चैप्टर 20 : ज़िन्दगी गुलज़ार है | Chapter 20 Zindagi Gulzar Hai Novel In Hindi

Chapter 20 Zindagi Gulzar Hai Novel In Hindi

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१८ अगस्त – ज़ारून

कभी-कभी मैं अपनी मौज़ूदगी से बोर होने लगता हूँ. कहाँ मैं लाहौर जैसे हंगामाखेज़ शहर का रहने वाला और कहाँ ये इस्लामाबाद जैसा फॉर्मल शहर. मेरे लिए यहाँ कोई एन्जॉयमेंट, कोई थ्रिल नहीं है. कभी-कभी मुख्तलिफ़ (अलग-अलग) सिफारत-खानों (दूतावास, एम्बेसी) में होने वाले फंक्शन भी इतने फॉर्मल होते हैं कि मेरा दिल वहाँ से भागने को चाहता है. अब मैं बस ये चाहता हूँ कि मेरी पोस्टिंग किसी दूसरे मुल्क में हो जाए, ताकि मैं अपनी जॉब को एन्जॉय कर सकूं.

अगले साल मेरी पोस्टिंग किसी दूसरे मुल्क में हो जायेगी, क्योंकि साउथ ईस्ट एशियाड बैंक पर काम करते मुझे एक साल हो गया है. फॉरेन सर्विस मेरा ख्वाब था और मुझे ख़ुशी है कि मैंने जो चाहा पा लिया, लेकिन कभी-कभी मुझे ये जॉब बोर भी लगती है, क्योंकि यहाँ न हसीन चेहरे हैं न रंगीन आंचल. फॉरेन सर्विस में एक तो जो लड़कियाँ आती हैं, वो भी सिर्फ निचले दर्जे पर और मैं उनसे ज्यादा फ्री नहीं हो सकता.

मैं कॉलेज लाइफ को बहुत मिस करता हूँ. क्या ज़िन्दगी थी कॉलेज की? हर रोज़ एक से बढ़ कर एक ख़ूबसूरत चेहरे होते थे. एक-एक चीज़ याद आती है मुझे यूनिवर्सिटी की. मेरे दोस्त, गर्लफ्रेंड और यहाँ तक कि कशफ़ मुर्तज़ा भी. अजीब लड़की थी, शायद मेरी ज़िन्दगी में आने वाली लकड़ियों में सब से अजीब. दो हफ्ते पहले ही मैं लाहौर गया था और ओसामा से बातों के दौरान कशफ़ का ज़िक्र आया था. ओसामा ने मुझसे पूछा था –

“ज़ारून कशफ़ के बारे में कुछ जानते हो तुम?”

मैं उसके सवाल पर हैरान हुआ था, “नहीं, मुझे तो कुछ पता नहीं है. क्यों? तुम क्यों पूछ रहे हो?”

“ऐसे ही यार, मैंने सोचा शायद तुम्हें कुछ इल्म होगा.”

“छोड़ यार, मुझे क्या पता उसका. उस वाक्ये के बाद तो उससे मेरी बातचीत भी ख़त्म हो गई थी.”

“वैसे कहीं तुम्हें कोई इश्क टाइप की चीज़ तो नहीं हो गई उससे?”

मेरी बात पर उसने कुशन उठा कर मुझे मारा था.

“तुम्हारी कमीनगी में कोई फ़र्क नहीं आया. चलो एक बात तो साबित हो गई कि जो कमीना होता है, वो कमीना ही रहता है, चाहे वो वज़ीर (मंत्री) बन जाये, या सफीर (राजदूत).

मैंने उसकी बात को नज़र-अंदाज़ करते हुए पूछा, “तो फिर क्यों पूछ रहे हो उसके बारे में?”

“ऐसे ही, वो लड़की मुझे हमेशा से अट्रैक्ट करती थी और आज भी वो मेरे ज़ेहन में महफूज़ है. वो ख़ूबसूरत होती, तो मैं समझता कि शायद मैं उसकी ख़ूबसूरती से मुतअस्सिर (प्रभावित) हूँ, लेकिन वो ख़ूबसूरत नहीं थी, फिर भी उसमें कुछ था, जो उसे दूसरी लड़कियों से अलग करता था. वो क्या चीज़ थी, ये मैं कभी समझ नहीं पाया. मेरी इन बातों को तुम प्यार या मुहब्बत के मानों में मत लेना. ये ज़रूरी नहीं होता कि हर ताल्लुक मुहब्बत का ही हो.”

वो बड़े अजीब अंदाज़ में कह रहा था और मैं हैरान था कि जो कुछ मैं कशफ़ के बारे में महसूस करता था, वो ही ओसामा ने भी महसूस किया था. तो क्या बाकी लड़के भी उसके बारे में यही सोचते होंगे. कभी कभी मुझे लगता है कि मैंने उसके साथ कुछ गलत किया था. बहुत दफ़ा मैंने सोचा कि उससे दोबारा बात माज़रत (माफ़ी मांगना) कर लूं, मगर हिम्मत नहीं हुई.

मैं अक्सर सोचता हूँ कि वो अब कहाँ होगी. हो सकता है उसकी शादी हो या वो कहीं जॉब करती हो, क्या वो अब भी वैसी ही होगी, जैसी वो कॉलेज में थी या बदल गई. मेरी ख्वाहिश पूरी हो जाती है और देखता हूँ ये ख्वाहिश कब पूरी होती है.

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