चैप्टर 22 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 22 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
Chapter 22 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
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मणि-फलित सहस्रों दीप के आलोक से प्रमोद भवन झलमला रहा है। देहरी, द्वार, खम्भे पटाव से लेकर समस्त वस्तुएँ, राजासन आदि भारत की श्रेष्ठ कारीगरी के आदर्श। चारों ओर से द्वार मुक्त। एक ओर शुभ्र जाह्नवी की जलधारा रात्रि की नीलमसिरेखा-सी प्रतीत होती हुई। अपर तीन पार्श्व प्रकृति के अन्य शोभन दृश्य नैश अन्धकार की अस्पष्टता से स्पष्ट करते हुए। मुक्त हवा सुगन्धियों से भीगी बहती हुई। भीतर और बाहर की समस्त दृश्यावली, तारकाखचित आकाश तक, जैसे इस महाशक्ति को मानकर नत होती हुई आज्ञापूर्ति के लिए सन्नद्ध है-महाराजाधिराज के मनोरंजन के लिए उद्यत। सारे फर्श पर सुख-स्पर्श बिस्तर लगा। पान और पात्र राजासन के सामने मणिपीठ पर रखे हुए। प्रवेश-द्वार पर सशस्त्र सिपाहियों का पहरा।
महाराजाधिराज की आज्ञानुसार सेवकों ने केवल नर्तकी को छोड़ने के लिए कहा था। इसलिए साजिन्दों को सिपाहियों ने बाहर प्रतीक्षा करने के लिए कहा, जब तक संगीत के लिए संगत की आज्ञा से पुकार न हो। केवल विद्या नूपुरों के मधुर रव से विलास के उस आकाश और सौध को रणित करती हुई कक्ष के भीतर गई। पूर्ण प्रौढ़ महाराजाधिराज जयचन्द बैठे हुए विचारमग्न सेविकाएँ चवर ढुरती हुई। एक बगल विद्या हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। आँख उठाकर महाराजाधिराज मुस्कुराए। नम्र मुस्कुराहट से उत्तर देती हुई विद्या पात्र पूर्ण कर मधुर भंगिमा से हाथ बढ़ाकर खड़ी हुई, महाराज ने ले लिया, और चवर ढुरने की आवश्यकता नहीं, हाथ के इशारे से सूचित किया। समझकर चपल भाव को हृदय में दबाकर दासियाँ सिर झुकाए हुए, महाराज को दाहिने रखकर बगल से बढ़ती हुई कक्ष के बाहर हो गई।
एक पात्र स्वयं भरकर प्रेयसी को पास बैठा, प्रौढ़ महाराजाधिराज ने उसके सुकुमार होंठों से लगाया, एक बाँह से उसे आवृत्त करते हुए। मुस्कुराकर विद्या ने पी लिया। एक पात्र उसने पुनः तैयार कर पिलाया। सुरा का तड़ित प्रवाह अंगों को प्रभावित करने लगा। आज्ञा हुई, स्वल्प झंकृत वीणा से तानें अलापो। पास सजी रखी हुई महाराजाधिराज की वीणा विद्या ने उठा ली। दो-एक बार मीठी झंकार कर वाद्य में अलाप लेने लगी। मर्मज्ञ महाराज एक दृष्टि से स्वर की परीक्षा कर मुग्ध होते रहे।
अलाप समाप्त कर विद्या ने एक पात्र और पिलाया और फिर दूसरी रागिनी में अलाप लेने लगी। महाराजाधिराज निपुणता पर मन से निछावर हो गए।
फिर बिना वाद्य के ताल-युक्त भाव-नृत्य करने के लिए कहा।
विद्या उठी। बाएँ हाथ से क्षुद्र स्वच्छ शीशा और दाहिने से प्याला लेकर नृत्य करने लगी। महाराजाधिराज के अज्ञात एक-दूसरे भाव से आज उसका हृदय उद्वेलित था, उसके नृत्य और भाव के प्रति प्रदर्शन पर उसकी तरंगें उठ-उठकर राजेश्वर में आवेश भरने लगीं। सुरा-सुन्दरी स्वयं जैसे नृत्य कर रही हो। नर्तित-पद ताल पर बढ़ती हुई भाव-पूर्ण विविध भंगिमाओं से विद्या महाराज को आसव पिलाती रही। नशे में यह दृश्य कान्यकुब्ज के समस्त ऐश्वर्य से कान्यकुब्जेश्वर को बढ़कर प्रतीत होने लगा।
प्रसन्न होकर बोले, “तुम्हारी जो इच्छा हो, माँगो।”
विद्या प्रसन्न होकर बोली, “महाराजाधिराज की कृपा-दृष्टि से बढ़कर भी कुछ?”
“नहीं, माँगो।”
“सेविका तो कृपा-दृष्टि ही चाहती है!” कहकर, हाथ बाँधकर विद्या मराल-ग्रीवा बनकर नम्र दृष्टि से मन्दस्मित खड़ी रह गई।
उठकर, उसकी ललित अंजलि खोलकर, मुग्ध प्रौढ़ महाराज आयत तिर्यक आँखें देखते हुए बोले, “तुमने प्रार्थना कभी नहीं की। सदा यही शब्द कहे!”
“हाँ, याद आई,” आँखें फेरकर विद्या बोली, “मेरा एक बीनकार कैद कर लिया गया है।” फिर खिलखिलाकर हँसी “महाराजा राजेश्वर के सिपाही और सरदार बड़े विचित्र मालूम होते हैं!” फिर एक तरफ मुँह फेरकर बोली, “रास्ते में उसे दो चिट्ठियाँ पड़ी मिली थीं। एक सरदार महेश्वरसिंह की लिखी थी, एक सरदार बलवन्तसिंह की। क्या शादी का झगड़ा था? महाराजाधिराज के नाम थी। मैंने उससे कहा, तू किसी सिपाही को दे आ जाकर। वह डर रहा था। मैंने भगवानदास को साथ कर दिया। लौटकर भगवानदास ने कहा कि मारे डर के उसने सिपाही के हाथ में चिट्ठियाँ नहीं दीं, सामने डाल दीं। फिर सरदार को चिट्ठियाँ दिखाकर सिपाही ने उसे गिरफ्तार कर कैदखाने में डाल दिया।” खिलखिलाकर बोली, “अब महाराजाधिराज को समझ लेना चाहिए कि बहुत जल्द हमारी पलटन महाराजाधिराज पर चढ़ाई करनेवाली है!”
महाराज जयचन्द हँसे। बोले, “हाँ, वे चिट्ठियाँ हमें मिली हैं। पर वह तुम्हारा साजिन्दा है, यह किसी को कैसे मालूम होता? तो तुम उसकी मुक्ति चाहती हो?” मन में उसकी माँगने की क्षुद्रता पर मुस्कुराए।
“हाँ, महाराजाधिराज की बड़ी कृपा और क्या होगी कि बेचारे निर्दोष मनुष्य की आज ही मुक्ति हो जाएगी।”
“उसका नाम क्या है?”
“महेन्द्रपाल।”
“महेन्द्रपाल?”
“हाँ”
“राजा महेन्द्रपाल भी कैद में हैं।”
“यह मुआ कहाँ मर गया राजा महेन्द्रपाल! यह रागी महेन्द्रपाल है।”
“अच्छा, मुक्ति का परवाना लिखो। हम मुहर देते हैं, कर लो – वह देखो पत्र, मसिपात्र और लेखनी सब वहाँ रखे हैं। लिखो।”
विद्या ने लिखा, “रागी महेन्द्रपाल को निर्दोष जानकर मुक्ति दी जाती है।” फिर उस पर महाराजाधिराज की मुहर कर दी। दिखा दिया। नशे में महाराज जयचन्द ने नहीं देखा। उसने ‘राजा’ ‘रागी’ की लिखावट में भेद न रखा था। ईकार को आकार ही रखा था। यथासमय महाराजाधिराज की आज्ञा पर बिदा हुई।
क्रमश:
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