चैप्टर 20 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 20 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
Chapter 20 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
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“चाचा!”
राजा महेन्द्रपाल कैदखाने के एक बगल बैठे हुए तरह-तरह के विचारों में गर्क थे। अभी तक कैद होने का कारण मालूम नहीं हुआ। कमरे में स्वल्पमात्र प्रकाश है। यह कौन-सा भतीजा साथ रहने के लिए आया, पहचानने के लिए आँखो में जोर लगा रहे थे कि रामसिंह ने फिर कहा, “चाचा!”
“कौन?”
“मैं, आपका खुशनसीब भतीजा हूँ!”
“खुशनसीब भतीजा!”
“जी हाँ।”
“खुशनसीब कैसे?”
“ऐसे”, रामसिंह ने दंड-प्रणाम करके कहा, “आपके शुभदर्शन हुए।”
राजा महेन्द्रपाल ने गौर से देखा, पर पहचान न सके। कभी देखा है। ऐसा भी न मालूम हुआ। पूछा, “तुम्हारा नाम?”
रामसिंह गिड़गिड़ाता हुआ बोला, “महुए के पेड़ और फल की तरह यह बदकिस्मत वही नाम रखता है जो श्रीमान का है।”
“मजाक करते हो?”
पैर छूकर रामसिंह ने कहा, “चाचा मजाक करता होऊँ तो…क्या कहूँ बाहर होते तो अपनी पतोहू से पूछ लेते!”
“बेवकूफ, पतोहू तेरा नाम क्यों बताती?” राजा महेन्द्रपाल हँस दिए।
“चाचा, आपकी पतोहु ने ही तो मुझे यहाँ भेजा है। बड़ी सती है। बोली, जाओ। चाचाजी तो कैद में रहें और तुम गुलछरें उड़ाओ?- तुम न रहोगे तो क्या होगा?- तुम्हारे चाचाजी बच जाएँगे, तो सब कुछ है!”
“तू बड़ा बेवकूफ है रे!” राजा महेन्द्रपाल स्नेह से रामसिंह को देखने लगे।
“लेकिन चाचा, बात तो ऐसी ही है।” रामसिंह शून्य दृष्टि से महेन्द्रपाल को देखने लगा।
“तू कैसे फँसा?” महेन्द्रपाल ने करूणा के स्वर से पूछा।
“फँसा कहाँ चाचा? उसी ने कहा फँस जाओ। मैं परोहन खोजने गया था -“
परोहन सुनकर चौंककर खिंचते हुए महेन्द्र पाल ने पूछा, “तू धोबी है?”
“धोबी होता तो तुम्हारे पास इस कैदखाने में पहुँचता क्या? चौहान हूँ। तुम्हारी पतोहू धोबिन है। कोई-न-कोई परोहन रोज खोती है। मैं खोज लाता हूँ -“
“क्या बकता है, बे-सिर- पैर की!”
“चाचा, बाद को समझिएगा। सब बातें सिर-पैर की हैं। सुनते जाइए। जहाँ न समझ में आए, समझ लीजिए कि बाद को समझिएगा। ऊँची बात है। फिर ऐसे ही परोहन खोज रहा था कि दो चिट्ठियाँ मिलीं। एक थी राजा महेश्वरसिंह की, लड़की प्रभावती से कुमार देव ने जबरदस्ती गान्धर्व विवाह कर लिया है। पर महेश्वरसिंह अपनी कन्या बलवन्त से ब्याहना से चाहते थे। चूँकि महेश्वर और बलवन्त से आपकी पहले की लागडाट थी, इसलिए अपने लड़के को सिखलाकर आप सफाई के लिए यहाँ चले आए। पर आपका मतलब था कि ताक में रहकर देख मौका पाते ही जबरदस्ती गान्धर्व विवाह कर ले। फिर तो प्रभावती पति का विचार कर सती-भाव में अचल रहने के लिए चूँ भी न करेगी। ऐसा ही हुआ। महेश्वर और बलवन्त जब वसूली के लिए पूरब गए तब पूर्णमासी को -यही जो बीती है – जासूसों से पता पाकर कि प्रभावती चाँदनी में नौका – विहार करेगी, कुमार देव कुछ साथियों के साथ आए, एक दूसरी नाव पर चढ़कर प्रभावती की नाव पर पहुँचे और विवाह कर लिया। बेचारी अबला विवश हो गई। फिर तो पति हो ही चुके थे। उनके साथी सब विदा हो गए और देव प्रभावती के साथ विहार करते हुए बहाव में बहते गए। इसी समय ईश्वर की कृपा से उधर से बलवन्त और महेश्वरसिंह आ पहुँचे। कुमार देव और बलवन्त में तकरार हो गई। कुमार घायल हो गए। उनकी सेवा-शुश्रूषा के लिए बलवन्त उन्हें अपने यहाँ लिए जा रहे हैं। उनका जो अपमान यह दोबारा किया गया, इसका महाराजाधिराज ही उचित विचार करें। यह हाल उन दोनों चिट्ठियों में था। चिट्ठियाँ महाराजाधिराज के पास पहुँच गई होतीं तब तो चाचा, तुम्हें मरे कई रोज हो गए होते!” कहकर महेन्द्रपाल की टाँगें पकड़कर रोने लगा।
महेन्द्रपाल के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं।
फिर उन्हें गौर से देखता हुआ बोला, “फिर महेश्वरसिंह आए। महाराजाधिराज से सारा हाल कहा। उन्हें मालूम हुआ कि वे चिट्ठियाँ नहीं पहुँची। हरकारे को किसी ने मालदार समझकर लूट लिया, सोचा होगा। फिर चाचा, तुम्हारी पतोहू ने उन चिट्ठियों को पढ़ा तब तुम गिरफ्तार हो चुके थे। पढ़कर बोली, ‘महेन्द्र, तुम्हें धिक्कार है जो तुम यहाँ बैठे हो! चाचा, मेरा नाम लिया न, जो तुम कहते थे, न लेगी? फिर बोली, जाओ अपने चाचा के पास और कहो कि तुम महेन्द्र बच जाओ, मैं अपना सिर कटवाता हूँ। मैं यहाँ बलवन्त और महेश्वरसिंह की सारी कारस्तानी अच्छी तरह धोए देती हूँ। मैंने कहा, तुम्हें धोने में क्या देर होगी, तुम तो अपने आपको धोए बैठी हो, लेकिन मैं चाचा के पास जाऊँगा कैसे? बोली, ये चिट्ठियाँ किसी सिपाही के सामने गिरा दो चलते-चलते, फिर खड़े रहो, जरा दूर कुछ खाते-पीते देखते-सुनते हुए, फिर देख लो, क्या हाल होता है। फिर तो चाचा देखते हो कि क्या कमाल हुआ?”
महेन्द्रपाल पस्त हो गए। रामसिंह देखने लगा, कि वे शिथिल हो हैं। बोला, “चाचा तुम्हें सफाई पेश करने की फुरसत न दी जाएगी। बस आज ही कल हो रहा है, जब भी कत्ल की आज्ञा निकल जाए।”
निस्तेज राजा महेन्द्रपाल कान्यकुब्ज का प्रचलित ढंग जानते थे। विचार किस तरह पारस्परिक ईर्ष्या के कारण मन्त्रणा-भवन में ही हो जाता है, किस तरह सफाई पेश करने का मौका न देते हुए हमेशा के लिए अभियुक्त को संसार से बिदा कर देते हैं। इसके अनेक रूपों में राजा महेन्द्रपाल प्रतिस्पर्धियों के मामले में पेश आ चुके थे। बोले, “तुम ठीक कहते हो। जो कुछ मेरे सम्बन्ध में कहा है, सही मालूम देता है। पर, तुम हो कौन?”
रामसिंह हँसा। कहा, “चाचा, मेरा परिचय तो आपको मिल चुका है। इससे ज्यादा आपकी समझ में न आएगा। अच्छा, यह तो बताइए, कहीं किसी लड़की पर, जब वह तेरह साल की थी, रात को बदमाश उठा ले गए थे और एक नर्तकी के यहाँ बेचा था, आपकी कृपा-दृष्टि थी? लिखाने-पढ़ाने और गाना सिखाकर होशियार कर देने की उदारता आपने दिखाई थी?”
“हाँ”
“इसके लिए आपने यथेष्ट धन भी खर्च किया था?”
“हाँ”
“क्यों?”
राजा महेन्द्रपाल चुप रहे।
“फिर उसका क्या हुआ?”
“फिर वह महाराजाधिराज के यहाँ नाचने आई?”
“अपनी इच्छा से?”
राजा महेन्द्रपाल चुप रहे।
“यह किसकी लड़की थी?”
राजा महेन्द्रपाल त्रस्त दृष्टि उठाकर रह गए।
“बतलाइए चाचा!”
महेन्द्रपाल लज्जित हो गए।
“उसे जो बदमाश लेकर भगे थे, उन्हें आप जानते थे?”
महेन्द्रपाल झूठ न बोल सके।
रामसिंह मुस्कुराया। कहा, “उसी ने आपको बचाने के लिए भेजा है। यद्यपि वह आपकी पाली हुई नर्तकी, लड़की है, पर मेरे सम्बन्ध से बहू है।”
“तुम्हारा मतलब सिन्धु से है।”
“हाँ, सिन्धु से। महाराजाधिराज के यहाँ से उससे बुरे तौर से आप फायदा नहीं उठा सके, इसलिए इस समय वह सच्चे तौर से आपके उद्धार के लिए कटिबद्ध हुई है।”
राजा महेन्द्रपाल कृतज्ञता के भार से सिर झुकाए हुए बैठे रहे।
शीशे की पतली पाती में लपेटी, चवन्नी से कुछ बड़े आकार के गोल काठ पर पक्के रंग से खींची एक तस्वीर गाल के भीतर से निकालकर, पतं खोलते हुए रामसिंह ने पूछा, “अच्छा, चाचा, वीरसिंह कोई आपके यहाँ था?”
“हाँ, था।” आशा से उमड़कर महेन्द्रपाल ने कहा।
“बड़ा बदमाश आदमी था?”
महेन्द्रपाल फिर बैठ गए।
“अच्छा चाचा, देखिए तो, यह किसकी तस्वीर है?” गोल काठवाला टुकड़ा रामसिंह ने महेन्द्रपाल को दिया। प्रकाश की ओर करके देखते ही महेन्द्रपाल बोले, “हाँ, वीरसिंह की है।”
“अच्छा दे दीजिए।” लेकर रामसिंह अन्यमनस्क हो गया। उसे वीरसिंह ने कभी अपना परिचय नहीं दिया। यमुना के आने के बाद उसे सन्देह हुआ था। वह हृदय से वीरसिंह का भक्त था, धीरसिंह को भी वह आचार्य मानता था। आज दोनों सूरतों के एक हो जाने से उसे जैसे जीवनमुक्ति का आनन्द मिलने लगा। स्नेह, श्रद्धा तथा क्षोभ एक-साथ उमड़ने लगे।
“तुम परोहन खोजने की बात कहते थे, सिन्धु का परोहन कहाँ हैं?” बैठे-बैठे महेन्द्रपाल ने पूछा।
“वह आदमियों को परोहन कहती है।” अन्यमनस्क भाव से कहकर रामसिंह सोचने लगा।
क्रमश:
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