चैप्टर 17 अधखिला फूल अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध का उपन्यास | Chapter 17 Adhkhila Phool Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh Novel

चैप्टर 17 अधखिला फूल अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध का उपन्यास | Chapter 17 Adhkhila Phool Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh Novel

Chapter 17 Adhkhila Phool Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh Novel

Chapter 17 Adhkhila Phool Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh Novel

एक बहुत ही घना बन है, आकाश से बातें करनेवाले ऊँचे-ऊँचे पेड़ चारों ओर खड़े हैं-दूर तक डालियों से डालियाँ और पत्तियों से पत्तियाँ मिलती हुई चली गयी हैं। जब पवन चलती है, और पत्तियाँ हिलने लगती हैं, उस घड़ी एक बहुत ही बड़ा हरा समुद्र लहराता हुआ सामने आता है, बड़, साल और पीपल के पेड़ों की बहुतायत है, पर बीच-बीच में दूसरे पेड़ भी इतने हैं जिससे सारा बन पेड़ों से कसा हुआ है। इस पर बेल, बूटे और झाड़ियों की भरमार, सूरज की किरणें कठिनाई से धरती तक पहुँचती थीं-कहीं-कहीं तो उनका पहुँचना भी कठिन था-वहाँ सदा अंधेरा रहता। एक चौड़ी खोर ठीक बन के बीच से होकर पच्छिम से पूरब को निकली थी, जहाँ पहुँच कर यह खोर लोप होती-वहाँ कुछ दूर तक बन बहुत घना न था। एक घड़ी दिन और है, बन में सर सर छटपट की धुन हो रही है, बरसाऊ बादल आकाश में फैले हुए हैं, पत्तों को खड़खड़ाती हुई बयार चल रही है-धीरे-धीरे सहज डरावना बन और भी डरावना हो रहा है।

जिस खोर की बात हमने ऊपर कही है, उसी खोर से घोड़े पर चढ़ा हुआ एक जन पश्चिम से पूर्व को जा रहा है। मुखड़े पर उमंग झलक रही है, आँखों से जोत निकल रही है, पर माथे में सिलवटें पड़ रही हैं, जिससे जान पड़ता है वह अपने आप कुछ सोच रहा है। घोड़ा बहुत ही धीमी चाल से चल रहा है-पर कान उसके खड़े हैं। कभी-कभी वह चौंक भी उठता है, उस घड़ी उसकी हिनहिनाहट उस सुनसान बन के सन्नाटे को, तोड़ देती है औेर एक बार उसी हिनहिनाइट से सारा बन गूँज उठता है। धीरे-धीरे तानपूरे का मीठा सुर चारों ओर फैलने लगा-साथ ही एक बहुत ही सुरीले गले से गीत गाया जाने लगा। पीछे तानपूरे का मीठा सुर और सुरीले गले की तान मिलकर एक हुई और एक बहुत ही सुहावनी और जी को बेचैन करनेवाली धुन सारे बन में गूँजने लगी। यह धुन धीरे-धीरे ऊपर बयार में उठी, पीछे खोर पर जानेवाले के कानों तक पहुँचा-वह चुपचाप गीत सुनने लगा-गीत यह था-

लावनी

जग का कुछ ऐसा ही है ढंग दिखाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।

जिससे पौधों ने समा निराला पाया।

जिसने बरबस था आँखों को अपनाया।

जिसके ऊपर था जी से भौंर लुभाया।

बहती बयार को भी जिसने महँकाया।

वह खिला सजीला फूल भी है कुम्हलाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।1।

देखा जिसको जग बीच ध्वजा फहराते।

राजे जिसके पाँवों पर शीश नवाते।

सुन करके जिसका नाम बीर घबराते।

जिसकी कीरत सब ओर सभी थे गाते।

कल पड़ा हुआ वह धूल में है बिललाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।2।

पड़ते थे जिसके तीन लोक में डेरे।

यम भी डरता था आते जिसके नेरे।

थे और देवते जितने जिसके चेरे।

काँपता स्वर्ग जिसके आँखों के फेरे।

उस रावण को था गीधा नोच कर खाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।3।

कब तक कितनी हम ऐसी कहें कहानी।

अपने जी में तू समझ सोच रे प्रानी।

क्यों धरम छोड़ कर करता है मनमानी।

तू क्यों बिगाड़ता है अपना पत पानी।

है पल भर में धन जोबन सभी बिलाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।4।

घोड़े पर चढ़ा हुआ कौन जा रहा है, क्या यह बतलाना होगा? ऊपर के गीत को सुनकर आप लोग आप समझ गये होंगे, वह कौन है? जो न समझे हों तो मैं बतलाता हूँ, वह कामिनीमोहन है। ऐसे घने बन में जहाँ सूरज की किरनें भी कठिनाई से जाती हैं, इस भाँत अचानक गीत होता हुआ सुन कर वह सन्नाटे में हो गया, फिर गीत भी ऐसा जो उसके दोनों कानों को भली-भाँत मल रहा था-जो वह सोच रहा था, मानो उसी के लिए उसको जली कटी सुना रहा था। कामिनीमोहन बहुत घबराया, सोचने लगा, बात क्या है! हो न हो दाल में कुछ काला है, पर कोई बात उसकी समझ में न आयी। सोचते-सोचते उसने देखा, वन में पेड़ एक ओर बहुत घने नहीं हैं, गाने की धुन उसी ओर से आ रही थी, गीत अब तक गाया जा रहा था। वह धीरे-धीरे घोड़े पर से उतरा, घोड़े को पेड़ से बाँध और चुपचाप पाँव दबाये उसी ओर चला। ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ने लगा, गीत का गाया जाना रुकने लगा। पथ में एक बहुत ही लम्बा-चौड़ा बड़ का पेड़ था, डालियाँ इस की बहुत दूर तक फैली हुई थीं। और कई सौ जटाएँ डालियों से निकलकर धरती तक आयी थीं। इस पेड़ तक पहुँचते-पहुँचते गीत का गाया जाना रुक गया, सोचने पर जान पड़ा इसी पेड़ के नीचे गीत हो रहा था। कामिनीमोहन यहाँ पहुँच कर बड़ के चारों ओर घूमा, बहुत सी चिड़ियाँ झाड़ियों में से निकलकर ऊपर उड़ गयीं-छोटे-छोटे वन के जीव इधर-उधर भागते दिखाई पडे, पर और कोई कहीं न दिखलायी दिया। कामिनीमोहन का जीवट आप लोग जानते हैं, वह चाहता था, पेड़ पर भी चढ़कर देखें, पर कुछ समझ बूझकर न चढ़ा। उसके हाथ में एक तुपक थी, उसने डर दिलाने के लिए आकाश में उसको चलाया, सन्नाटे में उसकी धुन सारे बन में गूँजी गयी-काँ काँ करते बहुत से कौवे पेड़ पर से उड़ गये-पर और कुछ न हुआ। कामिनीमोहन कुछ घड़ी यहाँ खड़ा न जाने क्या सोचता रहा-पीछे खोर की ओर फिरा।

खोर पर पहुँच कर वह घोड़े पर चढ़ा ही था, इसी बीच उसने फिर तानपूरे की धुन और गाना सुना, अबकी बार तानपूरा बड़ी उमंग से बज रहा था, गाना भी बहुत ऊँचे सुर में हो रहा था, गीत ये थे-

गीत

कितने ही घर हैं पाप ने घाले।

कितने ही के किये हैं मुँह काले।

पाप की बान है नहीं अच्छी।

ओ न पापों से काँपनेवाले।

सोते हो तेल कान में डाले।

धर्म के हैं तुझे पड़े लाले।

नाव डूबेगी बीच धार तेरी।

ओ धरम के न पालनेवाले।

फिर इस भाँत गाना होते सुनकर कामिनीमोहन बहुत चकराया, वह कुछ डरा भी, जी में आया, फिर उस पेड़ तक चलूँ, और उस पर चढ़कर देखूँ क्या बात है, वह घोड़े पर से उतरा भी, पर इसी बीच उसको एक पालकी सामने से आती हुई दिखलायी पड़ी, कहार सब बड़े वेग से पालकी चला रहे थे, पाँच लठधर पालकी के पीछे थे। पालकी के देखते ही कामिनीमोहन का जी उस ओर गया। उसने कहारों से तो कहा ले चलो! ले चलो!! पर जो पाँच लठधर पीछे दौड़ रहे थे, उनमें से एक को पास बुलाया, जो चार रह गये थे, वे सीधे पालकी के साथ गये। जिसको कामिनीमोहन ने पास बुलाया था, जब वह पास आया, तो उसने कहा, कपूर! काम तो तुमने बड़ा किया!

कपूर-मैंने कौन काम किया, जो कुछ किया सो बासमती ने किया, आज वह बड़ी चाल चली।

कामिनीमोहन-हाँ, कहो तो, कैसे क्या-क्या हुआ?

कपूर-आप घोड़े पर चढ़कर धीरे-धीरे चलिए, मैं भी कहता चलता हूँ, नहीं तो कहार सब बहुत आगे बढ़ जावेंगे।

कामिनीमोहन घोड़े पर चढ़ा, धीरे-धीरे आगे बढ़ा, त्योंही बन में तानपूरे के साथ गीत होता हुआ उसको फिर सुनायी पड़ा, अब की बार पूरी-पूरी टीप लग रही थी, पवन में तान की लहर सी फैल रही थी। गीत यह था-

गीत

फिर रहे हो बने जो मतवाले।

तो किसी के पड़ोगे तुम पाले।

जो कसर काढ़ लेगा सब दिन की।

ओ किसी की न माननेवाले।

इस गीत को कपूर भी सुन रहा था। उसने कहा, बाबू! बन में यह आज गाना कैसा हो रहा है? इस ओर मैं बहुत आया-गया हूँ पर इस भाँत गाना होते कभी नहीं सुना।

कामिनीमोहन ने कहा-जान पड़ता है यह जागती हुई धरती है, तभी यहाँ ऐसा गाना सुनाई दे रहा है, नहीं तो और कोई बात तो समझ में नहीं आती-जाने दो इन पचड़ों को, बन ही है-तुम अपनी बात कहो।

कपूर-आपके कहने से जिस भाँत दस-दस पाँच-पाँच दे कर गाँव की पचास स्त्रियों को बासमती ने आपके काम के लिए गाँठा था, आप जानते हैं, बेले के बने हुए फूल में जो अचेत करनेवाली औषधी लगायी गयी थी, उसका भेद भी आपसे छिपा नहीं है। इन्हीं पचास स्त्रियों और बने हुए बेले के फूल ने आपका सब काम कर दिया।

यह कहकर कपूर ने सारी बातें कह सुनायी, पीछे कहा, फूल को सूँघ कर ज्यों देवहूती अचेत हुई त्यों पास की पाँच छ: स्त्रियों ने उसको पकड़ कर एक पालकी में सुला दिया, इसी पालकी में सरला की भौजाई घाट पर आयी थी। कहार सब भी साट में थे। ज्यों देवहूती पालकी में सुलायी गयी, त्यों उन सबों ने पालकी उठा दी। पहले ये सब सीधे सरला की भावज के द्वार पर आये, वहाँ कुछ घड़ी पालकी उतारी, पीछे पालकी को उठाकर कुछ दूर उसको इस भाँत ले चले, जैसे कोई रीती पालकी ले चलता है, गाँव के बाहर आकर वे सब पवन से बातें करने लगे-और अब तक उसी ढंग से चले आ रहे हैं।

कामिनीमोहन-यह तो हुआ, पर क्या इस बात को उसकी मौसी ने नहीं जाना?

कपूर-वह कैसे जानती! जब कहार सब पालकी उठाकर चल दिये, उन्हीं स्त्रियों में से दो एक ने देवहूती के हाथ से गिरकर पानी में बहते हुए कपड़ों को दिखलाकर ऐसी बातें कहीं, जिससे उसकी मौसी के जी में उसके घड़ियाल के मुख में पड़ने की बात ठीक जँच गयी-इस घड़ी सारे गाँव में यह बात फैल गयी है, देवहूती को घड़ियाल उठा ले गया।

कामिनीमोहन-बासमती अच्छी चाल चली-पारबती का कान काट लिया।

कपूर-बात सच है, पर यह स्त्रियों के बीच की बात है, बहुत दिन न छिपेगी।

कामिनीमोहन-न छिपे, काम निकल जाने पर कोई जानकर ही क्या करेगा। मैं देवहूती से ही ऐसी बातें कहलाऊँगा जिस को सुनकर सभी हाथ मलते रह जावेंगे।

कपूर-राम ऐसा ही करे। पर इस घड़ी जो करना है, उस को कीजिए, देखिए पालकी खोर तक पहुँच गयी।

कामिनीमोहन-कहारों से कहो पालकी रख दें।

कपूर ने पुकार कर कहा, कहारों ने पालकी रख दी, और घर की ओर फिरे। अब जो चार लठधर पीछे थे, वे पालकी लेकर वन में धंसे, कपूर ने इन चारों की आँखों पर पट्टी बाँध दी थी। दूर तक वे सब इसी भाँत पालकी लेकर चले-कपूर आगे आगे था। पीछे इन सबों से भी पालकी रखा ली गयी। कपूर साथ-साथ आकर इन सबों को खोर तक पहुँचा गया। यहाँ पहुँचने पर इनकी पट्टी खोल दी गयी-पट्टी खुलने पर ये चारों भी घर फिर आये। कपूर फिर बन में चला गया।

क्रमशः 

Prev | Next| All Chapters 

प्रभावती सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का उपन्यास 

प्रेमा मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास 

देवांगना आर्चाय चतुर सेन शास्त्री का उपन्यास

नारी सियारामशरण गुप्त का उपन्यास

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *