चैप्टर 2 रेबेका उपन्यास डेफ्ने ड्यू मौरिएर

Chapter 2 Rebecca Novel In Hindi

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आज मैं सोचती हूँ कि यदि श्रीमती हॉपर इतनी बनने वाली न होती, तो न जाने मेरा जीवन कैसा होता। यह सोचकर हँसी सी आती है कि मेरा उस समय का जीवन श्रीमती हॉपर की इसी विशेषता के कच्चे धागे में लटक रहा था। दूसरों से मेलजोल बढ़ाने की उनकी उत्सुकता एक प्रकार की बीमारी थी – करीब-करीब पागलपन। पहले पहल जब मैं लोग-बागों को उनकी पीठ पीछे उनकी हँसी उड़ाते सुनती या उनके आते ही लोगों को कतरा कर जल्दी से इधर-उधर चले जाते देखती, तब मुझे बड़ा धक्का सा लगता। इस होटल में आये अब उन्हें कई बरस हो गए थे। ब्रिज खेलने का उन्हें बड़ा शौक था, जिसके कारण वह सारे मोंटीकार्लो में प्रसिद्ध हो चुकी थीं। उनका दूसरा शौक यह था कि होटल में जब कभी कोई बड़ा आदमी आता था, तब उसे वह अपना मित्र घोषित किए बिना ना रहती, चाहे उसे उन्होंने केवल एक बार कहीं रास्ता चलते ही क्यों न देखा हो। किसी न किसी तरह उससे परिचय प्राप्त कर ही लेती थी और इससे पहले कि बेचारा आगंतुक खतरे को भांप सके, वह उसे अपने कमरे में आने का निमंत्रण दे देती थीं। उनका यह आक्रमण इतना सीधा और इतना अचानक होता था कि उससे बच निकलने का अवसर ही नहीं मिलता था। उन्होंने होटल के आराम करने वाले कमरे में एक सोफे पर कब्जा जमा रखा था, जो स्वागत वाले बड़े कमरे और रेस्त्रां जाने के रास्ते के बीचो बीच था। दोपहर और रात के खाने के बाद वह वहीं बैठकर कॉपी किया करती थीं और हर आने जाने वाले को उनके पास से होकर गुज़रना पड़ता था।

अपना शिकार फांसने के लिए कभी-कभी वह मेरा भी प्रयोग करती थीं। नापसंद होने पर भी मुझे अक्सर उनके अकस्मात आ टपकने वाले परिचित मित्र के पास कभी कोई मौखिक संदेश देखकर या कोई किताब अथवा अखबार उधार मांगने के लिए या किसी और दूसरे बहाने से जाना पड़ता था। साधारण तौर पर श्रीमती हॉपर बड़े-बड़े ओहदेदार को ही पसंद करती थी, लेकिन अगर वह किसी व्यक्ति का फोटो किसी सामाजिक पत्र में एक बार भी छपा हुआ देख लेती थी, तो वह भी उनके लिए काफ़ी होता था।

उस दोपहर की बात तो कभी भुलाये नहीं भूलती। इतने साल भी चुके हैं लेकिन ऐसा लगता है मानो कल की ही घटना हो। श्रीमती हॉपर अपने प्रिय सोफे पर बैठी सोच रही थी कि नई चिड़िया को कैसे फंसाया जाये। उनके उस दिन के आकस्मिक व्यवहार को देखकर और जिस ढंग से वह अपनी ऐनक को अपने दांतों पर बजा रही थी, उससे मुझे यह समझने में देर न लगी कि वह किसी संभावना की खोज में है। जब उन्होंने मीठी प्लेट की चिंता न करते हुए खाना बड़ी जल्दी-जल्दी खत्म किया, तो मैं समझ गई कि वह नये आगंतुक के आने से पहले ही भोजन से निपटकर उस स्थान पर बैठ जाना चाहती हैं, जहाँ से उसे गुज़रना होगा। एकाएक वह मेरी तरफ मुड़ी और बोली – “ज़रा जल्दी से ऊपर जाकर वह खत तो ले आओ, जो मेरे भतीजे ने भेजा था। तुम्हें याद है ना! अरे, वही खत जो उसने हनीमून के अवसर पर लिखा था और जिसमें एक चित्र भी है। जाओ उसे फौरन ले आओ।

मैं समझ गई कि उनकी योजना बन चुकी है और वह अपने भतीजे को परिचय का माध्यम बनाना चाहती हैं। सदा की तरह उनकी योजना में हिस्सा देना मुझे अच्छा नहीं लगा। मुझे विश्वास था कि किसी अपरिचित का इस तरह बीच में आ पड़ना आगंतुक को अच्छा नहीं लगेगा। कोई दस महीने पहले श्रीमती हॉपर ने इस व्यक्ति के बारे में दैनिक पत्रों में जो कुछ पढ़ा था, उसे कभी काम में लाने के लिए उन्होंने अपने मस्तिष्क में जमा कर रखा था। उसी के आधार पर उस दिन भोजन के समय उन्होंने उसके संबंध में जो कुछ कहा, उसे सुनकर मैंने कम उम्र की और अनुभवहीन होते हुए भी अनुमान लगा लिया कि अपने एकांत में वह इस तरह सहसा बाधा पड़ना आगंतुक को रुचिकर नहीं होगा।

खत मेज़ की दराज़ में मिल गया, लेकिन लौटने में मैंने जानबूझकर देर कर दी। मुझे ऐसा लगा मानो मैं उसे एकांत की कुछ और घड़ियाँ बिताने का अवसर दे रही हूँ। यदि मुझ में साहस होता, तो मैं कुछ और भी देर कर देती और आगंतुकों आगाह कर देती; किंतु मुझमें झिझक बहुत ज्यादा थी और मैं यह नहीं सोच पाती थी कि उससे कहूंगी क्या!

जब मैं लौटी, तब आगंतुक खाने के कमरे में से उठ चुका था और इस भय से कि उससे मिलने का मौका कहीं हाथ से न निकल जाये, श्रीमती हॉपर अपने पति की प्रतीक्षा किए बिना ही उससे अपना सीधा परिचय कर लिया था। उस समय वह सोफे पर उनके पास बैठा था। मैंने जाकर चिट्ठी चुपचाप श्रीमती हॉपर के हाथों में पकड़ा दी। मुझे देखते ही वह एकदम उठ खड़ा हुआ और अपनी सफलता से आनंदित होकर श्रीमती हॉपर ने मेरी तरफ कुछ अनिश्चित भाव से हाथ हिलाया और मुँह ही मुँह में मेरा नाम लिया।

“मिस्टर द विंतर हमारे साथ कॉफ़ी पियेंगे। जाकर बैरा से दूसरा प्यारा लाने के लिए कहो।” वह बोली।

उनका यह उपेक्षापूर्ण स्वर आगंतुक को मेरी स्थिति का भान कराने के लिए काफ़ी था। उसका तात्पर्य था कि अभी मैं कम उम्र की हूँ और मेरा उनकी बातचीत में शामिल होना आवश्यक नहीं है। जब कभी वह दूसरे पर प्रभाव डालना चाहती थी, तब मुझे से इसी ढंग से बात करती थी और मेरा परिचय भी वह अपने बचाव के लिए ही दिया करती थी। क्योंकि एक बार लोग बाग मुझे उनकी बेटी समझ बैठे थे, जिसके कारण हम दोनों को ही बहुत लज्जित होना पड़ा था। उनके इस व्यवहार से लोगों को मेरी नगण्यता का भान हो जाता था और यही कारण था कि स्त्रियाँ मुझे देखकर इस ढंग से सिर जल्दी दिला देती थी कि और मैं अभिवादन के साथ ही साथ विदाई का भी संकेत होता था और पुरुष निश्चित होकर सोच लेते थे कि मेरे लिए खड़े रहकर अगर मैं अभी कुर्सी पर बैठ भी जाए तो इसमें कोई अशिष्टता नहीं होगी।

इसलिए जब वह आगंतुक खड़ा ही रहा, तब मुझे कुछ आश्चर्य सा हुआ। उसने बैरे को आने का संकेत किया और श्रीमती हॉपर से कहा, “क्षमा करें। मैं आपकी बात काट रहा हूँ। आप दोनों ही मेरे साथ कॉफ़ी पियेंगी।” और इससे पहले कि मैं कुछ ठीक से समझ सकूं, वह मेरी कुर्सी पर बैठ चुका था और मैं श्रीमती हॉपर के बराबर सोफे पर थी।

क्षण भर के लिए श्रीमती हॉपर उद्विग्न दिखाई दी क्योंकि ऐसी बात उन्होंने बिल्कुल नहीं चाही थी। लेकिन जल्दी ही उन्होंने अपने को संभाल लिया और मेरे और सोफे के बीच में अपने भारी-भरकम शरीर को फंसाते हुए उन्होंने उसकी कुर्सी की तरफ झुककर उससे ज़ोर-ज़ोर से बातें करनी शुरू कर दी।

“जैसे ही तुम रेस्टोरेंट में घुसे मैंने तुम्हें पहचान लिया और सोचा कि अरे मिस्टर विंतर तो बिली के मित्र हैं। उन्हें बिली और उसकी पत्नी के हनीमून के चित्र जरूर दिखाने चाहिए। देखो यह रहे। यह डोरा! ओह कितनी सुंदर है – पतली लचकदार कमर, बड़ी-बड़ी आँखें! यहाँ ये पाम बीच पर सूर्य स्नान कर रहे हैं। बिली तो डोरा के पीछे दीवाना है। जब उसने क्लेरिज में पार्टी दी थी, तब तक वह उससे नहीं मिला था। उस पार्टी में ही मैंने तुम्हें पहले पहल देखा था। लेकिन तुम्हें तो मुझ जैसी बुढ़िया की याद भी नहीं होगी।” यह शब्द श्रीमती हॉपर ने आगंतुक की ओर उत्तेजना पैदा करने वाली निगाहों से देख कर अपने दांतो को चमकाते हुए कहे।

“बात बिल्कुल उल्टी है, मुझे आपकी बहुत अच्छी तरह याद है।” आगंतुक ने कहा और इसके पहले कि श्रीमती हॉपर उसे फिर पहली मुलाकात की बातों में उलझाती, उसने उनकी और अपना सिगरेट का डिब्बा बढ़ा दिया और सिगरेट जलाने के लिए श्रीमती हॉपर को एक क्षण के लिए रुकना पड़ा। दियासलाई बुझाते हुए वह बोला, “मुझे पाम बीच पसंद नहीं है।” उस समय उसे देखकर ऐसा लगा जैसे वह 15वीं सदी के तंग गलियों वाले किसी ऐसे नगर का निवासी है, जहाँ के लोग नोंकदार जूते और ऊनी मोजे पहनते थे। मुझे सहसा किसी पिक्चर गैलरी में देखे हुए एक अज्ञात भद्र पुरुष के चित्र का स्मरण हो आया। उस समय यदि अंग्रेजी कोट उतार कर गले और आस्तीन पर बेल लगा हुआ काला कोट उसे पहना दिया जाता, तो ऐसा लगता जैसे वह बीते हुए युग का व्यक्ति हमारे आज के नये संसार को घूर घूर कर देख रहा है। मैं देर तक से चित्र की याद में खोई रही।

इस बीच उनकी बातचीत चलती रही। वह कह रहा था, “नहीं बीस बरस पहले भी मुझे ऐसी चीजों में आनंद नहीं आता था।”

इस पर श्रीमती हॉपर अपनी मोटी हँसी हँसते हुए बोली, “अगर किसी बिली के पास मैंदरले जैसा भवन होता, तो उसे पाम बीच में सैर करने जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। मैंने सुना है कि मैंदरले परी देश सा लगता है।“

वह रुककर उसके मुस्कुराने का इंतज़ार करने लगी, लेकिन वह सिगरेट पीता रहा और मैंने उसकी भौहों के बीच में मकड़ी के जाले जैसी महीने सिकुड़न देखी।

“मैंने मैंदरले की तस्वीर देखी है।” श्रीमती हॉपर ने फिर कहा, “वह सच में बड़ा मोहक लगता है। बिली कह रहा था कि सुंदरता में वह अपना सानी नहीं रखता। आश्चर्य है कि तुम उसे छोड़ कैसे पाते हो।”

उसका मौन अब स्पष्ट रूप से कष्ट कर हो चला था, लेकिन श्रीमती हॉपर थीं कि बोलती ही चली जा रही थी, ठीक वैसे ही जैसे कोई भौंडी बकरी किसी रक्षित प्रदेश में दौड़ती और फिर उसे रौंदती चली जाये। मेरा मुँह लज्जा से लाल हो गया। क्योंकि श्रीमती हॉपर के साथ-साथ मुझे भी अपमानित होना पड़ रहा था।

“अपने घरों के बारे में सभी अंग्रेज एक जैसे होते हैं। उनके बारे में उदासीनता इसलिए दिखाते हैं कि कोई ना समझ बैठे कि वह घमंडी हैं। क्यों ठीक कह रही हूँ ना!  मैंने सुना है मैंदरले में एक बहुत बड़ी चित्रशाला है और उसे बड़े-बड़े संगीतज्ञों के बहुमूल्य चित्र टंगे हैं?” और भी तेज आवाज में श्रीमती हॉपर ने कहा और फिर मेरी तरफ मुड़कर वह बोली, “मिस्टर द विंतर इतने संकोची हैं कि वह यह भी स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन मुझे विश्वास है कि यह सुंदर भवन उनकी पुरखों के पास सदियों से है। कहते हैं कि उसकी चित्रशाला में एक अनमोल हीरा है।”

अब मेरे लिए सहन करना कठिन हो गया था। शायद मिस्टर विंटर मेरी स्थिति को भांप गए क्योंकि उन्होंने आगे की ओर झुककर मुझसे बड़ी ही धीमी आवाज में पूछा, “थोड़ी और कॉफ़ी लोगी?” मैंने गर्दन हिला कर मना कर दिया, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि वह तब भी मुझे कुछ खोये-खोये से देख रहे थे और शायद सोच रहे थे कि मेरा और श्रीमती हॉपर का आपस में क्या संबंध है।

वह मुझसे बोले, “मोंटी-कार्लो के बारे में तुम्हारा क्या विचार है? इसके बारे में कभी कुछ सोचती भी हो या नहीं?” इस प्रकार उनकी बातचीत में शामिल कर लिए जाने के कारण स्कूल से अभी हाल ही में निकली हुई मुझ लाल कोहनी और सीधे बालों वाली लड़की की हालत और भी विचित्र हो गई और मोंटीकार्लो को आडंबर पूर्ण बताते हुए मैंने कुछ बड़े फूहड़पन से उत्तर देने की चेष्टा की। किंतु मेरे अटकते हुए वाक्य के पूरा होने से पहले श्रीमती हॉपर बीच में बोल उठी, “इसके साथ यही तो परेशानी है मिस्टर द विंतर! इसके दिमाग बड़े ऊँचे हो गए हैं। कोई दूसरी लड़की होती, तो मौंटी-कार्लो को देखने का मौका पाने के लिए अपनी आँखें तक न्योछावर करने को तैयार हो जाती।”

“वाह तब तो मौंटी-कार्लो का वह खूब मजा लूटती। श्री द विंतर ने मुस्कुराते हुए कहा।

हवा में सिगरेट के धुएं का एक बड़ा-सा बादल बनाते हुए श्रीमती हॉपर ने अपने कंधे ही हिलते हुए  पूछा, “तुम तो यहाँ शायद हर साल आते हो। तो इस बार क्या कार्यक्रम है? चेमी खेलोगे या गोल्फ।”

“मैंने अभी कुछ तय नहीं किया है।” उन्होंने जवाब दिया, “मैं ज़रा जल्दी  में आया हूँ।“

इन शब्दों ने शायद उन्हें किसी बात की याद दिला दी, क्योंकि उनका चेहरा फिर कुछ गंभीर हो गया और उनके माथे पर हल्की-हल्की त्यौरी पड़ गई। लेकिन श्रीमती हॉपर बोलती ही रही। कुछ प्रसिद्ध स्त्रियों और पुरुषों के नाम ले-लेकर वह बिल्कुल बेतुकी बातें कर रहीं थीं, जिनमें श्री द विंतर को रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन उन्होंने न तो एक बार भी श्रीमती हॉपर को बीच में टोका और न ही अपनी घड़ी की तरफ देखा। अंत में एक छोकरे ने आकर उन्हें इस स्थिति से उबारा। श्रीमती हॉपर के पास आकर बोला, “आपके कमरे में दरजी आपका इंतज़ार कर रहा है।“

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