सिपाही स्वयं भी हृदय से ऐसी कामना कर रहा था, ससम्भ्रम विद्या को भीतर जाने के लिए हाथ बढ़ाकर सम्बर्द्धित किया। विद्या भीतर गई।

नुपूर-गुच्छ की श्रुति-मधुर रणन निश्चेतन कारागृह में प्राणों से नवीन जीवन का संचार करने लगी। ज्योतिश्चुम्बी भौंरों की गूँज जैसे कमलों के फुल्ल होने के कारण हुई।

राजा महेन्द्रपाल की अभी-अभी पलकें लगी थीं। रामसिंह देर से प्लुत खर्राटा भर रहा था। दोनों चौककर एकाएक बैठ गए। रुक्ष प्रकाश में आँखें तिलमिला गईं। मलकर अच्छी तरह देखने लगे।

देखकर “आप आ रही हैं!” रामसिंह ने अभिनन्दन किया। अचपल दृष्टि से विद्या धीरे-धीरे बढ़ती हुई रामसिंह के पास आकर खड़ी हुई।

पहचानकर, “सिन्धु!” कहकर राजा महेन्द्रपाल आश्चर्य से देखने लगे।

“हाँ।” कहकर विद्या स्थिर दृष्टि से रामसिंह को देखने लगी। देखते-देखते आँखें सजल हो आईं।

“तुम्हारा अनुमान ठीक था, विद्या! यह लो, ये वही हैं।” कहकर रामसिंह ने वीरसिंह का वह चित्र मुँह से निकालकर विद्या को दिया। धीर भाव से विद्या ने ले लिया।

राजा महेन्द्रपाल इस अभेद्य रहस्य के प्रति निःशब्द देखते रहे।

“आचार्य को सूचित कर दूँगा यदि समय प्राप्त हुआ, कि शिष्य रूप से आचार्य को आत्मा में मिला लिया है।” संयत धीर शब्दों में रामसिंह बोला।

विद्या मौन खड़ी रही। केवल कुछ बूँदें आँसुओं की, शरत् की शेफाली के पत्रों से ओस जैसे पृथ्वी पर टपकीं।

“चिन्ता क्या है! इस जीवन में न मिले तो फिर मिलेंगे, विद्या! जाओ।”

देखकर विद्या फिर स्थिर खड़ी रह गई।

“कार्य हो गया?” रामसिंह ने धीर मन्द स्वर से पूछा।

“हो गया।” विद्या ने एक हाथ उठाकर प्रिय के स्कन्ध पर रखा। दूर रखा दीपक पार्श्व से दोनों के मुखों को प्रकाशित करता रहा।

“अच्छा अपना उद्देश्य पूर्ण करो।”

विद्या फिर खड़ी रही।

“चाचा,” रामसिंह ने मजाक के स्वर में कहा, “देखिए, मार्गाचलव्यति कराकुलितैव सिन्धुः!” फिर विद्या का हाथ पकड़कर द्वार की ओर ले चलते हुए, “चाचा, इनके साथ जाइए, आप मुक्त कर दिए गए।” फिर दीपक लेकर हाथ में रखते हुए, “चाचा को अच्छी तरह दिया दिखाकर ले जाओ, नहीं तो बुढ़ापे में कहीं गिर पड़ेंगे तो दाँत टूट जाएँगे, फिर तुम्हीं को सेवा करनी पड़ेगी। अच्छा, चाचा, चरण छूता हूँ।”

मन्द-चरण विद्या, साथ-साथ राजा महेन्द्रपाल काराद्वार से बाहर हो गए। प्रकाश में एक दृष्टि से रामसिंह विद्या की छवि-गति देखता रहा। कारा का द्वार फिर बन्द हो गया। फिर फिरकर विद्या ने नहीं देखा। सीधे अपने घर की ओर राजा महेन्द्रपाल को ले चली।

वहाँ कुछ भोजन कराकर उसी समय घोड़े पर चढ़कर सुबह होते-होते दूर निकल जाने के लिए कहा, और संक्षेप में सारा हाल समझाकर बतला दिया कि अनुकूल कारणों के प्रकट होने के पूर्व वे प्रकाश में न आएँ, उनके लिए अच्छा न होगा, और उसे निकालकर भी पालन करने की अपनी कृपा का इसे ऋण-शोध-रूप समझें। राजा महेन्द्रपाल प्रभात होते-होते विद्या के दिए एक घोड़े पर, निशा के कलंक की ही तरह, अदृश्य हो गए।

महाराज शिवस्वरूप विद्या के पलंग पर बेखबर सो रहे थे। अब तक क्या हुआ, नहीं मालूम। ऐसी सेज इस जीवन में पहले-पहल मिली थी। जब जगाए गए तब विद्या अपनी बड़ी-बड़ी कुल वस्तुएँ प्रातःकाल ही नौकरों को आपस में बराबर बाँटकर चले जाने के लिए देकर, अलंकारों की एक गठरी बाँधकर, आवश्यक कुछ सामान और लेकर, महाराजवाले घोड़े के साथ अपना घोड़ा सजवाकर, पुरुष वेश में भागने के लिए तैयार हो चुकी थी। आँखें खोलकर प्रेयसी को पुरुष-रूप में देखकर महाराज ने आश्चर्य से पूछा, “क्या है?”

“तुम्हारे साथ भगने को तैयार हो गई।”

“कहाँ?”

“यहाँ-वहाँ जहाँ चाहो, उठो जल्द।”

क्रमश: 

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