चैप्टर 17 प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास | Chapter 17 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
Chapter 17 Prabhavati Suryakant Tripathi Nirala Novel In Hindi
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मनवा के किले से कुछ दूर, सरायन नदी के तट पर, एक एकान्त स्थान में, बबलू की डालों से घोड़े बाँधकर यमुना और प्रभा बैठी हुई हैं। रात डेढ़ पहर बीत चुकी है। प्रभावती अपनी आदर्श-देवी यमुना के सामने सिर झुकाए बैठी उनके उज्ज्वल चरित्र की कल्पना में लीन है।
“दीदी,” प्रभा बोली, “मैंने तुम पर बड़ा अन्याय किया है, पर वह अज्ञानकृत है, इसलिए क्षमा करना।”
“बहन,” प्रभा का हाथ हाथों में लेती हुई सस्नेह यमुना ने कहा, “ऐसे अपराध तो, मुमकिन, ज्ञानकृत भी अब तुम्हें करने पड़ें। पर भ्रम तो भ्रम ही है? उसके लिए क्षमा की क्या आवश्यकता है?-जगह भी नहीं। पारस्परिक व्यवहार का जब जो सम्बन्ध रहता है, तब वह पारस्परिक व्यवहार के अतिरिक्त और कुछ नहीं ठहरता, इसलिए वह अपने रूप में ही अनित्य है, फिर अनित्य के लिए क्या क्षोभ और क्या क्षमा में तुम्हारी दासी थी, फिर भी तुम्हारे मन में मेरा ही आदर्श था-में ही वहाँ आराध्या बनकर रही, यह कम प्राप्ति नहीं। और देखो कि इस तरह जीवन का रहस्य जीवन में किस तरह रहता है। जिसे लोग नहीं मानते, उसे ही लोग मानते हैं। जो दासी है, वही देवी है।”
यमुना आकाश की ओर देखने लगी। फिर स्थिर कंठ से बोली, “अब हमें चलना चाहिए।”
प्रभावती उठी। वहाँ के रास्ते यमुना के परिचित थे। बचकर चलती हुई चारदीवार के एक कोने पर आकर खड़ी हुई। प्रभा को नाले के पास प्रतीक्षा करने के लिए छोड़ आई थी। चारदीवार के चारों ओर रात को पहरेदार लगते थे। सन्तरी घूमता हुआ आया तो एक स्त्री खड़ी हुई दिख पड़ी।
“कौन?” सिपाही ने आवाज दी।
“में एक दुखी स्त्री हूँ।” यमुना ने कहा।
सिपाही बढ़कर पास आया।
“तुम क्या चाहती हो?”
यमुना खिलखिलाकर हँसने लगी। “‘ चाहती हूँ? में खून चाहती हूँ।” अट्टहास।… “इस पुरी में पाप बहुत बढ़ गया है। एक यमुना थी, राजा की लड़की थी, इसी पुरी में रहती थी, बड़े लाड़-प्यार से पली थी। एक वीर से उसने विवाह किया। चूँकि वह राजा न था, इसलिए उसका भाई नाराज हो गया। उसे देशनिकाला दिलवा दिया। अब गली-गली ठोकरें खाती फिरती है। क्यों सिपाही, तुम सिपाही की तरफ हो या राजा की तरफ?”
पहले सिपाही ने सोचा था, पागल है। अब संशय में पड़ा।
“क्यों पहरेदार? चुप क्यों हो? डरते हो।”
“तुम ठीक कहती हो। में सिपाही हूँ, सिपाही की तरफ हूँ। मैंने कुमारी यमुना को देखा है।” सिपाही दुखी हो गया।
“तुम्हें उसके लिए स्नेह है?”
“मैं उसके लिए जान दे सकता हूँ।”
“अच्छा, और नजदीक आओ। अच्छी तरह पहचानो तो, में कौन हूँ।”
सिपाही अच्छी तरह देखने लगा। फिर राज परिवार को दी जानेवाली सशस्त्र सलामी दी। यमुना ने भी हाथ उठाकर अभिवादन द्वारा सिपाही का सम्मान किया।
कहा, “बैठ जाओ। तुमसे कुछ बातें करूंगी!”
सिपाही चारदीवार के सहारे बैठ गया। एक ओर यमुना भी बैठ गई।
“कुमार देव को भाईजी यहाँ कैद कर लाए हैं, यह तो तुम जानते होगे?”
“जी हाँ।”
“वे घायल हो गए थे, अब अच्छे हैं?”
“जी हाँ, बहुत कुछ अच्छे हो गए हैं।”
“रतन अच्छी तरह है?”
“जी हाँ, कुमार की सेवा उन्होंने बड़ी तत्परता से की।”
यमुना सोचने लगी।
“भाईजी का क्या हाल है?”
“वे कर लेने के लिए गए थे, तब से नहीं आए।”
“क्या आज उनकी कोई खबर यहाँ आई है?”
“जी नहीं।”
“अच्छा, देखो, कुमार से मिलने की हमें जरूरत है। तुम पर किसी को सन्देह न हो पाएगा, विश्वास करो और अगर होगा भी, तो हम तुम्हें अपने साथ ले लेंगे, और अच्छी नौकरी देंगे, यों भी तुम्हें पुरस्कार देंगे, तुम हमारी मदद करोगे?”
“आपके साथ मुझे स्वर्ग का सुख होगा। आपकी आज्ञा पूरी करना में अपना सबसे बड़ा अवसर मानता हूँ। फिर जहाँ आप ऐसी दीनता से मेरी मदद चाहती हैं, वहाँ मेरे लिए इससे बड़ा मान और कोई नहीं, मैं कैसे भूल जाऊँगा?”
यमुना कुछ काल तक स्थिर रही, शान्त दृष्टि से सिपाही को देखती हुई। पूछा, “कुमार किस जगह रखे गए हैं?”
“इसी बैठक में,” उँगली उठाकर सिपाही ने बगलवाले प्रासाद की ओर इंगित किया।
“तो एक काम करो। रात काफी हो गई है। प्रासाद के अधिकांश जन सो गए होंगे। शंका की कोई बात नहीं। मेरी एक सखी हैं, वे वहाँ बैठी हैं। मैं बुला लाती हूँ। मैं गई या वे, कुमार से मिलकर लौट आएँगी।”
सिपाही ने स्वीकृति दी। यमुना प्रभा के पास गई और वृत्तान्त समझाकर बुला लाई।
रास्ते में कहा, “चारदीवार पर चढ़ना होगा।”
प्रभा मुस्कुरा दी। दीवार के पास आकर यमुना ने सिपाही से पूछा, “आज का संकेत क्या है?”
“वज्र,” नम्रता से सिपाही ने उत्तर दिया।
काँटा लगा कमन्द, जिसमें रस्सी की सीढ़ी बनी थी, हाथ में लेकर यमुना बोली, “आओ, मैं काँटा फेंकती हूँ। ऊपर चढ़ जाओ। फिर खींचकर उतरकर बाएँ हाथवाले भवन में जाना। संकेत तुम्हें मालूम हो चुका है। लोग देख भी लेंगे, तो दासी समझेंगे।”
शिवजी का स्मरण कर प्रभा चढ़ी, फिर उतर गई।
क्रमश:
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