चैप्टर 13 (अंतिम भाग) नकली नाक : इब्ने सफ़ी का उपन्यास हिंदी में | Chapter 13 Nakli Naak Ibne Safi Novel In Hindi

Chapter 13 Nakli Naak Ibne Safi Novel

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खुलासा

नवाबजादा शाकिर के क़त्ल, शहर में आगजनी, खून, सरकारी कागजात की चोरी और दूसरे इल्ज़ामों के सिलसिले में ज़ाबिर का मुकदमा आज अदालत में पेश होने वाला था। नवाबजादा शाकिर के कत्ल के सिलसिले में कुंवर ज़फ़र अली खां पर दो मुकदमे थे। अदालत ने मुलजिम के कटहरे में उन्हें भी देखा जा सकता था। कुंवर ज़फ़र की आँखें आज पहली बार छलक रही थी। उन्होंने फ़रीदी की तरफ कई बार देखा और इशारों-इशारों में रहम की दरख्वास्त की।

ज़ाबिर अकेला खड़ा था। तमाशाइयों का तांता ऐसे भयानक आदमी को देखने के लिए बेताब था। उनकी समझ में नहीं आता था कि एक आदमी ऐसी बातें किस तरह कह सकता है, जो उनकी समझ से ऊपर है। ख़ुद हमीद भी ज़ाबिर के हालात को ज्यादा नहीं जानता था। सिर्फ यही एक मामला ऐसा रुखा साबित हुआ था, जिसमें उसे कोई औरत ना मिल सकी थी और अगर मिली भी तो जबरदस्ती बीवी बन कर धोखा दे गई।

आखिर वह औरत कौन थी?

गज़ाला और नवाब रशीदुज्ज्मा बहुत ख़ुश थे। उनका महबूब फ़रीदी ज़ाबिर को पकड़ लाया था। कैसी-कैसी गलतफ़हमियों को उन्होंने अपने दिल में जगह दी थी।

बेचारा तारिक अपने नेवले शाकी के अफ़सोस में था, मगर फिर भी नाखुश नहीं था।

उदास सिर्फ सईदा थी। उसका दिल दुआयें मांग रहा था कि कुंवर साहब बेगुनाह साबित हों।

इस अदालत में लेफ्टिनेंट बाकिर की गैरमौजूदगी बुरी तरह खटक रही थी। लोगों का ख़याल था कि शायद भी ऐन वक्त पर आयें।

हालांकि हर शख्स इंस्पेक्टर फ़रीदी का बयान सुनने के लिए बेताब था। किस्सा कुछ इस तरह पेश आया था कि केस बहुत मजेदार बन गया था।

ठीक दस बजे मुकदमे की कार्रवाई शुरू हुई। पुलिस के स्थानीय अफसरों के बयान के बाद इंस्पेक्टर फ़रीदी का बयान शुरू हुआ।

“मेरे बयान के सारे सबूत फाइल में मौजूद है।” फ़रीदी ने अपना बयान देते हुए कहा।

“मैं सबसे पहले यह गलतफ़हमी दूर कर देना चाहता हूँ कि लेफ्टिनेंट बाकिर और ज़ाबिर दो अलग-अलग शख्सियतें नहीं, दरअसल बाकिर और ज़ाबिर एक ही शख्सियत के दो नाम है…ज़ाबिर कौन है? इस पर थोड़ी सी रोशनी डालना ज़रूरी है। पढ़ाई का गलत इस्तेमाल और इंसानी ख्वाहिशों से आगे बढ़ना किस हद तक इंसान को गुमराह कर सकता है, इसकी ज़िन्दा मिसाल ज़ाबिर की पिछली ज़िन्दगी के वाक्यात है। मुज़रिम के कटघरे में खड़ा हुआ यह भयानक शख्स ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लंदन से फिलॉसफी में डिग्री ले चुका है और जर्मनी के ज्यूरिक कॉलेज से साइंस में एम.ए. कर चुका है। कई दिनों तक यह प्रोफ़ेसर भी रहा। इसकी माँ जर्मन औरत थी, बाप हिंदुस्तानी। इसकी पैदाइश हिंदुस्तान में हुई। हालात की बदकिस्मती कि इसने बचपन में अपने हिंदुस्तानी साथियों के हाथों काफ़ी बेइज्जती बर्दाश्त की और उस वक्त से इसके दिल में हिंदुस्तानियों के खिलाफ़ नफ़रत का ज़ज्बा पैदा हुआ। जवानी में यह लंदन पहुँचा। वहाँ से फिलॉसफी में ऊँची तालीम लेने के बाद है जर्मनी गया। वहीं साइंस के तजुर्बे और नाजीवाद की बढ़ती हुई ताकत ने इसका दिमाग दूसरे रास्तों पर डाल दिया। डॉक्टर गोएब्ल्ज़ के जासूसी डिपार्टमेंट में रहकर इसने अपना भेष बदलने, आवाज बदलने का तरीका सीखा और इस सिलसिले में ख़ुद भी इसने कई तजुर्बे किये।

“लड़ाई के वक्त एक तबाही वाला गैस बनाते वक्त इसकी नाक पर कुछ भाप आ गई और वह गल गई। यह इसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा हादसा था।”

“जर्मनी की हार के बाद की माली हालत गिरने लगी। इसे कीमिया बनाने का शौक हुआ और उसी शौक की बिना पर इसकी मुलाकात रंजीत नगर के राजकुमार संग्राम सिंह से हुई और उसी शौक ने राजकुमार की जान ले ली। राजकुमार की जिंसी बीमारियाँ  सिर्फ एक अफ़साना है। ज़ाबिर के जहर ने उन्हें मारा। उनसे वह नुस्खा तो इसे न मिल सका, लेकिन रंजीत नगर के राजकुमार बनने का शौक इसे हिंदुस्तान खींच लाया। इसके पहचानने वालों में से दो इसका शिकार हो गए और एक इस वक्त साजिद के रूप में गवाह है।

“मुंबई में से पता लगा कि रामगढ़ का मशहूर नवाबज़ादा शाकिर सोना बनाने का नुस्खा रखता है। उसके पास कुछ ऐसे किताबें हैं, जिनके बताए हुए उसूलों पर अमल करके इंसान हजारों साल तक ज़िन्दा रह सकता है। ज़ाबिर ने शाकिर से खतों के जरिये दोस्ती बनानी चाहिए। मगर इसमें इसे कामयाबी नहीं मिली।

“वह रामगढ़ आया।

“नवाबजादा शाकिर के काम में शामिल हुआ, जिसमें ज़फर अली खान भी थे। सोना तैयार हो जाने के बाद नवाबजादा शाकिर ने कुंवर साहब को हिस्सा देने से इंकार किया। अपनी एक किताब पर कुंवर साहब ने नवाबजादा को धमकी दी कि अगर उन्होंने इसका हिस्सा ना दिया, तो वे उसे जान से मार डालेंगे और उसके बाद रात में यह फिर नवाबजादा से मिले। इन्होंने अपना हिस्सा भी मांगा और अपनी तहरीर भी वापस मांगी। ज़ाबिर की जानकारी में यह बातें थी। उसने जज सिद्दीक अहमद के बेहतरीन खूबसूरत शीराजी पापोज कबूतर के जोड़े में से एक कबूतर चुराकर और उसे जहरीला छल्ला पहनाकर नवाबजादा के बरामदे में छोड़ दिया। नवाबजादा कबूतरों के रसिया थे। मगर वह कबूतर उठाते ही छल्ला लगा और जहर फैल गया। ठीक उसी वक्त कुंवर ज़फ़र अली खां उनके पास आये। नवाब साहब को मुर्दा देखकर उनके रोंगटे खड़े हो गये। उन्होंने अपनी तहरीर फाड़ी  और भाग गये। ज़ाबिर का आदमी उनकी इस हालत की तस्वीर हासिल कर चुका था। शायद लेफ्टिनेंट बाकिर की तरफ से दायर किए गए मुकदमे में उनके खिलाफ़ यही सबूत पेश किया जाता।

कुंवर ज़फ़र अली बेगुनाह है। गुस्से और झुंझलाहट की उस तहरीर पर उन्हें पछतावा था और उन्होंने नवाबजादा के नाम एक माफीनामा भी लिखा था, जो रिकॉर्ड में शामिल है।”

इतना कहने के बाद फ़रीदी रुका। सुनने वालों पर बिल्कुल ख़ामोशी थी। सईदा का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था। थोड़ी देर ठहरने के बाद फ़रीदी ने अपना बयान फिर शुरू किया।

“ज़ाबिर ने ज़फर और नवाब रशीदुज्जमा वगैरह को मेरे खिलाफ करने और मेरे रास्ते में रोड़ा अटकाने के लिए मेरा भेष बदलकर उनके घर पर डाका डाला और उनके घर से उनकी किताब, जो दरअसल नवाबजादा शाकिर की ज़ायजाद थी, ले उड़ा। उधर नवाबजादा शाकिर की लाइब्रेरी में इत्तेफाक से मेरे हाथ में किताबें लगी,  जिन की ज़ाबिर को तलाश थी। लेफ्टिनेंट बाकिर का किस्सा सुनने के बाद भी मेरा माथा ठनका था। मुंबई के मशहूर सेठों के यहाँ जेवरातों की चोरी की खबर ही मेरे पास थी। लाइब्रेरी में मुझे वह पर्चा मिला, जिसमें नवाबजादा शाकिर के सौतेले भाई के कुछ हालात थे, लेफ्टिनेंट बाकिर और ज़ाबिर का एक ही दिन मुंबई जाना मुझे और खटका। ज़ाबिर को यह यकीन हो गया था कि मैं उसका पीछा ज़रूर करूंगा। उसने मेरे रोकने के तमाम इंतज़ाम भी किए, मगर वह नाकाम रहा। अलबत्ता हालात ने हमारा साथ न दिया। मैं इत्तेफाक से डिब्बा कट जाने की वजह से उसका पीछा ना कर सका और हमीद को ज़ाबिर ही कि एक पिट्ठू ने धोखा दे दिया।

“मुंबई से वापसी पर शाकिर के सौतेले भाई के पूरे मामूलात हासिल कर चुका था। उनकी एक तस्वीर और पुराने खानदानी हालात हासिल करके वह यहाँ आया। फर्जी सबूत और दलीलें…खानदान में सईदा के अलावा और किसी रिश्तेदार का वजूद ना होने से उसको कामयाबी मिल गई।

“उसने अपने आपको सचमुच बाकिर साबित करने के लिए बड़े पापड़ बेले। अफसरों की दावतें करके उसने उन्हें यह भी मौका नहीं दिया कि वह उसके बारे में कुछ सोच सके। सईदा के नाम ज़ायजाद हवाले करके उसने उनका भी मुँह बंद कर दिया।

“अपने साथ लाए हुए एक बेकार नौजवान को अपना लड़का मशहूर करके और फिर ख़ुद ही उसे सिगरेट में जहर देकर और उसकी मौत पर फर्जी आँसू बहाकर उसने सबका दिमाग बेकार कर दिया। किसी शख्स का ख़याल भी इस तरह के ना जा सका। लेकिन कुंवर ज़फ़र अली मुझसे और उससे दोनों से शक करते थे। आग लगने से पहले पर नवाबजादा शाकिर के मकान के पिछले हिस्से की तरफ गये। कई दिन पहले उन्होंने कुछ लोगों को शक की हालत में इधर घूमते देखा था। यही कुरेद उन्हें उस तरफ़ ले गई। उसी वक्त आग लगी। वे भागे, ज़ाबिर के आदमी ने गोली चलाई और भी जख्मी हो गये। यह गलत है कि वे पुलिस की गोली से जख्मी हुये। अस्पताल में ऑपरेशन के बाद निकाली गई गोली इस बात का सबूत है।

“मुझे उसी वक्त शक हुआ था और इसलिए मैं ने नवाब रशीदुज्जमा वगैरह को माथुर साहब के घर जाने की हिदायत की थी। ये लोग गए, मगर लौट आये।

“मुझे अपने होटल के कमरे में फिर से दिनों की आग और कत्ल के वाकयात के बाद अंदाज़ा हो गया था कि मेरे ऊपर भी हमला होगा। इस बीच में तारिक से मुझे खबर मिली कि लेफ्टिनेंट बाकिर मुझसे अकेले में बातें करने का इरादा रखते हैं। मैंने होशियारी से भी दोनों किताबें, जिनकी ज़ाबिर को तलाश थी छुपा दी और ख़ुद बाकिर के घर की तरफ चला गया।  उनके जाने के बाद ही मुझे लाइब्रेरी में ज़ाबिर और नवाबजादा शाकिर के खत मिले। मुझे ऐसे कागजात भी मिले, जिनकी बिना पर ज़ाबिर बाकिर बना फिरता था। मैंने उनकी यह किताब भी देखी, जो इंसानी अंगों की बनावट पर लिख रहा था। उसकी लिखावट की ताजगी यह बता रही थी कि यह अभी लिखी गई है।

“दूसरी तरफ मेरे ज़ेहन में ज़ाबिर की तहरीर भी थी। हालांकि मुझे यकीन हो गया था कि ज़ाबिर और बाकिर एक ही शख्सियत के दो नाम है। ज़ाबिर का उसी वक्त आना और मुझे तहखाने में कैद करना मेरे लिए और यकीनी हो गया।

“मुझे कैद करने के बाद उसने मेरा भेष बदलकर एक तरफ मुझे मजबूर करके किताबी हासिल करना चाही, दूसरी तरफ हमीद को कैद करके एक कांटा रास्ते से हटाया। तीसरी तरफ नवाब साहब वगैरह से जबरदस्ती तहरीर लिखवाकर उनसे रुपए भी ऐंठे और उन्हें मेरा दुश्मन भी बना दिया।

बयान लंबा होने के बावजूद हर शख्स गौर से सुन रहा था। फ़रीदी फिर रुका और हमीद की तरह मुस्कुराते हुए उसने अपना बयान शुरू किया।

“मैं किस तरह छूटा, यह सिर्फ इत्तेफाक था। ज़ाबिर ने मुझे चौबीस घंटे का टाइम दिया था। अठारह घंटे बीतने के बाद शाम को ज़ाबिर का नौकर जब तहखाने में लैंप रखने आया, तो बिजली की तरह मेरे ज़ेहन में एक ख़याल गूंजा। मैंने नौकर के जाते ही अपने बंधे हाथों से लैंप तोड़ डाला और बत्ती की आग से अपने हाथ में बंधी हुई रस्सी को जलाता रहा। हाथ खुलने के बाद मैं आजाद हो गया। दूसरे ही कमरे में हमीद बंद था और उसे छुड़ाने के बाद मैं निकला। हमीद ने ज़ाबिर की बातचीत सुनी थी और उसका ख़याल था कि वह कोलकाता जायेगा; इसलिए कि कुछ अहम सरकारी रिकॉर्ड की कॉपियाँ उसके हाथ लग गई थी, जिन्हें वह जिनेवा में बेचना चाहता था। सईदा के बयान में यह बात पक्की कर दी और हमें कोलकाता से समुद्री सफर से ज़ाबिर को गिरफ्तार करना पड़ा। मेरा बयान खत्म हो रहा है, लेकिन अब एक बात रह जाती है और वह कीमिया का नुस्खा…ज़ाबिर  उसकी तलाश में था। मैं नहीं जानता कि वह उसे हासिल कर सका या नहीं। बहरहाल मुझे वह ना मिल सका।

फ़रीदी बैठ गया। अदालत ने कमरे में सन्नाटा था। ऐसा मालूम होता था जैसे तूफान अपने भयानक आवाज के बाद ठहर गया हो कि अचानक जंजीरे खड़खड़ाई और ज़ाबिर ने इशारा किया। जज साहब के हुक्म पर उसका मुँह खोल दिया गया। उसने कहा।

“मेरे बारे में फ़रीदी साहब ने जो बयान दिया है, वह बिल्कुल सही है। मेरे बारे में जानकारी जिस मुश्किल से जर्मन जबान में लिखे हुए खतों से उन्होंने इकट्ठा की है, उसके लिए वे तारीफ के काबिल हैं। मुझे अपने जुर्म का इकबाल है, लेकिन मेरी कहानी अभी अधूरी है। मेरी एक आरज़ू है कि मेरे हाथ खोल दिए जायें। मैं वादा करता हूँ कि किसी को कोई नुकसान ना पहुँचेगा, बल्कि एक छिपे हुए राज का खुलासा भी हो जायेगा। फ़रीदी साहब जानते हैं कि मैं झूठ नहीं बोलता।”

लोगों में खुसर-फुसर और तरह-तरह की बातें शुरू हो गई थी। इतने में जज साहब के हुक्म से चार सिपाहियों के अलावा दो और सिपाही संगीने लेकर उसके पास खड़े हो गये। हमीद का हाथ अपनी पिस्तौल पर आया और ज़ाबिर की हथकड़ियाँ खोल दी गई।

उसने सुकून से कहा।

“फ़रीदी साहब! कीमिया का नुस्खा और आपकी जानकारी और गुप्त जगह पर रखी हुई किताबें मैंने हासिल कर ली थी। किताबें समुंदर में डूब गई, लेकिन नुस्खा मेरे पास है, मैं जो चाहता हूँ उसे हासिल कर लेता हूँ।” कहते हुए उसने अपने चेहरे से बनावटी नाक उठाई।

दहशत और खौफ़ से गज़ाला और सईदा की चीखें निकल गई। भयानक चेहरा और भयानक हो गया था।

ज़ाबिर ने कहकहा लगाया। अपनी नाक के अंदर से उसने कागज की पुड़िया निकाली, “यह रहा नुस्खा फ़रीदी साहब, मैं जिस्मानी अंगों की बनावट का माहिर हूँ। यह नाक वही कारआमद है।” फ़रीदी नुस्खा लेने के लिए आगे बढ़ा।

“मगर ठहरिए…इसमें जहर है… सोना हासिल करने की कोशिश का नतीजा जहर ही हुआ।” कहते हुए उसने वह पुड़िया मुँह के अंदर रख ली. आधा सेकंड भी ना हुआ था कि वह चकरा कर गिरा और नाक उसके हाथ से फौरन छूट गई।

थोड़ी देर का हंगामा ख़ामोशी में बदल गया। ज़ाबिर की लाश से बड़ी बदबू आ रही थी और अजीब तरह का नीला पानी उसके मुँह से निकल रहा था।

कमरे में सन्नाटा हिचकोले ले रहा था।

***समाप्त*** 

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