चैप्टर 14 अधखिला फूल अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध का उपन्यास | Chapter 14 Adhkhila Phool Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh Novel
Chapter 14 Adhkhila Phool Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh Novel
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बड़ी गाढ़ी अंधियाली छायी है, ज्यों-ज्यों आकाश में बादलों का जमघट बढ़ता है, अंधियाली और गाढ़ी होती है। गाढ़ापन बढ़ते-बढ़ते ठीक काजल के रंग का हुआ, गाढ़ी अंधियाली और गहरी हुई, इस पर अमावस, आधी रात और सावन का महीना। पहरों से झड़ी लगी है; बड़ी धुम से वर्षा हो रही है, बादल जी खोलकर पानी उगल रहे हैं। कभी-कभी कौंध होती है-पर बहुत थोड़ी-बिजली झलक भर जाती है। मुँह निकालना उसको भी दूभर है। गरज बादलों के भीतर ही घूम रही है, पानी पड़ने की ओर चिंघाड़ सुनकर नीचे आते उसका कलेजा भी दहलता है। बूँदें धाड़ाके के साथ गिर रही हैं, ओलती से मुट्ठियों मोटी धार पड़ रही है और चारों ओर पानी बहने की हर हर हर हर बहुत ही डरावनी धुन फैली हुई है। यह सब बहुत ही छिपे-छिपे घोर अंधियाली की गोद में होता है। आँखें फाड़ कर देखने पर भी कहीं बँद और पानी की झलक तक नहीं दिखलाती। हाँ, बूँदों के गिरने, पानी के धुम से पड़ने और बहने की मिली हुई कठोर धुन इस अंधियाली के कलेजे को भी भेद कर कानों तक पहुँचती है, और रात के गहरे सन्नाटे को भी तोड़ रही है, पर घोर अंधियाली ने इसको भी अपने रंग में रँग कर बहुत ही डरावनी बना रखा है।
इसी बेले एक गली में घुटनों पानी हेलते हुए तीन जन घुस रहे हैं। यह तीनों बीच गली में जाकर ठहरे। गली की पश्चिम ओर एक ऊँचा कोठा है, उसकी एक बड़ी खिड़की खुली हुई है। ऐसी घोर अंधियाली में इस खिड़की के भीतर उँजाला है, खिड़की से गली की धरती तक एक रस्सी की सीढ़ी लगी हुई है, इन तीनों में से एक ने टटोल कर इस रस्सी की सीढ़ी को पाया और बहुत फुर्ती से उसके सहारे खिड़की तक पहुँचकर वह कोठे के भीतर पैठ गया। वहाँ उसने कोठे को सूना पाया, केवल एक चौदह पन्द्रह वर्ष की बहुत ही सुन्दर लड़की एक पलँग पर अलबेलेपन के साथ अचेत सो रही थी। एक चटाई पलँग के पास ही धरती पर बिछी हुई थी। एक मिट्टी का दीया टिमटिमाता हुआ जल रहा था, और कहीं कोई न था। कोठे पर चढ़नेवाला बहुत ही चुपचाप पहले कोठे की सीढ़ी के पास गया, वहाँ जो द्वार था उसको उसने बाहर की ओर से लगाया। धीरे-धीरे बिलाई के काँटों को पकड़कर किवाड़ों को आगे की ओर खींचा पर वह न खुले, जी का पूरा ढाढ़स हुआ। उसने भीतर से भी बिलाई लगा दी। इस द्वार के दक्खिन ओर एक बड़ी खिड़की थी, वह अब इसके पास आया, धीरे-धीरे इसके किवाड़ों को भी देखा, यह भी बाहर से लगे हुए थे। इसके कीलकाँटों को भी भली-भाँत देखकर पीछे इसकी बिलाई भी उसने भीतर से लगा दी। यह सब करके वह निचिन्त हुआ-एक ऊँची साँस भीतर से निकलकर बाहर आयी। कलेजा धक-धक करने लगा-पर वह जी को थामकर धीरे-धीरे पलँग की ओर बढ़ा। पलँग के पास पहुँचा ही था, इतने में जिस खिड़की से वह आया था, उसी खिड़की से उसने एक दूसरे जन को कोठे के भीतर पैठते देखा, कोठे के दीये की जोत ठीक इस पैठनेवाले के मुँह पर पड़ती थी, उसी धुंधली जोत में उसने देखा, पैठनेवाला उन्नीस बीस बरस का लम्बा गठीला जवान है। हाथ-पाँव बहुत ही कड़े हैं, सारे अंग खुले हुए हैं, केवल एक कसा हुआ लँगोटा देह पर है। सर के कटे हुए छोटे-छोटे बालों से पानी की अनगिनत बूँदें टपक रही हैं, मुँह उसका बहुत गम्भीर है-जिस पर बेडरी और भलमनसाहत एक साथ झलक रही है।
इस पिछले जन को इस भाँत अचानक आया हुआ देखकर उस पहले जन के पेट में खलबली पड़ गयी, औसान जाते रहे और कलेजा बल्लियों उछले लगा। जिस घड़ी पहले जन की आँख इस पिछले जन पर पड़ी थी, उसी घड़ी उसने ठीक कर लिया था, यह मेरे साथवाले दो जनों में से कोई एक नहीं है, यह इस गाँव का लोग भी नहीं जान पड़ता, क्योंकि इस गाँव का ऐसा कौन है जिसको मैं नहीं जानता, पर इसको तो आज तक मैंने कभी नहीं देखा। इसलिए फिर यह है कौन? उसने उसी घड़ी उसी हड़बड़ी में सोचा, यह हो न हो कोई चोर है! और जो चोर नहीं है तो देवहूती का छैल है! जो इसी भाँति छिपकर नित इसके पास आता है। ये दोनों बातें ऐसी थीं, जिनके जी में समाते ही वह जल भुन गया, उसके ऊपर उसको कुछ रोष भी हुआ, जिससे घबराहट दूर हुई, और जी कुछ कड़ा हुआ, इसलिए उसने कोठे में उसके पाँव रखते ही उससे कुछ अक्खड़पन के साथ पूछा, क्यों रे, तू कौन है?
पिछला जन-मैं तेरा यम हूँ।
पहला जन-हाँ, तू मेरा यम है! देख मुँह सम्हाल कर बातें कर, छोटा मुँह बड़ी बात अच्छी नहीं होती।
पिछला जन-मैं ही तो इस अंधियाली रात में छिपकर दूसरे के घर में घुस आया हूँ। मैं ही तो एक परायी स्त्री का सत इस भाँत कपट करके बिगाड़ना चाहता हूँ-इसी से मुझको बड़ा डर है।
पहला जन-मैं तो दूसरे के घर में छिपकर परायी स्त्री का सत बिगाड़ने आया हूँ! पर यह तो बतला-तू यहाँ क्यों आया है? क्या तू चोर नहीं है?
पिछला जन-मैं चोर हूँ या साह तुझे आप जान पड़ेगा, कुछ घड़ी में तू यह भी जानेगा, मैं किसलिए यहाँ आया हँ।
पहला जन-मैं कुछ घड़ी में क्या जानूँगा, अभी जानता हूँ तू मरने के लिए यहाँ आया है। चींटी को पंख निकलता है तो अपने आप वह आग पर जाकर जल मरती है।
पिछला जन-ठीक बात है! मैं मरने के लिए ही यहाँ आया हूँ; पर यह जान ले तुझे मारकर मरूँगा, बिना तुझे मारे मैं कभी न मरूँगा।
पहला जन-तू किस बूते इतनी हैकड़ी बघारता है? तू नहीं जानता मैं कौन हूँ?
पिछला जन-मैं जानता हूँ-तू देश का नीच, कुचाली और नटखट है।
पहला जन-चुप रह! जो गाली बकेगा तो जीभ पकड़कर खैंच लूँगा।
पिछला जन-आ, देखूँ तो कैसे मेरी जीभ खैंचता है! एक ही झापड़ में तो अंधा होकर धरती पर गिर पड़ेगा।
पहला जन-मुन्ना! मुन्ना!! ओ मुन्ना!!! बघेल! बघेल!! ओ बघेल!!! अबकी बार चिल्ला कर कहा-ओ मुन्ना और बघेल! अभी कोठे पर चढ़ आओ।
पिछला जन-मुन्ना और बघेल के भरोसे ही यह सीटी पटाक थी, तो तेरी देखी गयी। पापी नीच! जा। अब तू भी वहीं जा जहाँ मुन्ना और बघेल गये हैं।
इतना कहकर कड़क कर पिछला जन पहले जन की ओर झपटा, धन जन और जवानी के मद से मतवाले पहले जन से भी यह न सहा गया, वह भी छुरी निकाल कर इसकी ओर दौड़ा, पर पिछले जन ने बहुत ही फुर्ती से उसके हाथ से छुरी छीन ली, और गला पकड़कर एक ही झटके में उसको पछाड़ कर उसके ऊपर चढ़ बैठा।
इस झपटा-झपटी और कड़का-कड़की में उस पलँग पर सोयी हुई लड़की की नींद टूट गयी-वह घबड़ा कर पलँग पर उठ बैठी, आँख मलते-मलते बोली, भगमानी! भगमानी!! यह कैसी धमा चौकड़ी है!!! उसकी बोली उस सुनसान कोठे में गूँज उठी, पर किसी दूसरे का बोल न सुनाई पड़ा। उसने हड़बड़ी में आँखें खोल दीं, पास की चटाई पर किसी को न पाया, उससे थोड़ी ही दूर पर उसने कामिनीमोहन को धरती पर गिरा और उसके ऊपर एक अनजान को बैठे देखा। इस अनसोची और अनहोनी बात को अचानक देखकर वह काँप उठी-उसकी घिग्घी बँधा गयी और वह चक्कर में आ गयी। अभी वह सम्हली नहीं थी, इतने ही में उस पिछले जन ने जिसको अब हम देवस्वरूप नाम से पुकारेंगे, कहा-क्यों रे! राक्षसी!! भले घर की बहूबेटी का क्या यही काम है?
लड़की ने कहा, आप क्या कहते हैं, मैं समझ नहीं सकती हूँ। पर जिस भले घर की बहू-बेटी के ऐसे निराले कोठे में, ऐसी अंधियाली रात में, इस भाँति दो अनजान पुरुष धमाचौकड़ी करते हों वह भले घर की बहू-बेटी काहे को है। आप मुझको भले घर की बहू-बेटी न कहिये। मुझको अब इस धरती पर रहना भी भारी है। अब मैं यही चाहती हूँ धरती माता फट जावें और मैं उसमें सम जाऊँ।
देवस्वरूप ने कहा, तुम मत दुखी हो, मैंने तुम्हारा जी देखने के लिए ही वह बात कही थी, अब मुझको तुमसे कुछ नहीं कहना है। मैं कामिनीमोहन से दो-चार बात करना चाहता हूँ। यह कहकर वह कामिनीमोहन की ओर फिरा, उसको कड़ी आँखों से देखकर बोला, देखो कामिनीमोहन! मैं तुम्हारे ऊपर चढ़कर बैठा हूँ, तुम्हारी छुरी यह मेरे हाथ में है, मैं इसको तुम्हारे कलेजे में घुसेड़ दूँ-या तुम्हारे गले में चुभा दूँ, तो तुम अभी तड़प कर मर जाओगे, इस घड़ी तुम्हारा मरना-जीना मेरे हाथ में है। पर सच बात यह है-तुमको जी से मारने के लिए यहाँ नहीं आया हूँ-मैं इस लड़की का धर्म बचाने के लिए यहाँ आया था, राम की दया से वह बात पूरी हुई-मैं तुम्हारा जी लेकर क्या करूँगा। मैं तुमको अब छोड़ दे सकता हूँ। पर यों न छोडूँगा। तुम दो बातों के लिए मुझसे शपथ करो, तभी छोड़ँगा, क्या शपथ करोगे?
कामिनीमोहन ने बहुत धीरे से कहा, आप क्या कहते हैं?
देवस्वरूप ने कहा, मैं यही कहता हूँ-एक तो आज से किसी परायी स्त्री को तुम छल-कपट करके मत फाँसो और न किसी भाँत उसका सत बिगाड़ो-दूसरे आज की जितनी बातें हैं, उनको अपने तक रखना, भूल कर भी किसी से न कहना।
कामिनीमोहन ने एक लम्बी साँस ली-विष की सी घूँट घोंट कर देवस्वरूप की कही हुई बातों के लिए भगवान को बीच देकर शपथ किया, और एक आह भर कर कहा, आप अब मुझको छोड़ दीजिए, मेरा जी निकल रहा है।
अच्छा, जा छोड़ दिया, पर मेरी बात को भूलना मत, बुरा मान कर तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते, मैं ऐसा वैसा मनुष्य नहीं हूँ-धर्म की रक्षा के लिए जो लोग कभी-कभी मनुष्य के रूप में दिखलायी पड़ते हैं-मैं वही हँ, तुम सचेत हो जाओ, धर्म के पथ पर चलोगे, तो आगे को तुम्हारे लिए बहुत अच्छा होगा। यह कहकर देवस्वरूप ने कहा, अच्छा, कामिनीमोहन अब तू इस कोठे से उतर, मैं भी तेरे साथ नीचे चलता हूँ।
इतनी बातचीत होने पीछे बारी-बारी दोनों उसी रस्सी की सीढ़ी से नीचे उतरे। नीचे उतर कर देवस्वरूप ने उस रस्सी की सीढ़ी को खिड़की से खींच कर टुकड़े-टुकड़े कर डाला। देवहूती चुपचाप यह सब लीला देखती रही, पर कोई बात उसकी समझ में नहीं आयी। वह खिड़की के किवाड़ लगाकर फिर अपने पलँग पर सो गयी। पर उसका जी रह-रह कर बहुत घबड़ाता था।
अब भी वर्षा का वही ढंग था, अंधियाली भी वैसी ही गहरी थी, इसी अंधियाली और वर्षा से देवस्वरूप कामिनीमोहन की आँखों से ओझल हुआ। कामिनीमोहन ने अपने दोनों साथियों को इधर-उधर बहुत खोजा, पर उनको कहीं न पाया, चुपचाप मन मारे वह घर आया, आज उसकी रात बहुत ही बेचैनी से कटी।
क्रमशः
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