चैप्टर 12 तितली जयशंकर प्रसाद का उपन्यास | Chapter 12 Titli Jaishankar Prasad Novel In Hindi

चैप्टर 12 तितली जयशंकर प्रसाद का उपन्यास | Chapter 12 Titli Jaishankar Prasad Novel In Hindi

Chapter 12 Titli Jaishankar Prasad Novel In Hindi

Chapter 12 Titli Jaishankar Prasad Novel In Hindi

शेरकोट में पहुँचकर उसने अपनी चंचल मनोवृत्ति को भरपूर दबाने की चेष्‍टा की, और कुछ अंश तक वह सफल भी हुई, पर अब भी चौबे की राह देख रही थी। बहुत दिनों तक राजकुमारी के मन में यह कुतूहल उत्‍पन्‍न हुआ था कि चौबे के मन में वह बात अभी बनी हुई है या भूल गई। उसे जान लेने पर वह संतुष्‍ट हो जाएगी। बस, और कुछ नहीं। मधुबन ! नहीं, आज वह संध्‍या को घर लौटने के लिए कह गया है तो फिर, रसोई बनाने की भी आवश्‍यकता नहीं। वह स्थिर होकर प्रतीक्षा करने लगी।

किंतु ..बहुत दिनों पर चौबेजी आवेंगे, उनके लिए जलपान का कुछ प्रबंध होना चाहिए। राजकुमारी ने अपनी गृहस्‍थी के भंडार-घर में जितनी हाँडि़यां टटोलीं, सब सूनी मिलीं। उसकी खीझ बढ़ गई। फिर इस खोखली गृहस्‍थी का तो उसे अभी अनुभव भी न हुआ था।

आज माने वह शेरकोट अपनी अंतिम परीक्षा में असफल हुआ।

राजकुमारी का क्रोध उबल पड़ा 1 अपनी अग्निमयी आंखों को घुमाकर वह जिधर ही ले जाती थी, अभाव का क्षोखला मुँह विकृत रूप से परिचय देकर जैसे उसकी हंसी उड़ाने के लिए मौन हो जाता। वह पागल होकर बोली-यह भी कोई जीवन है।

क्‍या है भाभी ! मैं आ गया ! – कहते हुए चौबे ने घर में प्रवेश किया। राजकुमारी अपना घूंघट खींचते हुए काठ की चौकी दिखाकर बाली-बैठिए।

क्‍या कहूँ, तहसीलदार के यहाँ ठहर जाना पड़ा। उन्‍होंने बिना कुछ खिलाएं आने ही नहीं दिया। सो भाभी ! आज तो क्षमा करो, फिर किसी दिन आकर खा जाऊंगा। कुछ मेरे लिए बनाया तो नहीं ?

राजकुमारी रुद्ध कंठ से बोली-नहीं तो, आए बिना मैं कैसे क्‍या करती ! तो फिर कुछ तो …

नहीं आज कुछ नहीं ! हाँ, और क्‍या समाचार है। कुछ सुनाओ। – कहकर चौबे ने एक बार सतृष्‍ण नेत्रों से उस दरिद्र विधवा की ओर देखा।

सुखदेव ! कितने दिनों पर मेरा समाचार पूछ रहे हो, मुझे भी स्‍मरण नहीं, सब भूल गई हूँ। कहने की कोई बात हो भी। क्‍या कहूँ।

भाभी ! मैं बड़ा अभागा हूँ। मैं तो घर से निकाला जाकर कष्‍टमय जीवन ही बीता रहा हूँ। तुम्‍हारे चले आने के बाद मैं कुछ ही दिनों तक घर पर रह सका। जो थोड़ा खेत बचा था उसे बंधक रखकर बड़े भाई के लिए एक स्‍त्री खरीदकर जब आई, तो मेरे लिए रोटी का प्रश्‍न सामने खड़ा होकर हंसने लगा। मैं नौकरी के बहाने परदेश चला। मेरा मन भी वहाँ लगता न था। गांव काटने दौड़ता था। कलकत्ता में किसी तरह एक थेटर की दरबानी मिली। मैं उसके साथ बराबर परदेश घूमने लगा। रसोई भी बनाता रहा। हाँ, बीच में उसके साथ बराबर परदेश घूमने लगा 1 रसोई भी बनाता रहा। हाँ, बीच में मैं संग होने से हारमोनियम सीखता रहा। फिर एक दिन बनारस में जब हमारी कंपनी खेल कर रही थी, राजा साहब से भेंट हो गई। जब उन्‍हें सब हाल मालूम हुआ, तो उन्‍होंने कहा-तुम चलो, मेरे यहाँ सुख से रहो। क्‍यों परदेश में मारे-मारे फिर रहे हो ? तब मैं राजा साहब का दरबारी बना। उन्‍हें कभी कोई अच्‍छी चीज बनाकर खिलाता, ठंडाई बनाता और कभी-कभी बाजा भी सुनाता। मेरे जीवन का कोई लक्ष्‍य न था। रुपया कमाने की इच्‍छा नहीं। दिन बीतने लगे। कभी-कभी, न जाने क्‍यों, तुमको स्‍मरण कर लेता। जैसे इस संसार में …

राजकुमारी ने नस-नस में बिजली दौड़ने लगी थी। एक अभागे युवक का-जो सब ओर से ठुकराए जाने पर भी उसको स्‍मरण करता था। – रूप उसकी आंखों के सामने विराट होकर ममा के आलोक में झलक उठा। वह तन्‍मय होकर सुना रही थी, जैसे उसकी चेतना सहसा लौट आई। अपनी प्‍यास बढ़ाकर उसने पूछा-क्‍यों सुखदेव ! मुझे क्‍यों ?

न पूछो भाभी ! अपने दुख से जब ऊबकर मैं परदेस की किसी की कोठरी में गांव की बातें सोचकर आह कर बैठता था, तब मुझे तुम्‍हारा ध्‍यान बराबर हो आता। तुम्‍हारा दुख क्‍या मुझसे कम है ? और वाह रे निष्‍ठुर संसार ! मैं कुछ कर नहीं सकता था ? वह क्‍यों ?

सुखदेव ! बस करो। वह भूख समय पर कुछ न पाकर मर मिटी है। उसे जानने से कुछ लाथ नहीं। मुझे भी संसार में कोई पूछने वाला है, यह मैं नहीं जानती थी, और न जानना मेरे लिए अच्‍छा था। तुम सुखी हो। भगवान सबका भला करें।

भाभी ? ऐसा न कहो। दो दिन के जीवन में मनुष्‍य मनुष्‍य को यदि नहीं पूछता-स्‍नेह नहीं करता, तो फिर वह किसलिए उत्‍पन्‍न हुआ है। यह सत्‍य है कि सब ऐसे भाग्‍यशाली नहीं होते कि उन्‍हें कोई प्‍यार करे, पर यह तो हो सकता है कि वह स्‍वयं किसी को प्‍यार करे, किसी के दुख-सुख में हाथ बंटाकर अपना जन्‍म सार्थक कर ले।

सुखदेव नाटक में जैसे अभिनय कर रहा था।

राजकुमारी ने एक दीर्घ नि:श्‍वास लिया। वह नि:श्‍वास उस प्राचीन खंडहर में निराश होकर घूम आया था। वह सिर झुकाकर बैठी रही। सुखदेव की आंखों में आंसू झलकने लगे थे। वह दरबारी था, आया था कुछ काम साधने, परंतु प्रसंग ऐसा चल पड़ा कि उसे कुछ साफ-साफ होकर सामने आना पड़ा।

उसकी चतुरता का भाव परास्‍त हो गया था। अपने को सम्‍हालकर कहने लगा-तो फिर मैं अपनी बात न कहूँ ? अच्‍छा, जैसी तुम्‍हारी आज्ञा। एक विशेष काम से तुम्‍हारे पास आया हूँ। उसे तो सुन लोगी।

तुम जो कहोगे, सब सुनूंगी, सुखदेव !

तितली को तो जानती हो न !

जानती हूँ क्‍यों नहीं, अभी आते ही तो उससे भेंट हुई थी।

और हमारे मालिक कुंवर इन्‍द्रदेव को भी ?

क्‍यों नहीं।

यह भी जानती हो कि तुम लोगों के शेरकोट को छीनने का प्रबंध तहसीलदार ने कर लिया है ?

राजकुमारी अब अपना धैर्य न सम्‍हाल सकी, उसने चिढ़कर कहा-सब सुनती हूँ, जानती हूँ, तुम साफ-साफ अपनी बात कहो।

मैंने तहसीलदार को रोक दिया है। वहाँ रहकर अपनी आंखों के सामने तुम्‍हारा अनिष्‍ट होते मैं नहीं देख सकता था। किंतु एक काम तुम कर सकोगी ?

अपने को बहुत रोकते हुए राजकुमारी ने कहा-क्‍या ?

किसी तरह तितली से इन्‍द्रदेव का ब्‍याह करा दो और यह तुम्‍हारी किए होगा। और तुम लोगों से जो जमींदार के घर से बुराई है, वह भलाई में परिणत हो जाएगी। सब तरह का रीति-व्‍यवहार हो जाएगा। भाभी ! हम सब सुख से जीवन बिता सकेंगे।

राजकुमारी निश्‍चेष्‍ट होकर सुखदेव का मुँह देखने लगी, और वह बहुत-सी बात सोच रही थी। थोड़ी देर पर वह बोली-क्‍यों, मेम साहब क्‍या करेंगी ?

उसी को हटाने के लिए तो। तितली को छोड़कर और कोई ऐसी बालिका जाति की नहीं दिखाई पड़ती, जो इंद्रदेव से ब्‍याही जाए, क्‍योंकि विलायत से मेम ले आने का प्रवाद सब जगह फैल गया है।

कुछ देर तक राजकुमारी सिर नीचा कर सोचती रही। फिर उसने कहा-अच्‍छा, किसी दूसरे दिन इसका उत्तर दूंगी।

उस दिन चौबे विदा हुए। किंतु राजकुमारी के मन में भयानक हलचल हुई। संयम के प्रौढ़ भाव की प्राचीर के भीतर जिस चारित्र्य की रक्षा हुई थी, आज वह संधि खोजने लगा था। मानव-हृदय की वह दुर्बलता कही जाती है। किंतु जिस प्रकार चिररोगी स्‍वास्‍थ्‍य की संभावना से प्रेरित होकर पलंग के नीचे पैर रखकर अपनी शक्ति की परीक्षा लेता है, ठीक उसी तरह तो राजकुमारी के मन में कुतूहल हुआ था- अपनी शक्ति को जांचने का। वह किसी अंश तक सफल भी हुई, और उसी सफलता ने और भी चाट बढ़ा दी 1 राजकुमारी परखने लगी थी अपना-स्‍त्री का अवलंब, जिसके सबसे बड़े उपकरण हैं यौवन और सौंदर्य। आत्‍मगौरव, चारित्र्य और पवित्रता तक सबकी दृष्टि तो नहीं पहुँचती। अपनी सांसारिक विभूति और संपत्ति को सम्‍हालने की आवश्‍यकता रखने वाले किस प्राणी को, चिंता नहीं होती ?

शस्‍त्र कुंठित हो जाते हैं, तब उन पर शान चढ़ाना पड़ता है। किंतु राजकुमारी के सब अस्‍त्र निकम्‍मे नहीं थे। उनकी और परीक्षा लेने की लालसा उसके मन में बढ़ी।

उधर हृदय में एक संतोष भी उत्‍पन्‍न हो गया था। वह सोचने लगी थी कि मधुबन की गृहस्‍थी का बोझ उसी पर है। उसे मधुबन की कल्‍याण कामना के साथ उसकी व्‍यावहारिकता भी देखनी चाहिए। शेरकोट कैसे बचेगा, और तितली से ब्‍याह करके दरिद्र मधुबन कैसे सुखी हो सकेगा ? यदि तितली इंद्रदव की रानी हो जाती और राजकुमारी के प्रयत्‍न से, तो वह कितना …

वह भविष्‍य की कल्‍पना से क्षण-भर के लिए पागल हो उठी। सब बातों में सुखदेव की सुखद स्‍मृति उसकी कल्‍पनाओं को और भी सुंदर बनाने लगी।

बुढि़या ने बहुत देर तक प्रतीक्षा की, पर जब राजकुमारी के उठने के, या रसोई-घर में आने के, उसके कोई लक्षण नहीं देखे तो उसे भी लाचार होकर वहाँ से टल जाना पड़ा। राजकुमारी ने अनुभूति भरी आंखों से अपनी अभाव की गृहस्‍थी को देखा और वि‍रक्ति से वहीं चटाई बिछाकर लेट गई।

धीरे-धीरे दिन ढलने लगा। पश्चिम में लाली दौड़ी, किंतु राजकुमारी आलस भरी भावना में डुबकी ले रही थी। उसने एक बार अंगड़ाई लेकर करारों में गंगा की अधखुली धारा को देखा। वह धीरे-धीरे बह रही थी। स्‍वप्‍न देखने की इच्‍छा से उसने आंखें बंद की।

मधुबन आया। उसने आज राजकुमारी को इस नई अवस्‍था में देखा। वह कई बरसों से बराबर, बिना किसी दिन की बीमारी के, सदा प्रस्‍तुत रहने के रूप में ही राजकुमारी हो देखता आता था। किंतु आज वह चौंक उठा। उसने पूछा-

राजो ! पड़ी क्‍यों हो ?

वह बोली नहीं। सुनकर भी जैसे न सुन सकी। मन-ही-मन सोच रही थी। ओह, इतने दिन बीत गए ! इतने बरस ! कभी दो घड़ी की भी छुट्टी नहीं। मैं क्‍यों जगाई जा रही हूँ इसीलिए न कि रसोई नहीं बनी है। तो मैं क्‍या रसोई-दारिन हूँ। आज नहीं बनी-न सही।

मधुबन दौड़कर बाहर आया। बुढि़या को खोजने लगा। वह भी नहीं दिखाई पड़ी। उसने फिर भीतर जाकर रसोई-घर देखा। कहीं धुएं या चूल्‍हा जलने का चिह्न नहीं। बरतनों को उलट-पलट कर देखा 1 भूख लग रही थी। उसे थोड़ा-सा चबेना मिला। उसे बैठकर मनोयोग से खाने लगा। मन-ही-मन सोचता था – आज बात क्‍या है ? डरता भी या कि राजकुमारी चिढ़ न जाय। उसने भी मन में स्थिर किया- आज यहाँ रहूँगा नहीं।

मधुबन का रुठने का मन हुआ। वह चुपचाप जल पीकर चला गया।

राजकुमारी ने सब जान-बूझकर-कहा हूँ। अभी यह हाल है तो तितली से ब्‍याह हो जाने पर तो धरती पर पैर ही न पड़ेंगे।

विरोध कभी-कभी बड़े मनोरंजक रूप में मनुष्‍य के पास धीरे से आता है और अपनी काल्‍पनिक सृष्टि में मनुष्‍य को अपना समर्थन करने के लिए बाध्‍य करता है – अवसर देता है-प्रमाण ढूंढ़ लाता है। और फिर, आंखों में लाली, मन में घृणा, लड़ने का उन्‍माद और उसका सुख-सब अपने-अपने कोनों से निकलकर उसके हाँ-में-हाँ मिलाने लगते हैं।

गोधूलि आई। अंधकार आया। दूर-दूर झोंपड़ियों में दीये जल उठे। शेरकोट का खंडहर भी सायं-सांय करने लगा। किंतु राजकुमारी आज उठती ही नहीं। वह अपने चारों ओर और भी अंधकार चाहती थी।

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