चैप्टर 14 मैला आँचल फणीश्वरनाथ रेणु का उपन्यास | Chapter 14 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu Novel

चैप्टर 14 मैला आँचल फणीश्वरनाथ रेणु का उपन्यास | Chapter 14 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu Novel In Hindi , Chapter 14 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu Ka Upanyas 

Chapter 14 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu

Chapter 14 Maila Anchal Phanishwar Nath Renu Novel

चढ़ली जवानी मोरा अंग अंग फड़के से

कब होइहैं गवना हमार रे भउजियाऽऽऽ !

पक्की सड़क पर गाड़ीवानों का दल भउजिया का गीत गाते हुए गाड़ी हाँक रहा .’ है। “आँ आँ ! चल बढ़के। दाहिने…हाँ, हाँ, घोड़ा देखकर भी भड़कता है ! साला…!”

हथवा रंगाये सैयाँ देहरी बैठाई गइले

फिरहू न लिहले उदेश रे भउजियाऽऽऽ !

ननदिया के दिल की हूक गाड़ीवानों के गले से कूक बनकर निकल रही है। भउजिया ?…कमली की कोई भौजी नहीं, किससे दिल की बात कहे ? भउजिया की ननदिया की तो शादी हो चुकी है, कमली का तो हाथ भी पीला नहीं हुआ है।… ‘प्रेमसागर’ में मन नहीं लगता है-‘श्री सुकदेव जी बोले कि हे राजा, एक दिन कृष्ण कन्हैया वंशी बजैया कदम के बिरिछ पर बैठके बंशी बजाए रहे थे।’ चीरहरणलीला की तस्वीर को देखकर कमली का जी न जाने कैसा-कैसा करने लगता है ! वह ‘प्रेमसागर’ बन्द कर देती है।

-सुबह प्यारू आया था। कितना गौ आदमी है प्यारू !…आज क्या बना था प्यारू ? डाक्टर साहब आज ठीक समय पर खाए थे या शीशी-बोतल लेकर पड़े हुए थे ? प्यारू हँसकर हमेशा की तरह जवाब देगा, “अरे, क्या पूछती हो दैया ! इस आदमी का हमको कोई ताल-पता (ठौर-ठिकाना) नहीं लगता है। रोज कहेंगे कि प्यारू आज खाना जरा जल्दी बनाओ, और खाते फिर वही रात में ग्यारह बजे और दिन में दो बजे। आज बंधा का झोल बना था। झोल क्या खाएँगे ? मिर्च-मसाला छूते भी नहीं हैं। खाने का तो कोई सौख नहीं है, जो बना दो खा लेंगे।…और शीशी-बोतल ? क्या पूछती हो दैया ! कल से मच्छड़, खटमल और तिलचट्टे के पीछे पड़े हुए हैं। आज संथालटोली के जोगिया माँझी को कह रहे थे-चार खरगोश और एक दर्जन चूहा पकड़कर दे जाओ। पूरा इनाम मिलेगा।”

प्यारू को गाँव-भर की औरतें प्यार करती हैं। गाँव-भर में उसकी मामी, मौसी, नानी, दादी और काकी हैं। सभी जवान लड़कियों को वह ‘दैया’ कहता है।

….डाक्टर की मुस्कराहट बड़ी जानलेवा है। जब आवेगा तो मुस्कराते हुए आवेगाडर लगता है ?…हाँ-हाँ, डर लगता है तो तुमको क्या ? तुमको तो मज़ा मिलता है न ! मुस्कराए जाओ।…गले में आला लटकाए फिरते हैं बाबू साहब ! छाती और पीठ में लगाकर लोगों के दिल की बीमारी का पता लगाते हैं। झूठ ! इतने दिन हो गए, मेरे दिल की बात, मेरी बीमारी को कहाँ जान सके ! या जान-बूझकर अनजान बनते हो डाक्टर ! तुम्हारी मुस्कराहट से तो यही मालूम होता है।…अच्छा डाक्टर ! सच-सच बताना, तुम क्यों मुस्कराते हो ? तुम मुझे जलाने के लिए इस गाँव में क्यों आए ? नहीं, नहीं, तुम नहीं आते तो पागल हो जाती। रोज सपने में कमला नदी की बाढ़ में मैं बह जाती थी। बड़े-बड़े साँप ! तरह-तरह के साँप काटने दौड़ते थे। तुम आए, मैं डूबते-डूबते बच गई।…मेरी आँखों की पपनियाँ उलटकर देखो, मेरी पीठ पर आला लगाकर देखो, मेरे दिल की बात सुनो।…तुम डाँटते हो, बड़ा अच्छा लगता है ! तुम मुझे सूई से डराते हो, चिढ़ाते हो। कितना अच्छा लगता है मुझे ! फिर मीठी दवा भेज दूंगा ?…हाँ जी, भेज देना, पूछते हो क्या ! तुम्हारी बोली क्या कम मीठी है ! लेकिन तुम एक बार जरूर आया करो। नहीं आओगे तो मुझे डर लगेगा !…सिपैहियाटोली की कुसमी कहती थी, डाक्टर मुझसे भी पूछता था-मीठी दवा चाहिए क्या ?…मैं नहीं विश्वास करती, डाक्टर ऐसा नहीं है। कुसमी झूठ बोलती है। मीठी दवा और किसी को मिल ही नहीं सकती है। डाक्टर, खबरदार ! कुसमी बड़ी चालबाज लड़की है। बहुतों को बदनाम किया है उसने। हरगौरी उसका मौसेरा भाई है, लेकिन जाने…दो, क्या करोगे सुनकर ? उसकी ससुराल फारबिसगंज में है। घरवाला एक मारवाड़ी का सिपाही है। रात-भर सिपाही पहरा करता है और कुसमी ‘बैसकोप’ देखने जाती है।…

‘…श्री सुकदेव जी बोले कि हे राजा ! एक दिन यशुमती सभी ग्वालिनों को बुलाए।’

“कमली।”

“माँ !”

“पढ़ना बन्द करो। डाकडरबाबू ने मना किया है न ! दवा पी लो। मैं तुम्हारी किताब बक्से में बन्द कर ताला लगा दूँगी। हाँ, ऐसे तुम नहीं मानोगी।”

“पढ़ने से क्या होगा माँ !”

“लड़की की बात तो सुनो जरा ! पढ़ने से क्या होगा सो तो डाकडर से पूछना !”

“डाक्टरबाबू से ?…माँ, तुम्हारा डाक्टर क्या है जानती हो ? माटी का महादेव !

माँ ठठाकर हँस पड़ती है, “एक-एक बात गढ़कर निकालती है तू ! अच्छा, ठहर जा। आज आने दे डाकडरबाबू को।”

माँ-बाप के नैनों की पुतली है कमला। तहसीलदार साहब बेटी की इच्छा के खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकते। माँ कमला की हर आवश्यकता को बिना मुँह खोले ही पूरा कर देती है। बाप ने खुद पढ़ाया-लिखाया है रामायण, महाभारत, नल-दमयन्ती, सावित्री-सत्यवान, पार्वती-मंगल और शिवपुराण। कमला रोज शिव पूजती है-‘ओं शिवशंकर सुखकर नाथ बरदायक महादेव !…महादेव ! मिट्टी का महादेव !

“माँ चुप रहो।” कमली माँ से लिपटकर हाथों से मुँह बन्द कर देती है। “पूछो न अपने डाक्टर से, खरगोश पालकर क्या करेंगे !”

डाक्टर कोई जवाब नहीं देता है, सिर्फ मुस्कराता है। फिर गम्भीर होते हुए कहता ___ है, “अब तो सूई देनी ही पड़ेगी; दवा से बेहोशी तो दूर हो गई, लेकिन पागलपन…!”

सभी ठठाकर हँस पड़ते हैं…तहसीलदार साहब, माँ और प्यारू । कमली का चेहरा लाल हो जाता है-“मैं आज खून का दबाव नहीं जाँच कराऊँगी। नहीं-नहीं, ठीक है। हाँ, मैं पगली हूँ !”

“दीदी !” तहसीलदार साहब बेटी को दीदी कहकर पुकारते हैं, “आओ, डाक्टरसाहब को देर हो रही है।”

ब्लड प्रेशर जाँच करते समय डाक्टर गम्भीर होकर यन्त्र की ओर देखता है। कमली तिरछी निगाहों से चोरी-चोरी डाक्टर को देखती है-हाँ जी, मुझे पगली कहते हो ! लेकिन मुझे पगली बना कौन रहा है ?

गाँव में सिर्फ तहसीलदार साहब चाय पीते हैं, बढ़िया चाय की पत्ती का व्यवहार करते हैं। डाक्टर यहाँ हर शाम को चाय पीने आता है। कमला की माँ का अनुरोध है-‘रोज शाम को चाय पी जाइए।’

तहसीलदार साहब कहते हैं, डाक्टर तो अपने समाँग की तरह हो गया है। डाक्टर को भी तहसीलदार साहब से घनिष्ठता हो गई है। तहसीलदार साहब से गाँव-घर और जिले की बहुत-सी नई-पुरानी बातें सुनने को मिलती हैं।…राजपारबंगा स्टेट के जनरैल मैनेजर डफ साहब कैसा आदमी है ! आजकल एकदम हिन्दुस्तानी हो गया है। धोती-कुर्ता पहनता है। कभी-कभी रोरी का टीका भी लगाता है। राज पारबंगा के कुमार जी उसकी मुट्ठी में हैं। डफ साहब की बेटी जब तक रहेगी, कुमार जी डफ साहब को नहीं हटा सकते हैं।…महारानी चम्पावती जाति की मुसहरनी थीं।…राजा भूपतसिंह को ‘मेम रानी’ से दो लड़के हैं। बड़ा ऐयाश है राजा भूपत ! पोलो का जब्बड़ (जबर्दस्त) खिलाड़ी ! दार्जिलिंग रेस में हर साल उसका घोड़ा जीतता है। आजकल भी बाईस घोड़े हैं। बड़ा ऐयाश ! पुन्याह में बनारस, इलाहाबाद और लखनऊ से इतनी बाई जी आती हैं कि तीन दिन तीन रात महफिल जमी रहती है, एक मिनट भी बन्द नहीं होती।…पैरिस की शराब पीता है। असल राजा तो वही है। राज पारबंगावाला तो मक्खीचूस है।…जिला का सबसे बड़ा किसान है भोला बाबू ! तीस हजार बीघा जमीन है ! रहुआ इस्टेट के गुरुबंशीबाबू भी किसान ही हैं। उनकी बात निराली है। दाता कर्ण हैं। ‘वारफ़न’ में सबसे ज्यादे रुपैया दिया और कांग्रेस के ‘सहायताफन’ में भी सबसे ज्यादे रुपैया दिया और इसी को कहते हैं दुनिया का इन्साफ ! दिल खोलकर दान देने का सुफल क्या मिला है, जानते हैं ? लोगों ने झूठ-मूठ अफवाह फैला दिया है कि नोट बनाता है। अरे भाई, नोट तो बनाती है उसकी कोशी-गंगा किनारे की हजारों बीघा जमीन, जिसमें न हल लगता है न बैल, न मेहनत न मजदूरी ! बाढ़ का पानी हटा और कीचड़वाली धरती पर चना, खेसारी, मटर, सरसों, उरद वगैरह छींट दिया। बस, छींटने में जितनी मेहनत लगे। कोशी और गंगा के पानी से नहाई हुई धरती माता दिल खोलकर अपना धन लुटा देती है।…जिला कांग्रेस के सबसे बड़े लीडर हैं शिवनाथ चौधरी जी।…ओ, आप तो जानते ही हैं उनको ! वह भी बड़े किसान हैं।…पूर्णिया कचहरी में जो वकालत सीसीबाबू कर गए, वह अब कोई वकील क्या करेगा ! हाईकोर्ट के बालिस्टर भी उनके बनाए हुए मिसिल को नहीं काट सकते थे। लेकिन फौजदारी कचहरी में कभी पैर नहीं रखते थे। एक बार राजा भूपत दस हजार फीस देने लगा, खूनी केस था। सीसीबाबू ने अपना प्रण नहीं तोड़ा, कचहरी नहीं गए। कागज पढ़कर सिर्फ एक जगह एक लाइन काट दिया और एक जगह एक अक्षर जोड़ दिया। राजा भूपत बेदाग छूट गया।…अब तो न वह अयोध्या है और न वह राम।…

“बाबा”

“दीदी !”

“डाक्टर साहब आज यहीं खाएँगे।”

“प्यारू से झगड़ा मोल लेना चाहती है ?”

“प्यारू से कह दिया है।”

“तब डाक्टर साहब !…हमारी तो कभी हिम्मत नहीं हुई। दीदी कहती है, यदि शरधा हो तो…”

“श्रद्धा-अश्रद्धा की बात नहीं। बात यह है कि मैं…”

“मिर्च-मसाला नहीं खाते,” कमली बीच में ही बोल उठी, “उबली हुई चीजें खाएँगे। यही न ?”

डाक्टर समझ रहा है-रोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है…शीला रहती तो तुरन्त कुछ कह देती। शायद कहती, ‘भावात्मक संक्रमण’ अथवा ‘प्रत्यावर्तन’ के मोड़ पर रोग पहुँच गया है।

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